तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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६४ दर्शनमीमांसा का संग्रह | ५६ शरीरनिरूपण
८१-८५ श्लोक १३० | [ द्वितीय प्रमेय ] १६३
६५ मीमांसक मत का उपपादन १३१ | ५७ इन्द्रियनिरूपण
६६ नैयायिकमत से स्वतःप्रामाण्य | [ तृतीय प्रमेय ] १६४
का खण्डन १३३ | ५८ अर्थनिरूपण
६७ परतः प्रामाण्य का उपपादन १३४ | [ चतुर्थ प्रमेय ] १६८
४८ ज्ञाततान्यथानुपपत्तिप्रसूता | ५९ द्रव्यनिरूपण [ एक ]
अर्थापत्ति से ज्ञान और | ७८ मीमांसाभिमत तमो द्रव्य १७०
प्रामाण्य का ग्रहण १३६ | तमो द्रव्य का खण्डन १७१
४९ ज्ञातता का मण्डन १३७ | ५९ पृथिवीनिरूपण [क] १७८
५० मीमांसक द्वारा ज्ञातता का | ७९ पाकजोत्पत्ति विधान १७३
उपपादन १३८ | ८० पीलूपाक तथा पिठरपाक १७४
५१ विषय नियम का स्वाभा- | ८१ वैशेषिक का 'पी
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पृष्ठ
८४ द्वित्वविनाश प्रक्रिया १९५
८५ आश्रयनाश से द्वित्वनाश १९६
८६ सहानवस्थान विरोध पक्ष १९७
८७ वध्यघातक विरोध पक्ष १९७
७९ परिमाण निरूपण [६] १९८
८० पृथक्त्व निरूपण [७] २००
८१ संयोग निरूपण [८] २०१
८२ विभाग निरूपण [९] २०२
८३ परत्व अपरत्व निरूपण
[ १०-११ ] २०३
८४ गुरुत्व निरूपण [१२] २०४
८५ द्रवत्व निरूपण [१३] २०५
८६ स्नेह निरूपण [१४] २०५
८७ शब्द निरूपण [१५] २०५
८८ वीचीतरङ्ग न्याय २०६
८९ कदम्ब मुकुल न्याय २०७
८८ अनित्यत्व लक्षण २०९
८९ योगिसद्भाव में प्रमाण २०९
९० बुद्धि निरूपण [१६] २१०
[L2
भूमिका
प्रदीपः सर्वविद्यानां उपायः सर्वकर्मणाम् ।
आश्रयः सर्वधर्माणां शश्वदान्वीक्षिकी मता ॥
न्यायशास्त्र उच्चकोटि के संस्कृत साहित्य और विशेषतः भारत के दार्शनिक
साहित्य का प्रवेशद्वार है। उसके प्राथमिक परिज्ञान के बिना संस्कृत साहित्य के
किसी भी उँचे ग्रन्थ को फिर चाहे वह व्याकरण, काव्य, अलङ्कार, आयुर्वेद,
धर्मशास्त्र आदि दर्शन से सर्वथा असम्बद्ध विषयों का ही क्यों न हो यथार्थरूप से
समझ सकना कठिन है और दार्शनिक साहित्य में तो उसके बिना एक पग भी
चल सकना असम्भव ही है। न्याय और व्याकरण ये दोनों संस्कृत साहित्य का
प्रौढ पाण्डित्य प्राप्त करने के लिए आधारस्तम्भ का काम करते हैं। न्यायशास्त्र
पर जिसका जितना ही परिष्कृत अधिकार होगा अन्य शास्त्रों में उसका प्रवेश
उतनी ही सरलता और वैसी ही अबाध गति से हो सकता है। न्यायशास्त्र वस्तुतः
बुद्धि को सुपरिष्कृत, तीव्र और विशद बनाने वाला शास्त्र है। सान पर रखे हुए
शस्त्र द्वारा छेदनकार्य जैसे सुकर हो जाता है, न्याय संस्कारों से सुसंस्कृत मति के
लिए शास्त्राभ्यास का कार्य भी वैसे ही सुगम बन जाता है। परन्तु न्यायशास्त्र
जहाँ इतना आवश्यक और उपयोगी है वहाँ उतना ही कठिन भी है। विशेषतः
नव्य न्याय की रचना तो मानो सभी शास्त्रों की दुर्बोधता को एकत्र करके ही की
गई है। नव्य न्याय जैसा दुर्बोध विषय दूसरा नहीं है। संस्कृत के छात्र उसके
'परिष्कारों' को लोहे के चने कहते हैं, जो किसी अंश में भी अत्युक्ति नहीं है।
जिन्होंने अपने जीवन के सबसे सुन्दर, सबसे सुखद और सबसे अधिक बहुमूल्य
बारह-बारह वर्ष नव्य न्याय के उन्हीं परिष्कारों की भेंट चढ़ा दिए हैं ऐसे त्यागी और
तपस्वी विद्वानों की आज भी कमी नहीं है। पर उनकी संख्या प्रतिदिन कम होती
जा रही है। आज के भोग-प्रधान युग में 'ब्राह्मणेन निष्कारणो धर्मः षडङ्गो वेदोऽ-
ध्येयो ज्ञेयश्च' का आदर्श सामने रख कर कठोर साधना करने वाले इन तपस्वी
विद्वानों के उस तप और त्याग की कहानी बड़ी करुण जान पड़ती है। परन्तु
भारतीय दर्शनशास्त्र के इतिहास में वह सदा सुवर्णाक्षरों में अङ्कित रहेगी। उस
अपरिमित और उदात्त तप के बाद शान्ति और सन्तोष के साथ—
अधीतमध्यापितमर्जितं यशः, न शोचनीयं किमपीह विद्यते ।
