विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
प्रकरणम् १४ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ६६
आक्षिप्यमाणो दिशि दक्षिणस्यां जागर्ति यानेऽधिकृतः खरादौ ।
नेदिष्ठदिष्टान्तममुं कुमार्या नाऽऽर्य्याः प्रदानाय वरं वृणीरन् ॥११॥
सं०—अपि वा यः स्वप्ने शरीरात् क्षरद्रोमनखः, वा स्रवद्वामविलो-
चनः, वा अमानुषं ( मनुष्यभिन्नं ) सत्त्वं जन्तुं निरीक्षते, अपिवा विस्र-
स्तनासानयनश्रुतिः वा खरादौ यानेऽधिकृतः दक्षिणस्यां दिशि आक्षिप्य-
माणः सन् जागर्ति, अमुं एवंभूतं नेदिष्ठदिष्टान्तं ( नेदिष्ठः अत्यासन्नो
नेदिष्टो मृत्युर्यस्य तं तथोक्तं ) वरं कुमार्याः कन्याकायाः प्रदानाय आर्याः
श्रेष्ठा ज्ञातारो न वृणीरन् ( न वरयेयुः ) ॥१०-११॥
भा०—जिसके स्वप्न में शरीर से रोम, नह वा वामनेत्र गिर पड़े, वा मनुष्य
से भिन्न ( व्याघ्र आदि ) जन्तुओं को देखे वा नाक, नेत्र, कान ये शिथिल हो
जाय, अथवा गदहे आदि सवारियों पर आरूढ़ होकर दक्षिण दिशा में प्रेरित
होकर जाता हुआ जाग पड़े, इस प्रकार के समीप मृत्युवाले वरों का आर्य पुरुष
कन्यादान के लिये वरण न करै ॥१०-११॥
अथ छायालक्षणेनारिष्टसम्भवं कथयति—
छायां निरीक्ष्य क्षणमन्तरिक्षं पश्यन्न यो निश्चलनेत्रपातः ।
शुभ्राभ्रसच्छायमिह स्वकायं पश्येत्स नश्येद्विकृतौ विकारः ॥१२॥
सं०—यश्च निश्चलनेत्रपातः स्थिरदृष्टिः सन् छायां निरीक्ष्य क्षणं
अन्तरिक्षं पश्यन् स्वकायं शुभ्राभ्रसच्छायं न पश्येत् स नश्येत् नाशं
गच्छेत् । इहाऽस्मिन् स्वशरीरे विकृतौ दृष्टायां विकारः स्यात् ॥१२॥
भा०—जो मनुष्य स्थिर दृष्टि से अपनी छाया को देखकर क्षणभर आकाश
को देखता हुआ फिर अपने शरीर को स्वच्छ मेघ के समान न देखै वह आसन्न
कालही में मर जाता है । तथा अपने जिस अंग को विकृत रूप में देखे उस अंग
में शीघ्र विकार हो जाता है ॥१२॥
अथ सत्पुरुषलक्षणान्याह—
प्रदक्षिणावर्तशरीररोमा वृषस्वनः फेनिलमूत्रपातः ।
नात्यल्पपाष्णिर्मनसा गभीरो धीरोन्नतारम्भरुचिर्यशस्वी ॥१३॥
स्निग्धेक्षणत्वङ्नखदन्तकेशो युवा सुवासाः परिवीतचेष्टः ।
न स्त्रीमुखो निप्रभशान्तमूर्तिर्न चातिकृष्णेक्षणतारको वा ॥१४॥
१०० विवाहवृन्दावनम्— [ मिश्र—
श्रौचित्यचारी शुचिरिङ्गितज्ञो विशालहस्ताननबाहुवक्षाः ।
सर्वोपि सत्त्वाकृतिमान्कुलीनः कन्याप्रदानाय वरो न रोगी ॥१५॥
सं०—प्रदक्षिणावर्तशरीररोमा, वृषस्वनः (वृषस्य स्वन इव स्वनो यस्य
सः ) फेनिलमूत्रपातः ( फेनिलः फेनसहितो मूत्रपातो यस्य सः ), नात्यल्प-
पार्ष्णिः ( न अत्यल्पः पार्ष्णिर्गुल्फाधोभागो यस्य स तथोक्तः ), मनसा
गभीरो गम्भीरः, धीरोन्नतारम्भरुचिः ( धीरा उन्नता चारम्भेषु रुचि-
र्यस्य स तथोक्तः ) यशस्वी, स्निग्धेक्षणत्वङ्नखदन्तकेशः, युवा, सुवासाः,
परिवीतचेष्टः ( परिवीता संवृता चेष्टा यस्य स तथोक्तः ), न स्त्रीमुखः
( स्त्रीमुखमिव मुखं यस्य नेत्यर्थः ), निप्रभशान्तमूर्तिः ( नितरां प्रभा
कान्तिर्यस्यास्तथाभूता शान्ता मूर्तिर्यस्य स तथोक्तः ), वा नातिकृष्णेक्षण-
तारकः ( अतिकृष्णे ईक्षणतारके यस्य न स्तः तथाभूतः ), औचित्यचारी
(योग्याचरणशीलः) शुचिः पवित्रहृदयः, इङ्गितज्ञः परचेष्टितज्ञः, विशाल-
हस्ताननबाहुवक्षाः, एवं सर्वोऽपि सर्वलक्षणयुक्तोऽपि सत्त्वाकृतिमान्
सात्त्विकप्रकृतिः, कुलीनः सुकुलोद्भवः, नरोगी ( रोगरहितः ) एवं भूतो वरः
कन्याप्रदानाय योग्यो भवति ॥१३-१४-१५॥
भा०—शरीर में सव्य आवर्त ( दहिने तरफ से घुमा हुआ ) रोमवाला, वृष
के समान गंभीर शब्दवाला, जिसके मूत्र त्याग करने से फेन उठता हो, जिसकी
एँड़ी ( पैर का पिछला हिस्सा ) अत्यल्प न हो, मन गम्भीर, जिसका सन्देह
रहित और उच्च कार्यारम्भ में रुचि हो, संसार में सुयश हो, चिक्कन दृष्टि, त्वचा,
नख, दाँत और केश हो, युवावस्था वाला, सुन्दर वस्त्र रखने वाला, जो संवृत
चेष्टा वाला हो, जिसका स्त्री के सदृश मुँह न हो, अत्यन्त कान्ति युत शान्त मूर्ति
हो, आँख की तारे ( पुतली ) अत्यन्त कृष्णवर्ण न हो, उचित आचरण करने
वाला, पवित्र, दूसरे की चेष्टा को जानने वाला, जिसका हाथ, मुख, बाहु और
वक्षःस्थल ( हृदय ) विशाल हो इन लक्षणों से युक्त रहने पर भी कुलीन और
रोगहीन हो तो इस प्रकार का वर कन्यादान करने के लिये योग्य है ॥१३-१५॥
एवं वरलक्षणान्युक्त्वा कन्यालक्षणानि कथयति—
श्मश्रुश्यामोन्नतोष्ठी पृथुकरचरणा ह्रस्वरुक्षाग्रकेशा
निःशौचा रोमशांगी कृशकुटिलचलत्क्रूरसञ्छन्नदृष्टिः ।
प्रकरणम्-१४ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । १०१
वामावर्ता विशालोन्नतविकटनटद्भ्रूललाटा स्पृशन्ती
नोर्वीमन्त्यांगुलिभ्यामनियतबहुभुग्गेहिनी देहिनी रुक् ॥१६॥
सं०-श्मश्रुश्यामोन्नतोष्ठी (श्मश्रुभिः श्यामौ उन्नतौ च ओष्ठौ
