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त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

76 त्रिशतिका
न्यासः।। 6 9
2 1 लब्धं पिप्पलीपलद्वयम्
6 0
सुक्षेमा अनुवाद-6 पण से सोंठ के 2 पल तथा 9 पण से पीपल के 1 पल
प्राप्त होते हैं तो 6 पल सोंठ से कितनी पीपल प्राप्त होगी।
अनुशीलन-यहाँ 6, 2, 6 प्रमाण-पक्ष है तथा 9, 1 इच्छा पक्ष है। इसका
स्थान-परिवर्तन करके इस प्रकार लिखते हैं-
(6×1×6) / (9×2) = 36/18 = 2 पल
इस प्रश्न के लिये पहले 1 पण के सापेक्ष दोनों वस्तुओं का समानुपाती
परिमाण स्थापित करते हैं। पुनः इस समानुपाती परिमाण के एक संगत मान के
आधार पर अन्य संगत मान ज्ञात करते हैं। जैसे-
1 पण के सापेक्ष समानुपाती परिमाण-
(I) 6 पण से सोंठ के 2 पल
तो 1 पण से सोंठ के 2/6 पल
अतः समानुपात ⇒ 6 : 2 : : 1 : 2/6
(II) 9 पण से पीपल के 1 पल
तो 1 पण से पीपल के 1/9 पल
अतः समानुपात ⇒ 9 : 1 : : 1 : 1/9
इस प्रकार 1 पण के सापेक्ष 2/6 पल सोंठ तथा 1/9 पल पीपल समानुपाती हैं।
2/6 का संगत मान 6 दिया हुआ है। अतः यह तालिका प्राप्त होती है-
2/6 1/9
6 x अथवा 2/6 : 6 : : 1/9 : x
अतः 2/6 x = 1/9 × 6
⇒ x = 1/9 × 6/1 × 6/2 = 36/18 = 2
इस प्रकार हमने उपरिलिखित विधि प्राप्त कर ली है।
अन्यदुदाहरणम्
पणाभ्यां षोडशाम्राणि कपित्थानां शतं त्रिभिः।
षड्भिरान्रैः कपित्थानि लभ्यन्ते कति कथ्यताम्।। ५५।।

त्रिशतिका 77
न्यासः 2 3
16 100 लब्धं कपित्थानि 25
6 0
इति भाण्डप्रतिभाण्डकम्
सुक्षेमा अनुवाद-2 पण से 16 आम तथा 3 पण से 100 कैथा प्राप्त होते
हैं तो 6 आम के बदले में कितने कैथा प्राप्त होंगे।
अनुशीलन-यहाँ 2, 16, 6 प्रमाण-पक्ष तथा 3, 100 इच्छा पक्ष है। यहाँ भी
पूर्ववत् स्थान-परिवर्तन करके-
(2×100×6)/(3×16) = 1200/48 = 25 कैथा
यहाँ भी पहले 1 पण के सापेक्ष वस्तु-संख्या प्राप्त करते हैं-
(I) 2 पण से 16 आम
1 पण से 16/2 आम
(II) 3 पण से 100 कैथा
1 पण से 100/3 कैथा
अब प्रश्न का आकार यह होता है-
'यदि 1 पण से 16/2 आम तथा 1 पण से 100/3 कैथा हैं तो 6 आम के बदले
में कितने कैथा प्राप्त होंगे।
इससे यह तालिका प्राप्त करते हैं-
16/2 100/3
6 x अथवा 16/2 : 6 : : 100/3 : x
अतः 16/2 x = 100/3 × 6/1
x = (100×6×2)/(3×1×16) = 1200/48 = 25
इस प्रकार हमने उपरिलिखित विधि प्राप्त कर ली है।
जीवस्य विक्रयः स्यात् स एव परिवर्तिते वयसि¹॥ ३२॥
१. तुल. पाटी-गणित सू. 46, ग.ति.पृ. 81, सि.शे. 13.16, ग.कौ. 1.53