अतः परं श्रीभवनाथशर्मणां, मनो मनोहारिणि जाह्नवीतटे ॥
के कृतज्ञतापूर्ण शब्दों में अपने जीवन की चरितार्थता को उद्घोषित करने
वाली वे अमर आत्माएँ धन्य हैं।
न्यायशास्त्र का आरम्भ कब, कैसे और कहाँ हुआ इसका कोई निश्चित विवरण
संस्कृत साहित्य में नहीं मिलता फिर भी उसके प्रतिपाद्य विषय का मनन करने से
[ १६ ]
उसके आविष्कार की कहानी का कुछ आभास पाया जा सकता है। किसी एक
विषय को लेकर विशुद्ध जिज्ञासा-भाव से अथवा जय-पराजय की आकांक्षा से
अनेक विद्वान् पुरुषों में परस्पर जो शास्त्रचर्चा होती है उसी का नाम क्रमशः 'वाद'
और 'जल्प' है। न्यायशास्त्र की सारी शक्ति 'वाद' और 'जल्प' अथवा शास्त्रचर्चा के
इस स्वरूप को परिमार्जित, परिष्कृत और नियमित करने में ही व्यय हुई है ऐसा
स्पष्ट प्रतीत होता है। वादी और प्रतिवादी को अपने.२ विषय का प्रतिपादन किस
शैली से करना चाहिए, कौन सी ऐसी त्रुटियाँ हैं जो उनके पक्ष को कमजोर बना
देती हैं; प्रतिपक्षी को कैसे अवसर पर निगृहीत कर लेना चाहिए, वाद-विवाद की
शैली और इन्हीं दाँव-पेंचों का विशद विवरण न्यायशास्त्र के बहुत बड़े भाग में
मिलता है। इसके अतिरिक्त न्यायशास्त्र का जो कुछ अंश बचता है वह देहादि से
व्यतिरिक्त नित्य आत्मा की सत्ता-साधन में व्यय हुआ है। बस यह दो और
केवल यही दो न्यायशास्त्र के प्रतिपाद्य विषय हैं। इन दोनों विषयों का ध्यान कर
उस परिस्थिति का जिसमें न्यायशास्त्र का निर्माण हुआ, अनुमान सहज ही में
लगाया जा सकता है।
यह कहने की आवश्यकता नहीं कि न्यायशास्त्र के इन दोनों विषयों में से एक
साध्य है और दूसरा साधन । देहादि से अतिरिक्त नित्य आत्मा की सत्ता सिद्ध
करना ही न्यायशास्त्र का प्रमुख और सैद्धान्तिक भाग है। यह दूसरी बात है कि
परिस्थितियों के वशीभूत होकर अपने विषयों का प्रतिपादन करते समय उसने
साध्य को गौण और साधन-भाग को प्रधान बना दिया है। न्यायशास्त्र के प्रधान
प्रतिपाद्य-विषय आत्मवाद को देखकर यह सहज ही समझा जा सकता है कि
आत्मवाद और नैरात्म्यवाद के सङ्घर्ष में ही न्यायशास्त्र का आदि सूत्रपात हुआ है।
और उनके पारस्परिक वाद-विवादों से ही न्यायशास्त्र का विकास हुआ है।
वस्तुतः देखा जाय तो न्याय-दर्शन मनुष्य के विचारों का परिशोधक और
संरक्षक है। वात्स्यायन ने 'प्रमाणैरर्थपरीक्षणं न्यायः' के शब्दों में न्याय का जो
स्वरूप निर्दिष्ट किया है, वह भी इसी बात का पोषक है। प्रमाण और तर्क
[युक्तियों] के द्वारा किसी सिद्धान्त [अर्थ] की परीक्षा करना न्याय का कार्य
है। इस दृष्टि से मनुष्य जब किसी विषय में कोई सिद्धान्त स्थिर करता है वहीं
न्याय की सहायता अपेक्षित होती है। इसलिए न्याय-दर्शन विचारशील मानव
समाज की मौलिक आवश्यकता और प्राथमिक उद्भावना है। उसके विना मनुष्य
न अपने विचारों एवं सिद्धान्तों को परिष्कृत तथा सुस्थिर ही कर सकता है और न
प्रतिपक्षी के सैद्धान्तिक आघातों से अपने सिद्धान्त की रक्षा ही कर सकता है।
अपने सिद्धान्तों के परिष्कार, रक्षा और प्रचार कार्य में मनुष्य का सबसे बड़ा
सहायक न्याय शास्त्र ही है। इसीलिए न्याय-दर्शन के 'जल्प' और 'वितण्डा' का
प्रयोजन बतलाते हुए भाष्यकार ने लिखा है—
'तत्त्वाध्यवसायसंरक्षणार्थं जल्पवितण्डे, कण्टकशाखावरणवत्'
[ १७ ]
जिस प्रकार किसी छोटे पौधे की रक्षा करने के लिए उसके चारों ओर काँटों
की बाड़ लगा दी जाती है इसी प्रकार सिद्धान्त या तत्त्व की रक्षा के लिए
जल्प-वितण्डा आदि न्यायाङ्ग, काँटेदार बाड़े के समान हैं।
इस सिद्धान्त को समझ लेने से हमें न्याय शास्त्र के विविध स्वरूपों को या उन
परिवर्तनों को जो कि समय २ पर उसमें होते रहे हैं समझने में सहायता मिलेगी।
'अर्थपरीक्षा' और 'तत्त्वाध्यवसाय-संरक्षण' यही न्याय शास्त्र के प्रधान कार्य हैं इस
