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त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

52 त्रिशतिका
समानुपात में संगत पदों का वज्रगुणन फल या व्युत्क्रम गुणनफल बराबर होता है।
इस समीकरण से पुनः वही सूत्र प्राप्त करने में सक्षम हो जाते हैं, जिसका
उल्लेख त्रिशतिकाकार ने किया है-
इच्छाफल (d) = [प्रमाणफल (b) × इच्छा (c)] / प्रमाण (a)
उपर्लिखित विवेचना का निष्कर्ष यह है कि-
I. त्रैराशिक नियम के सभी प्रश्न संगत समानुपात के प्रश्न हैं। इसमें संगत
समानुपात की एक अज्ञात राशि का पता लगाया जाता है।
II. इसमें दो राशियों को विभाजन की विधि से या 1 के सापेक्ष तुलना द्वारा
अनुपात स्थापित किया जाता है।
III. पुनः संगत समानुपात की एक राशि के ज्ञान होने पर दूसरी अज्ञात
समानुपातिक राशि को पहचाना जाता है।
IV. इसके लिये सीधे उपर्लिखित अंकगणितीय सूत्र का या ऐकिक नियम
का या बीजगणितीय समीकरण का उपयोग किया जाता है। प्रत्येक विधि से वही
सूत्र तथा ठीक वही परिणाम प्राप्त होता है।
अन्यदुदाहरणम्
मरिचपलं सत्र्यंशं पणेन यदि लभ्यते सपादेन।
तत् त्र्यंशोनैर्दशभिः पणैः कियत् कथ्यतामाशु।। ३१।।
न्यासः 1 1 10
1/4 1/3 1/3 लब्धं पलानि 10 । कर्षम् 1
माषा 3 । गुञ्जाः 4 । भागाश्च 4/9
सुक्षेमा अनुवाद-यदि 1 1/4 या 5/4 पण से 1 1/3 = 4/3 पल मरिच मिलती है तो
10 - 1/3 = 29/3 पण में कितनी प्राप्त होगी।
यहाँ 5/4 प्रमाण (a), 4/3 प्रमाणफल (b) तथा 29/3 इच्छा (c) है। अतः पूर्वोक्त
सूत्रानुसार-
इच्छा-फल (d) = [(4/3) × (29/3)] / (5/4) = [116 × (4/5)] / 9 = 464/45 पल मरिच
464/45 = 10 14/45 पल, 14/45 × 4 = 56/45 = 1 11/45 कर्ष

भिन्न-व्यवहार एवं त्रैराशिक, पञ्चराशिक नियम (श्लोक ३१-५५)

त्रिशतिका 53
11/45 × 16 = 176/45 = 3 41/45 माष, 41/45 × 5 = 205/45 = 4 25/45 गुंजा
25/45 = 5/9 गुंजा के भाग।
ऐकिक नियम द्वारा प्रश्न का हल-
5/4 पण में 4/3 पल
∴ 1 पण में 4/3 × 4/5 = 16/15 पल
∴ 29/3 पण में 29/3 × 16/15 = 464/45 पल
बीजगणितीय समीकरण द्वारा प्रश्न का हल-
a b c d
हम देखते हैं कि- 5/4 : 4/3 :: 29/3 : x
अतः-
a × d = b × c के अनुसार-
5/4 x = 4/3 × 29/3
⇒ x = 4/3 × 29/3 × 4/5 = 464/45
यह पूर्वोक्त सूत्र के सर्वथा समकक्ष है।
खारीषष्टिः सार्धा रूपशतेन त्रिभागयुक्तेन।
यदि कथय ततो धान्यं रूपस्यैकस्य किं भवति॑॥ ३२॥
न्यासः 60 100 1
1/2 1/3 1 लब्धं खारी 0। द्रोणाः 9
आढकौ 2। प्रस्थौ 2। कुडवः 1। कुडवभागश्च 139/301
सुक्षेमा अनुवाद-100 1/3 या 301/3 रूप से 60 1/2 या 121/2 खारी धान्य प्राप्त होता
है, तो 1 रूप से कितना धान्य प्राप्त होगा।
अनुशीलन-सूत्रानुसार-
121/2 × 3/301 = 363/602 खारी धान्य। पूर्णांक खारी
363/602 × 16 = 2904/301 = 9 195/301 द्रोण, 195/301 × 4 = 780/301 = 2 178/301 आढक
178/301 × 4 = 712/301 = 2 110/301 प्रस्थ, 110/301 × 4 = 440/301 = 1 139/301 कुडव
१. तुल. पाटी-गणित उदा. 28

