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त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

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पृष्ठ 111

त्रिशतिका 83
सुक्षेमा अनुवाद-प्रमाण-काल को प्रमाण-धन से गुणित करें। पश्चात्
परकाल को प्रमाण-फल आदि अर्थात् भव्यक या प्रतिभू, वृत्ति या गणक तथा
ऋण-पत्र लेखक के अंश के योग से गुणित करे। इन दोनों के योगफल से
मिश्रधन गुणित प्रमाण-धन तथा प्रमाण-काल को विभक्त करने से मूलधन प्राप्त
होता है तथा इन योगफल से मिश्रधन गुणित परकाल तथा प्रमाण-फल को विभक्त
करने से ब्याज प्राप्त होता है।
उदाहरणम्
मासेन शतस्य फलं पञ्चैको भव्यकेऽर्धमथ वृत्तौ।
लेखकपादो वर्षे पञ्चाधिक-नवशती मिश्रम्।। ५९।।
1
न्यासः 100 12 मिश्रका भागा भव्यकादीनाम् 1 ½ ¼
5
मिश्रधनम् 905। लब्धं मूलधनम् 500 कलान्तरम् 300। भव्यके 60 वृत्तौ
30। लेखकस्य 15। इति भव्यकव्यवहारः॥
सुक्षेमा अनुवाद-100/- रु. पर 5/= मासिक ब्याज की दर से 1 वर्ष या
12 मास में 905/= मिश्रधन बनता है। इस ब्याज के साथ भव्यक या जमानतदार
के लिये 1% प्रतिमास, वृत्ति या गणक अर्थात् मुनीम के लिये ½% प्रतिमास तथा
ऋण पत्र लेखक के लिए ¼% प्रतिमास भी देय होता है। तो इस मिश्रधन का मूलध-
न, इसका ब्याज तथा जमानतदार, मुनीम तथा लेखक को प्राप्त होने वाला
अलग-2 भाग भी बताओ।
अनुशीलन-यह सूत्र मिश्रकव्यवहार में मूलधन के लिये पूर्वोक्त सूत्र नं. 33
के लिये समतुल्य है। अन्तर केवल यह है कि यहाँ ऋणदाता के लिये 5/= मासिक
ब्याज के साथ-साथ जमानतदार, मुनीम तथा लेखक के लिए भी अलग-अलग
निश्चित प्रतिशत देना है। अतः प्रस्तुत उदाहरण में 5 + 1 + ½ + ¼ = 27/4 प्रतिशत
मासिक के हिसाब से उस बेचारे कर्जदार द्वारा धन चुकाया जाना है। अतः यहाँ
परकाल को प्रमाणफल के साथ जमानतदार आदि के प्रतिशत भाग के योग के
साथ गुणित किया जावेगा। इस प्रकार हमें यह सूत्र प्राप्त होता है-
सूत्र-
मिश्रधन × प्रमाण-धन × प्रमाणकाल
मूलधन = -----------------------------------------------------------------
प्रमाण धन × प्रमाणकाल + (सभी प्रमाणफलों का योग) × परकाल