लिए उसका स्वरूप बहुत कुछ मानव-विचारों के ऊपर अवलम्बित है। जिस प्रकार
पृथ्वी में सभी प्रकार के पोषक तत्त्व हैं, हम अपने चर्म-चक्षुओं से उन्हें भले ही न
देख सकें पर नीम और नीबू, अंगूर और आम, केला और कटहल सभी अपने २
पोषक तत्त्व उसी पृथ्वी में से खींच लेते हैं और अपने फलों द्वारा उन विरोधी तत्त्वों
के अस्तित्व को मूर्त्तरूप में हमारे सामने प्रस्तुत कर देते हैं, इसी प्रकार विचार क्षेत्र
और प्रमाण क्षेत्र में भी हर प्रकार के तत्त्व विद्यमान हैं। हर विचार के और हर
सिद्धान्त के पोषक तत्त्व उसमें मिल सकते हैं। विचार क्षेत्र से उन तत्त्वों को खींच
कर अपने सिद्धान्त को परिपुष्ट करना और उन तत्त्वों को मूर्त्तरूप दे देना यही
न्यायशास्त्र का कार्य है। इसलिए बहुधा दो विरोधी सिद्धान्तों के समर्थन एवं
संरक्षण का भार न्यायशास्त्र पर ही आता है, और न्यायशास्त्र उन दोनों ही
सिद्धान्तों की पुष्टि के लिए आवश्यक उपकरण उसी सामान्य क्षेत्र से निकाल कर
जुटाता है। 'आत्मा है' की पुष्टि भी न्यायशास्त्र ही करता है और 'आत्मा नहीं है'
इसकी पुष्टि का उत्तरदायित्व भी न्यायशास्त्र पर ही आता है। हम उसे 'बौद्धन्याय'
नाम से अलग करने का यत्न भले ही करें पर है तो वह न्यायशास्त्र ही। ऐसी
अवस्था में मूलतः एक ही तत्त्व होने पर भी उसके बाह्यस्वरूप में परिवर्तन हो
जाता है और एक ही न्यायशास्त्र प्राचीन न्याय, नव्यन्याय; बौद्धन्याय, जैन न्याय,
पौरस्त्यन्याय, पाश्चात्त्यन्याय आदि के विविधस्वरूपों में हमारे सामने आता है।
न्यायशास्त्र के विकास पर धार्मिक प्रभाव—
भारतीय साहित्य में न्याय शास्त्र का पथनिर्देश प्रायः धार्मिक भावना ने किया
है। समाज में जिस प्रकार की धार्मिक क्रान्तियां समय २ पर होती गईं न्यायशास्त्र
के स्वरूप पर उसका प्रभाव स्पष्ट रूप से अङ्कित होता गया। वह प्रभाव इतना
व्यापक और इतना स्थायी है कि विभिन्न काल में निर्मित न्याय साहित्य पर
उसकी छाप स्पष्ट दिखाई देती है। इस प्रभाव की परख को ध्यान में रखते हुए
यदि हम सम्पूर्ण न्याय साहित्य का विश्लेषण करें तो हमें उसके तीन भाग
बिल्कुल अलग २ दिखाई देंगे, जिन्हें हम प्राचीन न्याय, मध्य न्याय और नव्य
न्याय के नाम से निर्दिष्ट कर सकते हैं। न्याय दर्शन का प्रादुर्भाव बुद्ध भगवान् के
जन्म के पूर्व हो चुका था। न्याय शास्त्र के प्रवर्तक गौतम ऋषि के गोत्रज होने से
ही कदाचित् वह गौतम बुद्ध कहे जाते हैं। इसलिए बौद्धधर्म के प्रादुर्भाव और
प्रतिष्ठा से पूर्व का न्याय 'प्राचीन न्याय' कहलाता है; बौद्ध और जैन धर्म के
२ त० भ०
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यौवनकाल का 'बौद्ध न्याय' तथा जैन-न्याय 'मध्य कालीन न्याय' है और बौद्ध-
धर्म के पतन एवं ब्राह्मण धर्म के पुनरुत्थान काल का न्याय 'नव्य न्याय' के नाम
से विख्यात है।
भारत के धार्मिक जगत् में बौद्ध धर्म एक भीषण क्रान्ति के रूप में उत्पन्न
हुआ और वि० पू० पञ्चम शताब्दी से लेकर दश शताब्दी वै० तक १५०० वर्ष
उसने देश के धार्मिक एवं राजनीतिक क्षेत्र को व्यापक रूप में प्रभावित किया।
परन्तु उसके बाद वह भारत से एकदम लुप्त हो गया। भारत के सीमावर्ती तिब्बत
चीन, ब्रह्मा, लङ्का आदि देशों में बौद्धधर्म का प्रचार हो जाने के बाद भारत में
उसका प्रभाव बहुत काल तक स्थिर नहीं रह सका। वह आँधी की तरह आया,
राज्याश्रय ने उसे उत्तेजना दी, लगभग पन्द्रह सौ वर्ष बाद फिर जैसे सब कुछ
साफ हो गया केवल साहित्य में जहाँ-तहाँ उसके कुछ चिह्न अवशिष्ट रह गए।
बौद्धधर्म के उन्हीं साहित्यिक भग्नावशेषों में मध्यकालीन 'बौद्ध-न्याय' है। 'बौद्ध
न्याय' के समकालीन तथा समान तन्त्र 'जैनन्याय' की भी लगभग वही स्थिति
है। परन्तु न विदेशों में उसका उतना प्रचार हुआ और न भारत से उसका