यस्याः सा ), पृथुकरचरणा, ह्रस्वारुणाग्रकेशा; निःशौचा शौचरहिता,
रोमशाङ्गी, कृशकुटिलचलत्क्रूरसच्छद्मदृष्टिः (कृशा कुटिला चलन्ती
क्रूरा सच्छद्मा कपटसहिता दृष्टिर्यस्याः सा ) वामावर्ता (अप्रदक्षिण-
रोमावर्ता ), विशालोन्नतविकटनटद्भ्रूललाटा (विशालं विस्तीर्णं उन्न-
तञ्च विकटनटद्भ्रूललाटं यस्याः सा तथोक्ता विकटनटद्भ्रूः विशालोन्न-
तललाटा चेत्यर्थः ), अन्त्याङ्गुलीभ्यां कनिष्ठिकाभ्यां उर्वी भूमिं न स्पृशन्ती,
अनियतबहुभुक् (अनियतं बहु भुंक्ते सा तथोक्ता) एवं भूता गेहिनी भार्या
देहिनी शरीरधारिणी रुक् साक्षाद्रोग एवेत्यर्थः ॥ १६ ॥
भा०—जिस का दाढ़ी मुछ से श्याम वर्ण और ऊँचा ओठ हो, बड़ा बड़ा हाथ
पैर हो, छोटे छोटे और रूखे अग्रभाग वाले केश हो, जो शौचहीन हो, बहुत रोम-
युक्त शरीरवाली हो, जिसकी छोटी छोटी, टेढ़ी, चञ्चल और कपट भरी आँख हो,
वामावर्त्त रोम हो, बड़ा विशाल और ऊँचा ललाट विचित्र रूप से नाचती भ्रू हो,
चलते समय दोनों पैर की कनिष्ठा (कनगुडिया) अङ्गुली पृथिवी को स्पर्श नहीं करती
हो, जो अनियम रूप से बहुत खानेवाली हो इस प्रकार की पत्नी मानो साक्षात्
शरीर धारण किया हुआ रोग ही है ॥१६॥
या स्फिग्ललाटोदरलम्बिनी सा स्यात्कान्तकान्तानुजतातहन्त्री ।
नितम्बिनी स्वल्पनितम्बगुह्या द्रुह्यात्पतिं दीर्घगला कुलघ्नी ॥१७॥
सं०-या नितम्बिनी स्त्री स्फिग्ललाटोदरलम्बिनी ( स्फिग्गललाटो-
दरैर्लम्बते इति तथोक्ता ) सा क्रमेण कान्त-कान्तानुज-तातहन्त्री स्यात् ।
या स्वल्पनितम्बगुह्या (नितम्बः कटिपश्चाद्भागः, गुह्यो योनिः, स्वल्पे
नितम्बगुह्ये यस्याः सा तथोक्ता ) सा पतिं द्रुह्यात्, या दीर्घगला सा
कुलघ्नी ( प्रतिकुलघातिनी ) भवति ॥ १७ ॥
भा०-दीर्घ नितम्ब (चूतर) वाली पति को, दीर्घ ललाटवाली देवर को
और दीर्घ उदरवाली श्वशुर को नाश करती है। तथा अत्यल्प योनिरवाली स्त्री पति-
कुल को नाश करनेवाली होती है ॥ १७॥
निःस्वातिह्रस्वा धमनौ पुरंध्री प्रायेण तत्रातिपृथुः प्रचण्डा ।
१०२ विवाहवृन्दावनम्- [ मिश्र-
कपोलकूपा हसितेप्यशीला कूर्म्मोदरी दुःखदरी दुरात्मा ॥१८॥
सं०-धमनौ शिरायां अतिह्रस्वा पुरन्ध्री निःस्वा धनहीना भवति ।
तत्र 'धमनौ' या अतिपृथुः सा प्रचण्डा उग्रस्वभावा भवति । या हसिते
कपोलकूपा सा अशीला भवति । या च कूर्म्मोदरी सा दुःखदरी दुरात्मा
दुष्टस्वभावा च भवति ॥१८॥
भा०-जिसकी शिरायें ( शरीर की नाड़ियाँ ) अत्यन्त कृश हों वह स्त्री
निर्धना होती, और शिरायें मोटी मोटी हों तो अत्यन्त उग्र स्वभाव वाली होती
है । जिसके हँसने से कपोल ( गाल ) में गहिरा हो जाय वह दुराचारिणी होती
है । और कछुए के समान उदरवाली स्त्री दुःख की खान और दुष्ट स्वभाव वाली
होती है ॥१८॥
अथ हस्तपदगतरेखाफलानि कथयति-
रेखाभिरंगुष्ठतलेऽङ्गनानां पुंस्त्रीप्रसूतिर्विपुलाल्पिकाभिः ।
अच्छिन्नभिन्नाभिरखण्डमायुः खण्डन्तदन्याभिरमूरभिरस्याः ॥१९॥
सं०-अङ्गनानां स्त्रीणां अङ्गुष्ठतले कराङ्गुष्ठमूलाधोभागे विपुलाऽ-
ल्पिकाभिः रेखाभिः क्रमेण पुंस्त्रीप्रसूतिर्वाच्या (विपुलरेखातुल्याः पुत्र-
सन्ततिः, अल्परेखातुल्याः कन्या सन्ततिरित्यर्थः ) अमूभिः रेखाभिः
अच्छिन्नभिन्नाभिः अस्याः प्रसूतेः (सन्ततेः) अखण्डं पूर्ण आयुः, तदन्याभिः
( छिन्नभिन्नाभिः रेखाभिः ) अस्याः प्रसूतेः (पुंस्त्रीसन्ततेः ) खण्डं स्वल्पं
आयुर्वाच्यम् ॥१९॥
भा०-स्त्रियों के अंगुष्ठमूल से नीचे जितनी रेखायें हों उनमें बड़ी रेखा के
तुल्य पुत्र और छोटी रेखा के तुल्य कन्या सन्तान समझना । वे रेखायें अच्छिन्न
और अभिन्न ( सम्पूर्ण पुष्ट ) हों तो सन्तान की पूर्ण आयु, यदि कटी फटी रेखायें
हों तो सन्तान की अल्पायु होती है ॥१९॥
एका तिर्यक्तर्जनीं याति रेखा तर्जन्यंगुष्ठान्तराले तदन्या ।
ते द्वे स्यातामायुरैश्वर्यरेखे तत्सौन्दर्ये सुन्दरत्वं तयोः स्यात् ॥२०॥
सं०-'या' एका रेखा तर्जनीं प्रति तिर्यग् याति, तदन्या तद्भिन्ना
तर्जन्यङ्गुष्ठान्तराले याति, ते द्वे क्रमेण आयु-रैश्वर्यरेखे स्याताम् ।
तत्सौन्दर्ये तयो रेखयोः शोभनत्वे तयोरायु रैश्वर्ययोः सुन्दरत्वं शुभत्वं स्यात् ।
प्रकरणम् १४ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । १०३
भा०—हाथ के मध्य में एक तिरछी रेखा तर्जनी अंगुली की तरफ जाती है
वह आयुर्दाय रेखा, और तर्जनी तथा अंगूठा के मध्य में जो दूसरी तिरछी रेखा
होती है वह ऐश्वर्य रेखा कहाती है, ये दोनों रेखायें सुन्दर हों पुष्ट हों तो आयु
और ऐश्वर्य भी पूर्ण होते हैं ॥२०॥
ऐश्वर्यरेखाशिखरेण मूलाद्युनक्ति याऽसौ पितृवंशरेखा ।
नीरन्ध्रबन्धा गृहबन्धनाय बंहीयसी वंशविवर्धनाय ॥२१॥
सं०—या रेखा मूलात् हस्तमूलात् निर्गता ऐश्वर्यरेखायाःशिखरेणा-
