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त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

58 त्रिशतिका
गुणा करके इच्छा (c) से भाग देकर अज्ञात राशि (d) का प्राप्त कर सकते हैं। इस
नियम के अनुसार हम यह सूत्र प्राप्त करते हैं-
प्रमाण (a) ×प्रमाणफल (b)
इच्छाफल (d) = ─────────────────────
इच्छा (c)
इस नियम को प्रस्तुत उदाहरण में समन्वित करते हैं-
अष्टसेतिकहारेण मापिता हारविंशतिः।
सा षट् सेतिकहारेण का संख्या भवितोच्यताम्।। ४०।।
न्यासः 8/1 20/1 6/1 लब्धं हाराः 26 २/३
सुक्षेमा अनुवाद-कुछ सेतिका या मोतियों में से 8-8 मोतियों वाले 20 हार
बनते हैं, तो उतने ही मोतियों में से 6-6 मोतियों वाले कितने हार बनेंगे।
अनुशीलन-यहाँ पूर्वोक्त श्लोक का अर्थ परिवर्तित करके व्युत्क्रमानुपात के
रूप में प्रस्तुत किया गया है।
यहाँ 8 सेतिका वाला हार प्रमाण (a) है। 20 हार प्रमाणफल (b) तथा 6
सेतिका वाला हार इच्छा है। अतः अज्ञात राशि (d) के लिये सूत्रानुसार-
8×20 = 160 = 26 २/३ हार
────── ─────
6 6
यहाँ प्रस्तुत प्रश्नों में 8 तथा 20 इस मान का व्युत्क्रमानुपाती संगत मान प्राप्त
किया गया है। यहाँ तुलना के लिये इन मानों के व्युत्क्रमानुपाती तथा समानुपाती
संगत मान इस तालिका में प्रस्तुत करते हैं-
व्युत्क्रमानुपाती | अनुक्रमानुपाती
मोती x 8ᵃ 6ᶜ | x 8 6
हार y 20ᵇ 26 २/३ᵈ | y 26 २/३ 20
तालिका से स्पष्ट है कि अनुक्रमानुपाती में x के पदों का जो अनुपात है
ठीक वही अनुपात इसके संगत y पदों का भी है। क्योंकि-
8× ३/४ = 6 तथा ८०/३ × ३/४ = 20
────────────────────────────────────────────────────────
१. मुक्ताफलानामष्टभिरिष्टभिः सेतिकैरैकैको हारः कृतः, विंशतिश्च हारा जाताः।
त एव मुक्ताहारा मुक्तावलीकृताः षट्सेतिकहारकल्पनया कियन्तो भवन्ति।। - पाटी-गणित
उदा. 34 पर व्याख्या

त्रिशतिका 59
पर व्युत्क्रमानुपाती तालिका में x के पदों के अनुपात के ठीक विपरीत y
के संगत पदों का है। यह तालिका से स्पष्ट है तथा इस प्रकार भी–
8× ¾ = 6 तथा 20× 4/3 = 80/3
इससे स्पष्ट है कि व्युत्क्रमानुपात में x में प्रथम पद के सापेक्ष दूसरे पद का
अनुपात जितना घटता (या बढ़ता) है, उसके संगत y के प्रथम पद के सापेक्ष दूसरे
पद का अनुपात ठीक उतना ही बढ़ता (या घटता) है। इस स्थिति में व्युत्क्रमानुपात
का विवरण इस प्रकार प्राप्त होता है–
प्रमाण (a) / इच्छाफल (d) = इच्छा (c) / प्रमाणफल (b)
अतः स्वभावतः समीकरण यह प्राप्त होता है–
a × b = c × d
इससे यह समीकरण प्राप्त होता है–
इच्छाफल (d) = [प्रमाण (a) × प्रमाणफल (b)] / इच्छा (c)
इस प्रकार हमने बीजगणितीय समीकरण की विधि से उक्त सूत्र पुनः प्राप्त
कर लिया है। इससे यह भी सिद्ध है कि त्रिशतिका का यह सूत्र वास्तव में
व्युत्क्रमानुपात के एक अज्ञात पद को खोजने का उपाय है।
अन्यदुदाहरणम्
पञ्चरक्तिकमाषेण सुवर्णानां शतत्रयम्।
षष्टिरक्तिकमाषेण¹ का संख्या भवितोच्यताम्॥
5। 300। 60। लब्धं 25।।
सुक्षेमा अनुवाद-यदि 5 रक्तिक (रत्ती) वाले 'माष' वाले तोल से 300
सुवर्ण तोले जाते हैं, तो 60 रत्ती वाले माष वाले तोल से कितने सुवर्ण तुलेंगे।
अनुशीलन-सूत्रानुसार–
(5 × 300) / 60 = 1500 / 60 = 25 सुवर्ण
१. तत् षड्रक्तिक माषेण...पाटी-गणित श्लोक 35
स्पष्टतः 6 रत्ती वाले तोल से 250 सुवर्ण प्राप्त होंगे।