78 त्रिशतिका
सुक्षेमा अनुवाद-जीव के विक्रय वाले प्रश्नों में वयः को स्थान्तरित करके
वही पूर्वोक्त पाञ्चराशिक विधि अपनाई जाती है।
उदाहरणम्
षोडशवर्षाणां यदि पञ्च लभन्ते शतद्वयं विद्वन्।
तत् किं विंशति वर्षे उभे लभेते ममाचक्ष्व¹।। ५६।।
न्यासः 5 2
16 20 लब्धं पुराणाः 64
200 0
इति जीवविक्रयः।
सुक्षेमा अनुवाद-हे विद्वन्! 16 बरस की 5 दासियाँ 200 पुराण प्राप्त करती
हैं। तो 20 बरस की 2 दासियाँ कितना प्राप्त करेंगी।
अनुशीलन-यह उदाहरण उस काल में दास-दासियों के क्रय-विक्रय की
प्रथा को प्रकट करता है। यह समानुपात, व्यस्तत्रैराशिक या व्युत्क्रमानुपात दोनों का
उदाहरण है। क्योंकि जैसे-जैसे दासियों की संख्या बढ़ती है, उनका मूल्य भी बढ़ता
है। साथ ही जैसे-जैसे दासियों की उम्र बढ़ती है, उनका मूल्य घटता है²। अतः
समानु., व्युत्क्रमा. के सूत्रों के समन्वय के साथ-
16 बरस की 5 दासियाँ 200 पुराण प्राप्त करती हैं
अतः 20 बरस की 2 दासी (200×16×2)/(5×20) = 6400/100 = 64 पुराण
अथ मिश्रकव्यवहारे शुद्धस्थानलाभे करणसूत्रमार्या
निजकालेनाहन्यात् प्रमाणराशिं फलेन परकालम्।
तौ स्वयुतिहृतौ स्यातां मिश्रगुणौ मूलवृद्धिधने³।। ३३।।
सुक्षेमा अनुवाद-प्रमाण राशि (standard principal = SP) (सामान्यतः
100) को निज काल याने प्रमाण काल (standard period = y) से गुणन करे।
१. पाटी-गणित उदा. 50, ग.सा.सं. 5.40, ग.ति.पृ. 81, ग.कौ.पृ. 53 लीलावती
२. उम्र बढ़ने से मल्य घटता है→ भुज्यमानवस्त्रन्यायेन क्षणात् क्षणे जीर्णतापत्तौ मूल्यापचयात्।
यावत्तु वयः सारानन्तरं तावदपचीयते मूल्यमधिकवयसः, तात्त्विकमूल्यमनवयसस्तूपचीयते -
पाटी-गणित श्लोक 50 पर टीका पृ. 52
३. तुल. ब्रा.स्फु.सि. 12.14, पाटी-गणित सू. 47, ग.सा.सं. 6.21-23, म.सि. 15.31, ग.ति.पृ.
82, सि.शे. 13.17 लीलावती

त्रिशतिका 79
पश्चात् प्रमाणफल (rate) को परकाल (time) से गुणा करे। इन दोनों गुणनफल
को जोड़ देवे। पश्चात् इस गुणनफल से मिश्रधन (Amount) प्रमाण राशि (SP)
प्रमाण काल (y) के गुणनफल को विभक्त करें। इससे मूलधन (Principal) प्राप्त
होता है।
साथ ही पूर्वोक्त गुणनफल से मिश्रधन (A) तथा गुण अर्थात् प्रमाण फल
(R) तथा मिश्रकाल या परकाल (t) के गुणनफल को विभक्त करने से ब्याज (I)
प्राप्त होता है।
इससे हमें मूलधन तथा ब्याज ज्ञात करने के लिये यह सूत्र प्राप्त होता है—
मिश्रधन × प्रमाण धन × प्रमाणकाल
मूलधन = ——————————————————————————————————————
प्रमाण धन × प्रमाणकाल + परकाल × प्रमाणफल
A × SP × Y
अथवा P = ————————————————
SP × Y + t × R
मिश्रधन × पर काल × प्रमाणफल
ब्याज = ———————————————————————————————————
प्रमाण धन × प्रमाणकाल + परकाल × प्रमाणफल
A × t × R
अथवा I = ————————————————
SP × Y + t × R
उदाहरणम्
मासेन पञ्चकशते मूलफलैक्यं चतुर्विहीनशतम्।
दृष्टं वर्षेण सखे किं मूलं तत्र किं च फलम्¹॥ ५७॥
न्यासः 1 12
100 96 लब्धं मूलधनम् 60। वृद्धिः 36
5
सुक्षेमा अनुवाद-5/= रु. सैकड़ा मासिक ब्याज की दर से एक वर्ष में
मूलधन तथा ब्याज (अर्थात् मिश्रधन) 96 होता है। तो इसका अलग-2 मूलधन
तथा ब्याज बताओ।
अनुशीलन-प्रस्तुत उदाहरण में पूर्वोक्त सूत्र के द्वारा मिश्रधन के परिज्ञान के
आधार पर मूलधन तथा ब्याज का पता लगाया गया है। यहाँ 5/= प्रमाणफल
(rate), सैकड़ा या 100/= प्रमाण राशि (standard Principal= SP), 1 महीना
१. तुल. पाटी-गणित उदा. 52, ग.सा.सं. 6.22-24, ग.ति.पृ. 83, ग.कौ.पृ. 60 लीलावती

80 त्रिशतिका
प्रमाण काल (standard period = y), 1 वर्ष या 12 महीना परकाल (time),
96/= रु. मिश्रधन (Amount) है। अब पूर्वोक्त सूत्र के अनुसार–
मूलधन = 96×100×1 / (100×1+12×5) = 9600 / 160 = 60
ब्याज = 96×12×5 / (100×1+12×5) = 5760 / 160 = 36
यह सूत्र मूलतः समानुपात से सम्बन्धित है। अतः उन नियमों से इसे प्राप्त
किया जा सकता है। इसके लिये पहले 100/= मूलधन पर 5/= सैकड़ा मासिक
ब्याज की दर से मिश्रधन ज्ञात करते हैं–
100/= मूलधन पर 5/= सैकड़ा मासिक ब्याज की दर से 12 मास का
ब्याज 12 × 5 = 60
अतः 100/= का मिश्रधन 100×1+12×5 = 160
160/= मिश्रधन पर 100/= मूलधन
1/= मिश्रधन पर 100×1 / (100×1+12×5) = 100 / 160
96/= मिश्रधन पर 96×100×1 / (100×1+12×5) = 9600 / 160 = 60 मूलधन
इस प्रकार हमने मूलधन का ज्ञान करते हुए ठीक उपरिलिखित सूत्र प्राप्त
कर लिया है।
अब 160/= मिश्रधन पर 12×5 = 60/= ब्याज
1/= मिश्रधन पर 12×5 / (100×1+12×5) = 60 / 160 ब्याज
96/= मिश्रधन पर 96×12×5 / (100×1+12×5) = 5760 / 160 = 36 ब्याज
इस प्रकार पुनः वही सूत्र प्राप्त हो गया है।
यहाँ 160/= मिश्रधन का प्रश्नोक्त समय तथा दर के हिसाब से 100/=
मूलधन प्राप्त किया गया है। इस अनुपात की 96 मिश्रधन के आधार पर समानुपात
की खोज की गई है। इस प्रकार हमें यह अनुपात प्राप्त होता है–
160 : 100 : : 96 : x

