त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिशतिका 87
विवरण - पत्र का निरूपण
तालिका नं. 1- यह प्रमाण-काल अर्थात् ब्याज जोड़ने के मानक काल प्रकट
करता है।
तालिका नं. 2- यह प्रमाण धन अर्थात् ब्याज के मानक धन को सूचित
करता है।
तालिका नं. 3- यह प्रमाण-फल (Rate) है। प्रथम खण्ड में 2/= रूप
सैकड़ा ब्याज प्रकट करता है।
तालिका नं. 4- कर्ज की अवधि (जैसे प्रथम खण्ड में 4 महीना) को प्रकट
करता है।
तालिका नं. 5- मूलधन को द्योतित करता है।
तालिका नं. 6- सम्पूर्ण महीने के कुल ब्याज को प्रकट करता है। जैसे प्रथम
खण्ड में 2/= की दर से 4 महीने के 100/= का ब्याज बताया है। अतः 2×4×1=8
हुआ।
तालिका नं. 7- सम्पूर्ण मूलधन का 1 मास का ब्याज वर्णित है। जैसे प्रथम
खण्ड में 2/= की दर से 1 महीने का 100/= का ब्याज बताया है। अतः 2×1×1
=2
तालिका नं. 8 ⇒ सम्पूर्ण ब्याज के कुल महीने प्राप्त करने के लिये श्लोक
35 के (I) नियम में इसे प्रकट किया है।
तालिका नं. 9- कुल महीने का 100 का ब्याज प्राप्त करने के लिये श्लोक
35 के (II) नियम के अनुसार 100 से कुल ब्याज (तालिका नं. 6) को गुणित-
करके मूलधन (तालिका नं. 5) से विभक्त किया है।
वास्तव में इसे तालिका नं. 3 तथा 4 से गुणित करके आसानी से प्राप्त
किया जा सकता है।
यहाँ तालिका नं. 6 के अन्तिम योग के अनुसार समस्त ब्याज का योग
324/= है तथा 1 महीने के कुल ब्याज का योग 40/= है। संस्कृत व्याख्या तथा
तालिका नं. 3 के अनुसार 4 प्रकार के प्रमाण-फल (rate) हैं तथा तालिका नं.
5 के अनुसार मूलधन का कुल योग 1000/- है।
तालिका को क्रम से इस प्रकार पढ़ेंगे- 1 महीने में 100/= रूप का का
ब्याज 2/= है तो 4 महीने में 100/= का ब्याज 8/= तथा 1 महीने का ब्याज 2/=
है। ब्याज के कुल 4 महीने हैं तथा सम्पूर्ण महीने के 100/= का ब्याज 8/= है।