60 त्रिशतिका
समीकरण विधि के अनुसार-
a × b = c × d अतः 60x = 5 × 300
x = (5 × 300) / 60 = 25
स्पष्टतः समीकरण तथा सूत्र सर्वथा समान हैं।
अन्यदुदाहरणम्
सार्धद्वादशवर्णं सुवर्णशतमर्धकोपेतम्।
दत्त्वाऽऽप्यते कियत् तत् सचरणदशवार्णिकं कनकम्¹॥ ४२॥
न्यासः 12 100 10
½ ½ ¼ लब्धं सुवर्णाः 122
पणाः 8। रक्तिकाः 4। रक्तिकाभागश्च 36/41।।
सुगमानुवाद-एक निश्चित मूल्य देकर 12½ या 25/2 वर्ण (carat) वाले
आधे सहित 100 अर्थात् 201/2 'सुवर्ण' प्राप्त होते हैं तो उतना ही मूल्य देकर 10¼
वाले कितने 'सुवर्ण' खरीदे जा सकेंगे।
अनुशीलन-स्पष्टतः सोना जितना हीन

त्रिशतिका 61
सुक्षेमा अनुवाद- विद्वन्! यदि सूत्र के एक निश्चित परिमाण से क्रमशः 3
तथा 9 चौड़ाई तथा लम्बाई वाले 200 कम्बल निर्मित होते हैं। तो उतने ही परिमाण
से 2 तथा 6 चौड़ाई, लम्बाई वाले कितने कम्बल निर्मित होंगे।
अनुशीलन- स्पष्टतः जितने छोटे कम्बल होंगे उतने ही अधिक संख्या में
कम्बल बनेंगे। यहाँ 3 × 9 = 27 वर्गहस्त तथा 2 × 6 = 12 वर्गहस्त क्षेत्रफल मानने
पर-
27 × 200 5400
──────── = ──────── = 450 कम्बल प्राप्त होंगे।
12 12
अथ पञ्चसप्तनवराशिकेषु करणसूत्रमार्या
नीतफले ऽन्यं पक्षं विभजेद् बहुराशिपक्षम Fred?ितरेण।
छेदानां व्यत्यासं कृत्वाभ्यासं च राशीनाम्॥ ३१॥
प्रमाण फल (R) का व्यत्यास या स्थान-परिवर्तन करके उन राशियों का
अभ्यास या गुणित करके बहुराशि पक्ष या अधिक राशि के गुणनफल को इतर या
अल्पराशि पक्ष अर्थात् अल्प राशि के गुणनफल से भाग देने पर पञ्चराशिक की
अज्ञात राशि प्राप्त होती है।
उदाहरणम्
मासेन पञ्चकशते षष्टेर्वर्षेण किं फलं भवति।
फलतश्च कथय कालं ताभ्यामज्ञातमूलं च^२॥ ४४॥
न्यासः 1 12
100 60 लब्धं फलम् 36।
5
कालज्ञानार्थं न्यासः 1 0
100 60 लब्धं कालो मासाः 12
5 36
──────────────────────────────────────────────
१. तुल. ब्रा.स्फु.सि. 12.11, पाटी-गणित सू. 45, ग.सा.सं. 5.32, म.सि. 15.26-27, ग.ति.पृ.
74, सि.शे. 13.15, लीलावती पाञ्चराश्यादिकम् श्लोक 9
२. पाटी-गणित उदा. 39, ग.सा.सं. 5.33, ग.ति.पृ. 75 लीलावती

62 त्रिशतिका
मूलज्ञानार्थ न्यासः 1 12
100 0 लब्धं मूलं 60।
5 36
शतफलेऽज्ञाते न्यासः 1 12
100 60 लब्धं शतफलम् 5
0 36
प्रमाणकालेऽज्ञाते न्यासः 0 12
100 60 लब्धं प्रमाणकालः 1
5 36
सुक्षेमा अनुवाद-100/- रु. का 1 महीने का ब्याज 5/- रु. हो तो 60/-
रु. का 1 वर्ष या 12 महीने का ब्याज फल कितना होगा। इस फल के आधार पर
काल तथा इन दोनों के आधार पर मूलधन को ज्ञात करो। (इनके आधार पर
शतफल तथा प्रमाण भी ज्ञात करो।)
अनुशीलन-इस प्रकार के प्रश्नों में 5 राशियाँ प्रस्तुत की जाती हैं। इनके
द्वारा एक अन्य छठी राशि को ज्ञात करना होता है। अतः इन्हें पञ्चराशिक नाम
दिया गया है। इन प्रश्नों में दो-दो राशियाँ आपस में गुणित होकर अन्य से संगत
मान बनाती हैं। इस दशा में समानुपाती प्रश्न होता है। अथवा एक-एक राशि अन्य
से समानुपात तथा दूसरी एक-एक राशि अन्य से व्युत्क्रमानुपात बनाती हैं। इस
दशा में समानुपात के सूत्र से प्रथम राशि समूह की चतुर्थ राशि ज्ञात करने के
पश्चात् व्युत्क्रमानुपात के सूत्र से द्वितीय राशि समूह की अज्ञात राशि का पता
लगाया जाता है। इस दशा में समानुपात तथा व्युत्क्रमानुपात के पूर्वोक्त सूत्र तथा
समीकरण के पूर्वोक्त नियम ही मूलतः क्रियाशील होते हैं।
इस प्रकार के प्रश्न मुख्यतः ब्याज के प्रश्नों से सम्बन्धित हैं। त्रिशतिकाकार
ने ऐसे प्रश्नों को आसान रीति से सिद्ध करने का प्रयास किया है। इनके अनुसार
इन नामों वाली संख्याओं को क्रम से रख लेते हैं-
प्रमाण राशि पक्ष इच्छा राशि पक्ष
1 प्रमाण काल 12 इच्छा काल (T)
100 प्रमाण धन 60 इच्छा धन (P)
5 प्रमाण फल (R) x अज्ञात फल (ब्याज)

