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सर्वकोश
विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

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पृष्ठ 118

प्रकरणम् १४ ] वसन्तरक्ष्मीसहितम् । १०५
भा०-पुरुष अथवा स्त्री के पैर वा हाथ में यदि कमल, विल्व वृक्ष, ध्वजा,
हस्ती, मछली, स्तम्भ, कलश, माला, ऐना, छत्र, अंकुश, वज्र, भृंगार ( सुवर्ण
जलपात्र ), पर्वत, रथ, घोड़ा, श्रीवत्स ( हृदय में रोम की दक्षिणावर्त भौंरी ),
पङ्खा, जौ, यज्ञस्तम्भ, इत्यादि चिह्न हों तो अवश्य राज्य मिलता है ॥२५॥
अथ मुख्यशुभलक्षणान्याह -
अर्चितं वचनमुन्नतं मनो निर्विशेषसुखदं वपुर्दृशाम् ।
अस्ति चेदघपराङ्मुखा मतिर्लक्षणैः किमपरैर्नृयोषिताम् ॥२६॥
सं०-चेद्यदिवचनं अर्चितं पूजितं 'लोकैः स्वीकृत'मित्यर्थः । मनः
उन्नतम् , वपुः शरीरं दृशां चक्षुषां निर्विशेषसुखदं अत्यन्तसुखप्रदम्, मतिः
अघपराङ्मुखा (पापात्परावृत्ता ) तर्हि नृयोषितां (नरनारीणां ) अपरैः
लक्षणैः किं ? न किमपि प्रयोजनमित्यर्थः ॥ २६ ॥
भा०-यदि बचन आदरणीय, मन उच्च, शरीर नेत्रों को अत्यन्त सुख-
प्रद तथा बुद्धि पापकर्म से निवृत्त हों तो अन्य शुभ लक्षणों से क्या प्रयोजन ?
अर्थात् इन्हीं चार सुलक्षणों से सब सिद्ध होता है ॥२६॥
अथ निमित्तानि कथयति तत्र पक्षिचेष्टितान्याह -
वरस्य कन्यावरणे वरेण्यो दुर्गेव यो दक्षिणचेष्टितश्च ।
अदक्षिणं चेष्टितमिष्टमाहुस्तयोः कुमारी वृणुयाद्वरं चेत् ॥२७॥
सं०-वरस्य कन्यावरणे कन्यावरणकाले यः 'पुंसंज्ञितः पक्षी' दक्षिण-
चेष्टितः (दक्षिणाङ्गे कण्डूयनादिभिश्चेष्टितः ) स दुर्गा कृष्णचीटिका इव
वरेण्यः शुभप्रदो भवति, स्त्रीसंज्ञितपक्षिषु दुर्गापि दक्षिणचेष्टितैव शुभप्रदा
भवतीत्यर्थः । अनयोर्वामचेष्टितं न शुभप्रदमित्यर्थत एव सिद्ध्यति । तथा
यदि कुमारी वरं वृणुयात् तदा तयोः पुंसंज्ञितपक्षिदुर्गयोः अदक्षिणं चेष्टितं
वामाङ्गचेष्टितं इष्टं शुभप्रदं आहुः 'मुनीन्द्रा' इति शेषः ॥ २७ ॥
भा०-वर जिस समय कन्या का वरण करै उस समय पुंल्लिंग पक्षी और
स्त्रीलिंग में दुर्गा (कृष्णचीटिका ) पक्षी ये दोनों यदि दक्षिण अङ्ग से (खुजलाना
आदि कोई ) चेष्टा करते हों तो शुभप्रद समझना । अर्थात् इन दोनों के वाम चेष्टा
कन्यावरण में अशुभ है । तथा जिस समय कन्या ही वर का वरण करै उस समय
उक्त दोनों पक्षियों का वाम चेष्टा ही शुभप्रद है। अर्थात् दक्षिण चेष्टा अशुभ है ॥
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