54 त्रिशातिका
धान्यद्रोणः सार्धः कुडवत्रितयं च लभ्यतेऽष्टाभिः।
तद् द्रोणयुक्तखार्या किं मूल्यं कथ्यतामाशु१।। ३३।।
आद्यन्तयोः कुडवैन्यासः ९९/१ 8/१ 1088/१
लब्धानि रूपाणि 87 भागाश्च ९१/९९
सुक्षेमा अनुवाद-३/२ द्रोण तथा 3 कुडव अर्थात् 99 कुडव धान्य का मूल्य
8 रूप है तो 1 द्रोण से युक्त 1 खारी अर्थात् 1088 कुडव धान्य का मूल्य क्या
होगा।
अनुशीलन-यहाँ सूत्रानुसार-
8 × 1088/99 = 8704/99 = 87 ९१/९९ रूप मूल्य
अन्यदुदाहरणम्
यत्र सुवर्णो लभते रूपाणां सप्ततिं त्रिभागयुताम्।
तत्रैको माषः किं दशभागोनः सखे कथय।। ३४।।
न्यासः 16/1 70 1
1/3 1/10 लब्धानि रूपाणि 3, भागाश्च 153/160
सुक्षेमा अनुवाद-1 सुवर्ण या 16 माष से 70 1/3 या 211/3 रूप प्राप्त होते हैं।
तो 1- 1/10 अर्थात् 9/10 माष से कितने रूप प्राप्त होंगे।
अनुशीलन-यहाँ सूत्रानुसार-
(211/3 × 9/10) / 16 = 633/10 × 1/16 = 633/160 = 3 153/160 रूप
अन्यदुदाहरणम्
पंगुः प्रयाति कश्चिद् दिवसत्रितयेन योजनाष्टांशम्।
योजनशतं स यास्यति निगद्यतां केन कालेन२।। ३५।।
न्यासः 1/8 3/1 100 लब्धं वर्षाणि 6 मास 8
सुक्षेमा अनुवाद-कोई लंगड़ा 1/8 योजन 3 दिन में पार करता है तो वह 100
योजन कितने दिन में पहुँचेगा।

१. तुल. पाटी-गणित उदा. 27-28, ग.सा.सं. 5.2, म.सि. 15.24-25, ग.ति.पृ. 68, लीलावती
त्रैराशिक उदा. 3
२. उदा. 30, ग.सा.सं. 5.3.4, ग.ति.पृ. 72

6। 6। 1000। लब्धं Wait,106। 6। 1000।-> Yes,106। 6। 1000। लब्धं`

  • रूपाणि भाव्यके 56। रूपभागाश्च 32/53
  • सुक्षेमा अनुवाद-यदि 100 में 6 मिलाने पर अर्थात् 106 मूल्य से 6 वस्तुएँ
  • प्राप्त होती हैं तो 1000 मूल्य से कितनी प्राप्त होंगी।
  • अनुशीलन-सूत्रानुसार -
  • 6 × 1000 = 6000/106 = 56 + 64/106 या 32/53 भाग
    Wait, under 6 × 1000 is 106.
  • अन्यदुदाहरणम्
  • अष्टसेतिकहारेण मापिता हारविंशतिः।
  • सा षट् सेतिकहारेण का संख्या भवितोच्यताम्।। ३८।।
  • Footnote:
    १. त्रिशतिका श्लोक 7 के अनुसार 2000 दण्ड का एक कोस, 4 हस्त का 1 दण्ड, 24 अंगुल
    `का 1 हस्त सिद्ध होता है।

56 त्रिशतिका
अत्र त्रैराशिकद्वयम्
यद्येकस्मिन् हारे अष्टौ सेतिकाः स्यु ततो हारविंशत्या कति सेतिकाः स्युरिति।
न्यासः।। 1। 8। 20।। लब्धं सेतिकाः 160
पुनस्त्रैराशिकम्
यदि सेतिकाषट्केनैको हारस्तत् सेतिकाशतेन षष्ट्यधिकेन कति हाराः स्युरिति
न्यासः।। 6। 1। 160। लब्धं हाराः 26 हारभागाश्च 2/3
सुक्षेमा अनुवाद-यदि एक हार में 8 सेतिका या गुरिया हों तो 20 हार में
कितनी गुरियाँ मापी जावेंगी।
श्लेष से अन्य प्रश्न- यदि 6 गुरिया से 1 हार बनता है तो 20×8 = 160
गुरिया से कितने हार बनेंगे।
अनुशीलन-सूत्रानुसार-
प्रथम प्रश्न-
8×20 = 160 गुरियाँ
द्वितीय प्रश्न-160/6 = 26 + 4/6 अर्थात् 26 पूर्ण हार, 2/3 भाग
अन्यदुदाहरणम्
षोडशवर्णककाञ्चनसुवर्णशतमष्टषष्टि-संयुक्तम्।
परिवर्त्य लभ्यते कियदेकादशवर्णकं कनकम्१॥ ३९॥
अत्रापि त्रैराशिकद्वयम्
यद्येकस्मिन् सुवर्णे षोडशवर्णकाः कल्याणसुवर्णस्य षोडशमाषका इत्यर्थः।
तत्सुवर्णशतेऽष्टषष्ट्यधिके कति वर्णकाः स्युरिति। न्यासः।। 1। 16। 168। लब्धं
वर्णकाः 2688
पुनस्त्रैराशिकम्
यद्येकादशभिर्वर्णकैरैकः सुवर्णस्ततः षड्विंशत्याष्टाशीत्यधिकया कियन्तः सुवर्णाः
स्युरिति न्यासः 11। 1। 2688। लब्धं सुवर्णाः 244। माषाः 5। गुञ्जाः 4।
गुञ्जाभागाश्च 1/11।।
१. तुल. पाटी-गणित उदा. 36, ग.सा.सं. 5.18, ग.ति.पृ. 74