त्रिशतिका 63
अब निम्न सूत्र के अनुसार इनका स्थान परिवर्तन करते हुए प्रमाण-फल
(R) को भाज्य बनाते हुए इस प्रकार लिखते हैं-
प्रमाणफल × इच्छा काल × इच्छा धन
ब्याज = ─────────────────────────────────
प्रमाण काल × प्रमाण धन
अथवा प्रमाण काल 1 तथा प्रमाणधन 100 होने पर-
P . T . R
ब्याज I = ─────────
100
इसके अनुसार इन राशियों को इस प्रकार लिखेंगे-
5 × 12 × 60 3600
x = ─────────── = ──── = 36/= रु. ब्याज
1 × 100 100
यह मूलतः समानुपात का प्रश्न है। यहाँ 100 × 1 का संगत पद 60×12
है। इसमें से 100 का संगत मान 5 बता दिया गया है। अन्य पद का समानुपाती
मान ज्ञात करना है। अतः हम निम्न तालिका प्राप्त करते हैं-
100ᵃ : 60 × 12ᶜ : : 5ᵇ : x ᵈ
अब पूर्वोक्त a × d = b × c के नियमानुसार-
100 x = 5 × 60 ×12
अतः पूर्वोक्त समानुपात के सूत्र या समीकरण के नियमानुसार-
5 × 60 ×12
x = ──────────
100
इस सामान्य नियम से हमने ठीक वही संक्रिया प्राप्त कर ली है, जिसका
इस श्लोक में वर्णन किया गया है। इससे सिद्ध है कि ब्याज के ये प्रश्न मूलतः
समानुपात के प्रश्न हैं।
ब्याज के ज्ञात होने के आधार पर इच्छा काल (T) ज्ञात करना-
यदि इसी प्रश्न का काल अज्ञात हो तो उसे इस प्रकार लिखेंगे-
100/= रु. का 5/= रु. ब्याज 1 महीने में बनता है तो 60/= का 36/= ब्याज
कितने महीने में बनेगा।
यहाँ श्लोक की रीति के अनुसार उपरिलिखित तालिका में से स्थान-परिवर्तन
करके बहुराशि पक्ष को अल्प राशि पक्ष के गुणनफल से भाग देने से अज्ञात राशि
काल ज्ञात होता है। जैसे-

64 त्रिशतिका
तालिका–
प्रमाण राशि पक्ष इच्छा राशि पक्ष
1 0
100 60
5 36
स्थान परिवर्तन करके भाग देने पर–
बहुराशिपक्ष ⇒ 1 × 100 × 36
अल्पराशिपक्ष ⇒ 60 × 5 = 3600 / 300 = 12 मास
वास्तव में बीजगणितीय सामान्य समीकरण से इसका सूत्र प्राप्त हो सकता
है। प्रमाण–काल 1 तथा प्रमाण–धन 100 होने पर–
प्र.फ. × इ.का. × इ.ध. अथवा–
ब्याज = ───────────────────── I. = P. × T. × R.
100 ────────────
ब्याज × 100 100
∴ इच्छाकाल = ───────────── T. = I. × 100
प्र.फ. × इ.ध. ──────────
P. × R.
स्पष्टतः ऊपर श्लोकानुसार यही संक्रिया की गई है। यह प्रश्न व्युत्क्रमानुपात
तथा समानुपात दोनों का होने से इसमें मूलतः उपरिलिखित दोनों सूत्र क्रियाशील
हैं। यहाँ मूलधन तथा काल का व्युत्क्रमानुपात है। क्योंकि एक निश्चित ब्याज की
प्राप्ति के लिये ज्यों–ज्यों मूलधन बढ़ता है (या घटता है) त्यों–त्यों काल घटता है।
(या बढ़ता है) साथ ही ब्याज तथा काल का समानुपात है। क्योंकि एक निश्चित
मूलधन का काल बढ़ने पर उसी अनुपात में ब्याज भी बढ़ता है। अतः पहले
व्युत्क्रमानुपात का सूत्र लगाकर बाद में समानुपात का सूत्र लगाकर अथवा इसके
विपरीत क्रम से भी हल किया जा सकता है। जैसे–
काल का मूलधन के अथवा ऐकिक नियम
साथ व्युत्क्रमानुपात–
मूलधन 100 60 100/= का 5/= ब्याज 1 महीने में
काल (महीना में) 1 x 1 का 5/= ब्याज 100×1 महीना
इस प्रकार 60 x = 100×1
∴ x = 100/60 महीना ∴ 60/= का 5/= ब्याज 100/60 महीने में