विलोप ही हुआ।
वह बौद्धन्याय [ तथा जैन न्याय ] एक आँधी या क्रान्ति की स्मृति या
भग्नावशेष भले ही हो परन्तु उसका अपना स्वतन्त्र व्यक्तित्व है और वह व्यक्तित्व
इतना ज़बरदस्त है कि उसने दार्शनिक साहित्य और विशेषतः ब्राह्मणों के न्याय
साहित्य को अलग दो टुकड़ों में बाँट दिया है। बौद्धधर्म से पूर्व का प्राचीन न्याय
अलग है और बौद्धधर्म के ह्रास के बाद का नव्य न्याय अलग है। उन दोनों
की रचना शैली इतनी भिन्न हो गई है कि उनको मिलाने का यत्न करने पर भी
वे मिल नहीं सकते। उन दोनों के बीच अविचल खड़ा हुआ 'मध्य न्याय' या बौद्ध
न्याय जैसे आज भी उनके सारे बल-पौरुष-प्रयत्न को विफल कर रहा है।
प्राचीन और नवीन न्याय के बीच 'बौद्ध न्याय' जो अपना एक अलग अस्तित्व
रखता है उसका कारण उसकी धार्मिक विशेषता है। बौद्धधर्म अनात्मवादी धर्म है
और उसके पूर्वोत्तरवर्ती धर्म आत्मवादी धर्म हैं। इसलिए जहाँ प्राचीन और
नवीन न्याय आत्मास्तित्व-पोषक तत्त्व जुटाने का प्रयत्न करते हैं वहाँ बौद्धन्याय
अनात्मवाद-पोषक तत्त्वों का संग्रह करने में व्यस्त है। इसलिए उसका व्यक्तित्व
उन दोनों से अलग स्पष्ट ही दीख रहा है।
न्यायशास्त्र के दो युग—
न्याय साहित्य के जो यह तीन प्रमुख विभाग हमने किए हैं, इनकी भी सूक्ष्म
विवेचना करने से उनमें से प्रत्येक में अनेक स्तर [ तह ] दिखाई देते हैं जो उसके
विभिन्न-कालिक प्रभावों को परिलक्षित करते हैं। उदाहरण के लिए प्राचीन न्याय
को लीजिए। रचना की दृष्टि से इसके दो भाग अत्यन्त स्पष्ट हैं। एक में मूल सूत्र
और दूसरे में भाष्य, वार्त्तिक, तात्पर्य टीका आदि का समावेश होता है। इनमें से न
[ १६ ]
मूल सूत्रों का निर्माण एक दिन में हुआ है और न भाष्यवार्तिक आदि का, दोनों के
निर्माण में शताब्दियाँ लगी हैं। भाष्य, वार्तिक, तात्पर्य टीका आदि अलग २ ग्रन्थ
हैं इसलिए उनके ऊपर इन शताब्दियों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। परन्तु
मूल सूत्र अलग २ पुस्तकें नहीं हैं। वह एक पुस्तक के रूप में उपलब्ध होते हैं
इसलिए उनके भीतर शताब्दियों का प्रभाव सहज में नहीं देखा जा सकता फिर
भी जिन संघर्षों में होकर न्याय-सूत्रों को अन्तिम स्वरूप मिल सका है उनका
प्रभाव छिप नहीं सकता है।
यों तो न्याय शास्त्र का सारा जीवन ही संघर्ष का जीवन रहा है। आत्मा
और अनात्मा के इस संघर्ष से उसका जन्म हुआ, इसीसे उसका विकास हुआ,
इसीसे वह जी रहा है और जिस दिन मरेगा-उस दिन इसी संघर्ष में वीरगति लाभ
करेगा। परन्तु इस संघर्षमय जीवन में उसके शत्रुगण विविध रूपों में उसके
प्रतिपक्ष में खड़े हुये हैं। जिस आदि अनात्मवाद के संघर्ष से न्याय शास्त्र को
जन्मलाभ हुआ वह अनात्मवाद कुछ दूसरी ही चीज थी परन्तु कुछ समय बाद
न्यायशास्त्र के यौवनकाल में उसी अनात्मवाद ने बौद्ध दर्शन के नैरात्म्यवाद के
नवीन रूप में आकर उससे लोहा लिया है।
१ साध्यप्रधानयुग—
उपनिषदों में अनेक स्थलों पर अनात्मवादी अथवा देहात्मवादी मतों का उल्लेख
मिलता है। कठोपनिषत् १, ९ 'येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति
चैके' और छान्दोग्य नवमाध्याय के इन्द्र-विरोचन के उपाख्यान में जिस अनात्म-
वाद और देहात्मवाद का उल्लेख हुआ है वह विचार उस काल से भी बहुत पूर्व
की सम्पत्ति हैं। ऐसे विचारों का परिशोधन कर नित्य आत्मा के अस्तित्व को
प्रतिष्ठित करना ही उपनिषदों का ध्येय है। उसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये लगभग
उसी समय के आस पास न्यायशास्त्र का भी सूत्रपात हुआ। यह न्यायशास्त्र का
'साध्यप्रधान' अथवा 'अध्यात्मप्रधान' युग था। उसमें विशुद्ध जिज्ञासा भाव से
शङ्का-समाधान होता था। परन्तु जय या पराजय की भावना उसमें नहीं थी।