त्रिशतिका 57
सुक्षेमा अनुवाद-यदि 1 'सुवर्ण' नामक सिक्के में 16 वर्णक या माषक
होते हैं। तो 68 सहित 100 अर्थात् 168 'सुवर्ण' सिक्के में कितने माषक होंगे।
श्लेष से अन्य प्रश्न- यदि 11 वर्णक वाले सोने का मूल्य एक 'सुवर्ण'
सिक्का है तो 168 × 16 = 2688 वर्णकों का मूल्य कितने सुवर्ण होगा।
त्रिशतिका सूत्र 5 पृ. 3 से प्रकट है कि 'कल्याणसुवर्ण' नामक सिक्का 16
माष का होता है। यह 16 वर्ण अर्थात् 24 कैरेट का सबसे विशुद्ध सोना माना जाता
है।
अनुशीलन-सूत्रानुसार-
प्रथम प्रश्न- 168 × 16 = 2688 माषक व्यस्तत्रैराशिके सूत्रम्
द्वितीय प्रश्न 2688/11 = 244+ 4/11 सुवर्ण
4/11 × 16 = 64/11 = 5 + 9/11 माष
9/11 × 5 = 45/11 = 4 + 1/11 गुंजा, 1/11 गुंजा भाग
आदिगुणितेऽन्त्यभक्ते मध्ये मानान्तरे भवति गणितम् १।
सुक्षेमा अनुवाद-मध्य या प्रमाण फल (b) को आदि प्रमाण (a) से गुणित
करके अन्त्य या इच्छा (c) से भाग करने पर विपरीत मान या व्युत्क्रम अनुपात
वाला गणित सिद्ध होता है।
अनुशीलन-प्रस्तुत श्लोक में विपरीत अनुपात या व्युत्क्रमानुपात के नियम
बताए गए हैं। किन्हीं दो पदों का जो अनुपात है, यदि उनके संगत पदों का ठीक
उनसे विपरीत अनुपात हो तो वे व्युत्क्रमानुपाती पद कहे जावेंगे।
यदि दो पद तथा उनके संगत पदों में से एक की व्युत्क्रमानुपाती राशि बता
दी गई हो तो दूसरी व्युत्क्रमानुपाती राशि प्रस्तुत नियम के द्वारा खोजी जा सकती
है। इसके प्रकार के प्रश्नों में 3 राशियाँ ज्ञात होती है। साथ ही तीसरी संगत राशि
अन्य के सापेक्ष व्युत्क्रम होने से इसे व्यस्तत्रैराशिक नाम दिया गया है।
यहाँ भी प्रमाण को a प्रमाणफल को b तथा इच्छा को c से प्रकट कर सकते
हैं। श्लोक के अनुसार ऐसे प्रश्नों के हल के लिये प्रमाण (a) प्रमाणफल (b) से

१. तुल. ब्रा.स्फु.सि. 12.11 ग.सि. 15.25, लीलावती

58 त्रिशतिका
गुणा करके इच्छा (c) से भाग देकर अज्ञात राशि (d) का प्राप्त कर सकते हैं। इस
नियम के अनुसार हम यह सूत्र प्राप्त करते हैं-
प्रमाण (a) ×प्रमाणफल (b)
इच्छाफल (d) = ─────────────────────
इच्छा (c)
इस नियम को प्रस्तुत उदाहरण में समन्वित करते हैं-
अष्टसेतिकहारेण मापिता हारविंशतिः।
सा षट् सेतिकहारेण का संख्या भवितोच्यताम्।। ४०।।
न्यासः 8/1 20/1 6/1 लब्धं हाराः 26 २/३
सुक्षेमा अनुवाद-कुछ सेतिका या मोतियों में से 8-8 मोतियों वाले 20 हार
बनते हैं, तो उतने ही मोतियों में से 6-6 मोतियों वाले कितने हार बनेंगे।
अनुशीलन-यहाँ पूर्वोक्त श्लोक का अर्थ परिवर्तित करके व्युत्क्रमानुपात के
रूप में प्रस्तुत किया गया है।
यहाँ 8 सेतिका वाला हार प्रमाण (a) है। 20 हार प्रमाणफल (b) तथा 6
सेतिका वाला हार इच्छा है। अतः अज्ञात राशि (d) के लिये सूत्रानुसार-
8×20 = 160 = 26 २/३ हार
────── ─────
6 6
यहाँ प्रस्तुत प्रश्नों में 8 तथा 20 इस मान का व्युत्क्रमानुपाती संगत मान प्राप्त
किया गया है। यहाँ तुलना के लिये इन मानों के व्युत्क्रमानुपाती तथा समानुपाती
संगत मान इस तालिका में प्रस्तुत करते हैं-
व्युत्क्रमानुपाती | अनुक्रमानुपाती
मोती x 8ᵃ 6ᶜ | x 8 6
हार y 20ᵇ 26 २/३ᵈ | y 26 २/३ 20
तालिका से स्पष्ट है कि अनुक्रमानुपाती में x के पदों का जो अनुपात है
ठीक वही अनुपात इसके संगत y पदों का भी है। क्योंकि-
8× ३/४ = 6 तथा ८०/३ × ३/४ = 20
────────────────────────────────────────────────────────
१. मुक्ताफलानामष्टभिरिष्टभिः सेतिकैरैकैको हारः कृतः, विंशतिश्च हारा जाताः।
त एव मुक्ताहारा मुक्तावलीकृताः षट्सेतिकहारकल्पनया कियन्तो भवन्ति।। - पाटी-गणित
उदा. 34 पर व्याख्या