त्रिशतिका 65
काल का ब्याज के | अथवा ऐकिक नियम
साथ समानुपात– |
ब्याज 5 36 | 60/= का 5/= ब्याज 100/60 महीने में
काल (महीना में) 100/60 x | 60/= का 1/= ब्याज 100/(60×5) महीना में
इस प्रकार 5 x = 36 × 100/60 |
x = (36×100)/(60×5) | 60/= का 36/= ब्याज (100×36)/(60×5) महीना में
इस स्थिति को क्रम बदलकर भी प्रदर्शित किया जा सकता है। जैसे–
काल का ब्याज के | अथवा ऐकिक नियम से–
साथ समानुपात– |
ब्याज 5 36 | 100/= का 5/= ब्याज 1 महीने में
काल (महीना में) 1 x | 100/= का 1/= ब्याज 1/5 महीने में
इस प्रकार 5 x = 36 |
x = 36/5 | 100/= का 36/= ब्याज 36/5 महीने में
काल का मूलधन से अथवा ऐकिक नियम से–
व्युत्क्रमानुपात–
मूलधन 100 60 | 100/= का 36/= ब्याज 36/5 महीने में
काल (महीना में) 36/5 x | 1/= का 36/= ब्याज 36/5×100 महीने में
इस प्रकार 60 x = 100× 36/5 |
x = (100×36)/(5×60) | 60/= का 36/= ब्याज (36×100)/(5×60) महीने में
स्पष्टतः सभी उपायों से पूर्वोक्त सूत्र प्राप्त कर लिया गया है।
ब्याज (I) के ज्ञात होने पर इच्छाधन मूलधन ज्ञात करना–
इसके लिये प्रश्न को इस प्रकार प्रस्तुत करेंगे–
1 महीने में 5/= रु. ब्याज 100/= रु. मूलधन पर बनता है तो 12 महीने में
36/= ब्याज कितने मूलधन पर बनेगा।

66 त्रिशतिका
यहाँ पूर्वोक्त तालिका- स्थान-परिवर्तन करके भाग देने पर
1 12 बहुराशि ⇒ 100×36×1
100 0 ────────── = 60 मूलधन
5 36 अल्पराशि ⇒ 12×5
बीजगणितीय सामान्य समीकरण से स्थान-परिवर्तन का नियम सर्वथा स्पष्ट
है-
प्रमाण काल 1 तथा प्रधान धन 100 होने पर-
प्र.फ.ᴿ × इ. का.ᵀ × इ.धᴾ अथवा I = P.T.R
ब्याज = ──────────────────── ─────
100 100
ब्याज × 100 P = I × 100
∴ इ.ध (P.) = ───────────── ───────
प्र.फ. × इ.का. T.R.
यहाँ भी पूर्वोक्त के समान समानुपात तथा व्युत्क्रमानुपात दोनों वर्तमान हैं।
किसी निश्चित समय में ब्याज का मूलधन के साथ समानुपात है। क्योंकि ब्याज
बढ़ने पर मूलधन भी बढ़ता है। इस प्रकार
5 : 100 : : 36 : x
अथवा ब्याज ⇒ 5 36
मूलधन ⇒ 100 x
साथ ही किसी निश्चित ब्याज में काल का मूलधन के साथ व्युत्क्रमानुपात
है। क्योंकि काल के बढ़ने या घटने पर मूलधन घटता या बढ़ता है। अतः –
1 : 12 : : x : 720
अथवा काल 1 12
मूलधन 720 x
इस प्रकार समा. तथा व्युत्क्रमा. के दोनों सूत्रों का प्रयोग करते हुए भी वही
उपरिलिखित परिणाम प्राप्त करते हैं-
1 महीने में 5/= ब्याज 100/= मूलधन में
समानुपाती विवरण⟶ 1 महीने में 1/= ब्याज 100 रु. मूलधन में
─────
5
1 महीने में 36/= ब्याज 100 × 36 = 720/= मूलधन में
────────
5

