त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें78 त्रिशतिका
सुक्षेमा अनुवाद-जीव के विक्रय वाले प्रश्नों में वयः को स्थान्तरित करके
वही पूर्वोक्त पाञ्चराशिक विधि अपनाई जाती है।
उदाहरणम्
षोडशवर्षाणां यदि पञ्च लभन्ते शतद्वयं विद्वन्।
तत् किं विंशति वर्षे उभे लभेते ममाचक्ष्व¹।। ५६।।
न्यासः 5 2
16 20 लब्धं पुराणाः 64
200 0
इति जीवविक्रयः।
सुक्षेमा अनुवाद-हे विद्वन्! 16 बरस की 5 दासियाँ 200 पुराण प्राप्त करती
हैं। तो 20 बरस की 2 दासियाँ कितना प्राप्त करेंगी।
अनुशीलन-यह उदाहरण उस काल में दास-दासियों के क्रय-विक्रय की
प्रथा को प्रकट करता है। यह समानुपात, व्यस्तत्रैराशिक या व्युत्क्रमानुपात दोनों का
उदाहरण है। क्योंकि जैसे-जैसे दासियों की संख्या बढ़ती है, उनका मूल्य भी बढ़ता
है। साथ ही जैसे-जैसे दासियों की उम्र बढ़ती है, उनका मूल्य घटता है²। अतः
समानु., व्युत्क्रमा. के सूत्रों के समन्वय के साथ-
16 बरस की 5 दासियाँ 200 पुराण प्राप्त करती हैं
अतः 20 बरस की 2 दासी (200×16×2)/(5×20) = 6400/100 = 64 पुराण
अथ मिश्रकव्यवहारे शुद्धस्थानलाभे करणसूत्रमार्या
निजकालेनाहन्यात् प्रमाणराशिं फलेन परकालम्।
तौ स्वयुतिहृतौ स्यातां मिश्रगुणौ मूलवृद्धिधने³।। ३३।।
सुक्षेमा अनुवाद-प्रमाण राशि (standard principal = SP) (सामान्यतः
100) को निज काल याने प्रमाण काल (standard period = y) से गुणन करे।
१. पाटी-गणित उदा. 50, ग.सा.सं. 5.40, ग.ति.पृ. 81, ग.कौ.पृ. 53 लीलावती
२. उम्र बढ़ने से मल्य घटता है→ भुज्यमानवस्त्रन्यायेन क्षणात् क्षणे जीर्णतापत्तौ मूल्यापचयात्।
यावत्तु वयः सारानन्तरं तावदपचीयते मूल्यमधिकवयसः, तात्त्विकमूल्यमनवयसस्तूपचीयते -
पाटी-गणित श्लोक 50 पर टीका पृ. 52
३. तुल. ब्रा.स्फु.सि. 12.14, पाटी-गणित सू. 47, ग.सा.सं. 6.21-23, म.सि. 15.31, ग.ति.पृ.
82, सि.शे. 13.17 लीलावती