त्रिशतिका 59
पर व्युत्क्रमानुपाती तालिका में x के पदों के अनुपात के ठीक विपरीत y
के संगत पदों का है। यह तालिका से स्पष्ट है तथा इस प्रकार भी–
8× ¾ = 6 तथा 20× 4/3 = 80/3
इससे स्पष्ट है कि व्युत्क्रमानुपात में x में प्रथम पद के सापेक्ष दूसरे पद का
अनुपात जितना घटता (या बढ़ता) है, उसके संगत y के प्रथम पद के सापेक्ष दूसरे
पद का अनुपात ठीक उतना ही बढ़ता (या घटता) है। इस स्थिति में व्युत्क्रमानुपात
का विवरण इस प्रकार प्राप्त होता है–
प्रमाण (a) / इच्छाफल (d) = इच्छा (c) / प्रमाणफल (b)
अतः स्वभावतः समीकरण यह प्राप्त होता है–
a × b = c × d
इससे यह समीकरण प्राप्त होता है–
इच्छाफल (d) = [प्रमाण (a) × प्रमाणफल (b)] / इच्छा (c)
इस प्रकार हमने बीजगणितीय समीकरण की विधि से उक्त सूत्र पुनः प्राप्त
कर लिया है। इससे यह भी सिद्ध है कि त्रिशतिका का यह सूत्र वास्तव में
व्युत्क्रमानुपात के एक अज्ञात पद को खोजने का उपाय है।
अन्यदुदाहरणम्
पञ्चरक्तिकमाषेण सुवर्णानां शतत्रयम्।
षष्टिरक्तिकमाषेण¹ का संख्या भवितोच्यताम्॥
5। 300। 60। लब्धं 25।।
सुक्षेमा अनुवाद-यदि 5 रक्तिक (रत्ती) वाले 'माष' वाले तोल से 300
सुवर्ण तोले जाते हैं, तो 60 रत्ती वाले माष वाले तोल से कितने सुवर्ण तुलेंगे।
अनुशीलन-सूत्रानुसार–
(5 × 300) / 60 = 1500 / 60 = 25 सुवर्ण
१. तत् षड्रक्तिक माषेण...पाटी-गणित श्लोक 35
स्पष्टतः 6 रत्ती वाले तोल से 250 सुवर्ण प्राप्त होंगे।

60 त्रिशतिका
समीकरण विधि के अनुसार-
a × b = c × d अतः 60x = 5 × 300
x = (5 × 300) / 60 = 25
स्पष्टतः समीकरण तथा सूत्र सर्वथा समान हैं।
अन्यदुदाहरणम्
सार्धद्वादशवर्णं सुवर्णशतमर्धकोपेतम्।
दत्त्वाऽऽप्यते कियत् तत् सचरणदशवार्णिकं कनकम्¹॥ ४२॥
न्यासः 12 100 10
½ ½ ¼ लब्धं सुवर्णाः 122
पणाः 8। रक्तिकाः 4। रक्तिकाभागश्च 36/41।।
सुगमानुवाद-एक निश्चित मूल्य देकर 12½ या 25/2 वर्ण (carat) वाले
आधे सहित 100 अर्थात् 201/2 'सुवर्ण' प्राप्त होते हैं तो उतना ही मूल्य देकर 10¼
वाले कितने 'सुवर्ण' खरीदे जा सकेंगे।
अनुशीलन-स्पष्टतः सोना जितना हीन