त्रिशतिका 67
व्युत्क्रमानुपाती विवरण→12 महीने में 36/= ब्याज
विवरण व्युत्क्रमा. है, अतः भाग देने पर ⇒ (100 × 36) / (5 × 12) = 60 मूलधन में
स्पष्टतः इस संक्रिया से भी हमने वही परिणाम प्राप्त कर लिया है।
ब्याज के ज्ञात होने पर प्रमाण फल (R) ज्ञात करना—
प्रश्न इस प्रकार प्रस्तुत करेंगे—
12 महीने में 60/= रु. पर ब्याज 36/= बनता है तो 1 महीने में 100/= पर
कितना ब्याज बनेगा।
अथवा
12 महीने में 60/= रु. पर 36/= ब्याज कितने प्रतिशत मासिक दर पर
बनेगा।
यहाँ पूर्वलिखित तालिका—
1 12 बहुराशि 100 × 36 3600
100 60 स्थान परिवर्तन से ⇒ ──────── = ──────── = ──── = 5
0 36 अल्पराशि 12 × 60 720
बीजगणितीय समीकरण से स्थान-परिवर्तन का नियम

68 त्रिशतिका
1 ,, 60/= पर ब्याज ³⁶⁄₁₂/=
1 ,, 1/= पर ब्याज 36
───────
60×12
1 ,, 100/= पर ब्याज 36×100 = 3600 = 5
─────── ────
60×12 720
ब्याज के ज्ञात होने पर प्रमाण काल (period) ज्ञात करना—
प्रश्न इस प्रकार प्रस्तुत करेंगे—
60/= रु. का 36/= ब्याज 12 महीने में बनता है तो 100/= का 5/= रु.
ब्याज कितने महीने में बनेगा।
यहाँ पूर्वलिखित तालिका
0 12
100 60 स्थान परिवर्तन से 100×36 = 3600 = 1
─────── ────
5 36 12×5×60 3600
इस प्रश्न में पूर्वोक्त प्रश्नों से भिन्न प्रमाणकाल 12 महीने तथा प्रमाण-धन

त्रिशतिका 69
100/= का 5/= ब्याज (12×5×60)/(36×100) = 1 महीने में
अथ भिन्नोदाहरणम्
सार्धस्य शतस्य फलं मासत्र्यंशेन रूपमध्यर्धम्।
विचरणसप्तदशानां किं फलमर्धाष्टमैर्मासैः¹॥ ४५॥
न्यासः १/३ 15/2
201/2 67/4 लब्धं फलम् 5 कालाद्याप्तिः प्राग्वत्
३/२ ० ५/८
सुक्षेमा अनुवाद-प्र.का. १/३ मास में 100½ या 201/2 प्र.ध. रूप का 1½ या ३/२
रूप ब्याज प्राप्त होता है, तो 7½ = 15/2 इ.का. मास में 17 - 1/4 इ.ध. अर्थात् 16¾ या
67/4 रूप का कितना ब्याज होगा।
यहाँ ब्याज का पूर्वोक्त सूत्र-
ब्याज = (प्रमाणफल × इच्छाकाल × इच्छाधन) / (प्रमाणकाल × प्रमाण धन)
तदनुसार ⇒ ३/२ × 15/2 × 67/4 × ३/१ × २/२०१ = 18090/3216 = 5 + 2010/3216
2010 ÷ 402 = 5
3216 ÷ 402 = 8
अतः 5 + ५/८ रूप ब्याज
ज्ञात ब्याज के आधार पर काल-
सूत्र-
इ. का. (T.) = (ब्याज × प्र. का. × प्र. ध.) / (प्र. फ. × इ. ध.)
अतः 45/8 × १/३ × २०१/२ × २/३ × ४/६७ = 72360/9648
= 7 + 4824/9648 = 7 ½ या 15/2
ज्ञात ब्याज के आधार पर इ.ध. या मूलधन-
१. तुल. पाटी-गणित उदा. 40, ग.सा.सं. 5.34, ग.ति.पृ. 76

70 त्रिशतिका
सूत्र–
इ.ध. = ब्याज × प्र. का. × प्र. ध.
───────────────────────
प्र. फ. × इ. का.
45/8 × 1/3 × 20 1/2 × 2/3 × 2/15 = 36180/2160 = 16 1620/2160
1620 ÷ 540 = 3 2160 ÷ 540 = 4
= 16 3/4 रूप इ. ध.
ज्ञात ब्याज के आधार पर प्रमाणफल (R.)
प्र. फ. (R.) = ब्याज × प्र. का. × प्र. ध.
─────────────────────────
इ. का. × इ. ध.
45/8 × 1/3 × 20 1/2 × 2/15 × 4/67 = 72360/48240
1 24120/48240 = 1 1/2 रूप
षोडशवार्णिकहेम्नः षष्टिमूल्यं यदा सुवर्णस्य।
कथय तदा दशवार्णिकषष्टेस्त्रियुक्तायाः¹।। ४६।।
न्यासः 16 10 लब्धं रूपाणि 2362
60 63 1/2
सुक्षेमा अनुवाद-यदि 16 वर्ण वाले 1 'सुवर्ण' का मूल्य 60 रूप है तो 10
वर्ण वाले 63 'सुवर्ण' का क्या मूल्य होगा।
अनुशीलन-
16 वर्ण वाले 1 सोने का मूल्य 60 रूप
1 वर्ण वाले 1 सोने का मूल्य 60/16
10 वर्ण वाले 1 सोने का मूल्य 60×10 / 16
10 वर्ण वाले 63 सोने का मूल्य 60×10×63 / 16 = 37800 / 16
= 2362 8/16 = 2362 1/2 रूप
१. तुल. पाटी-गणित उदा. 41, ग.सा.सं. 5.35