ऐसे अनेक प्रसङ्गों की चर्चा उपनिषदों में आई है। उन प्रसङ्गोंमें दोनों पक्ष अपनी-
अपनी बात को समझाने के लिये युक्ति और प्रमाणों का आश्रय लेते थे। उनको
भी सिद्धान्तों के परिशोधन एवं संरक्षण के लिये न्यायशास्त्र की सहायता की आव-
श्यकता होती थी। परन्तु वह जो कुछ थी, जिज्ञासा-भाव से, मूलतत्त्व को समझने
के लिये। श्रद्धापूर्वक, समित्पाणि होकर, जिज्ञासाभाव से लोग उपस्थित होते थे
आत्मदर्शी ऋषियों के आश्रम में। वैसे ही प्रेम भाव से अपने सम्पूर्ण अनुभव को
जिज्ञासु के हृदय में उड़ेल देने की आकुलता के साथ ऋषियों के उत्तर होते थे।
और यदि एक बार में समझ में नहीं आते तो दूसरे दिन दूसरे प्रकार से और
तीसरे दिन तीसरे प्रकार से उसी बात को समझाया जाता था। उद्देश्य था आत्म-
तत्त्व का ज्ञान प्राप्त करना, वह जिस प्रक्रिया से भी हो सके वही ठीक है—
[ २० ]
'यया यया भवेत्पुंसां व्युत्पत्तिः प्रत्यगात्मनि ।
सा सैव प्रक्रिया साध्वी विपरीता ततोऽन्यथा ॥'
यह प्राचीन न्याय का एक युग था। उसे हमने 'साध्यप्रधान युग' के नाम से
निर्दिष्ट किया है।
२ साधनप्रधानयुग—
उसके बाद आत्मा और अनात्मा का यह विवाद जब स्पष्ट रूप से पक्ष-प्रतिपक्ष
के रूप में सामने आया और उसके साथ वादी या प्रतिवादी की जय अथवा
पराजय की भावना का पुट लगा तो उसने एक नवीन रूप धारण किया। जय-
पराजय की इस भावना के साथ ही विषय-प्रतिपादक पञ्चावयवयुक्त अनुमान-
वाक्य की शैली का आविष्कार हुआ। प्रतिज्ञा, हेतु और उदाहरणादि का पृथक् २
निर्देश कर परार्थानुमान की प्रणाली का जन्म और उसके बाद हेत्वाभास, जाति
और अन्त में निग्रह स्थानों का परिष्कृत रूप में प्रचार इन सबका आविष्कृत
और प्रचलित होना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य था और वही हुआ भी। थोड़े
समय में वाद-विवाद की कला ने एक स्वतन्त्र शास्त्र का रूप धारण कर लिया
और उनके लिये स्वतन्त्र परिभाषाओं और स्वतन्त्र नियमों का निर्माण हुआ।
न्यायशास्त्र के इस परिवर्तन काल में नियम-निर्माण आदि के इस अभिनव
आयोजन का कुछ ऐसा प्रभाव पड़ा कि तात्कालिक नैयायिकों की दृष्टि में आत्म-
तत्त्व विवेचन रूप उनका प्रधान प्रतिपाद्य विषय तो पीछे पड़ गया, और साध्य
के बजाय साधन के निर्माण में ही उनकी सारी शक्ति लग गई। इस नवीन युग-
भावना के बीच सुसंस्कृत होकर न्यायशास्त्र जिस रूप में हमारे पास पहुँचा वही
आज का उपलब्ध न्यायदर्शन है, जिसमें साध्य की अपेक्षा साधन पर और प्रमेय
की अपेक्षा प्रमाण पर अधिक बल दिया गया है। इसे हम न्यायशास्त्र में 'साधन-
प्रधान-युग' कह सकते हैं।
न्यायशास्त्र के इन दो विभिन्न रूपों का परिचय न केवल उसके विकास क्रम
के सूक्ष्म परिशीलन में ही पाया जाता है, अपितु दो विभिन्न कालों में उसके लिये
प्रयुक्त होने वाले दो विभिन्न नामों में भी उनकी ध्वनि स्फुट रूप में प्रतीत होती
है। प्राचीन न्यायशास्त्र के लिये 'आन्वीक्षिकी' शब्द का प्रयोग संस्कृत साहित्य में
बहुतायत से हुआ है। और वह शब्द न्यायशास्त्र के 'साध्यप्रधान युग' की भावना
को ही स्फुटतया व्यक्त करता है। 'आन्वीक्षिकी' शब्द का अर्थ स्वयं भाष्यकार
'वात्स्यायन' ने इस प्रकार किया है—
'प्रत्यक्षागमाभ्यामीक्षितस्य अन्वीक्षणमन्वीक्षा।
तया प्रवर्तत इत्यान्वीक्षिकी न्यायविद्या न्यायशास्त्रम् ॥'
अर्थात् प्रत्यक्ष [योगि प्रत्यक्ष] और आगम [आप्त वचन] द्वारा परिज्ञात
अर्थ [आत्मतत्त्व] का [युक्तियों द्वारा लौकिक पुरुषों के] परिज्ञान प्राप्त करने
[ २१ ]
का नाम 'अन्वीक्षा' है और अन्वीक्षण के आधार पर प्रवृत्त हुई विद्या का नाम
आन्वीक्षिकी अथवा न्यायशास्त्र है ।
आन्वीक्षिकी शब्द के इस सूक्ष्म विश्लेषण से यह परिणाम सरलता से ही
निकाला जा सकता है कि इस शब्द के भीतर आत्मान्वीक्षण की झलक स्पष्ट है