त्रिशतिका 61
सुक्षेमा अनुवाद- विद्वन्! यदि सूत्र के एक निश्चित परिमाण से क्रमशः 3
तथा 9 चौड़ाई तथा लम्बाई वाले 200 कम्बल निर्मित होते हैं। तो उतने ही परिमाण
से 2 तथा 6 चौड़ाई, लम्बाई वाले कितने कम्बल निर्मित होंगे।
अनुशीलन- स्पष्टतः जितने छोटे कम्बल होंगे उतने ही अधिक संख्या में
कम्बल बनेंगे। यहाँ 3 × 9 = 27 वर्गहस्त तथा 2 × 6 = 12 वर्गहस्त क्षेत्रफल मानने
पर-
27 × 200 5400
──────── = ──────── = 450 कम्बल प्राप्त होंगे।
12 12
अथ पञ्चसप्तनवराशिकेषु करणसूत्रमार्या
नीतफले ऽन्यं पक्षं विभजेद् बहुराशिपक्षम Fred?ितरेण।
छेदानां व्यत्यासं कृत्वाभ्यासं च राशीनाम्॥ ३१॥
प्रमाण फल (R) का व्यत्यास या स्थान-परिवर्तन करके उन राशियों का
अभ्यास या गुणित करके बहुराशि पक्ष या अधिक राशि के गुणनफल को इतर या
अल्पराशि पक्ष अर्थात् अल्प राशि के गुणनफल से भाग देने पर पञ्चराशिक की
अज्ञात राशि प्राप्त होती है।
उदाहरणम्
मासेन पञ्चकशते षष्टेर्वर्षेण किं फलं भवति।
फलतश्च कथय कालं ताभ्यामज्ञातमूलं च^२॥ ४४॥
न्यासः 1 12
100 60 लब्धं फलम् 36।
5
कालज्ञानार्थं न्यासः 1 0
100 60 लब्धं कालो मासाः 12
5 36
──────────────────────────────────────────────
१. तुल. ब्रा.स्फु.सि. 12.11, पाटी-गणित सू. 45, ग.सा.सं. 5.32, म.सि. 15.26-27, ग.ति.पृ.
74, सि.शे. 13.15, लीलावती पाञ्चराश्यादिकम् श्लोक 9
२. पाटी-गणित उदा. 39, ग.सा.सं. 5.33, ग.ति.पृ. 75 लीलावती

62 त्रिशतिका
मूलज्ञानार्थ न्यासः 1 12
100 0 लब्धं मूलं 60।
5 36
शतफलेऽज्ञाते न्यासः 1 12
100 60 लब्धं शतफलम् 5
0 36
प्रमाणकालेऽज्ञाते न्यासः 0 12
100 60 लब्धं प्रमाणकालः 1
5 36
सुक्षेमा अनुवाद-100/- रु. का 1 महीने का ब्याज 5/- रु. हो तो 60/-
रु. का 1 वर्ष या 12 महीने का ब्याज फल कितना होगा। इस फल के आधार पर
काल तथा इन दोनों के आधार पर मूलधन को ज्ञात करो। (इनके आधार पर
शतफल तथा प्रमाण भी ज्ञात करो।)
अनुशीलन-इस प्रकार के प्रश्नों में 5 राशियाँ प्रस्तुत की जाती हैं। इनके
द्वारा एक अन्य छठी राशि को ज्ञात करना होता है। अतः इन्हें पञ्चराशिक नाम
दिया गया है। इन प्रश्नों में दो-दो राशियाँ आपस में गुणित होकर अन्य से संगत
मान बनाती हैं। इस दशा में समानुपाती प्रश्न होता है। अथवा एक-एक राशि अन्य
से समानुपात तथा दूसरी एक-एक राशि अन्य से व्युत्क्रमानुपात बनाती हैं। इस
दशा में समानुपात के सूत्र से प्रथम राशि समूह की चतुर्थ राशि ज्ञात करने के
पश्चात् व्युत्क्रमानुपात के सूत्र से द्वितीय राशि समूह की अज्ञात राशि का पता
लगाया जाता है। इस दशा में समानुपात तथा व्युत्क्रमानुपात के पूर्वोक्त सूत्र तथा
समीकरण के पूर्वोक्त नियम ही मूलतः क्रियाशील होते हैं।
इस प्रकार के प्रश्न मुख्यतः ब्याज के प्रश्नों से सम्बन्धित हैं। त्रिशतिकाकार
ने ऐसे प्रश्नों को आसान रीति से सिद्ध करने का प्रयास किया है। इनके अनुसार
इन नामों वाली संख्याओं को क्रम से रख लेते हैं-
प्रमाण राशि पक्ष इच्छा राशि पक्ष
1 प्रमाण काल 12 इच्छा काल (T)
100 प्रमाण धन 60 इच्छा धन (P)
5 प्रमाण फल (R) x अज्ञात फल (ब्याज)