त्रिशतिका 71
अन्यदुदाहरणम्
षोडशवार्णिककाञ्चनसुवर्णमूल्यं त्रिसप्ततिर्यत्र।
तत्रैकादशवार्णिकसार्धसुवर्णस्य किं भवति।। ४७।।
16 11
1 लब्धं रूपाणि 75 ९/३२
73 3/2
सुक्षेमा अनुवाद-यदि 16 वर्ण वाले 1 'सुवर्ण' का मूल्य 73 रूप है तो 11
वर्ण वाले 3/2 'सुवर्ण' का मूल्य क्या होगा।
अनुशीलन-
16 वर्ण वाले 1 सोने का मूल्य 73 रूप
1 वर्ण वाले 1 सोने का मूल्य 73/16
11 वर्ण वाले 1 सोने का मूल्य (73×11)/16
11 वर्ण वाले 3/2 सोने का मूल्य (73×11×3)/(2×16) = 2409/32 = 75 ९/३२ रूप
अन्यदुदाहरणम्
कल्याणसुवर्णदलं गुञ्जोनं सार्धविंशतिं लभते।
सार्धैकादशवार्णिक-गुञ्जात्रितयं किमाप्नोति¹।। ४८।।
न्यासः 16/1 23/2
39 3 लब्धं रूपं 1 भागाः 111/832
41/2 0
सुक्षेमा अनुवाद-यदि 16 वर्ण वाले 'कल्याणसुवर्ण' नामक सिक्के के
आधे में 1 गुञ्जा कम अर्थात् 39 गुञ्जा को² 20½ या 41/2 रूप में प्राप्त करता है
तो 11½ या 23/2 वर्ण वाली 3 गुञ्जा कितने मूल्य में प्राप्त करेगा।
16 वर्ण के 39 गुञ्जा का मूल्य 41/2 रूप
1 वर्ण के 39 गुञ्जा का मूल्य 41/(2×16)

१. तुल. पाटी-गणित उदा. 42
२. 80 गुञ्जा का एक 'सुवर्ण' होता है। द्रष्टव्य-त्रिशतिका श्लोक 5।

72 त्रिशतिका
23/2 वर्ण के 39 गुञ्जा का मूल्य 41/2 × 1/16 × 23/2
23/2 वर्ण के 1 गुञ्जा का मूल्य 41/2 × 1/16 × 23/2 × 1/39
23/2 वर्ण के 3 गुञ्जा का मूल्य 41/2 × 1/16 × 23/2 × 1/39 × 3/1 = 2829/2496
⇒ 1 333/2496 = 1 111/832
अन्यदुदाहरणम्
अष्टौ व्रीहिद्रोणा नीयन्ते योजनं पणैः षड्भिः।
खारी द्रोणेन युता कियता वद योजनत्रितयम्¹॥ ४९॥
न्यासः 8 17
1 3 लब्धं पुराणौ 2। पणाः 6। काकिणी 1
6
सुक्षेमा अनुवाद-8 द्रोण व्रीहि को 1 योजन पहुँचाने की भार ढुलाई 6 पण
बनती है। तो 17 द्रोण व्रीहि को 3 योजन पहुँचाने की ढुलाई कितनी होगी।
अनुशीलन-
8 द्रोण व्रीहि 1 योजन 6 पण में।
1 द्रोण व्रीहि 1 योजन 6/8 पण में
17 द्रोण व्रीहि 1 योजन (6×17)/8 पण में
17 द्रोण व्रीहि 3 योजन (6×17×3)/8 = 306/8 पण = 153/4 पण
= 38 + 1/4 पण = 2 पुराण, 6 + 1/4 पण या 6 पण 1 काकिणी
अन्यदुदाहरणम्
यदि कर्मकरत्रितयं दिवसद्वितयेन पञ्च प्राप्नोति।
कर्मकरा अष्ट जना नवभिर्दिवसैः किमाचक्ष्व²॥ ५०॥
न्यासः 3 8
2 9 लब्धं रूपाणि 60
5
१. तुल. पाटी-गणित उदा. 43
२. तुल. पाटी-गणित उदा. 44

