विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् १४ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । १०३
भा०—हाथ के मध्य में एक तिरछी रेखा तर्जनी अंगुली की तरफ जाती है
वह आयुर्दाय रेखा, और तर्जनी तथा अंगूठा के मध्य में जो दूसरी तिरछी रेखा
होती है वह ऐश्वर्य रेखा कहाती है, ये दोनों रेखायें सुन्दर हों पुष्ट हों तो आयु
और ऐश्वर्य भी पूर्ण होते हैं ॥२०॥
ऐश्वर्यरेखाशिखरेण मूलाद्युनक्ति याऽसौ पितृवंशरेखा ।
नीरन्ध्रबन्धा गृहबन्धनाय बंहीयसी वंशविवर्धनाय ॥२१॥
सं०—या रेखा मूलात् हस्तमूलात् निर्गता ऐश्वर्यरेखायाःशिखरेणा-
ग्रेण युनक्ति मिलति, असौ पितृवंशरेखा स्यात् । सा नीरन्ध्रबन्धा
( निश्छिद्रा निर्ग्रन्था ) गृहबन्धनाय ( गृहं गृहिणी तस्या बन्धनं प्रेम तस्मै
तथोक्ताय ) भवति । तथा बंहीयसी ( अतिशयेन बहुला ) सा रेखा
वंशविवर्धनाय भवति ॥ २१ ॥
भा०—हस्तमूल ( मणिबन्ध से ) निकली हुई और ऐश्वर्य रेखा के अग्र से
मिली हुई रेखा पितृवंश रेखा कहलाती है । यदि उसमें छिद्र और गाँठ नहीं हो
तो वह घर में बन्धन ( स्त्रियों में प्रेम ) कराने वाली होती है । यदि वही रेखा
अत्यन्त पुष्ट हो तो वंशवृद्धिकारिणी होती है ॥२१॥
कनिष्ठिकाजीवितरेखयोः स्यान्मध्ये मिथः कान्तकलत्ररेखा ।
अपत्यरीत्या करभे परस्मिन् भवन्ति सांमातुरवर्गरेखाः ॥२२॥
सं०—कनिष्ठिकाजीवितरेखयोः ( कनिष्ठिकामूलायुष्यरेखयोः ) मध्ये
( करभप्रदेशे ) मिथः कान्तकलत्ररेखा ( स्त्रीकरे पतिरेखा, पुरुषकरे
कलत्ररेखा ) स्यात् । करभे परस्मिन् शेषभागे सांमातुरवर्गरेखाः ( सांमा-
तुराः सोदरास्तेषां रेखाः ) अपत्यरीत्या (अपत्यरेखानुसारेण) ज्ञेया ॥२२॥
भा०—कनिष्ठामूल और आयु रेखा के मध्य ( करभप्रदेश ) में स्त्री के हाथ
में पति रेखा, और पुरुष के हाथ में स्त्री रेखा होती है । तथा शेष करभ भाग
( आयु रेखा और मणिबन्ध के मध्यस्थान ) में सोदर रेखा रहती है उन रेखाओं
को सन्तान रेखा के अनुसार समझना । अर्थात् जैसे—अंगूठे के नीचे बड़ी रेखा
से पुत्र और छोटी से कन्या के शुभाशुभ समझा जाता है, उसी प्रकार करभ-
प्रदेशस्थ बड़ी रेखा से भाई और छोटी रेखा से बहिन के शुभाशुभ समझना
चाहिये ॥२२॥
अनामिकामूलविभूषणं या पुण्यस्य रेखा तदवाप्तिहेतुः ।