त्रिशतिका 81
समानुपात के सूत्रानुसार—
160 x = 100×96
x = 100×96 / 160 = 9600 / 160 = 60/= मूलधन
इसी प्रकार 160/= मिश्रधन के अन्तर्गत का 60/= ब्याज होने पर 96/=
मिश्रधन के आधार पर मिश्रधन तथा ब्याज का यह समानुपात प्राप्त होता है—
160 : 60 : : 96 : x
160 x = 60×96
x = 60×96 / 160 = 5760 / 160 = 36/= ब्याज
इस प्रकार हमने समीकरण के सामान्य उपाय से पुनः वही सूत्र प्राप्त कर
लिया है।
अथ भिन्नोदाहरणम्
सार्धस्य शतस्य फलं सपादमासेन रूपमध्यर्धम्।
फलमूलैक्यं षट्कृतिरर्धयुतार्धाष्टमैर्मासैः१॥ ५८॥
न्यासः 5/4 15/2
201/2 73/2 लब्धं मूलधनम् 33
3/2 ½ वृद्धिः 3
इति मिश्रव्यवहारः।
सुक्षेमा अनुवाद-1¼ = 5/4 महीने में 100½ = 201/2 रूप का ब्याज 1½ =
3/2 रूप होता है तो 7½ = 15/2 मास में 6² = 36 तथा ½ = 73/2 मिश्रधन का मूलधन
तथा ब्याज क्या होगा।
यहाँ पूर्वोक्त सूत्र को समन्वित करने से पहले राशियों को समानुपात में
स्थापित करते हैं—
5/4 महीने में 201/2 रूप का ब्याज 3/2/= रूप
1 महीने में 201/2 रूप का ब्याज 3/2 × 4/5 = 12/10 = 6/5 रूप
————————————————————————————————
१. तुल. पाटी-गणित उदा. 53

82 त्रिशतिका

1 महीने में 1 रूप का ब्याज 6/5 × 2/201 = 12/1005 = 4/335 रूप
1 महीने में 100 रूप का ब्याज 4/335 × 100 = 400/335 = 80/67 रूप
अब प्रश्न का आकार यह है-
80/67 रूप सैकड़ा मासिक ब्याज की दर से 15/2 मास में 73/2 मिश्रधन होता है।
तो इसका मूलधन तथा ब्याज बताओ।
पूर्वोक्त सूत्रानुसार-
(73/2 × 100 × 1) / (100 × 1 + 15/2 × 80/67) = 3650 / (100 + 600/67) = 3650 / (7300 / 67)
= 3650 × 67/7300 = 244550 / 7300 = 33½ रूप मूलधन
इसी प्रकार
(73/2 × 15/2 × 80/67) / (100×1 + 15/2 × 80/67) = (43800 / 134) / (7300 / 67) = 21900/67 × 67/7300 = 3 रूप ब्याज
ऐकिक नियम से यह हल आसानी से प्राप्त है। पूर्वोक्तानुसार-
1 महीने में 1 रूप का ब्याज 4/335
7½ महीने में 1 रूप का ब्याज 4/335 × 15/2 = 60/670 = 6/67
अतः 7½ महीने का मिश्रधन 1 + 6/67 = 73/67
73/67 मिश्रधन पर 1 रूप मूलधन
तो 73/2 मिश्रधन पर मूलधन 73/67 : 1 : : 73/2 : x
⇒ x = 73/2 × 67/73 = 67/2 = 33½ रूप मूलधन
तथा 73/2 - 67/2 = 6/2 = 3 रूप ब्याज
अथ भाव्यक सूत्रम्
कालप्रमाणघातो गतकालहताः फलादयश्चैते।
स्वयुतिहता मिश्रगुणा भवन्ति मूलादयः क्रमश:¹।। ३४।।
१. तुल. परकालहता: - पाटी-गणित सू. 48, ग.ति.पृ. 83, सि.शे. 13.18