और वह न्यायशास्त्र के इतिहास के 'साध्यप्रधान युग' की भावना को ही व्यक्त
करता है ।
आन्वीक्षिकी के अतिरिक्त न्यायशास्त्र के वादविद्या, तर्कविद्या आदि जो अन्य
नाम मनुस्मृति, स्कन्दपुराण, महाभारत, गौतम-धर्मशास्त्र आदि ग्रन्थों में मिलते
हैं, वे सभी उसके 'साधनप्रधान-युग' के द्योतक हैं । स्वयं न्याय शब्द की ध्वनि
भी 'साधनप्रधान-युग' के साथ ही है । 'वात्स्यायन' ने न्याय शब्द का अर्थ—
'प्रमाणैरर्थपरीक्षणं न्यायः' ।
किया है, उसकी ध्वनि 'साध्यप्रधान-युग' के नहीं अपि तु 'साधनप्रधान-युग'
के साथ ही है। इस प्रकार हम देखते हैं कि प्राचीन न्यायशास्त्र का जो रूप मूल
न्याय दर्शन के नाम से आज उपलब्ध होता है वह दो विभिन्न कालों की दो
विभिन्न भावनाओं के बीच निमग्नोन्मग्न होता हुआ परिमार्जित और परिष्कृत
होकर हम तक पहुँचा है । और सूक्ष्म आलोचक-दृष्टि उसके भीतर से प्राचीन
न्याय शास्त्र के क्रमिक विकास के इतिहास को सफलतापूर्वक परिलक्षित कर
सकती है ।
न्याय शास्त्र के निर्माता
इस न्याय-शास्त्र के निर्माण का वास्तविक श्रेय किसको प्राप्त है । इस प्रश्न
का भी कोई सहज निपटारा दिखाई नहीं देता । इसका कारण यह है कि संस्कृत
साहित्य के विविध ग्रन्थों में न्यायशास्त्र के रचयिता का उल्लेख विविध नामों से
मिलता है । पद्मपुराणे१, स्कन्दपुराणे२, गान्धर्व तन्त्रे३, नैषधचरिते४ और विश्वनाथ वृत्ति५
१. कणादेन तु सम्प्रोक्तं शास्त्रं वैशेषिकं महत् ।
गौतमेन तथा न्यायं, सांख्यन्तु कपिलेन वै ॥ [ पद्म, उत्तर खं. अ. २६३ ]
२. गौतमः स्वेन तर्केण खण्डयंस्तत्र तत्र हि । [ स्कन्द. कालिका खं. अ. १७ ]
३. गौतमप्रोक्तशास्त्रार्थनिरताः सर्व एव हि ।
शृगालीं योनिमापन्नाः सन्दिग्धाः सर्वकर्मसु ॥
[ गान्धर्व तन्त्र-प्राणतोषिणी तन्त्र में उद्धृत ]
४. मुक्तये यः शिलात्वाय शास्त्रमूचे सचेतसाम् ।
गौतमं तमवेत्तैव यथा वित्थ तथैव सः ॥ [ नैषध सर्ग १७ ]
५. एषा मुनिप्रवरगौतमसूत्रवृत्तिः,
श्रीविश्वनाथकृतिना सुगमाल्पवर्णा ।
श्रीकृष्णचन्द्रचरणाम्बुजचञ्चरीक-
श्रीमच्छिरोमणिभवःप्रचयैरकारि ॥
[ २२ ]
आदि ग्रन्थों में न्यायशास्त्र का रचयिता 'महर्षि गौतम' को ठहराया गया है।
इसके विपरीत न्यायभाष्य, न्यायवार्तिक, न्यायवार्तिक तात्पर्य टीका और
न्यायमंजरी आदि न्याय शास्त्र के अनेक ग्रन्थों में न्याय शास्त्र को 'अक्षपाद' की
कृति बतलाया गया है। इस सम्बन्ध में एक तीसरा मत महाकवि भास के
प्रतिमा नाटक में मिलता है जो इन दोनों से भिन्न है और जो न्याय शास्त्र का प्रणेता
श्री 'मेधातिथि को बतलाता है। इस प्रकार संस्कृत साहित्य में न्याय शास्त्र के
रचयिता के रूप में हमारे सामने तीन नाम आते हैं। इन तीनों में न्यायशास्त्र
वस्तुतः किसकी कृति है इसका निर्णय कर सकना कठिन कार्य है। प्राचीन पण्डितों
के अनुसार अक्षपाद और गौतम एक ही व्यक्ति है। महर्षि गौतम का दूसरा नाम
अक्षपाद क्यों पड़ा इस सम्बन्ध में दो आख्यायिकाएँ प्रसिद्ध हैं। पहली आख्या-
यिका का भाव यह है कि—
महर्षि गौतम किसी समय भ्रमण के लिए जा रहे थे। उस समय वे किसी
दार्शनिक प्रश्न के विचार में इतने निमग्न हो गये कि मार्ग का ध्यान उन्हें न
रहा और वह किसी कुएं में जा गिरे। कुएं से उनकी प्राणरक्षा तो यथा-कथञ्चित्
हो गई, पर आगे कभी इस प्रकार की दुर्घटना न घटे इस भाव से कृपालु भगवान्
ने उनके पैरों में दो आँखे बना दीं इसीलिए वह अक्षपाद [ पैरों में आँख वाले ]
कहे जाने लगे ।
इस कथा की निःसारता और मिथ्या-परिकल्पना इतनी स्पष्ट है कि उसके
लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। जिस मस्तिष्क से इस मिथ्या
कथानक की सृष्टि हुई उसने अक्षपाद शब्द को अन्वर्थ कर देने की बात तो
सोची, पर शेष उसकी यौक्तिकता आदि पर तनिक भी विचार नहीं किया