त्रिशतिका 73
इति पञ्चराशिकं समाप्तम्।
सुक्षेमा अनुवाद-यदि 3 मजदूर 2 दिन में 5 रूप प्राप्त करते हैं, तो 8
मजदूर 9 दिन में कितना पाएँगे।
3 मजदूर 2 दिन में 5 रूप पाते हैं।
3 मजदूर 1 दिन में 5/2 रूप पाएँगे।
3 मजदूर 9 दिन में (5×9)/2 रूप पाएँगे।
1 मजदूर 9 दिन में (5×9)/(2×3) रूप
8 मजदूर 9 दिन में (5×9×8)/(2×3) रूप = 360/6 = 60 रूप
सप्तराशिके उदाहरणम्
द्विकव्यासाष्टकायामः कम्बलो लभते दश।
ततोऽन्यौ त्रिकव्यासौ नवायामौ किमाप्नुतः१॥ ५१॥
न्यासः 2 3
8 9 लब्धं रूपाणि 33 ¾
1 2
10
इति सप्तराशिकोदाहरणम्
सुक्षेमा अनुवाद-यदि 2 व्यास या चौड़ाई तथा 8 आयाम अर्थात् लम्बाई
वाले 1 कम्बल को 10 रूप में प्राप्त करता है तो 3 चौड़ाई तथा 9 लम्बाई वाले 2
कम्बल को कितने रूप में पाएगा।
2×8 = 16 वर्ग क्षेत्रफल वाला 1 कम्बल 10 रूप में
1 वर्ग क्षेत्रफल वाला 1 कम्बल 10/16 रूप में
3×9 = 27 वर्ग क्षेत्रफल वाला 1 कम्बल (10×27)/16 रूप में

१. तुल. पाटी-गणित उदा. 45

74 त्रिशतिका
27 वर्ग क्षेत्रफल वाला 2 कम्बल 10×27×2 रूप में 540/16

16
= 270/8 = 33 6/8 = 33 ¾ रूप
नवराशिके उदाहरणम्
आयामव्यासपिण्डेषु नवपञ्चैकहस्तका।
लभ्यन्तेऽष्टौ शिला द्वे किं दशसप्तद्विहस्तके१।। ५२।।
न्यासः 1 2
9 10 लब्धम् 49 7/9
5 7
1 2
8 0
सुक्षेमा अनुवाद-9 हाथ लम्बी, 5 हाथ चौड़ी 1 हाथ मोटी 1 शिला 8 रूप
में मिलती है तो 10 हाथ लम्बी, 7 हाथ चौड़ी 2 हाथ मोटी 2 शिला कितने रूप
में मिलेगी।
9×5×1 = 45 घन आयतन की 1 शिला 8 रूप में
1 घन आयतन की 1 शिला 8/45 रूप में
10×7×2 = 140 घन आयतन की 1 शिला 8×140/45 रूप में
140 घन आयतन की 2 शिला 8×140×2/45 = 2240/45
= 448/9 = 49 7/9 रूप में
अन्यदुदाहरणम्
द्विव्यासषट्समुच्छ्रयसप्तायामस्य हस्तिनो द्रोणः।
त्रिव्यासनवसमुच्छ्रयदशदैर्घ्यगजस्य किं भुक्तौ२।। ५३।।
१. तुल. पाटी-गणित उदा. 46
२. तुल. पाटी-गणित उदा. 47

त्रिशतिका 75
1 1
न्यासः 2 3 लब्धं द्रोणाः ३। प्रस्थाः ३। कुडवः 1 कुडवभागाश्च ⁵/₇
6 9
7 10
1 0
इति नवराशिकम्
सुक्षेमा अनुवाद-2 हाथ चौड़े, 6 हाथ ऊँचे, 7 हाथ लम्बे 1 हाथी के लिये
1 द्रोण आहार खर्च होता है। तो 3 हाथ चौड़े 9 हाथ ऊँचे 10 हाथ लम्बे 1 हाथी
के लिये कितना आहार लगेगा।
2×6×7 = 84 घन विस्तार वाले 1 हाथी के लिए 1 द्रोण
1 घन विस्तार वाले 1 हाथी के लिए ¹/₈₄ द्रोण
270 घन विस्तार वाले 1 हाथी के लिए (1×270)/84 = ¹³⁵/₄₂ द्रोण
¹³⁵/₄₂ = 3 ⁹/₄₂ द्रोण, ⁹/₄₂ × 16 = ¹⁴⁴/₄₂ = 3 ¹⁸/₄₂ प्रस्थ
¹⁸/₄₂ × 4 = ⁷²/₄₂ = 1 ³⁰/₄₂ कुडव, ³⁰/₄₂ = ⁵/₇ कुडवभाग
भाण्डप्रतिभाण्डके सूत्रम्
विपरीतकृते मूल्ये भाण्डप्रतिभाण्डके विधिः पूर्वः¹।
सुक्षेमा अनुवाद-भाण्ड प्रतिभाण्डक में मूल्य, फल आदि को विपरीत रीति
से स्थान-परिवर्तन करके पूर्वोक्त विधि करने से अज्ञात राशि प्राप्त होती है।
अनुशीलन-भाण्ड का अर्थ वस्तु है तथा प्रतिभाण्ड विनिमय द्वारा प्राप्त
वस्तु है। यह विधि वस्तु-विनिमय की अज्ञात राशि का ज्ञान कराती है। अतः इसे
'वस्त-विनिमय गणित' भी कहा जाता है।
उदाहरणम्
शुण्ठ्या पलद्वयं षड्भिः पिप्पल्या नवभिः पणैः।
ततः शुण्ठ्याः पलैः षड्भिः पिप्पली कियती भवेत्²॥ ५४॥
१. तुल. ब्रा.स्फु.सि. 12.13, पाटी-गणित सू. 46, ग.सा.सं. 6.18, म.सि. 15.28, ग.ति.पृ. 80
सि.शे. 13.16, लीलावती
२. तुल. पाटी-गणित उदा. 48, ग.सा.सं. 6.19-20

