विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०० विवाहवृन्दावनम्— [ मिश्र—
श्रौचित्यचारी शुचिरिङ्गितज्ञो विशालहस्ताननबाहुवक्षाः ।
सर्वोपि सत्त्वाकृतिमान्कुलीनः कन्याप्रदानाय वरो न रोगी ॥१५॥
सं०—प्रदक्षिणावर्तशरीररोमा, वृषस्वनः (वृषस्य स्वन इव स्वनो यस्य
सः ) फेनिलमूत्रपातः ( फेनिलः फेनसहितो मूत्रपातो यस्य सः ), नात्यल्प-
पार्ष्णिः ( न अत्यल्पः पार्ष्णिर्गुल्फाधोभागो यस्य स तथोक्तः ), मनसा
गभीरो गम्भीरः, धीरोन्नतारम्भरुचिः ( धीरा उन्नता चारम्भेषु रुचि-
र्यस्य स तथोक्तः ) यशस्वी, स्निग्धेक्षणत्वङ्नखदन्तकेशः, युवा, सुवासाः,
परिवीतचेष्टः ( परिवीता संवृता चेष्टा यस्य स तथोक्तः ), न स्त्रीमुखः
( स्त्रीमुखमिव मुखं यस्य नेत्यर्थः ), निप्रभशान्तमूर्तिः ( नितरां प्रभा
कान्तिर्यस्यास्तथाभूता शान्ता मूर्तिर्यस्य स तथोक्तः ), वा नातिकृष्णेक्षण-
तारकः ( अतिकृष्णे ईक्षणतारके यस्य न स्तः तथाभूतः ), औचित्यचारी
(योग्याचरणशीलः) शुचिः पवित्रहृदयः, इङ्गितज्ञः परचेष्टितज्ञः, विशाल-
हस्ताननबाहुवक्षाः, एवं सर्वोऽपि सर्वलक्षणयुक्तोऽपि सत्त्वाकृतिमान्
सात्त्विकप्रकृतिः, कुलीनः सुकुलोद्भवः, नरोगी ( रोगरहितः ) एवं भूतो वरः
कन्याप्रदानाय योग्यो भवति ॥१३-१४-१५॥
भा०—शरीर में सव्य आवर्त ( दहिने तरफ से घुमा हुआ ) रोमवाला, वृष
के समान गंभीर शब्दवाला, जिसके मूत्र त्याग करने से फेन उठता हो, जिसकी
एँड़ी ( पैर का पिछला हिस्सा ) अत्यल्प न हो, मन गम्भीर, जिसका सन्देह
रहित और उच्च कार्यारम्भ में रुचि हो, संसार में सुयश हो, चिक्कन दृष्टि, त्वचा,
नख, दाँत और केश हो, युवावस्था वाला, सुन्दर वस्त्र रखने वाला, जो संवृत
चेष्टा वाला हो, जिसका स्त्री के सदृश मुँह न हो, अत्यन्त कान्ति युत शान्त मूर्ति
हो, आँख की तारे ( पुतली ) अत्यन्त कृष्णवर्ण न हो, उचित आचरण करने
वाला, पवित्र, दूसरे की चेष्टा को जानने वाला, जिसका हाथ, मुख, बाहु और
वक्षःस्थल ( हृदय ) विशाल हो इन लक्षणों से युक्त रहने पर भी कुलीन और
रोगहीन हो तो इस प्रकार का वर कन्यादान करने के लिये योग्य है ॥१३-१५॥
एवं वरलक्षणान्युक्त्वा कन्यालक्षणानि कथयति—
श्मश्रुश्यामोन्नतोष्ठी पृथुकरचरणा ह्रस्वरुक्षाग्रकेशा
निःशौचा रोमशांगी कृशकुटिलचलत्क्रूरसञ्छन्नदृष्टिः ।