अन्यथा ऐसी तुच्छ परिकल्पना वह कभी न करता। मन अणु है, एक समय
में एक ही वस्तु का ज्ञान वह कर सकता है, 'युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम्'
यह न्यायशास्त्र का ही सूत्र है। महर्षि गौतम का मन उस समय किसी अन्य
१. योऽक्षपादमृषिं न्यायः प्रत्यभाद् वदतां वरम् ।
तस्य वात्स्यायन इदं, भाष्यजातमवर्तयत् ॥
[ न्याय भाष्य, विजयनगरम् संस्कृत सीरीज ]
२. यदक्षपादः प्रवरो मुनीनां शमाय शास्त्रं जगतो जगाद ।
कुतार्किकाज्ञाननिवृत्तिहेतोः करिष्यते तस्य मया निबन्धः ॥ [ न्यायवार्तिक ]
३. अथ भगवता अक्षपादेन निःश्रेयसहेतौ शास्त्रे प्रणीते । [ न्याय-वार्तिक तात्पर्य टीका ]
४. अक्षपादप्रणीतो हि विततो न्यायपादपः ।
सान्द्रामृतरसस्यन्दफलसन्दर्भनिर्भरः ॥ [ न्यायमञ्जरी, प्रथम परि० ]
५. भोः काश्यपगोत्रोऽस्मि । साङ्गोपाङ्गं वेदमधीये, मानवीयं धर्मशास्त्रं, माहेश्वरं योगशास्त्रं,
बार्हस्पत्यम्^र्थशास्त्रं, मेधातिथेर्न्यायशास्त्रं, प्राचेतसं श्राद्धकल्पं च ।
[ प्रतिमा नाटक अङ्क ५, पृ० ७९ ]
[ २३ ]
विषय के चिन्तन में व्यासक्त था, इसलिए आँखों के सामने कुएँ के आते हुए
भी वह कुएँ को नहीं देख सके। यही उनके कुएँ में गिरने का कारण था, न
कि उनकी नेत्र-विहीनता। पैरों में दो आँखें और हो जाने से क्या इस परि-
स्थिति में कोई परिवर्तन हो गया? पैरों में क्या उनके सारे शरीर में आँखों के सिवा
और कुछ भी न रहता तो भी मन के विषयान्तरासक्त होने की हालत में असली
दो आँखों के समान वे सहस्रों आँखें व्यर्थ ही रहतीं और वे उस घटना की पुनरा-
वृत्ति को रोक नहीं सकती थीं। महर्षि गोतम के सम्बन्ध में ऐसी मिथ्या कल्पना
करते समय भी यदि उसे उनके इस सिद्धान्त का स्मरण हो आता तो आशा थी
कि उसे इस प्रकार की मिथ्या और व्यर्थ कल्पना करने का साहस न होता। हाँ
पैरों के दोष से कुएँ में गिर पड़ने की भी दुर्घटना ने उनकी 'आँखें खोल दीं' ताकि
आगे वह सावधान होकर चले और इस प्रकार की दुर्घटना की पुनरावृत्ति न हो।
यह भावार्थ यदि 'अक्षपाद' शब्द से निकाला जाय तो उसकी अपेक्षा अधिक
सङ्गत होगा।
दूसरी कथा का निर्देश न्यायकोशकार ने अपनी टिप्पणी में किया है जिसका
भाव यह है कि-महर्षि गोतम, न्याय-सिद्धान्तों का खण्डन करने वाले महर्षि
व्यास से अप्रसन्न हो गये और उन्होंने ऐसी प्रतिज्ञा कर ली कि कभी इसका मुख
नहीं देखूँगा। पीछे व्यास की प्रार्थना आदि से प्रसन्न होने पर उन्होंने पैरों में
आँखें बनाकर उन पैर की आँखों से उन्हें देखा। पूर्वकथा की भाँति ही यह कथा
भी सर्वथा मिथ्या, अविश्वसनीय और किसी दूषित मस्तिष्क की परिकल्पना है।
उसका प्रयोजन न्याय का खण्डन करने वाले वेदान्त शास्त्र के प्रवर्तक महर्षि व्यास
की तुच्छता दिखाकर महर्षि गोतम और उसके द्वारा न्यायशास्त्र की गौरव वृद्धि
करना है। अस्तु, इस प्रकार की मिथ्या कल्पनाओं से इस समस्या का हल नहीं
हो सकता।
गोतम तथा अक्षपाद का भेद पक्ष—
पुराण आदि प्राचीन संस्कृत साहित्य में पाए जाने वाले इस सम्बन्ध के ऐति-
हासिक विवरणों पर यदि विचार करें तो वह शायद गोतम और अक्षपाद की
एकता के बजाय विभिन्नता की पुष्टि में अधिक सहायक होंगे। इसका कारण यह
है कि पुराणों के अनुसार महर्षि गोतम का स्थान 'मिथिला' के पास और अक्षपाद
का स्थान 'काठियावाड़' के पास 'प्रभासपत्तन' में निश्चित होता है। ब्रह्माण्ड
पुराण के अनुसार अक्षपाद शिवजी के अंशभूत सोमशर्मा ब्राह्मण के पुत्र हैं, और
प्रभासपत्तन के रहने वाले और जातुकर्णी व्यास के समकालीन हैं। उनके सम्बन्ध
में ब्रह्माण्ड पुराण का वर्णन इस प्रकार है—
१. गोतमो हि स्वमतदूषकस्य व्यासस्य दर्शनं चक्षुषा न कर्तव्यमिति प्रतिज्ञाय, पश्चाद्
व्यासेन प्रसादितः पादे नेत्रं प्रकाश्य तं दृष्टवान्, इति पौराणिकी कथा।
[ २४ ]
