विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम्-१४ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । १०१
वामावर्ता विशालोन्नतविकटनटद्भ्रूललाटा स्पृशन्ती
नोर्वीमन्त्यांगुलिभ्यामनियतबहुभुग्गेहिनी देहिनी रुक् ॥१६॥
सं०-श्मश्रुश्यामोन्नतोष्ठी (श्मश्रुभिः श्यामौ उन्नतौ च ओष्ठौ
यस्याः सा ), पृथुकरचरणा, ह्रस्वारुणाग्रकेशा; निःशौचा शौचरहिता,
रोमशाङ्गी, कृशकुटिलचलत्क्रूरसच्छद्मदृष्टिः (कृशा कुटिला चलन्ती
क्रूरा सच्छद्मा कपटसहिता दृष्टिर्यस्याः सा ) वामावर्ता (अप्रदक्षिण-
रोमावर्ता ), विशालोन्नतविकटनटद्भ्रूललाटा (विशालं विस्तीर्णं उन्न-
तञ्च विकटनटद्भ्रूललाटं यस्याः सा तथोक्ता विकटनटद्भ्रूः विशालोन्न-
तललाटा चेत्यर्थः ), अन्त्याङ्गुलीभ्यां कनिष्ठिकाभ्यां उर्वी भूमिं न स्पृशन्ती,
अनियतबहुभुक् (अनियतं बहु भुंक्ते सा तथोक्ता) एवं भूता गेहिनी भार्या
देहिनी शरीरधारिणी रुक् साक्षाद्रोग एवेत्यर्थः ॥ १६ ॥
भा०—जिस का दाढ़ी मुछ से श्याम वर्ण और ऊँचा ओठ हो, बड़ा बड़ा हाथ
पैर हो, छोटे छोटे और रूखे अग्रभाग वाले केश हो, जो शौचहीन हो, बहुत रोम-
युक्त शरीरवाली हो, जिसकी छोटी छोटी, टेढ़ी, चञ्चल और कपट भरी आँख हो,
वामावर्त्त रोम हो, बड़ा विशाल और ऊँचा ललाट विचित्र रूप से नाचती भ्रू हो,
चलते समय दोनों पैर की कनिष्ठा (कनगुडिया) अङ्गुली पृथिवी को स्पर्श नहीं करती
हो, जो अनियम रूप से बहुत खानेवाली हो इस प्रकार की पत्नी मानो साक्षात्
शरीर धारण किया हुआ रोग ही है ॥१६॥
या स्फिग्ललाटोदरलम्बिनी सा स्यात्कान्तकान्तानुजतातहन्त्री ।
नितम्बिनी स्वल्पनितम्बगुह्या द्रुह्यात्पतिं दीर्घगला कुलघ्नी ॥१७॥
सं०-या नितम्बिनी स्त्री स्फिग्ललाटोदरलम्बिनी ( स्फिग्गललाटो-
दरैर्लम्बते इति तथोक्ता ) सा क्रमेण कान्त-कान्तानुज-तातहन्त्री स्यात् ।
या स्वल्पनितम्बगुह्या (नितम्बः कटिपश्चाद्भागः, गुह्यो योनिः, स्वल्पे
नितम्बगुह्ये यस्याः सा तथोक्ता ) सा पतिं द्रुह्यात्, या दीर्घगला सा
कुलघ्नी ( प्रतिकुलघातिनी ) भवति ॥ १७ ॥
भा०-दीर्घ नितम्ब (चूतर) वाली पति को, दीर्घ ललाटवाली देवर को
और दीर्घ उदरवाली श्वशुर को नाश करती है। तथा अत्यल्प योनिरवाली स्त्री पति-
कुल को नाश करनेवाली होती है ॥ १७॥
निःस्वातिह्रस्वा धमनौ पुरंध्री प्रायेण तत्रातिपृथुः प्रचण्डा ।