त्रिशतिका 63
अब निम्न सूत्र के अनुसार इनका स्थान परिवर्तन करते हुए प्रमाण-फल
(R) को भाज्य बनाते हुए इस प्रकार लिखते हैं-
प्रमाणफल × इच्छा काल × इच्छा धन
ब्याज = ─────────────────────────────────
प्रमाण काल × प्रमाण धन
अथवा प्रमाण काल 1 तथा प्रमाणधन 100 होने पर-
P . T . R
ब्याज I = ─────────
100
इसके अनुसार इन राशियों को इस प्रकार लिखेंगे-
5 × 12 × 60 3600
x = ─────────── = ──── = 36/= रु. ब्याज
1 × 100 100
यह मूलतः समानुपात का प्रश्न है। यहाँ 100 × 1 का संगत पद 60×12
है। इसमें से 100 का संगत मान 5 बता दिया गया है। अन्य पद का समानुपाती
मान ज्ञात करना है। अतः हम निम्न तालिका प्राप्त करते हैं-
100ᵃ : 60 × 12ᶜ : : 5ᵇ : x ᵈ
अब पूर्वोक्त a × d = b × c के नियमानुसार-
100 x = 5 × 60 ×12
अतः पूर्वोक्त समानुपात के सूत्र या समीकरण के नियमानुसार-
5 × 60 ×12
x = ──────────
100
इस सामान्य नियम से हमने ठीक वही संक्रिया प्राप्त कर ली है, जिसका
इस श्लोक में वर्णन किया गया है। इससे सिद्ध है कि ब्याज के ये प्रश्न मूलतः
समानुपात के प्रश्न हैं।
ब्याज के ज्ञात होने के आधार पर इच्छा काल (T) ज्ञात करना-
यदि इसी प्रश्न का काल अज्ञात हो तो उसे इस प्रकार लिखेंगे-
100/= रु. का 5/= रु. ब्याज 1 महीने में बनता है तो 60/= का 36/= ब्याज
कितने महीने में बनेगा।
यहाँ श्लोक की रीति के अनुसार उपरिलिखित तालिका में से स्थान-परिवर्तन
करके बहुराशि पक्ष को अल्प राशि पक्ष के गुणनफल से भाग देने से अज्ञात राशि
काल ज्ञात होता है। जैसे-

64 त्रिशतिका
तालिका–
प्रमाण राशि पक्ष इच्छा राशि पक्ष
1 0
100 60
5 36
स्थान परिवर्तन करके भाग देने पर–
बहुराशिपक्ष ⇒ 1 × 100 × 36
अल्पराशिपक्ष ⇒ 60 × 5 = 3600 / 300 = 12 मास
वास्तव में बीजगणितीय सामान्य समीकरण से इसका सूत्र प्राप्त हो सकता
है। प्रमाण–काल 1 तथा प्रमाण–धन 100 होने पर–
प्र.फ. × इ.का. × इ.ध. अथवा–
ब्याज = ───────────────────── I. = P. × T. × R.
100 ────────────
ब्याज × 100 100
∴ इच्छाकाल = ───────────── T. = I. × 100
प्र.फ. × इ.ध. ──────────
P. × R.
स्पष्टतः ऊपर श्लोकानुसार यही संक्रिया की गई है। यह प्रश्न व्युत्क्रमानुपात
तथा समानुपात दोनों का होने से इसमें मूलतः उपरिलिखित दोनों सूत्र क्रियाशील
हैं। यहाँ मूलधन तथा काल का व्युत्क्रमानुपात है। क्योंकि एक निश्चित ब्याज की
प्राप्ति के लिये ज्यों–ज्यों मूलधन बढ़ता है (या घटता है) त्यों–त्यों काल घटता है।
(या बढ़ता है) साथ ही ब्याज तथा काल का समानुपात है। क्योंकि एक निश्चित
मूलधन का काल बढ़ने पर उसी अनुपात में ब्याज भी बढ़ता है। अतः पहले
व्युत्क्रमानुपात का सूत्र लगाकर बाद में समानुपात का सूत्र लगाकर अथवा इसके
विपरीत क्रम से भी हल किया जा सकता है। जैसे–
काल का मूलधन के अथवा ऐकिक नियम
साथ व्युत्क्रमानुपात–
मूलधन 100 60 100/= का 5/= ब्याज 1 महीने में
काल (महीना में) 1 x 1 का 5/= ब्याज 100×1 महीना
इस प्रकार 60 x = 100×1
∴ x = 100/60 महीना ∴ 60/= का 5/= ब्याज 100/60 महीने में

त्रिशतिका 65
काल का ब्याज के | अथवा ऐकिक नियम
साथ समानुपात– |
ब्याज 5 36 | 60/= का 5/= ब्याज 100/60 महीने में
काल (महीना में) 100/60 x | 60/= का 1/= ब्याज 100/(60×5) महीना में
इस प्रकार 5 x = 36 × 100/60 |
x = (36×100)/(60×5) | 60/= का 36/= ब्याज (100×36)/(60×5) महीना में
इस स्थिति को क्रम बदलकर भी प्रदर्शित किया जा सकता है। जैसे–
काल का ब्याज के | अथवा ऐकिक नियम से–
साथ समानुपात– |
ब्याज 5 36 | 100/= का 5/= ब्याज 1 महीने में
काल (महीना में) 1 x | 100/= का 1/= ब्याज 1/5 महीने में
इस प्रकार 5 x = 36 |
x = 36/5 | 100/= का 36/= ब्याज 36/5 महीने में
काल का मूलधन से अथवा ऐकिक नियम से–
व्युत्क्रमानुपात–
मूलधन 100 60 | 100/= का 36/= ब्याज 36/5 महीने में
काल (महीना में) 36/5 x | 1/= का 36/= ब्याज 36/5×100 महीने में
इस प्रकार 60 x = 100× 36/5 |
x = (100×36)/(5×60) | 60/= का 36/= ब्याज (36×100)/(5×60) महीने में
स्पष्टतः सभी उपायों से पूर्वोक्त सूत्र प्राप्त कर लिया गया है।
ब्याज (I) के ज्ञात होने पर इच्छाधन मूलधन ज्ञात करना–
इसके लिये प्रश्न को इस प्रकार प्रस्तुत करेंगे–
1 महीने में 5/= रु. ब्याज 100/= रु. मूलधन पर बनता है तो 12 महीने में
36/= ब्याज कितने मूलधन पर बनेगा।