त्रिशतिका 83
सुक्षेमा अनुवाद-प्रमाण-काल को प्रमाण-धन से गुणित करें। पश्चात्
परकाल को प्रमाण-फल आदि अर्थात् भव्यक या प्रतिभू, वृत्ति या गणक तथा
ऋण-पत्र लेखक के अंश के योग से गुणित करे। इन दोनों के योगफल से
मिश्रधन गुणित प्रमाण-धन तथा प्रमाण-काल को विभक्त करने से मूलधन प्राप्त
होता है तथा इन योगफल से मिश्रधन गुणित परकाल तथा प्रमाण-फल को विभक्त
करने से ब्याज प्राप्त होता है।
उदाहरणम्
मासेन शतस्य फलं पञ्चैको भव्यकेऽर्धमथ वृत्तौ।
लेखकपादो वर्षे पञ्चाधिक-नवशती मिश्रम्।। ५९।।
1
न्यासः 100 12 मिश्रका भागा भव्यकादीनाम् 1 ½ ¼
5
मिश्रधनम् 905। लब्धं मूलधनम् 500 कलान्तरम् 300। भव्यके 60 वृत्तौ
30। लेखकस्य 15। इति भव्यकव्यवहारः॥
सुक्षेमा अनुवाद-100/- रु. पर 5/= मासिक ब्याज की दर से 1 वर्ष या
12 मास में 905/= मिश्रधन बनता है। इस ब्याज के साथ भव्यक या जमानतदार
के लिये 1% प्रतिमास, वृत्ति या गणक अर्थात् मुनीम के लिये ½% प्रतिमास तथा
ऋण पत्र लेखक के लिए ¼% प्रतिमास भी देय होता है। तो इस मिश्रधन का मूलध-
न, इसका ब्याज तथा जमानतदार, मुनीम तथा लेखक को प्राप्त होने वाला
अलग-2 भाग भी बताओ।
अनुशीलन-यह सूत्र मिश्रकव्यवहार में मूलधन के लिये पूर्वोक्त सूत्र नं. 33
के लिये समतुल्य है। अन्तर केवल यह है कि यहाँ ऋणदाता के लिये 5/= मासिक
ब्याज के साथ-साथ जमानतदार, मुनीम तथा लेखक के लिए भी अलग-अलग
निश्चित प्रतिशत देना है। अतः प्रस्तुत उदाहरण में 5 + 1 + ½ + ¼ = 27/4 प्रतिशत
मासिक के हिसाब से उस बेचारे कर्जदार द्वारा धन चुकाया जाना है। अतः यहाँ
परकाल को प्रमाणफल के साथ जमानतदार आदि के प्रतिशत भाग के योग के
साथ गुणित किया जावेगा। इस प्रकार हमें यह सूत्र प्राप्त होता है-
सूत्र-
मिश्रधन × प्रमाण-धन × प्रमाणकाल
मूलधन = -----------------------------------------------------------------
प्रमाण धन × प्रमाणकाल + (सभी प्रमाणफलों का योग) × परकाल

84 त्रिशतिका
उदाहरण-
905 × 100 × 1
─────────────────────────────
100 × 1 + (5 + 1 + ½ + ¼) 12 = 90500 = 500 मूलधन
─────
181
मिश्रधन × परकाल × प्रमाणफल
ब्याज= ──────────────────────────────────────────────────────────
प्रमाण धन × प्रमाणकाल + (सभी प्रमाणफलों का योग)×परकाल
उदाहरण-
905 × 12 × 5
─────────────────────────────
100 × 1 + (5 + 1 + ½ + ¼) 12 = 54300 = 300 ब्याज
─────
181
भाव्यक का धन =
100/=पर 1 मास में 1/=
100/=पर 12 मास में 12/=
500/=पर 12 मास में 12×5=60 रूप
अन्य के धन भी इसी प्रकार प्राप्त हैं। इन सभी सूत्रों की उपपत्ति पूर्वोक्त
सूत्र नं. 33 में वर्णित ऐकिक नियम के समान है।
एकपत्रीकरणसूत्रम्
गतकालफलसमासो मासफलैक्योद्धृतो भवेत् कालः।
शतगुणमासफलैक्ये धनयोगहृते शतस्य फलम्¹॥ ३५॥
सुक्षेमा अनुवाद-अतीत काल के समस्त फल अर्थात् कुल ब्याज (I) को
मास फल याने 1 महीने के ब्याज से विभक्त करने पर अतीत काल या ब्याज के
कुल महीने ज्ञात होते हैं। (तालिका नं. 8)
(II) 100 से गुणित मास फल या कुल महीने के ब्याज को मूलधन से
विभक्त करने पर 100/= का फल या ब्याज प्राप्त होता है। (तालिका नं. 9)
──────────────────────────────────────────────────────────
१. तुल. पाटी-गणित सू. 51, ग.सा.सं. 6.77, ग.ति.पृ. 86

