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सर्वकोश
विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

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पृष्ठ 125

११२ विवाहवृन्दावनम्— [ वंशवर्णन-
भा०—जैसे नदी के किनारे पर लटकता हुआ तृणों का गुच्छा चालन नहीं
सह सकता है, उसी प्रकार विवाह के फल समूह भी तर्क से चालन 'अन्यथाकरण'
नहीं सह सकता है । अर्थात् आर्षोक्त आगमसिद्ध विवाहफल में तर्क से
अन्यथा अर्थ करना उचित नहीं है । इसलिये परमत रूप आतप से पीड्यमान
लोगों का अभ्र ( रक्षण ) है जिससे ऐसे वृन्दावन नामक इस ग्रन्थ में
पण्डितों की बुद्धिसम्पत्ति यथेच्छ क्रीड़ा करै ॥ ७ ॥
अथ स्ववंशवर्णनाध्यायः ।
अभूद्भरद्वाजमहर्षिवंशे विश्वावतंसे श्रुतितत्त्ववेदी ।
औदीच्यचारित्रपथप्रवर्ती जनार्दनो याज्ञिकचक्रवर्ती ॥१॥
सं०—विश्वावतंसे भरद्वाजमहर्षिवंशे श्रुतितत्त्ववेदी औदीच्यचारित्र-
पथप्रवर्ती याज्ञिकचक्रवर्ती जनार्दनोऽभूत् ॥ १ ॥
भा०—विश्व के भूषण स्वरूप ( वन्दनीय ) भारद्वाज महर्षि के गोत्र में
वेदों के तत्त्वार्थ जानने वाले औदीच्य ब्राह्मणों के आचार के मार्गप्रवर्तक यज्ञ
करनेवालों में अत्यन्त श्रेष्ठ जनार्दन नाम के पण्डित हुए ॥ १ ॥
अस्ति श्रियादित्य इति स्म तस्य सूनुः श्रियादित्य इव द्वितीयः ।
त्रिस्कन्धपारङ्गत रङ्गमल्लस्तदात्मजो राणग इत्युदीर्ये ॥ २ ॥
सं०—तस्य जनार्दनस्य सूनुः पुत्रः श्रियादित्य इत्यस्ति स्म। कथंभूतः—
श्रिया दीप्त्या द्वितीय आदित्यः सूर्य इव । तदात्मजः ( तस्य श्रियादित्यस्या-
त्मजः ) उदीर्ये कथनीये राणगः इति आसीत् । कथंभूतः त्रिस्कन्धपारं-
गतरङ्गमल्लः त्रिस्कन्धज्योतिर्विदां युद्धभूमौ युद्धकुशल इत्यर्थः ॥ २ ॥
भा०—उन ( जनार्दन ) के दीप्तियों से दूसरे सूर्य के समान श्रियादित्य
नामक पुत्र हुए । तथा श्रियादित्य के पुत्र त्रिस्कन्ध ज्योतिःशास्त्रवेत्ताओं के युद्ध-
में मल्लस्वरूप राणग नामक हुए ॥ २ ॥
श्रीकेशवः सुकविरध्ययनाध्वनीनव्यूहान्प्रतर्पयितुमर्थपयःप्रवाहैः ।
दैवज्ञराणगसुतः सुतपःश्रयेस्मिन्वृन्दावने मुनिगवीनिवहं दुदोह ॥
सं०—दैवज्ञराणगसुतः सुकविः श्रीकेशवः अध्ययनाध्वनीनव्यूहान्
(अध्ययनमार्गज्ञानिसमूहान्) अर्थपयःप्रवाहैः प्रतर्पयितुं अस्मिन् सुतपःश्रये
(सुपुण्यजनसेव्यमाने) वृन्दावने मुनिगवीनिवहं दुदोह दुग्धवान् ॥ ३ ॥