सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 94, कुल 208 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 94

66 त्रिशतिका
यहाँ पूर्वोक्त तालिका- स्थान-परिवर्तन करके भाग देने पर
1 12 बहुराशि ⇒ 100×36×1
100 0 ────────── = 60 मूलधन
5 36 अल्पराशि ⇒ 12×5
बीजगणितीय सामान्य समीकरण से स्थान-परिवर्तन का नियम सर्वथा स्पष्ट
है-
प्रमाण काल 1 तथा प्रधान धन 100 होने पर-
प्र.फ.ᴿ × इ. का.ᵀ × इ.धᴾ अथवा I = P.T.R
ब्याज = ──────────────────── ─────
100 100
ब्याज × 100 P = I × 100
∴ इ.ध (P.) = ───────────── ───────
प्र.फ. × इ.का. T.R.
यहाँ भी पूर्वोक्त के समान समानुपात तथा व्युत्क्रमानुपात दोनों वर्तमान हैं।
किसी निश्चित समय में ब्याज का मूलधन के साथ समानुपात है। क्योंकि ब्याज
बढ़ने पर मूलधन भी बढ़ता है। इस प्रकार
5 : 100 : : 36 : x
अथवा ब्याज ⇒ 5 36
मूलधन ⇒ 100 x
साथ ही किसी निश्चित ब्याज में काल का मूलधन के साथ व्युत्क्रमानुपात
है। क्योंकि काल के बढ़ने या घटने पर मूलधन घटता या बढ़ता है। अतः –
1 : 12 : : x : 720
अथवा काल 1 12
मूलधन 720 x
इस प्रकार समा. तथा व्युत्क्रमा. के दोनों सूत्रों का प्रयोग करते हुए भी वही
उपरिलिखित परिणाम प्राप्त करते हैं-
1 महीने में 5/= ब्याज 100/= मूलधन में
समानुपाती विवरण⟶ 1 महीने में 1/= ब्याज 100 रु. मूलधन में
─────
5
1 महीने में 36/= ब्याज 100 × 36 = 720/= मूलधन में
────────
5