त्रिशतिका 85
उदाहरणम्
द्विके त्रिके चतुष्के च दत्तं स्वं पञ्चके शतम्।
एकं द्वे त्रीणि चत्वारि शतान्येषां यथाक्रमम्॥ ६०॥
द्वौ त्रयं पञ्च चत्वारो गता मासा द्विसंगुणाः।
तत्कथं कथ्यतामेतैरेकं पत्रं भविष्यति१॥ ६१॥
1/1 4/1 1/1 6/1 1/1 10/1 1/1 8/1
न्यासः 100 100 100 200 100 300 100 400
1 1 1 1 1 1 1 1
2/1 3/1 4/1 5/1
लब्धमतीतकालो मासाः 8 । दिनानि 3 । शतस्य फलम् 4 मूलधनम् 1000॥
सुक्षेमा अनुवाद- 2/= , 3/= , 4/= , 5/= सैकड़ा
मासिक की दर से क्रमशः 100/= , 200/= , 300/= , 400/= रूप
उधार दिये गए। इन कर्जों पर क्रमशः 2×2 = 4 , 2×3 = 6 , 2×5 = 10 ,
2×4 = 8 महीने बीत गए। तो इनका विवरण मूलक पत्र कैसे तैयार होगा। बताओ।
अनुशीलन-विवरण-पत्र आगे अंकित है। इसमें तालिका नं. 1 से 5 तक
'न्यास' के क्रम से प्रमाण-काल आदि का विवरण है। तालिका नं. 6, 7 में
पाटी-गणित व्याख्या के अनुसार वर्णन है। तालिका नं. 8, 9 में श्लोक के अनुसार
विवरण है-
१. प्रथमपत्रे गतकालफलं (तालिका 6), ...प्रतिपत्रं मासफलानि यथा...(तालिका नं. 7)
पाटी-गणित व्याख्या उदा. 57

86
त्रिशतिका
ब्याज का विवरण - पत्र
१ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९
प्रमाण काल standard period (y)- | प्रमाण धन standard Principal (SP)-, | प्रमाण फल (Rate) (R) | परकाल time (T) | मूलधन (Principal) (P.) | गतकालफल या (कुल ब्याज) तालिका 3×4×5 | मासफल 1 महीने का ब्याज तालिका 3×5 | सम्पूर्ण ब्याज के कुल महीने तालिका 6÷7 | कुल महीने का 100/= का ब्याज
प्रथम खण्ड : 1 | 100/= | 2/= दर | 4 महीना | 100/= | 2×4 = 8 | 2×1 =2 | 8/2 = 2 | 100×8 / 100 = 8 अथवा 4×2 = 8
द्वितीय खण्ड : 1 | 100/= | 3/= | 6,, | 200/= | 3×6×2 =36 | 3×2 =6 | 36/6 = 6 | 100×36 / 200 = 18 अथवा 6×3 = 18
तृतीय खण्ड : 1 | 100/= | 4/= | 10,, | 300/= | 4×10×3= 120 | 4×3 =12 | 120/12 = 10 | 100×120 / 300 = 40 अथवा 10×4 = 40
चतुर्थ खण्ड : 1 | 100/= | 5/= दर, | 8,, | 400/=, | 5×8×4 = 160 | 5×4 =20 | 160/20 = 8 | 100×160 / 400 = 40 अथवा 8×5 = 40

त्रिशतिका 87
विवरण - पत्र का निरूपण
तालिका नं. 1- यह प्रमाण-काल अर्थात् ब्याज जोड़ने के मानक काल प्रकट
करता है।
तालिका नं. 2- यह प्रमाण धन अर्थात् ब्याज के मानक धन को सूचित
करता है।
तालिका नं. 3- यह प्रमाण-फल (Rate) है। प्रथम खण्ड में 2/= रूप
सैकड़ा ब्याज प्रकट करता है।
तालिका नं. 4- कर्ज की अवधि (जैसे प्रथम खण्ड में 4 महीना) को प्रकट
करता है।
तालिका नं. 5- मूलधन को द्योतित करता है।
तालिका नं. 6- सम्पूर्ण महीने के कुल ब्याज को प्रकट करता है। जैसे प्रथम
खण्ड में 2/= की दर से 4 महीने के 100/= का ब्याज बताया है। अतः 2×4×1=8
हुआ।
तालिका नं. 7- सम्पूर्ण मूलधन का 1 मास का ब्याज वर्णित है। जैसे प्रथम
खण्ड में 2/= की दर से 1 महीने का 100/= का ब्याज बताया है। अतः 2×1×1
=2
तालिका नं. 8 ⇒ सम्पूर्ण ब्याज के कुल महीने प्राप्त करने के लिये श्लोक
35 के (I) नियम में इसे प्रकट किया है।
तालिका नं. 9- कुल महीने का 100 का ब्याज प्राप्त करने के लिये श्लोक
35 के (II) नियम के अनुसार 100 से कुल ब्याज (तालिका नं. 6) को गुणित-
करके मूलधन (तालिका नं. 5) से विभक्त किया है।
वास्तव में इसे तालिका नं. 3 तथा 4 से गुणित करके आसानी से प्राप्त
किया जा सकता है।
यहाँ तालिका नं. 6 के अन्तिम योग के अनुसार समस्त ब्याज का योग
324/= है तथा 1 महीने के कुल ब्याज का योग 40/= है। संस्कृत व्याख्या तथा
तालिका नं. 3 के अनुसार 4 प्रकार के प्रमाण-फल (rate) हैं तथा तालिका नं.
5 के अनुसार मूलधन का कुल योग 1000/- है।
तालिका को क्रम से इस प्रकार पढ़ेंगे- 1 महीने में 100/= रूप का का
ब्याज 2/= है तो 4 महीने में 100/= का ब्याज 8/= तथा 1 महीने का ब्याज 2/=
है। ब्याज के कुल 4 महीने हैं तथा सम्पूर्ण महीने के 100/= का ब्याज 8/= है।