ग्रेण युनक्ति मिलति, असौ पितृवंशरेखा स्यात् । सा नीरन्ध्रबन्धा
( निश्छिद्रा निर्ग्रन्था ) गृहबन्धनाय ( गृहं गृहिणी तस्या बन्धनं प्रेम तस्मै
तथोक्ताय ) भवति । तथा बंहीयसी ( अतिशयेन बहुला ) सा रेखा
वंशविवर्धनाय भवति ॥ २१ ॥
भा०—हस्तमूल ( मणिबन्ध से ) निकली हुई और ऐश्वर्य रेखा के अग्र से
मिली हुई रेखा पितृवंश रेखा कहलाती है । यदि उसमें छिद्र और गाँठ नहीं हो
तो वह घर में बन्धन ( स्त्रियों में प्रेम ) कराने वाली होती है । यदि वही रेखा
अत्यन्त पुष्ट हो तो वंशवृद्धिकारिणी होती है ॥२१॥
कनिष्ठिकाजीवितरेखयोः स्यान्मध्ये मिथः कान्तकलत्ररेखा ।
अपत्यरीत्या करभे परस्मिन् भवन्ति सांमातुरवर्गरेखाः ॥२२॥
सं०—कनिष्ठिकाजीवितरेखयोः ( कनिष्ठिकामूलायुष्यरेखयोः ) मध्ये
( करभप्रदेशे ) मिथः कान्तकलत्ररेखा ( स्त्रीकरे पतिरेखा, पुरुषकरे
कलत्ररेखा ) स्यात् । करभे परस्मिन् शेषभागे सांमातुरवर्गरेखाः ( सांमा-
तुराः सोदरास्तेषां रेखाः ) अपत्यरीत्या (अपत्यरेखानुसारेण) ज्ञेया ॥२२॥
भा०—कनिष्ठामूल और आयु रेखा के मध्य ( करभप्रदेश ) में स्त्री के हाथ
में पति रेखा, और पुरुष के हाथ में स्त्री रेखा होती है । तथा शेष करभ भाग
( आयु रेखा और मणिबन्ध के मध्यस्थान ) में सोदर रेखा रहती है उन रेखाओं
को सन्तान रेखा के अनुसार समझना । अर्थात् जैसे—अंगूठे के नीचे बड़ी रेखा
से पुत्र और छोटी से कन्या के शुभाशुभ समझा जाता है, उसी प्रकार करभ-
प्रदेशस्थ बड़ी रेखा से भाई और छोटी रेखा से बहिन के शुभाशुभ समझना
चाहिये ॥२२॥
अनामिकामूलविभूषणं या पुण्यस्य रेखा तदवाप्तिहेतुः ।
१०४ विवाहवृन्दावनम्— [ मिश्र-
निःसीमसीमन्तितपञ्चशाखा कस्योध्वंरेखा न करोति राज्यम् २३
सं०-या रेखा अनामिकामूलविभूषणं सा पुण्यस्य रेखा तदवाप्तिहेतुः
( तस्य पुण्यस्य अवाप्तिः प्राप्तिस्तस्या हेतुः ) भवति । तथा निःसीमसीम-
न्तितपञ्चशाखा ( निर्गता सीमा यस्यासौ निःसीमः, निस्सीमः सीमन्तितः
पञ्चशाखो हस्तो यया सा तथोक्ता ) ऊर्ध्वरेखा कस्य जनस्य राज्यं न
करोति ? अपि तु सर्वस्यैव राज्यं करोत्येवेत्यर्थः ॥ २३ ॥
भा०-अनामिका अंगुली मूल को विभूषित करने वाली (अर्थात् अनामिका
के मूल और आयुरेखा पर्यन्त खड़ी ) रेखा पुण्य रेखा कहाती है, वह पुण्य कराने
वाली होती है । और जो रेखा मणिबन्ध से निकल कर समस्त हस्ततल को
विभक्त करती हुई ऊपर को जाती है वह ऊर्ध्व रेखा किस को राज्य नहीं कराती,
अर्थात् इस प्रकार की ऊर्ध्व रेखा हाथ में हो तो अवश्य राज्यप्रद होती है ॥२३॥
अथ सर्वासां रेखाणां साधारण्येन स्फुटफलप्रदत्वमाह —
अरूक्षगम्भीरमनोहराभी रेखाभिरन्तर्मधुपिङ्गलाभिः ।
न चातिबह्वीभिरवामवामेष्वंगेषु पुंस्त्रीफलयोः स्फुटत्वम् ॥२४॥
सं०-अवामवामेषु ( पुरुषस्य अवामेषु दक्षिणे षु, स्त्रिया वामेषु )
अङ्गेषु अरूक्षगम्भीरमनोहराभिः, अन्तर्मधुपिङ्गलाभिः न चातिबह्वीभिः
( नातिसंकीर्णाभिः ) रेखाभिः पुंस्त्रीफलयोः स्फुटत्वं स्यात् ॥ २४ ॥
भा०-अत्यन्त चिकनी गहिरी देखने में मनोहर और मधु समान पिङ्गलवर्ण
की पृथक्-पृथक् रेखा पुरुष के दहिने अंग और स्त्री के वाम अंग में हो तो स्पष्ट
रूप से शुभ फल मिलता है ॥२४॥
अथ राजचिह्नानि कथयति—
सरोजश्रीवृक्षध्वजगजतिमिस्तम्भकलश-
स्रगादर्शच्छत्रांकुशकुलिशभृङ्गारगिरिभिः ।
रथाश्वश्रीवत्सव्यजनयवयूपप्रभृतिभि-
र्नरा नार्यो राज्यं दधति पदपाणिप्रणयिभिः ॥२५॥
सं० — सरोज-श्री-वृक्ष-ध्वज-गज-तिमि-स्तम्भ-कलश-स्रगादर्श-च्छत्रा-
ङ्कुश-कुलिश-भृङ्गार-गिरिभिः रथाऽश्व-श्रीवत्स-व्यजन-यव-यूपप्रभृतिभिः पद-
पाणिप्रणयिभिः नराः, नार्यश्च, राज्यं दधति धारयन्ति ॥ २५ ॥
प्रकरणम् १४ ] वसन्तरक्ष्मीसहितम् । १०५
भा०-पुरुष अथवा स्त्री के पैर वा हाथ में यदि कमल, विल्व वृक्ष, ध्वजा,
हस्ती, मछली, स्तम्भ, कलश, माला, ऐना, छत्र, अंकुश, वज्र, भृंगार ( सुवर्ण
जलपात्र ), पर्वत, रथ, घोड़ा, श्रीवत्स ( हृदय में रोम की दक्षिणावर्त भौंरी ),
पङ्खा, जौ, यज्ञस्तम्भ, इत्यादि चिह्न हों तो अवश्य राज्य मिलता है ॥२५॥
अथ मुख्यशुभलक्षणान्याह -
अर्चितं वचनमुन्नतं मनो निर्विशेषसुखदं वपुर्दृशाम् ।
अस्ति चेदघपराङ्मुखा मतिर्लक्षणैः किमपरैर्नृयोषिताम् ॥२६॥
सं०-चेद्यदिवचनं अर्चितं पूजितं 'लोकैः स्वीकृत'मित्यर्थः । मनः
उन्नतम् , वपुः शरीरं दृशां चक्षुषां निर्विशेषसुखदं अत्यन्तसुखप्रदम्, मतिः
अघपराङ्मुखा (पापात्परावृत्ता ) तर्हि नृयोषितां (नरनारीणां ) अपरैः
लक्षणैः किं ? न किमपि प्रयोजनमित्यर्थः ॥ २६ ॥
भा०-यदि बचन आदरणीय, मन उच्च, शरीर नेत्रों को अत्यन्त सुख-
प्रद तथा बुद्धि पापकर्म से निवृत्त हों तो अन्य शुभ लक्षणों से क्या प्रयोजन ?
