विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् १५ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । १०४
सं०—शशिसितौ ( चन्द्रशुक्रौ ) युग्मर्क्षगौ द्विपदाङ्गनांशे द्विपदस्त्री-
राशिनवांशे ) तनुं लग्नं ईक्षमाणौ स्यातां तदा तदाप्तिपिशुनौ ( कन्यालाभ-
सूचकौ) भवेताम् । वा उदितं लग्नगतं नारीनवांशं वृषादिसमराशिनवांशकं
ईक्षमाणौ शशिसितौ कन्याप्राप्तिसूचकौ भवेताम् । परेऽन्येऽपि खचरा
ग्रहाः स्त्र्यर्क्षगाः समराशिगताः विलसदुज्ज्वलवीर्यभाजः तनुमीक्षमाणाः
कन्याप्तिसूचका भवन्ति ॥ २ ॥
भा०—शुक्र और चन्द्रमा समराशि में स्थित कन्या नवांश में होकर लग्न को
देखते हों तो कन्यालाभ के सूचक होते हैं । अथवा शुक्र चन्द्रमा यदि लग्नगत
समराशिके नवांश को देखते हों तो भी कन्या लाभसूचक होते हैं। दूसरे ग्रह भी
प्रकाशमान विम्ब और बल से युक्त होकर लग्नगत समराशि के नवांश को देखते
हों तो भी कन्याप्राप्ति सूचक होते हैं । अर्थात् इन योगों में वर के लिये कन्या का
लाभ होता है ॥ २ ॥
अथ कन्याया वरप्राप्तिप्रश्नमाह—
एवं नरा नरदृकाणनवांशदृग्भिः
पुंखेचरैरूपनमन्ति नितम्बिनीनाम् ।
यल्लिङ्गिबालकपशुप्रभृतीङ्गितं स्यात्
प्रश्नक्षणे तदु तथैव वधूवरस्य ॥३॥
सं०—एवं पूर्वोक्तप्रकारेण पुंखेचरैः ( रवि-कुज-गुरुभिः ) नरदृ-
काणनवांशदृग्भिः नितम्बिनीनां ( स्त्रीणां ) नरा उपनमन्ति उपलब्धा
भवन्तीत्यर्थः । लग्नगतान् विषमराशिदृकाणनवांशान् पुंग्रहाः पश्यन्ति चेत्
तदा कन्याया वरलाभः स्यादित्यर्थः । अथ निमित्तं कथयति - प्रश्नक्षणे
लिङ्गिबालक-पशुप्रभृतीनां यत् इङ्गितं तद् वधूवरस्य तथैव उ निश्चयेन
भवति ॥ ३ ॥
भा०—जिस प्रकार स्त्रीग्रह ( चन्द्र शुक्र ) और समराशिनवांश से वर
को कन्यालाभ कहा गया है उसी प्रकार—पुरुषग्रह विषमराशि में हों विषमराशि
लग्नगत दृकाण नवांश को देखते हों तो कन्या को वर की प्राप्ति होती है । अब
निमित्त कहते हैं कि—प्रश्न के समय लिङ्गी ( कापालिक आदि ) बालक तथा पशु
आदि जन्तुओं की जिस प्रकार चेष्टा हो उसी प्रकार उस कन्यावर को भी समझना
चाहिये ॥ ३ ॥