66 त्रिशतिका
यहाँ पूर्वोक्त तालिका- स्थान-परिवर्तन करके भाग देने पर
1 12 बहुराशि ⇒ 100×36×1
100 0 ────────── = 60 मूलधन
5 36 अल्पराशि ⇒ 12×5
बीजगणितीय सामान्य समीकरण से स्थान-परिवर्तन का नियम सर्वथा स्पष्ट
है-
प्रमाण काल 1 तथा प्रधान धन 100 होने पर-
प्र.फ.ᴿ × इ. का.ᵀ × इ.धᴾ अथवा I = P.T.R
ब्याज = ──────────────────── ─────
100 100
ब्याज × 100 P = I × 100
∴ इ.ध (P.) = ───────────── ───────
प्र.फ. × इ.का. T.R.
यहाँ भी पूर्वोक्त के समान समानुपात तथा व्युत्क्रमानुपात दोनों वर्तमान हैं।
किसी निश्चित समय में ब्याज का मूलधन के साथ समानुपात है। क्योंकि ब्याज
बढ़ने पर मूलधन भी बढ़ता है। इस प्रकार
5 : 100 : : 36 : x
अथवा ब्याज ⇒ 5 36
मूलधन ⇒ 100 x
साथ ही किसी निश्चित ब्याज में काल का मूलधन के साथ व्युत्क्रमानुपात
है। क्योंकि काल के बढ़ने या घटने पर मूलधन घटता या बढ़ता है। अतः –
1 : 12 : : x : 720
अथवा काल 1 12
मूलधन 720 x
इस प्रकार समा. तथा व्युत्क्रमा. के दोनों सूत्रों का प्रयोग करते हुए भी वही
उपरिलिखित परिणाम प्राप्त करते हैं-
1 महीने में 5/= ब्याज 100/= मूलधन में
समानुपाती विवरण⟶ 1 महीने में 1/= ब्याज 100 रु. मूलधन में
─────
5
1 महीने में 36/= ब्याज 100 × 36 = 720/= मूलधन में
────────
5

त्रिशतिका 67
व्युत्क्रमानुपाती विवरण→12 महीने में 36/= ब्याज
विवरण व्युत्क्रमा. है, अतः भाग देने पर ⇒ (100 × 36) / (5 × 12) = 60 मूलधन में
स्पष्टतः इस संक्रिया से भी हमने वही परिणाम प्राप्त कर लिया है।
ब्याज के ज्ञात होने पर प्रमाण फल (R) ज्ञात करना—
प्रश्न इस प्रकार प्रस्तुत करेंगे—
12 महीने में 60/= रु. पर ब्याज 36/= बनता है तो 1 महीने में 100/= पर
कितना ब्याज बनेगा।
अथवा
12 महीने में 60/= रु. पर 36/= ब्याज कितने प्रतिशत मासिक दर पर
बनेगा।
यहाँ पूर्वलिखित तालिका—
1 12 बहुराशि 100 × 36 3600
100 60 स्थान परिवर्तन से ⇒ ──────── = ──────── = ──── = 5
0 36 अल्पराशि 12 × 60 720
बीजगणितीय समीकरण से स्थान-परिवर्तन का नियम

68 त्रिशतिका
1 ,, 60/= पर ब्याज ³⁶⁄₁₂/=
1 ,, 1/= पर ब्याज 36
───────
60×12
1 ,, 100/= पर ब्याज 36×100 = 3600 = 5
─────── ────
60×12 720
ब्याज के ज्ञात होने पर प्रमाण काल (period) ज्ञात करना—
प्रश्न इस प्रकार प्रस्तुत करेंगे—
60/= रु. का 36/= ब्याज 12 महीने में बनता है तो 100/= का 5/= रु.
ब्याज कितने महीने में बनेगा।
यहाँ पूर्वलिखित तालिका
0 12
100 60 स्थान परिवर्तन से 100×36 = 3600 = 1
─────── ────
5 36 12×5×60 3600
इस प्रश्न में पूर्वोक्त प्रश्नों से भिन्न प्रमाणकाल 12 महीने तथा प्रमाण-धन