अर्थात् इन्हीं चार सुलक्षणों से सब सिद्ध होता है ॥२६॥
अथ निमित्तानि कथयति तत्र पक्षिचेष्टितान्याह -
वरस्य कन्यावरणे वरेण्यो दुर्गेव यो दक्षिणचेष्टितश्च ।
अदक्षिणं चेष्टितमिष्टमाहुस्तयोः कुमारी वृणुयाद्वरं चेत् ॥२७॥
सं०-वरस्य कन्यावरणे कन्यावरणकाले यः 'पुंसंज्ञितः पक्षी' दक्षिण-
चेष्टितः (दक्षिणाङ्गे कण्डूयनादिभिश्चेष्टितः ) स दुर्गा कृष्णचीटिका इव
वरेण्यः शुभप्रदो भवति, स्त्रीसंज्ञितपक्षिषु दुर्गापि दक्षिणचेष्टितैव शुभप्रदा
भवतीत्यर्थः । अनयोर्वामचेष्टितं न शुभप्रदमित्यर्थत एव सिद्ध्यति । तथा
यदि कुमारी वरं वृणुयात् तदा तयोः पुंसंज्ञितपक्षिदुर्गयोः अदक्षिणं चेष्टितं
वामाङ्गचेष्टितं इष्टं शुभप्रदं आहुः 'मुनीन्द्रा' इति शेषः ॥ २७ ॥
भा०-वर जिस समय कन्या का वरण करै उस समय पुंल्लिंग पक्षी और
स्त्रीलिंग में दुर्गा (कृष्णचीटिका ) पक्षी ये दोनों यदि दक्षिण अङ्ग से (खुजलाना
आदि कोई ) चेष्टा करते हों तो शुभप्रद समझना । अर्थात् इन दोनों के वाम चेष्टा
कन्यावरण में अशुभ है । तथा जिस समय कन्या ही वर का वरण करै उस समय
उक्त दोनों पक्षियों का वाम चेष्टा ही शुभप्रद है। अर्थात् दक्षिण चेष्टा अशुभ है ॥
१४
१०६ विवाहवृन्दावनम्- ˚ [ मिश्र-
अथ शुनश्चेष्टितं कथयति-
शूनो गतिर्दक्षिणेष्टा कुमारी यत्र कांक्षिणी ।
अदक्षिणा यत्र तत्र वर एतां वुवूर्षति ॥२८॥
सं०-यत्र यस्मिन् समये कुमारी कांक्षिणी भवति ( वरं वरीतुमि-
च्छतीत्यर्थः ) तस्मिन् समये शुनः कुक्कुरस्य दक्षिणा ( स्वदक्षिणभागगता )
गतिः इष्टा शुभप्रदा स्यात् । यत्र वरः एतां कुमारीं वुवूर्षति वरीतुमिच्छति
तत्र अदक्षिणा शुनोर्गतिरिष्टा भवति ॥ २८ ॥
भा०- जिस समय कन्या वरका वरण करै उस समय दाहिने भाग होकर
कुकर का चलना शुभ है। और जिस समय वर कन्या का वरण करै उस समय
वाम भाग कुकर का जाना शुभ होता है। अर्थात् इससे विपरीत अशुभ समझना ।
अथोपश्रुतिशकुनं कथयति -
आरोप्याक्षतपूरिते गणपतिम्प्रस्थादिपात्रे शनैः
संमार्जन्यववेष्टिते युवतयस्तिस्रः सकन्या निशि ।
निर्याता रजकादिवेश्मसु करे कृत्वा तमभ्यर्चितं
यां वाचं शृणुयुस्तदर्थसदृशी सिद्धिः किलोपश्रुतौ ॥२६॥
सं०-अक्षतपूरिते तण्डुलपूर्णे संमार्जन्यववेष्टिते प्रस्थादिपात्रे 'प्रस्थ-
कुडवादिमानपात्रे' गणपतिं गणेशमूर्तिं आरोग्य, अभ्यर्चितं संपूजितं तं
गणपतिं करे कृत्वा सकन्याः कन्यया सहितास्तिस्रः युवतयः सुवासिन्यः
निशि रात्रौ रजकादिवेश्मसु निर्याताः तत्र यां वाचं शृणुयुः तदर्थसदृशी
सिद्धिः उपश्रुतौ ज्ञेया किलेति निश्चयार्थकम् ॥ २९ ॥
भा०-चावल से पूर्ण प्रस्थ आदि ( सेर, पौआ, आदि ) अन्न नापने के पात्र
को संमार्जनी ( बढ़नी ) से ढककर उस पर गणेशजी की प्रतिमा रखकर उनकी
पूजाकर और उन्हें हाथ में लेकर रात्रि के समय कन्यासहित तीन सुवासिनी स्त्री
धोबी आदि जातियों के घर के समीप जाकर चुपके से उस घर में रहनेवाले का
शब्द सुने, वहाँ जिस प्रकार का वचन सुनने में आवे उसी प्रकार अपने चिन्तित
कार्य की सिद्धि समझना। अर्थात् यदि वहाँ शुभवचन सुनने आवे तो शुभ, तथा
अशुभवचन सुनने में आवे तो अशुभ समझना ॥ २९ ॥
अथ कन्यावरणनक्षत्राणि कुलाचारपालनं चाह-
श्रुतित्रिपूवीवसुवह्निमित्रविश्वानिल भॊ वरणं कुमार्याः ।
प्रकरणम् १४ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । १०७
तच्चावमन्येत न चेतसापि यदाचरेयुः स्वकुलोक्तमार्याः ॥३०॥
सं०-श्रुतित्रिपूर्वावसुवह्निमित्रविश्वानिलर्चे कुमार्याः कन्यायाः
वरणं शुभं स्यात् । तथा आर्याः मान्यवृद्धाः कुलोक्तं निजकुलपरंपरागतं
यत् आचरेयुः तच्चेतसापि मनसापि नावमन्येत तदवमानना न कार्येत्यर्थः ।
भा०-श्रवण, तीनों पूर्वा, धनिष्ठा, कृत्तिका, अनुराधा, उत्तराषाढ़ा, स्वाती
इन नक्षत्रों में कन्या का वरण करना शुभ है । और माननीय वृद्ध लोग अपने कुल
परंपरागत जो आचार करते आये हों उसका अवहेलना मनसे भी नहीं करना
चाहिये । अर्थात् कुलका आचार भी अवश्य करना चाहिये ॥ ३० ॥
अथ वेदिकानिर्माणं कथयति—
वेदिकां विरचयेत्तथा यथा स्यादियं प्रविशतश्च दक्षिणे ।
स्युर्जनाश्रययवोप्तिवर्णिकाः षण्णवत्रिदिवसेषु नाग्रतः ॥३१॥
सं०-विवाहार्थं—वेदिकां तथा विरचयेत् यथेयं गृहं प्रविशतः
पुरुषस्य दक्षिणे भागे भवेत् । अग्रतः विवाहदिनात् पूर्वे षण्णवत्रिदिवसेषु
जनाश्रय-यवोप्ति-वर्णिका न स्युः ( न भवेयुः ) । पश्चात् मण्डपाद्युद्वासन-
मपि-एतन्मितेषु दिनेषु नो कार्यम् । अन्यव्यवस्था आचारतो ज्ञेया ॥३१॥
भा०-विवाह के लिये वेदी इस प्रकार बनाना चाहिये जिससे वह गृह
( मण्डप ) में प्रवेश करते समय दाहिने भाग पड़े । और विवाहदिन से पूर्व, षष्ठ,
