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सर्वकोश
विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

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प्रकरणम् १४ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ६६
आक्षिप्यमाणो दिशि दक्षिणस्यां जागर्ति यानेऽधिकृतः खरादौ ।
नेदिष्ठदिष्टान्तममुं कुमार्या नाऽऽर्य्याः प्रदानाय वरं वृणीरन् ॥११॥
सं०—अपि वा यः स्वप्ने शरीरात् क्षरद्रोमनखः, वा स्रवद्वामविलो-
चनः, वा अमानुषं ( मनुष्यभिन्नं ) सत्त्वं जन्तुं निरीक्षते, अपिवा विस्र-
स्तनासानयनश्रुतिः वा खरादौ यानेऽधिकृतः दक्षिणस्यां दिशि आक्षिप्य-
माणः सन् जागर्ति, अमुं एवंभूतं नेदिष्ठदिष्टान्तं ( नेदिष्ठः अत्यासन्नो
नेदिष्टो मृत्युर्यस्य तं तथोक्तं ) वरं कुमार्याः कन्याकायाः प्रदानाय आर्याः
श्रेष्ठा ज्ञातारो न वृणीरन् ( न वरयेयुः ) ॥१०-११॥
भा०—जिसके स्वप्न में शरीर से रोम, नह वा वामनेत्र गिर पड़े, वा मनुष्य
से भिन्न ( व्याघ्र आदि ) जन्तुओं को देखे वा नाक, नेत्र, कान ये शिथिल हो
जाय, अथवा गदहे आदि सवारियों पर आरूढ़ होकर दक्षिण दिशा में प्रेरित
होकर जाता हुआ जाग पड़े, इस प्रकार के समीप मृत्युवाले वरों का आर्य पुरुष
कन्यादान के लिये वरण न करै ॥१०-११॥
अथ छायालक्षणेनारिष्टसम्भवं कथयति—
छायां निरीक्ष्य क्षणमन्तरिक्षं पश्यन्न यो निश्चलनेत्रपातः ।
शुभ्राभ्रसच्छायमिह स्वकायं पश्येत्स नश्येद्विकृतौ विकारः ॥१२॥
सं०—यश्च निश्चलनेत्रपातः स्थिरदृष्टिः सन् छायां निरीक्ष्य क्षणं
अन्तरिक्षं पश्यन् स्वकायं शुभ्राभ्रसच्छायं न पश्येत् स नश्येत् नाशं
गच्छेत् । इहाऽस्मिन् स्वशरीरे विकृतौ दृष्टायां विकारः स्यात् ॥१२॥
भा०—जो मनुष्य स्थिर दृष्टि से अपनी छाया को देखकर क्षणभर आकाश
को देखता हुआ फिर अपने शरीर को स्वच्छ मेघ के समान न देखै वह आसन्न
कालही में मर जाता है । तथा अपने जिस अंग को विकृत रूप में देखे उस अंग
में शीघ्र विकार हो जाता है ॥१२॥
अथ सत्पुरुषलक्षणान्याह—
प्रदक्षिणावर्तशरीररोमा वृषस्वनः फेनिलमूत्रपातः ।
नात्यल्पपाष्णिर्मनसा गभीरो धीरोन्नतारम्भरुचिर्यशस्वी ॥१३॥
स्निग्धेक्षणत्वङ्नखदन्तकेशो युवा सुवासाः परिवीतचेष्टः ।
न स्त्रीमुखो निप्रभशान्तमूर्तिर्न चातिकृष्णेक्षणतारको वा ॥१४॥