त्रिशतिका 69
100/= का 5/= ब्याज (12×5×60)/(36×100) = 1 महीने में
अथ भिन्नोदाहरणम्
सार्धस्य शतस्य फलं मासत्र्यंशेन रूपमध्यर्धम्।
विचरणसप्तदशानां किं फलमर्धाष्टमैर्मासैः¹॥ ४५॥
न्यासः १/३ 15/2
201/2 67/4 लब्धं फलम् 5 कालाद्याप्तिः प्राग्वत्
३/२ ० ५/८
सुक्षेमा अनुवाद-प्र.का. १/३ मास में 100½ या 201/2 प्र.ध. रूप का 1½ या ३/२
रूप ब्याज प्राप्त होता है, तो 7½ = 15/2 इ.का. मास में 17 - 1/4 इ.ध. अर्थात् 16¾ या
67/4 रूप का कितना ब्याज होगा।
यहाँ ब्याज का पूर्वोक्त सूत्र-
ब्याज = (प्रमाणफल × इच्छाकाल × इच्छाधन) / (प्रमाणकाल × प्रमाण धन)
तदनुसार ⇒ ३/२ × 15/2 × 67/4 × ३/१ × २/२०१ = 18090/3216 = 5 + 2010/3216
2010 ÷ 402 = 5
3216 ÷ 402 = 8
अतः 5 + ५/८ रूप ब्याज
ज्ञात ब्याज के आधार पर काल-
सूत्र-
इ. का. (T.) = (ब्याज × प्र. का. × प्र. ध.) / (प्र. फ. × इ. ध.)
अतः 45/8 × १/३ × २०१/२ × २/३ × ४/६७ = 72360/9648
= 7 + 4824/9648 = 7 ½ या 15/2
ज्ञात ब्याज के आधार पर इ.ध. या मूलधन-
१. तुल. पाटी-गणित उदा. 40, ग.सा.सं. 5.34, ग.ति.पृ. 76

70 त्रिशतिका
सूत्र–
इ.ध. = ब्याज × प्र. का. × प्र. ध.
───────────────────────
प्र. फ. × इ. का.
45/8 × 1/3 × 20 1/2 × 2/3 × 2/15 = 36180/2160 = 16 1620/2160
1620 ÷ 540 = 3 2160 ÷ 540 = 4
= 16 3/4 रूप इ. ध.
ज्ञात ब्याज के आधार पर प्रमाणफल (R.)
प्र. फ. (R.) = ब्याज × प्र. का. × प्र. ध.
─────────────────────────
इ. का. × इ. ध.
45/8 × 1/3 × 20 1/2 × 2/15 × 4/67 = 72360/48240
1 24120/48240 = 1 1/2 रूप
षोडशवार्णिकहेम्नः षष्टिमूल्यं यदा सुवर्णस्य।
कथय तदा दशवार्णिकषष्टेस्त्रियुक्तायाः¹।। ४६।।
न्यासः 16 10 लब्धं रूपाणि 2362
60 63 1/2
सुक्षेमा अनुवाद-यदि 16 वर्ण वाले 1 'सुवर्ण' का मूल्य 60 रूप है तो 10
वर्ण वाले 63 'सुवर्ण' का क्या मूल्य होगा।
अनुशीलन-
16 वर्ण वाले 1 सोने का मूल्य 60 रूप
1 वर्ण वाले 1 सोने का मूल्य 60/16
10 वर्ण वाले 1 सोने का मूल्य 60×10 / 16
10 वर्ण वाले 63 सोने का मूल्य 60×10×63 / 16 = 37800 / 16
= 2362 8/16 = 2362 1/2 रूप
१. तुल. पाटी-गणित उदा. 41, ग.सा.सं. 5.35

त्रिशतिका 71
अन्यदुदाहरणम्
षोडशवार्णिककाञ्चनसुवर्णमूल्यं त्रिसप्ततिर्यत्र।
तत्रैकादशवार्णिकसार्धसुवर्णस्य किं भवति।। ४७।।
16 11
1 लब्धं रूपाणि 75 ९/३२
73 3/2
सुक्षेमा अनुवाद-यदि 16 वर्ण वाले 1 'सुवर्ण' का मूल्य 73 रूप है तो 11
वर्ण वाले 3/2 'सुवर्ण' का मूल्य क्या होगा।
अनुशीलन-
16 वर्ण वाले 1 सोने का मूल्य 73 रूप
1 वर्ण वाले 1 सोने का मूल्य 73/16
11 वर्ण वाले 1 सोने का मूल्य (73×11)/16
11 वर्ण वाले 3/2 सोने का मूल्य (73×11×3)/(2×16) = 2409/32 = 75 ९/३२ रूप
अन्यदुदाहरणम्
कल्याणसुवर्णदलं गुञ्जोनं सार्धविंशतिं लभते।
सार्धैकादशवार्णिक-गुञ्जात्रितयं किमाप्नोति¹।। ४८।।
न्यासः 16/1 23/2
39 3 लब्धं रूपं 1 भागाः 111/832
41/2 0
सुक्षेमा अनुवाद-यदि 16 वर्ण वाले 'कल्याणसुवर्ण' नामक सिक्के के
आधे में 1 गुञ्जा कम अर्थात् 39 गुञ्जा को² 20½ या 41/2 रूप में प्राप्त करता है
तो 11½ या 23/2 वर्ण वाली 3 गुञ्जा कितने मूल्य में प्राप्त करेगा।
16 वर्ण के 39 गुञ्जा का मूल्य 41/2 रूप
1 वर्ण के 39 गुञ्जा का मूल्य 41/(2×16)

१. तुल. पाटी-गणित उदा. 42
२. 80 गुञ्जा का एक 'सुवर्ण' होता है। द्रष्टव्य-त्रिशतिका श्लोक 5।