नवम, और तृतीय दिन में मण्डप, अङ्कुरार्पणार्थ जौ का बोना और लीपना पोतना
रंग लगाना आदि न करना चाहिये । अर्थात् विवाह दिन से पीछे ३, ६ और ९
दिनों में मण्डप आदि का उद्वासन (उत्थापन) भी न करना चाहिये । और विशेष
व्यवस्था आचार से समझना चाहिये ॥ ३१ ॥
अथ मातृकापूजनं कर्तव्यमित्याह—
कन्यकोक्तविधिवत्पुलोमजापूजनं सयुवतिः समाचरेत् ।
घ्नन्ति चाशुभमविघ्नमातरो मातृयज्ञकुलकर्मशान्तयः ॥३२॥
सं०-सयुवतिः ( सुवासिनीस्त्रीसहिता ) कन्यका उक्तविधिवत्
शौनकादिप्रतिपादितरीत्या पुलोमजापूजनं इन्द्राण्याराधनं समाचरेत् ।
तथा मातृयज्ञ-कुलकर्मशान्तयः ( मातरो गौर्याद्याः, मातृमातामह्याद्याश्च ता-
सां यज्ञः पूजनं, कुलाचारवशेन शान्तयश्च ) अविघ्नमातरः ( निर्विघ्नं
१०८ विवाहवृन्दावनम्- •[ प्रश्न-
निष्पादिताः ) अशुभं घ्नन्ति नाशयन्ति । अतः शच्याः, मातृकाणां, कुल
देवतानां चाराधनमवश्यमेव कर्तव्यमिति तात्पर्यम् ॥३२॥
भा०-सुवासिनी स्त्री सहित कन्या शौनकादिकथित विधि से शची की पूजा
करे । और गौरी आदि षोडशमातृका तथा माता मातामही आदि माताओं का
यज्ञ ( पूजनादि ) तथा कुलाचारानुसारशान्ति ( कुलदेवतापूजनादि ) ये विघ्नों को
नाश कर देते हैं। इसलिये इन कर्मों को मंगलकार्यों में अवश्य करना चाहिये ॥
अथ वधूवरप्रश्नाध्यायः ।
तत्रादौ वधूप्रश्नमाह-
कर्मायसूनुसहजस्मरगो मृगाङ्कः
स्त्रीपुंससंगमयिता यदि जीवदृष्टः ।
स्वर्क्षाणि शुक्रशशिदृष्टयुतानि कन्या-
लब्ध्यै वधूगृहदक्काणनवांशका वा ॥ १ ॥
सं०-प्रश्नलग्नात् कर्मायसूनुसहजस्मरगो मृगाङ्कश्चन्द्रो यदि जीव-
दृष्टस्तदा स्त्रीपुंससंगमयिता वधूवरसंगमकारको भवतीत्यर्थः । शुक्रशशि-
दृष्टयुतानि स्वर्क्षाणि ( शुक्रशशिनोः स्वगृहाणि ) लग्नगतानि, वा वधूगृह-
दृक्काणनवांशकाः (वधूगृहाणि समराशयस्तेषां दृक्काणनवांशकाः लग्नगताः)
कन्यालब्ध्यै कन्यालाभाय भवन्ति ॥ १ ॥
भा० - वरकन्यालाभार्थ प्रश्नलग्न से १०, ११, ५, ३, ७ इन स्थानों में
चन्द्रमा हो और बृहस्पति से दृष्ट हो तो वधूवरसंगमकारक होता है । अर्थात् वर
के लिये कन्या और कन्या के लिये वर मिलता है । तथा शुक्र और चन्द्रमा की
राशि ( वृष, तुला, कर्क ये ) लग्न हो और शुक्र चन्द्रमा से दृष्ट युत हो, वा
समराशि ( वृष आदि ) के द्रेष्काण, नवांश लग्नगत हो और शुक्रचन्द्र से दृष्ट युत
हो तो कन्यालाभ होता है ॥ १ ॥
युग्मर्त्तगौ शशिसितौ द्विपदाङ्गनांशे
स्यातान्तदासिपिशुनौ तनुमीक्षमाणौ ।
नारीनवांशमुदितं खचराः परेपि
स्त्रैणर्त्तगा विलसदुज्ज्वलवीर्यभाजः ।। २ ।।
प्रकरणम् १५ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । १०४
सं०—शशिसितौ ( चन्द्रशुक्रौ ) युग्मर्क्षगौ द्विपदाङ्गनांशे द्विपदस्त्री-
राशिनवांशे ) तनुं लग्नं ईक्षमाणौ स्यातां तदा तदाप्तिपिशुनौ ( कन्यालाभ-
सूचकौ) भवेताम् । वा उदितं लग्नगतं नारीनवांशं वृषादिसमराशिनवांशकं
ईक्षमाणौ शशिसितौ कन्याप्राप्तिसूचकौ भवेताम् । परेऽन्येऽपि खचरा
ग्रहाः स्त्र्यर्क्षगाः समराशिगताः विलसदुज्ज्वलवीर्यभाजः तनुमीक्षमाणाः
कन्याप्तिसूचका भवन्ति ॥ २ ॥
भा०—शुक्र और चन्द्रमा समराशि में स्थित कन्या नवांश में होकर लग्न को
देखते हों तो कन्यालाभ के सूचक होते हैं । अथवा शुक्र चन्द्रमा यदि लग्नगत
समराशिके नवांश को देखते हों तो भी कन्या लाभसूचक होते हैं। दूसरे ग्रह भी
प्रकाशमान विम्ब और बल से युक्त होकर लग्नगत समराशि के नवांश को देखते
हों तो भी कन्याप्राप्ति सूचक होते हैं । अर्थात् इन योगों में वर के लिये कन्या का
लाभ होता है ॥ २ ॥
अथ कन्याया वरप्राप्तिप्रश्नमाह—
एवं नरा नरदृकाणनवांशदृग्भिः
पुंखेचरैरूपनमन्ति नितम्बिनीनाम् ।
यल्लिङ्गिबालकपशुप्रभृतीङ्गितं स्यात्
प्रश्नक्षणे तदु तथैव वधूवरस्य ॥३॥
सं०—एवं पूर्वोक्तप्रकारेण पुंखेचरैः ( रवि-कुज-गुरुभिः ) नरदृ-
काणनवांशदृग्भिः नितम्बिनीनां ( स्त्रीणां ) नरा उपनमन्ति उपलब्धा
भवन्तीत्यर्थः । लग्नगतान् विषमराशिदृकाणनवांशान् पुंग्रहाः पश्यन्ति चेत्
तदा कन्याया वरलाभः स्यादित्यर्थः । अथ निमित्तं कथयति - प्रश्नक्षणे
लिङ्गिबालक-पशुप्रभृतीनां यत् इङ्गितं तद् वधूवरस्य तथैव उ निश्चयेन
भवति ॥ ३ ॥
भा०—जिस प्रकार स्त्रीग्रह ( चन्द्र शुक्र ) और समराशिनवांश से वर
को कन्यालाभ कहा गया है उसी प्रकार—पुरुषग्रह विषमराशि में हों विषमराशि
लग्नगत दृकाण नवांश को देखते हों तो कन्या को वर की प्राप्ति होती है । अब
निमित्त कहते हैं कि—प्रश्न के समय लिङ्गी ( कापालिक आदि ) बालक तथा पशु
आदि जन्तुओं की जिस प्रकार चेष्टा हो उसी प्रकार उस कन्यावर को भी समझना
चाहिये ॥ ३ ॥
११० विवाहवृन्दावनम्— [ प्रश्न-
अथ प्रश्नसमये शुभाशुभयोगानाह—