88 त्रिशतिका
अन्यदुदाहरणम्
पूर्वोक्तैरेव फलैः शतस्य रूपार्धसंयुतैः क्रमशः।
मासैश्च पक्षयुक्तैः कथय कथं पत्रमेकं स्यात्‌॥ ६२॥
कृतभागानुबन्धे न्यासो यथा
1/1 9/2 1/1 13/2 1/1 21/2 1/1 17/2 लब्धमतीतकालः
100 100 100 200 100 300 100 400 मासाः 8। दिनानि16
1 1 1 1 1 1 1 1
5/2 7/2 9/2 11/2 शतफलम् 4½
लब्धं मूलधनम् 1000। यद्यतीतकाले दिनभागा भवन्ति ततस्तेषामृणिना
धनिनः कलान्तरं दत्वा दिनभागानपास्यैकपत्रं क्रियत इति
सुक्षेमा अनुवाद-पूर्वोक्त ब्याज की दरों में आधा या ½ संयुक्त करके
अर्थात्

त्रिशतिका 89
सुक्षेमा अनुवाद-सोने के अलग-२ वर्णों को सोने की अपनी-२ मात्रा से
गुणित करके उनके योग को सोने की मात्रा के योग से विभक्त करने पर सोने का
वर्ण (fineness) ज्ञात होता है।
द्वादश दश चैकादश वर्णा नव पञ्च षोडश सुवर्णाः।
कनकस्य समावर्ते जायन्ते वर्णकाः केऽस्मिन्१॥ ६३॥
न्यासः 12/9 10/5 11/16 लब्धमावर्ते वर्णाः 11 २/१५
सुक्षेमा अनुवाद-12, 10 तथा 11 वर्ण वाले क्रमशः 9, 5 तथा 16 माष के
सुवर्ण को समावर्त अर्थात् मिला देने पर निर्मित सुवर्ण का क्या वर्ण होगा। अथवा
उसकी शुद्धता कितने वर्ण (carat) की होगी।
अनुशीलन-श्लोक के नियमानुसार-
(12 × 9 + 10 × 5 + 11 × 16) / (9 + 5 + 16) = 334/30 = 11 4/30 = 11 → २/१५ सुवर्ण का वर्ण

90 त्रिशतिका
द्वितीयोदाहरणम्
सार्धैकादशदशकार्धाष्टमवर्णाः क्व वर्णके योगात्।
अर्धषडंशार्धान्वित-पञ्च-चतुः-सप्त-माषाः स्युः¹॥ ६४॥
11 10 7
न्यासः ½ 1 ½ लब्धमावर्ते वर्णाः 9 ⁴⁰/₁₀₃ ।।
5 4 7
1 1 1
2 6 2
सुक्षेमा अनुवाद-11½ = ²³/₂, ¹⁰/₁, तथा 7½ = ¹⁵/₂ वर्ण वाले क्रमशः अर्धयुक्त
5 अर्थात् ¹¹/₂, छठे अंश से युक्त 4 अर्थात् ²⁵/₆ तथा अर्धयुक्त 7 अर्थात् ¹⁵/₂ माष के सुवर्ण
को मिलाने से निर्मित सुवर्ण का वर्ण क्या होगा।
अनुशीलन-पूर्वोक्त नियमानुसार-
²³/₂ × ¹¹/₂ + ¹⁰/₁ × ²⁵/₆ + ¹⁵/₂ × ¹⁵/₂ = ²⁵³/₄ + ²⁵⁰/₆ + ²²⁵/₄
= (1518 + 1000 + 1350) / 24 = 3868 / 24
¹¹/₂ + ²⁵/₆ + ¹⁵/₂ = (33 + 25 + 45) / 6 = 103 / 6
³⁸⁶⁸/₂₄ × ⁶/₁₀₃ = ²³²⁰⁸/₂₄⁷₂ = (23208 ÷ 24) / (2472 ÷ 24) = ⁹⁶⁷/₁₀₃ = 9 ⁴⁰/₁₀₃ सुवर्ण का वर्ण
पक्वसुवर्णस्य वर्णसुवर्णयोः परिज्ञानाय सूत्रम्
वर्णसुवर्णवधैक्यं विपक्वकनकेन भाजितं वर्णः।
वर्णेन हृतं तु भवेत् तदेव परिपक्ववह्निभवम्²॥ ३७॥
सुक्षेमा अनुवाद-सुवर्ण के वर्ण को उनकी अलग-2 मात्रा से गुणित करके
उनके योग को पक्व सुवर्ण की मात्रा से विभाजित करने से वर्ण का परिज्ञान होगा।
उस योग को सुवर्ण के वर्ण से विभाजित करने पर परिपक्व वह्नि में निर्मित सोने
की मात्रा जानी जावेगी।
अनुशीलन-इससे पूर्व श्लोक में सोने की मात्रा के योग से विभक्त करने
पर सोने के वर्ण का परिज्ञान बताया है। सोने को आग में गलाने पर उसकी मात्रा
१. तुल. पाटी-गणित उदा. 62, ग.सा.सं. 6.170
२. तुल. पाटी-गणित सू. 53, ग.सा.सं. 6.175, म.सि. 15.40

