त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिशतिका 91
उतनी नहीं रहती। अपितु उसके मल के नष्ट होने से कम हो जाती है। इससे सोने
का वर्ण अधिक अच्छा तथा मूल्य बढ़ जाता है। इस प्रकार ज्यो-ज्यों मात्रा कम
होती है, त्यों-त्यों वर्ण (fineness) बढ़ती है। अतः इसे बढ़े हुए वर्ण को जानने
के लिये उस घटी हुई मात्रा से भाग देना चाहिये। अथवा घटी हुई मात्रा को जानने
के लिये बढ़े हुए वर्ण से भाग देना चाहिये। यही इस श्लोक में कहा है। इन नियमों
से हमें ये सूत्र प्राप्त होते हैं-
वर्ण₁ × मात्रा₁ + वर्ण₂ × मात्रा₂ + ....वर्णₙ × मात्राₙ
वर्ण = ----------------------------------------------------
मात्रा
वर्ण₁ × मात्रा₁ + वर्ण₂ × मात्रा₂ + ....वर्णₙ × मात्राₙ
मात्रा = ----------------------------------------------------
वर्ण
उदाहरणम्
पञ्चाष्टषट्सुवर्णा द्वादशनवकार्धपञ्चदशवर्णाः।
पक्वाः षोडश दृष्टास्तद् वर्णक उच्यतामाशु¹।। ६५।।
12 9 29
न्यासः 1 1 2 पक्वे हेम 16। लब्धं वर्णाः 13¹¹/₁₆
5 8 6
सुक्षेमा अनुवाद-12, 9 तथा 14½ = ²⁹/₂ वर्ण वाले क्रमशः 5, 8 तथा 6 माष
के सुवर्ण मिलकर पकने पर 16 माष के देखे गए। वे कितने वर्ण के होंगे।
अनुशीलन-सोने की कुल मात्रा 5 + 8 + 6 = 19 है। पर आग पर तपाने
से वह 16 माषा रह गया है। इससे उसका वर्ण बढ़ गया है। अतः पूर्वोक्त प्रक्रिया
का अनुसरण करते हुए, 19 से भाग न देकर 16 से भाग देना होगा। इससे उसका
बढ़ा वर्ण प्राप्त होगा-
12 × 5 + 9 × 8 + ²⁹/₂ × 6 60 + 72 + 87
------------------------- = ----------------
16 16
= ²¹⁹/₁₆ = 13 + ¹¹/₁₆ सुवर्ण का वर्ण
द्वितीयोदाहरणम्
त्रिचतुः सप्तवर्णा द्वादशदशकाष्टवर्णका दृष्टाः।
एकादश च विपक्वा वर्णा वद पक्ववह्निभवम्²।। ६६।।
१. तुल. पाटी-गणित उदा. 63
२. तुल. पाटी-गणित उदा. 64