प्रश्नोदयादमृतरोचिषि षण्मृतिस्थे मूर्तौ च तत्र मदनस्पृशि चावनेये ।
तन्वस्तयोरशुभसङ्गतयोर्वरस्य नाशः क्रमाद्वसुमहीमुनिसंमितेऽब्दे ॥
सं०—प्रश्नोदयात् प्रश्नलग्नात् अमृतरोचिषि चन्द्रे षण्मृतिस्थे षष्ठाष्ट-
मस्थे इत्येको योगः, तथा च तत्र तस्मिन् चन्द्रे मूर्तौ लग्नगते, आवनेये
भौमे मदनस्पृशि सप्तमस्थिते सति द्वितीययोगः, तथा तन्वस्तयोः लग्नसप्तम-
योः अशुभसङ्गतयोः पापग्रहसहितयोः इति तृतीयो योगः, एषु योगेषु
क्रमाद् वसु-मही-मुनिसंमितेऽब्दे वरस्य नाशः स्यात् ॥ ४ ॥
भा०—प्रश्नलग्न से चन्द्रमा ६ या ८ स्थान में हो, वा चन्द्रमा लग्न में और
मङ्गल सप्तम में हो, अथवा लग्न और सप्तम दोनों में पापग्रह हों तो इन तीनों
योग में क्रम से विवाह के बाद ८ वर्ष, १ वर्ष, और ७ वर्ष में वर का नाश
होता है ॥ ४ ॥
जामित्रगौ विधुसितौ विधवामसाध्वीं
सौरिः कुजः सुरमहेज्यबुधौ धनाढ्याम् ।
दीर्घायुषं वपुषि सुप्रसवां प्रसूतो
स्त्रीजातकोक्तमखिलं खलु चिन्त्यमत्र ॥५॥
सं०—जामित्रगौ सप्तमस्थौ विधुसितौ वधूं विधवां, सौरिः शनिः
कुजश्च असाध्वीं दुःशीलां, सुरमहेज्यबुधौ धनाढ्यां धनयुक्तां कुरुतः ।
वपुषि लग्ने स्थितौ सुरमहेज्यबुधौ दीर्घायुषं चिरजीविनीं, प्रसूतौ पञ्चमस्थाने
स्थितौ गुरुबुधौ सुप्रसवां सुसन्ततिं कुरुतः । स्त्रीजातकोक्तं अखिलमपि
शुभाशुभं अत्रास्मिन् प्रश्नलग्ने विवाहलग्ने च चिन्त्यम् ॥ ५ ॥
भा०—प्रश्नलग्न से सप्तमस्थ चन्द्रमा और शुक्र स्त्री को विधवा, शनि और
मंगल दुराचारिणी तथा गुरु और बुध धनवती बनाते हैं । लग्न में बुध और
बृहस्पति स्त्री को चिरजीविनी, पञ्चम स्थान में बुध गुरु हो तो शुभसन्तानवाली
स्त्री होती है। स्त्री जातकोक्त समस्त शुभाशुभ योग प्रश्न और विवाहलग्न में
विचारना चाहिए ॥ ५ ॥
वि०—विवाहदीपिकाटीकाकारने—
“यदि पृच्छकलग्नस्थौ भृगुसौम्यौ जीवनीं कुरुतः ।
पञ्चसंस्थौ पुत्राद् जामित्रगतौ विपुलधनाम् ॥”
प्रकरणम् १५ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । १११
इस शौनकवचन के विरोधभय से “कुजोऽसुरमहेज्यबुधौ” इस प्रकार का पाठ
बनाया है । उस प्रकार से भी शुक्र के फल में पुनरुक्ति दोष आता है । क्योंकि
यहाँ आचार्य केशवार्क ने सप्तमस्थ सूर्येतर सब ग्रहों का फल कहा है ॥५॥
अथ दलनकण्डनादिकार्येषु शुभकालं कथयति —
भतिथिवारफलानि पदे पदे विरचितानि परैरिति नोचिरे ।
सकलकर्मसु यस्तदुपक्रमः स हि विवाहभ एव शुभे दिने ॥ ६ ॥
सं० — सकलकर्मसु ( दलनकण्डनादिसमस्तविवाहाङ्गकृत्येषु ) परैर-
न्याचार्यैः भतिथिवारफलानि पदे पदे विरचितानि, इत्येवं प्रकारेणात्र
नोदिरेऽस्माभिर्नोक्तानीत्यर्थः । हि यतः यस्तदुपक्रमः ( तेषां दलनकण्ड-
नादिसकलकर्मणां उपक्रमः ) स शुभदिने विष्टिमहापातादिदोषरहितदिवसे
विवाहभे विवाहविहितनक्षत्र एव स्यात् । तथा च श्रीपतिः — “विवाहकृत्यं
११२ विवाहवृन्दावनम्— [ वंशवर्णन-
भा०—जैसे नदी के किनारे पर लटकता हुआ तृणों का गुच्छा चालन नहीं
सह सकता है, उसी प्रकार विवाह के फल समूह भी तर्क से चालन 'अन्यथाकरण'
नहीं सह सकता है । अर्थात् आर्षोक्त आगमसिद्ध विवाहफल में तर्क से
अन्यथा अर्थ करना उचित नहीं है । इसलिये परमत रूप आतप से पीड्यमान
लोगों का अभ्र ( रक्षण ) है जिससे ऐसे वृन्दावन नामक इस ग्रन्थ में
पण्डितों की बुद्धिसम्पत्ति यथेच्छ क्रीड़ा करै ॥ ७ ॥
अथ स्ववंशवर्णनाध्यायः ।
अभूद्भरद्वाजमहर्षिवंशे विश्वावतंसे श्रुतितत्त्ववेदी ।
औदीच्यचारित्रपथप्रवर्ती जनार्दनो याज्ञिकचक्रवर्ती ॥१॥
सं०—विश्वावतंसे भरद्वाजमहर्षिवंशे श्रुतितत्त्ववेदी औदीच्यचारित्र-
पथप्रवर्ती याज्ञिकचक्रवर्ती जनार्दनोऽभूत् ॥ १ ॥
भा०—विश्व के भूषण स्वरूप ( वन्दनीय ) भारद्वाज महर्षि के गोत्र में
वेदों के तत्त्वार्थ जानने वाले औदीच्य ब्राह्मणों के आचार के मार्गप्रवर्तक यज्ञ
करनेवालों में अत्यन्त श्रेष्ठ जनार्दन नाम के पण्डित हुए ॥ १ ॥
अस्ति श्रियादित्य इति स्म तस्य सूनुः श्रियादित्य इव द्वितीयः ।
त्रिस्कन्धपारङ्गत रङ्गमल्लस्तदात्मजो राणग इत्युदीर्ये ॥ २ ॥
सं०—तस्य जनार्दनस्य सूनुः पुत्रः श्रियादित्य इत्यस्ति स्म। कथंभूतः—
श्रिया दीप्त्या द्वितीय आदित्यः सूर्य इव । तदात्मजः ( तस्य श्रियादित्यस्या-
त्मजः ) उदीर्ये कथनीये राणगः इति आसीत् । कथंभूतः त्रिस्कन्धपारं-
गतरङ्गमल्लः त्रिस्कन्धज्योतिर्विदां युद्धभूमौ युद्धकुशल इत्यर्थः ॥ २ ॥
भा०—उन ( जनार्दन ) के दीप्तियों से दूसरे सूर्य के समान श्रियादित्य
नामक पुत्र हुए । तथा श्रियादित्य के पुत्र त्रिस्कन्ध ज्योतिःशास्त्रवेत्ताओं के युद्ध-
में मल्लस्वरूप राणग नामक हुए ॥ २ ॥
श्रीकेशवः सुकविरध्ययनाध्वनीनव्यूहान्प्रतर्पयितुमर्थपयःप्रवाहैः ।
