विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् १७ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ११३
भा०—दैवज्ञ राणग के पुत्र श्रीकेशवार्क ( मैंने ) अध्ययनमार्गगामिजनों को
अर्थरूपदुग्ध के प्रवाहों से तृप्ति करने के लिये पुण्यवानों से सेव्यमान इस वृन्दावन
में मुनियों के वचनरूप गायों को दूहा है । अर्थात् जैसे—तपस्वियों से
सेव्यमान वन में मार्ग चलने से खिन्न पथिकों की तृप्ति के लिये गायें दुही जाती हैं,
उसी प्रकार दूसरे ग्रन्थों के अध्ययनमार्ग में थके हुए लोगों की तृप्ति के लिए मैंने
भी सुपुण्यजनों से सेवनीय इस वृन्दावन में मुनिवचनों का सारांश संग्रह कर
दिया है ॥ ३ ॥
अबहुदृष्टधियः कियदप्यदः पदगभीरमधीरभिरंस्यते ।
विशदशास्त्रधियां त्विदमेकदा श्रुतिगतं रसनासु विवृत्स्यति ॥ ४ ॥
सं०—अबहुदृष्टधियः ( अल्पज्ञस्य ) अदः ( एतत् मत्कृतं गुण-
विशिष्टमपि विवाहवृन्दावनं ) कियत् ? न किञ्चिदित्यर्थः । तथा—अधीः
( निर्बुद्धिस्तु ) पदगभीरं ( पदैर्गम्भीरं ) दृष्ट्वाऽभिरंस्यते ( आनन्दं प्राप्स्य-
तीत्यर्थः) । तथा—विशदशास्त्रधियां (विशदा अत्यधिका शास्त्रेषु धीर्येषां तेषां)
तु एकदा ( एकवारं ) श्रुतिगतं कर्णप्राप्तं इदं ( विवाहवृन्दावनं ) रसनासु
जिह्वासु विवृत्स्यते विवृद्धिं प्राप्स्यतीत्यर्थः ॥ ४ ॥
भा०—जिन्होंने बहुत शास्त्रों को नहीं देखा उन ( अल्पज्ञों ) के लिये यह
गुणविशिष्टभी विवाहवृन्दावन है तो क्या ? कुछ भी नहीं अर्थात् वे लोग इसे तुच्छ
समझेंगे । तथा जो अबुद्धि ( कुछ भी शास्त्र नहीं देखे ) हैं वे इसे पदों से गंभीर
समझकर ही आनन्द को प्राप्त होंगे । तथा शास्त्रों में विशदबुद्धिवालों के तो
एकबार कर्णगोचर होते ही यह ( विवाहवृन्दावन ) उनकी जिह्वापर जाकर वृद्धि
को प्राप्त होगा ॥ ४ ॥
अथ लग्नशुद्ध्यध्यायः ।
तत्र विवाहविहितनक्षत्राणि—
ध्रुवानुराधामृगमूलरेवतीकरं मघास्वातिरदूषणो गणः ।
रवेरमीना मकरादिषड्गृही करग्रहे मङ्गलकृन्मृगीदृशाम् ॥१॥
सं०—श्लोकोऽयं नक्षत्रशुद्धिप्रकरणे व्याख्यात एव द्रष्टव्यं पृ० २ ॥१॥
भा०—इस श्लोक की टीका नक्षत्रशुद्धि प्रकरण में हो चुकी है ॥ १ ॥
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