76 त्रिशतिका
न्यासः।। 6 9
2 1 लब्धं पिप्पलीपलद्वयम्
6 0
सुक्षेमा अनुवाद-6 पण से सोंठ के 2 पल तथा 9 पण से पीपल के 1 पल
प्राप्त होते हैं तो 6 पल सोंठ से कितनी पीपल प्राप्त होगी।
अनुशीलन-यहाँ 6, 2, 6 प्रमाण-पक्ष है तथा 9, 1 इच्छा पक्ष है। इसका
स्थान-परिवर्तन करके इस प्रकार लिखते हैं-
(6×1×6) / (9×2) = 36/18 = 2 पल
इस प्रश्न के लिये पहले 1 पण के सापेक्ष दोनों वस्तुओं का समानुपाती
परिमाण स्थापित करते हैं। पुनः इस समानुपाती परिमाण के एक संगत मान के
आधार पर अन्य संगत मान ज्ञात करते हैं। जैसे-
1 पण के सापेक्ष समानुपाती परिमाण-
(I) 6 पण से सोंठ के 2 पल
तो 1 पण से सोंठ के 2/6 पल
अतः समानुपात ⇒ 6 : 2 : : 1 : 2/6
(II) 9 पण से पीपल के 1 पल
तो 1 पण से पीपल के 1/9 पल
अतः समानुपात ⇒ 9 : 1 : : 1 : 1/9
इस प्रकार 1 पण के सापेक्ष 2/6 पल सोंठ तथा 1/9 पल पीपल समानुपाती हैं।
2/6 का संगत मान 6 दिया हुआ है। अतः यह तालिका प्राप्त होती है-
2/6 1/9
6 x अथवा 2/6 : 6 : : 1/9 : x
अतः 2/6 x = 1/9 × 6
⇒ x = 1/9 × 6/1 × 6/2 = 36/18 = 2
इस प्रकार हमने उपरिलिखित विधि प्राप्त कर ली है।
अन्यदुदाहरणम्
पणाभ्यां षोडशाम्राणि कपित्थानां शतं त्रिभिः।
षड्भिरान्रैः कपित्थानि लभ्यन्ते कति कथ्यताम्।। ५५।।

त्रिशतिका 77
न्यासः 2 3
16 100 लब्धं कपित्थानि 25
6 0
इति भाण्डप्रतिभाण्डकम्
सुक्षेमा अनुवाद-2 पण से 16 आम तथा 3 पण से 100 कैथा प्राप्त होते
हैं तो 6 आम के बदले में कितने कैथा प्राप्त होंगे।
अनुशीलन-यहाँ 2, 16, 6 प्रमाण-पक्ष तथा 3, 100 इच्छा पक्ष है। यहाँ भी
पूर्ववत् स्थान-परिवर्तन करके-
(2×100×6)/(3×16) = 1200/48 = 25 कैथा
यहाँ भी पहले 1 पण के सापेक्ष वस्तु-संख्या प्राप्त करते हैं-
(I) 2 पण से 16 आम
1 पण से 16/2 आम
(II) 3 पण से 100 कैथा
1 पण से 100/3 कैथा
अब प्रश्न का आकार यह होता है-
'यदि 1 पण से 16/2 आम तथा 1 पण से 100/3 कैथा हैं तो 6 आम के बदले
में कितने कैथा प्राप्त होंगे।
इससे यह तालिका प्राप्त करते हैं-
16/2 100/3
6 x अथवा 16/2 : 6 : : 100/3 : x
अतः 16/2 x = 100/3 × 6/1
x = (100×6×2)/(3×1×16) = 1200/48 = 25
इस प्रकार हमने उपरिलिखित विधि प्राप्त कर ली है।
जीवस्य विक्रयः स्यात् स एव परिवर्तिते वयसि¹॥ ३२॥
१. तुल. पाटी-गणित सू. 46, ग.ति.पृ. 81, सि.शे. 13.16, ग.कौ. 1.53