त्रिशतिका 91
उतनी नहीं रहती। अपितु उसके मल के नष्ट होने से कम हो जाती है। इससे सोने
का वर्ण अधिक अच्छा तथा मूल्य बढ़ जाता है। इस प्रकार ज्यो-ज्यों मात्रा कम
होती है, त्यों-त्यों वर्ण (fineness) बढ़ती है। अतः इसे बढ़े हुए वर्ण को जानने
के लिये उस घटी हुई मात्रा से भाग देना चाहिये। अथवा घटी हुई मात्रा को जानने
के लिये बढ़े हुए वर्ण से भाग देना चाहिये। यही इस श्लोक में कहा है। इन नियमों
से हमें ये सूत्र प्राप्त होते हैं-
वर्ण₁ × मात्रा₁ + वर्ण₂ × मात्रा₂ + ....वर्णₙ × मात्राₙ
वर्ण = ----------------------------------------------------
मात्रा
वर्ण₁ × मात्रा₁ + वर्ण₂ × मात्रा₂ + ....वर्णₙ × मात्राₙ
मात्रा = ----------------------------------------------------
वर्ण
उदाहरणम्
पञ्चाष्टषट्सुवर्णा द्वादशनवकार्धपञ्चदशवर्णाः।
पक्वाः षोडश दृष्टास्तद् वर्णक उच्यतामाशु¹।। ६५।।
12 9 29
न्यासः 1 1 2 पक्वे हेम 16। लब्धं वर्णाः 13¹¹/₁₆
5 8 6
सुक्षेमा अनुवाद-12, 9 तथा 14½ = ²⁹/₂ वर्ण वाले क्रमशः 5, 8 तथा 6 माष
के सुवर्ण मिलकर पकने पर 16 माष के देखे गए। वे कितने वर्ण के होंगे।
अनुशीलन-सोने की कुल मात्रा 5 + 8 + 6 = 19 है। पर आग पर तपाने
से वह 16 माषा रह गया है। इससे उसका वर्ण बढ़ गया है। अतः पूर्वोक्त प्रक्रिया
का अनुसरण करते हुए, 19 से भाग न देकर 16 से भाग देना होगा। इससे उसका
बढ़ा वर्ण प्राप्त होगा-
12 × 5 + 9 × 8 + ²⁹/₂ × 6 60 + 72 + 87
------------------------- = ----------------
16 16
= ²¹⁹/₁₆ = 13 + ¹¹/₁₆ सुवर्ण का वर्ण
द्वितीयोदाहरणम्
त्रिचतुः सप्तवर्णा द्वादशदशकाष्टवर्णका दृष्टाः।
एकादश च विपक्वा वर्णा वद पक्ववह्निभवम्²।। ६६।।


१. तुल. पाटी-गणित उदा. 63
२. तुल. पाटी-गणित उदा. 64

92 त्रिशतिका
न्यासः 12 10 8
3 4 7 पक्वसुवर्णवर्णाः 11, लब्धं सुवर्णाः 12
सुक्षेमा अनुवाद-12, 10 तथा 8 वर्ण वाले क्रमशः 3, 4 तथा 7 माष के
सुवर्ण वह्नि में तपने पर 11 वर्ण के हो जाते हैं। उनकी अब कितनी मात्रा रह गई,
बताओ।
अनुशीलन-पूर्वोक्त विवरण के अनुसार सोने का वर्ण जितना बढ़ता है,
मात्रा उतनी ही घटती है। अतः यहाँ वर्ण से भाग देने पर मात्रा ज्ञात होगी। अतः-
12 × 3 + 10 × 4 + 8 × 7 36 + 40 + 56 132
───────────────────────── = ──────────────── = ─── = 12
11 11 11
प्रक्षेपक-करण-सूत्रम्
स्वयुतिहृतप्रक्षेपान् फलेन हन्यात् पृथक् फलावाप्त्यै॥
सुक्षेमा अनुवाद-प्रक्षेप¹ अर्थात् खेत में छितराए गए बीज या मूलधन के
योग से 'प्रक्षेप' या मूलधन की अलग-2 मात्रा को विभक्त करके सम्पूर्ण फल या
मिश्रधन से गुणित करने पर अलग-2 फल या उपज ज्ञात होती है।
द्वौ त्रयः पञ्च चत्वारः प्रस्था बीजस्य वापिताः।
शतद्वयं दशोपेतं तत्र किं स्यात् पृथक् फलम्²॥ ६७॥
न्यासः 2 । 3 । 4 । 5 फलम् 210 लब्धं पृथक्-पृथक् फलम् 30 । 45 । 60 ।
75 ।।
सुक्षेमा अनुवाद-अलग-अलग खेतों में क्रमशः 2, 3, 4 तथा 5 प्रस्थ बीज
डाले गए। उन खेतों में कुल मिलाकर 210 प्रस्थ धान्य तैयार हुए। अलग-अलग
खेतों में कितनी-कितनी उपज हुई।।
अनुशीलन-यहाँ खेती से सम्बन्धित प्रश्न दिये गए हैं। इनकी विधि से
लाभ, साझा (share) के वाणिज्य विषयक प्रश्नों को भी हल किया जा सकता है।
इन सबमें समानुपात को खोजा गया है। श्लोक के नियमानुसार प्रश्न का हल-
────────────────────────────────────────────────────────
१. प्रक्षिप्यते उप्यते सन्तन्यते इति प्रक्षेप्यो बीजं, तत उत्पत्तिः फलम्। - पाटी गणित सूत्र 59 पर
टीका
तुल. ब्रा.स्फु.सि. 12.16, सि.शे. 13.19, लीलावती मिश्रक व्यवहार श्लोक 13
२. तुल. पाटी-गणित उदा. 71

