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तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा

DevanagariHindipublished174 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 174 में से

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पृष्ठ 36

कल्पना करता हूं उस समय जितना आनन्द होता है उस-
से ज्यादा भय होता है कि तैयारी पूरी होते न होते कर्तव्य-
का आह्वान न आ जाय। तब यही चाहता हूं कि जब तक
तैयार न हो जाऊं तबतक छुटकारेकी बात नहीं उठे।
आज मैं बाहर भीतरसे तैयार नहीं हूं इसलिये कर्तव्यका
आह्वान भी नहीं आया। जिस दिन तैयार हो जाऊंगा,
उस दिन एक मुहूर्तके लिये भी यह मुझे अटकाकर न रख
सकेगा।
यही भावोंका सिलसिला है, इसमें Objective
truth है यो नहीं, नहीं जानता। जेलमे रहते रहते sub-
jective truth और objective truth एक हो गया हैं।
भाव और स्मृतिके सहारे रहते रहते, भाव और स्मृति
ही वास्तविकमें परिणत हो जाती हैं। मेरी अवस्था
बहुत कुछ ऐसी ही हो गयी है। भाव ही मेरे लिये
वास्तव सत्य है, क्योंकि एकत्व बोधमें ही शान्ति है।
आपने लिखा है, “देश और कालके व्यवधानने बंगालके
लिये आपको और भी अधिक प्रिय कर दिया हैं।” और
देश कालके व्यवधानने बंगालको मेरे सामने कितना
सुन्दर, कितना वास्तविक बना दिया है, यह मैं कह नहीं
सकता। देशबन्धुने कहा है, “बंगालके जल और मिट्टीमें
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