दैवज्ञराणगसुतः सुतपःश्रयेस्मिन्वृन्दावने मुनिगवीनिवहं दुदोह ॥
सं०—दैवज्ञराणगसुतः सुकविः श्रीकेशवः अध्ययनाध्वनीनव्यूहान्
(अध्ययनमार्गज्ञानिसमूहान्) अर्थपयःप्रवाहैः प्रतर्पयितुं अस्मिन् सुतपःश्रये
(सुपुण्यजनसेव्यमाने) वृन्दावने मुनिगवीनिवहं दुदोह दुग्धवान् ॥ ३ ॥
प्रकरणम् १७ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ११३
भा०—दैवज्ञ राणग के पुत्र श्रीकेशवार्क ( मैंने ) अध्ययनमार्गगामिजनों को
अर्थरूपदुग्ध के प्रवाहों से तृप्ति करने के लिये पुण्यवानों से सेव्यमान इस वृन्दावन
में मुनियों के वचनरूप गायों को दूहा है । अर्थात् जैसे—तपस्वियों से
सेव्यमान वन में मार्ग चलने से खिन्न पथिकों की तृप्ति के लिये गायें दुही जाती हैं,
उसी प्रकार दूसरे ग्रन्थों के अध्ययनमार्ग में थके हुए लोगों की तृप्ति के लिए मैंने
भी सुपुण्यजनों से सेवनीय इस वृन्दावन में मुनिवचनों का सारांश संग्रह कर
दिया है ॥ ३ ॥
अबहुदृष्टधियः कियदप्यदः पदगभीरमधीरभिरंस्यते ।
विशदशास्त्रधियां त्विदमेकदा श्रुतिगतं रसनासु विवृत्स्यति ॥ ४ ॥
सं०—अबहुदृष्टधियः ( अल्पज्ञस्य ) अदः ( एतत् मत्कृतं गुण-
विशिष्टमपि विवाहवृन्दावनं ) कियत् ? न किञ्चिदित्यर्थः । तथा—अधीः
( निर्बुद्धिस्तु ) पदगभीरं ( पदैर्गम्भीरं ) दृष्ट्वाऽभिरंस्यते ( आनन्दं प्राप्स्य-
तीत्यर्थः) । तथा—विशदशास्त्रधियां (विशदा अत्यधिका शास्त्रेषु धीर्येषां तेषां)
तु एकदा ( एकवारं ) श्रुतिगतं कर्णप्राप्तं इदं ( विवाहवृन्दावनं ) रसनासु
जिह्वासु विवृत्स्यते विवृद्धिं प्राप्स्यतीत्यर्थः ॥ ४ ॥
भा०—जिन्होंने बहुत शास्त्रों को नहीं देखा उन ( अल्पज्ञों ) के लिये यह
गुणविशिष्टभी विवाहवृन्दावन है तो क्या ? कुछ भी नहीं अर्थात् वे लोग इसे तुच्छ
समझेंगे । तथा जो अबुद्धि ( कुछ भी शास्त्र नहीं देखे ) हैं वे इसे पदों से गंभीर
समझकर ही आनन्द को प्राप्त होंगे । तथा शास्त्रों में विशदबुद्धिवालों के तो
एकबार कर्णगोचर होते ही यह ( विवाहवृन्दावन ) उनकी जिह्वापर जाकर वृद्धि
को प्राप्त होगा ॥ ४ ॥
अथ लग्नशुद्ध्यध्यायः ।
तत्र विवाहविहितनक्षत्राणि—
ध्रुवानुराधामृगमूलरेवतीकरं मघास्वातिरदूषणो गणः ।
रवेरमीना मकरादिषड्गृही करग्रहे मङ्गलकृन्मृगीदृशाम् ॥१॥
सं०—श्लोकोऽयं नक्षत्रशुद्धिप्रकरणे व्याख्यात एव द्रष्टव्यं पृ० २ ॥१॥
भा०—इस श्लोक की टीका नक्षत्रशुद्धि प्रकरण में हो चुकी है ॥ १ ॥
१५
११४ विवाहवृन्दावनम्- [ लग्नशुद्धि-
अथ नक्षत्रशुद्धिं त्रिभिः श्लोकैः कथयति—
क्रूरोज्झितं द्विः शशिभोगतोर्वाक्तदाप्यमाढ्यं च शुभं न भं स्यात् ।
त्र्यष्टाऽर्कविंशं च कुजार्किभानुस्वर्भानुतः सत्रिविधाद्भुतं च ॥२॥
सं०—क्रूरोज्झितं पापग्रहेण त्यक्तं, तदाप्यं ( पापग्रहेण प्राप्यं ) तेन
पापेन आढ्यं च भं नक्षत्रं, तथा कुजाऽर्कि-भानुस्वर्भानुतः क्रमेण त्र्यष्टाऽर्क-
विंशं च भं तथा सत्रिविधाद्भुतं च नक्षत्रं द्विःशशिभोगतो ( द्विधाचन्द्रभो-
गात् ) अर्वाक् पूर्वं न शुभं स्यात् । अर्थात् एतत् सर्वं नक्षत्रं द्वितीये चन्द्र-
भोगे शुभं भवति ॥ २ ॥
भा०—जिसको पापग्रह छोड़ दिया हो, जिसमें जानेवाला हो और जिसमें
वर्तमान हो ये तीनों नक्षत्र, मंगल जिस नक्षत्र में हो उससे तीसरा, शनि से
आठवाँ, सूर्य से १२ वा
प्रकरणम् १७ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ११५
एकार्गलः साभिजितीन्दुतोर्कः समेस्ति योगेष्वशुभाह्वयेषु ।
चतुर्दशं चेन्दुभमर्कधिष्ण्यादितीयमुक्तोद्वहनर्क्षशुद्धिः ॥ ४ ॥
सं०—अशुभाह्वयेषु ( वैधृत्यादिषु ) योगेषु इन्दुतःश्चन्द्रनक्षत्रात् अर्कः
सूर्यः साभिजिति समे समसंख्यनक्षत्रेऽस्ति चेत् तदा एकार्गलः स्यात् ।
तथाऽर्कधिष्ण्यात् चतुर्दशे इन्दुभं चन्द्रनक्षत्रं चाशुभं स्यात् । इत्येवं प्रकारे-
णोयं उद्वहनर्क्षशुद्धिः विवाहनक्षत्रशुद्धिः उक्ता ॥ ४ ॥
भा०—वैधृति व्यतीपात आदि अशुभ योगों में चन्द्रनक्षत्र से अभिजित्
सहित सम संख्यक नक्षत्र में सूर्य हो तो एकार्गल दोष होता है । और सूर्य के
नक्षत्र से १४ वाँ चन्द्रमा का नक्षत्र भी हो तो अशुभ है । इस प्रकार यह
विवाहनक्षत्र शुद्धि कही गई है ॥ ४ ॥
अथ लग्नशुद्धिं कथयति—
षट्त्र्यायेष्वशुभाः शुभाय निधनद्यूनान्त्यवर्ज्यं परे
त्र्यायार्थेषु शशी मृतौ शनितमःसूर्याः परे भङ्गदाः ।
क्रूरद्यूनवृतान्विते शशितनू अस्ते सितज्ञौ विधु-
र्लग्ने सोमसिताधिपा द्विषि सितः सेन्दुर्विनष्टोंशपः ॥५॥
सं०—श्लोकोऽयं प्रहयोगबलाब्लाध्याये व्याख्यात एव । केवलमत्रा-
ष्टमस्थाने तमो राहुरपि शुभाय प्रोक्तः ॥ ५ ॥
भा०—इसी ग्रन्थ के प्रकरण १३ श्लोक १ पहला देखो । यहाँ अष्टम स्थान
