विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११६ विवाहवृन्दावनम्- [ लग्नशुद्धि-
यामार्धव्यतिपातविष्टिकुलिके, ऊनाधिके मासे, ऊनाधिकेऽह्नि ( तिथिक्षये
तिथिवृद्धौ चेत्यर्थः ) लग्नं न कार्यम् ॥ ६ ॥
भा०—लग्न में नवांस मिथुन, कन्या, धन और तुला प्रशस्त हैं । लग्न से
वा नवांश से नवांशस्वामी १२, २, ३, ८ स्थानों में किसी में हो तो वह लग्न
नहीं ग्रहण करनां । सप्तम भाव के नवांशस्वामी लग्नसप्तम से वा नवांशसप्तम
से १२, २, ३, ८ इनमें हो तो लग्न नहीं शुभ है । तथा गण्डान्त, वैधृति, और
संक्रान्ति काल से पूर्व तथा पश्चात् २ पहर, यामार्ध, व्यतिपात, भद्रा, कुलिक,
क्षयमास, अधिमास, तिथिक्षय, तिथिवृद्धि इनमें भी लग्न अशुभ होता है ॥ ६ ॥
जन्मर्क्षाज्जन्मलग्नान्निधनविधनते अष्टमद्वादशाभ्यां
लग्ने तत्स्वामितत्स्थैरपि वपुषि खगैस्तद्गृहांशैश्च ते स्तः ।
अस्तेशारेर्नवांशे व्यसनमसुभयं नाडिवेधे षडष्ट-
क्षेत्रेशानामसख्ये दनुजनरगणे वार्कजीवेन्दुशुद्धौ ॥७॥
सं०—जन्मर्क्षात् वा जन्मलग्नात् अष्टमद्वादशाभ्यां राशिभ्यां लग्ने
स्थिताभ्यां क्रमेण निधनविधनते ( अष्टमराशौ लग्नगते निधनता मृत्युः,
द्वादशराशौ लग्नगते विधनता निर्धनत्वं स्यादित्यर्थः ) । तत्स्वामितत्स्थैः
( तयोः जन्मर्क्षलग्नयोः द्वादशाष्टमस्वामिभिः, तन्नस्थैश्च ) खगैः वपुषि
लग्ने स्थितैश्च ते ( निधनविधनते ) स्तः । तथा तद्गृहांशैश्च लग्ने स्थितैः
ते निधनविनते भवतः । अस्तेशारेः सप्तमेशरिपोर्नवांशे लग्नस्थे व्यसनं
दुःखं स्यात् । नाडिवेधे सति असुभयं प्राणभीतिः स्यात् । षडष्टक्षेत्रेशानां
( षट्काष्टके राश्याधिपानां ) असख्ये वैरे सति, तथा दनुजनरगणे,
वाऽर्कजीवेन्दुशुद्धौ ( रविगुरुचन्द्रबलालाभे सति ) असुभयं भवति ॥ ७ ॥
भा०—जन्मराशि से वा जन्मलग्न से अष्टमराशि विवाहलग्न में हो तो मरण,
और द्वादशराशिलग्न में हो तो निर्धनता, एवं अष्टम द्वादश के स्वामी, वा उन्हीं
अष्टमद्वादश में स्थित ग्रह लग्न में पड़े तो भी क्रम से मरण और निर्धनता
समझना । वा उन्हीं अष्टमद्वादश के नवांश वा तन्नस्थित ग्रहों की राशि के नवांश-
लग्न में हों तो भी क्रम से मरण और निर्धनता समझना । सप्तमेश का जो शत्रु
हो उसका नवांश लग्न में पड़े तो दुःख, नाडीवेध हो, वा षटकाष्टक होने पर
राश्याधिपों में शत्रुता हो, वा नर और राक्षस गण हों, तथा रवि गुरु और चन्द्र
की शुद्धि न हो तो प्राणभय होता है ॥ ७ ॥