त्रिशतिका 93
प्रक्षेप या मूलधन ⇒ 2 । 3 । 4 । 5
इनका योग = 14
मूलधन के योग से एकक मात्रा का विभाग 2/14 = 1/7,
1/7 × 210 = 210/7 = 30 प्रथम खेत की उपज
इसके समानुपात से इस प्रकार हल प्राप्त होते हैं –
14 : 210 : : 2 : x अतः x = (210 × 2)/14 = 420/14 = 30
14 : 210 : : 3 : x x = (210 × 3)/14 = 630/14 = 45
14 : 210 : : 4 : x x = (210 × 4)/14 = 840/14 = 60
14 : 210 : : 5 : x = (210 × 5)/14 = 1050/14 = 75
द्वितीयोदाहरणम्
शतस्य लब्धवानेकः पञ्चशत्यास्तथापरः।
फलमन्यः सहस्रस्य सहस्रे षट्शताधिके।। ६८।।
सर्वग्रामफले विद्वन् तत्रोत्पन्नं शतद्वयम्।
ततः किं कस्य भागे स्याद् गणयित्वा निगद्यताम्।। ६९।।
न्यासः 100। 500। 1000। सर्वग्रामफलम् 1600। सर्वोत्पत्तिः 200। लब्धं
पृथक्-पृथक् फलम् 25/2 । 62 ½ । 125
इति प्रक्षेपकप्रकरणम्
सुक्षेमा अनुवाद-हे विद्वन्! सम्पूर्ण ग्राम के कुल 1600 परिमाण के खेत
में एक ने 100, दूसरे ने 500 तथा तीसरे ने 1000 परिमाण वाले खेत से उपज
प्राप्त की। कुल उपज 200 प्रस्थ हुई। तो किसने कितने प्रस्थ अनाज प्राप्त किया।
अनुशीलन-यह भी समानुपात का प्रश्न है। अतः यह मान लिया गया है
कि सभी खेत समान रूप से उपजाऊ थे। श्लोक के नियमानुसार-
100/1600 × 200 = 1/16 × 200 = 200/16 = 12 ½

diagonal.
Now look at the numerator of पिप्पलीमूल्यम्:
It has a round top, diagonal down, flat base: that's 2!
Now look at the numerator of शुण्ठीमूल्यम्:
It has a flat top, diagonal down: that's 7!
Wait, so the printed text literally has:
शुण्ठीमूल्यम् 7/37 पिप्पलीमूल्यम् 2/37!
Wait, wait! Let me look even closer:
Wait, could it be शुण्ठीमूल्यम् 2/37 पिप्पलीमूल्यम् 7/37?
Wait! Look at the first fraction:
Is the numerator २ or 7?
Wait, look at the footnote:
१. तुल. पाटी-गणित सू. 59...
Look at 7 in 57 (at end of line):
The 7 in 57 has a straight horizontal top, and a diagonal down to the left.
Now look at the numerator of the first fraction (after शुण्ठीमूल्यम्):
It has a straight horizontal top, and a diagonal down to the left! That is unmistakably a 7!
Now look at 2 in 125 (line 3):
It has a curved top, diagonal down to the left, and horizontal baseline to the right.
Now look at the numerator of the second

त्रिशतिका 95
अनुशीलन-यहाँ मिश्रधन 1 तथा समान मूल्य से मात्राओं का अनुपात इस
प्रकार है-
मूल्य पण्य या मात्रा
रूप ⇒ 1 : 1/2 पल
⇒ 1 : 2
⇒ 1 : 7
अब श्लोक के नियमानुसार मूल्य को पण्य से विभाजित करने पर ⇒
1 × 2/1 = 2, 1 × 1/2 = 1/2, 1 × 1/7 = 1/7
इस प्रकार समान मात्राओं का मूल्य से अनुपात-
मात्रा मूल्य
पल ⇒ 1 : 2 ⇐ रूप
⇒ 1 : 1/2 ⇐
⇒ 1 : 1/7 ⇐
मूल्य अथवा फल का योग-
2 + 1/2 + 1/7 = 37/14
श्लोक के नियमानुसार प्रक्षेप या मूल्य की अलग मात्राओं को इनके फल
अथवा योग से विभक्त करके मिश्रधन 1 से गुणित करने पर-
2 × 14/37 × 1 = 28/37 रूप की 14/37 पल हींग
1/2 × 14/37 × 1 = 7/37 रूप की 14/37 पल पीपल
1/7 × 14/37 × 1 = 2/37 रूप की 14/37 पल सोंठ
इस प्रकार 28/37 + 7/37 + 2/37 = 1 रूप से प्रत्येक तीनों की 14/37 पल समान
मात्राएँ प्राप्त होती हैं।
समान मात्रा ज्ञात होने पर इनका मूल्य समानुपात से भी ज्ञात होता है-
1/2 : 1 : : 14/37 : x अतः x = (14 × 2)/37 = 28/37 हींग का मूल्य
2 : 1 : : 14/37 : x ...x = (14 × 1)/(37 × 2) = 7/37 पीपल का मूल्य