में तम ( राहु ) भी शुभ कहा गया है इतना ही विशेष है ॥ ५ ॥
अंशाः षट्त्रिनवाद्रयस्तदधिपे लग्नांशयोर्द्वादश-
द्वित्र्यष्टासु न लग्नस्तलवपे तत्सप्तमाभ्यां तथा ।
गण्डान्तेषु च वैधृतावुभयतः संक्रान्तियामद्वये
यामार्धव्यतिपातविष्टिकुलिके मासेद्धि चोनाधिके ॥६॥
सं०—षट्त्रिनवाद्रयः कन्यामिथुनधनुस्तुलाः अंशाः लग्ननवांशाः
शुभा भवन्ति । तदधिपे (नवांशस्वामिनि) लग्नांशयोः (लग्नात् नवांशाद्वा)
द्वादशद्वित्र्यष्टासु स्थिते लग्नं न कार्यम् । अस्तलवपे सप्तमभावांशाधिपे
तत्सप्तमाभ्यां ( लग्नसप्तमात्-अंशसप्तमाद्वा ) तथा तद्वत् द्वादशद्वित्र्यष्टासु
स्थिते सति लग्नं न कार्यम् । गण्डान्तेषु, वैधृतौ, उभयतः संक्रान्तियामद्वये,
११६ विवाहवृन्दावनम्- [ लग्नशुद्धि-
यामार्धव्यतिपातविष्टिकुलिके, ऊनाधिके मासे, ऊनाधिकेऽह्नि ( तिथिक्षये
तिथिवृद्धौ चेत्यर्थः ) लग्नं न कार्यम् ॥ ६ ॥
भा०—लग्न में नवांस मिथुन, कन्या, धन और तुला प्रशस्त हैं । लग्न से
वा नवांश से नवांशस्वामी १२, २, ३, ८ स्थानों में किसी में हो तो वह लग्न
नहीं ग्रहण करनां । सप्तम भाव के नवांशस्वामी लग्नसप्तम से वा नवांशसप्तम
से १२, २, ३, ८ इनमें हो तो लग्न नहीं शुभ है । तथा गण्डान्त, वैधृति, और
संक्रान्ति काल से पूर्व तथा पश्चात् २ पहर, यामार्ध, व्यतिपात, भद्रा, कुलिक,
क्षयमास, अधिमास, तिथिक्षय, तिथिवृद्धि इनमें भी लग्न अशुभ होता है ॥ ६ ॥
जन्मर्क्षाज्जन्मलग्नान्निधनविधनते अष्टमद्वादशाभ्यां
लग्ने तत्स्वामितत्स्थैरपि वपुषि खगैस्तद्गृहांशैश्च ते स्तः ।
अस्तेशारेर्नवांशे व्यसनमसुभयं नाडिवेधे षडष्ट-
क्षेत्रेशानामसख्ये दनुजनरगणे वार्कजीवेन्दुशुद्धौ ॥७॥
सं०—जन्मर्क्षात् वा जन्मलग्नात् अष्टमद्वादशाभ्यां राशिभ्यां लग्ने
स्थिताभ्यां क्रमेण निधनविधनते ( अष्टमराशौ लग्नगते निधनता मृत्युः,
द्वादशराशौ लग्नगते विधनता निर्धनत्वं स्यादित्यर्थः ) । तत्स्वामितत्स्थैः
( तयोः जन्मर्क्षलग्नयोः द्वादशाष्टमस्वामिभिः, तन्नस्थैश्च ) खगैः वपुषि
लग्ने स्थितैश्च ते ( निधनविधनते ) स्तः । तथा तद्गृहांशैश्च लग्ने स्थितैः
ते निधनविनते भवतः । अस्तेशारेः सप्तमेशरिपोर्नवांशे लग्नस्थे व्यसनं
दुःखं स्यात् । नाडिवेधे सति असुभयं प्राणभीतिः स्यात् । षडष्टक्षेत्रेशानां
( षट्काष्टके राश्याधिपानां ) असख्ये वैरे सति, तथा दनुजनरगणे,
वाऽर्कजीवेन्दुशुद्धौ ( रविगुरुचन्द्रबलालाभे सति ) असुभयं भवति ॥ ७ ॥
भा०—जन्मराशि से वा जन्मलग्न से अष्टमराशि विवाहलग्न में हो तो मरण,
और द्वादशराशिलग्न में हो तो निर्धनता, एवं अष्टम द्वादश के स्वामी, वा उन्हीं
अष्टमद्वादश में स्थित ग्रह लग्न में पड़े तो भी क्रम से मरण और निर्धनता
समझना । वा उन्हीं अष्टमद्वादश के नवांश वा तन्नस्थित ग्रहों की राशि के नवांश-
लग्न में हों तो भी क्रम से मरण और निर्धनता समझना । सप्तमेश का जो शत्रु
हो उसका नवांश लग्न में पड़े तो दुःख, नाडीवेध हो, वा षटकाष्टक होने पर
राश्याधिपों में शत्रुता हो, वा नर और राक्षस गण हों, तथा रवि गुरु और चन्द्र
की शुद्धि न हो तो प्राणभय होता है ॥ ७ ॥
प्रकरणम् १७ ] वसन्तलद्मोसहितम् । ११७
अथाचार्यः स्वदेशपलभां ततश्चरखण्डानि चाह—
वेदा इभाब्धय इयं किल नार्मदी भा
तद्व्यङ्गुलं हसति पुष्यति योजनेन ।
याम्योत्तरे पथि हता दशनागदिग्भि-
रन्त्या पुनर्दहनहृच्चरखण्डकानि ॥ ८ ॥
सं०—वेदा इभाब्धयः (४।४८ चत्वार्यङ्गुलानि, अष्टचत्वारिंशद्व्यंगु-
लानि च) नार्मदीभा (नर्मदातीरे पलभा) स्यात् । ततो याम्योत्तरे
पथि योजनेन एकैकयोजनेन तद्व्यङ्गुलं (तस्याः पलभायाः एकैकं व्यङ्गुलं)
ह्रसति, पुष्यति वर्धते च । नर्मदातो दक्षिणे देशे देशान्तरयोजनतुल्यव्यंगु-
लै रहिता उत्तरे सहिता सा स्वदेशे पलभा भवितुमर्हति । अथ सा
स्वदेशपलभा त्रिष्ठा दशनागदिग्भिर्हता अन्त्या पुनर्दहनहृन् (त्रि
११८ विवाहवृन्दावनम्- [ लग्नशुद्धि-
उपरोक्तरीति से साधित चरखण्डों को घटाना, फिर लंकोदय को विलोमविधि से
रखकर उनमें उत्क्रम से चरखण्डों को जोड़ना तो ये मेषादि ६ राशियों के
उदयपल होते हैं । फिर यही उत्क्रम से तुलादि ६ राशियों के स्वदेशोदयपल
होते हैं ॥ ९ ॥
उदाहरण—लग्नप्रदीप के प्रथमभाग में स्पष्ट दिखलाया गया है ।
अथ संक्रान्तिज्ञानात् स्पष्टार्कसाधनम्-
अष्टाक्षाः नगपञ्च सप्तविषयाः सप्तैषवोऽष्टैषवो
गोऽक्षाः शून्यरसाः कुषड्विधुरसाः कङ्गानि शून्यर्तवः ।
गोक्षा मेषमुखेषु भास्करगतिर्निघ्ना दिनाद्यैर्गतैः
संक्रान्तेः खरसैर्हताऽऽप्तलवयुग् यातर्क्षमिष्टो रविः ॥१०॥
सं०—अष्टाक्षाः ५८, नगपञ्च ५७, सप्तविषयाः ५७, सप्तैषवः ५७,
अष्टैषवः ५८, गोक्षाः ५९, शून्यरसाः ६०, कुषट् ६१,