सप्तविंशतिमे प्राप्ते परिवर्ते क्रमागते ।
जातुकर्ण्यो यदा व्यासो भविष्यति तपोधनः ॥
तदाऽहं संभविष्यामि सोमशर्मा द्विजोत्तमः ।
प्रभासतीर्थमासाद्य योगात्मा लोकविश्रुतः ॥
तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति तपोधनाः ।
अक्षपादः कणादश्च उलूकी वत्स एव च ॥
A. S. B. द्वारा वायु पुराण नाम से प्रकाशित ब्रह्माण्डपुराण अध्याय २३.
यदि यह वर्णन ठीक है तो यह मानना ही पड़ेगा कि श्री अक्षपाद का स्थान
वर्तमान काठियावाड़ के प्रभासपत्तन् में कहीं रहा होगा ।
इधर महर्षि गोतम के स्थान का पता मिथिला के पास मिलता है । वर्तमान
दरभङ्गा से उत्तर पूर्व के कोने में २८ मील की दूरी पर 'गोतम स्थान' नाम-का
एक स्थान मिलता है जिसमें एक बहुत ऊँचा टीला है और कहा जाता है कि यहाँ
ही किसी समय महर्षि गोतम की कुटी रही होगी । उस टीले के पास ही गोतम
कुण्ड नाम का एक बहुत बड़ा तालाब है जिसका पानी अत्यधिक सफेद और दूध
की भाँति ही अत्यन्त स्वादिष्ट है। इस तालाब से एक छोटी सी नदी भी निकलती
है जो खीरोई [क्षीरोदधि] नाम से प्रसिद्ध है । 'गोतम स्थान' पर चैत्र की नवमी
को आज भी बहुत बड़ा मेला लगता है । इस प्रकार गोतम और अक्षपाद के
स्थान-भेद के इस प्रश्न ने उनके एकीकरण में एक और बाधा उपस्थित कर दी है
जिससे मूल समस्या की कठिनता और भी बढ़ गई है ।
मेधातिथि—
इसी प्रसङ्ग में तीसरा नाम 'मेधातिथि' का उपस्थित हो जाता है, वह भी एक
विचारणीय प्रश्न है । श्रीसुरेन्द्रनाथ दास गुप्त ने अपनी 'हिस्ट्री आफ इण्डियन
फिलासफी' नामक ग्रन्थ के द्वितीय भाग में इस प्रश्न पर जिस ढंग से विचार
किया है उससे भी इस प्रश्न का हल हो नहीं सकता है । इस सम्बन्ध में उनका
मत दुर्बल और सारहीन जान पड़ता है । आपने भास के प्रतिमा नाटक में आई
हुई 'मेधातिथेर्न्यायशास्त्रम्' इस पंक्ति की अर्थान्तर कल्पना कर समस्या को
सुलझाने का जो प्रयत्न किया वह बहुत अस्वाभाविक और असमर्थनीय बन गया
है। आपका भाव यह जान पड़ता है कि 'मेधातिथेः' को षष्ठी न मानकर पञ्चमी का
रूप मानना चाहिए तब उसका अर्थ 'मेधातिथि का न्यायशास्त्र' न होकर 'मेधा-
तिथि से न्यायशास्त्र पढ़ा' यह हो जायगा । और उस अवस्था में न्यायशास्त्र-प्रणेता
के रूप में मेधातिथि का नाम आने का कोई अवसर ही नहीं रहेगा । यह ठीक है,
यदि ऐसा अर्थ संभव होता तब तो यह प्रश्न उठता ही क्यों, पर उसका वैसा अर्थ
मानना सरल, स्वाभाविक और संभव नहीं है । 'मेधातिथेर्न्यायशास्त्रम्' यह वाक्यांश
यदि अलग स्वतन्त्ररूप से हमारे सामने आए तो हम उसके दोनों ही अर्थ कर
[ २५ ]
सकते हैं, परन्तु जिस प्रकार से और पूर्वापर के जिन वाक्यांशों के बीच वह प्रयुक्त
हुआ उस स्थिति में उसका एक और केवल एक ही अर्थ हो सकता है, दूसरा अर्थ
करने की नाम-मात्र भी संभावना नहीं है। भास की पुस्तक से मूल वाक्य हम
ऊपर उद्धृत कर चुके हैं। 'मानवीयं धर्मशास्त्रम्-और-बार्हस्पत्यमर्थशास्त्रम्-के साथ-
मेधातिथेर्न्यायशास्त्रम्-का अर्थ स्पष्ट रूप से 'मेधातिथि का न्यायशास्त्र' ही हो सकता
है 'मेधातिथि से न्यायशास्त्र पढ़ा' यह अर्थ सर्वथा प्रक्रम-विरुद्ध है। श्रीदासगुप्त ने
ऐसा अर्थ करके भास, मेधातिथि और न्यायशास्त्र सबके साथ अन्याय किया है।
क्या गोतम न्यायशास्त्र के निर्माता नहीं है ?—
श्रीदासगुप्त ने इससे भी अधिक आश्चर्यजनक एक और नई कल्पना की है।
न्यायशास्त्र-प्रणेताओं की सूची में महर्षि गोतम का नाम रखना आपकी दृष्टि
में सर्वथा ही अप्रामाणिक है। न्यायशास्त्र के प्रणेता श्री अक्षपाद ही हैं; उस
सम्बन्ध में मेधातिथि या गोतम का नाम आ ही नहीं सकता ऐसा आपका मत
है। आप लिखते हैं—
Medhatithi Gotam is more or less a mythical person, and there is
no proof that he ever wrote anything'......
Vatsyayan himself refers to Akshpada as the person to whom
Nyaya [ the science of logic, ] revealed itself. Udyotakar also refers
to Akshpad as the utterer of the Nyaya shastra and so also does
Vachaspati. There is therefore absolutely no reason why the original
authorship of Nyaya should be attributed to a Gotam as against
Akshapad...
the Nyaya shastra therefore cannot be traced on the evidence of
the earliest Nyaya authorities to any earlier Gotam; for had this
been so, it would certainly have been mentioned by either Vatsyayan,
Udyotkar or Vachaspati.
( History of Indian philosophy, Vol. II, P. P. 393-94 )
न्यायशास्त्र के साथ महर्षि गोतम का नाम ऐसा जुड़ा है जिसके अलग करने
की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। शताब्दियों से वे न्यायशास्त्र के प्रणेता माने
जा रहे हैं। संस्कृत साहित्य के अनेकानेक प्राचीन ग्रन्थों के प्रमाण ऊपर उद्धृत
किए जा चुके हैं जो स्पष्टरूप से महर्षि गोतम को ही न्यायशास्त्र का प्रणेता
प्रतिपादन कर रहे हैं, फिर भी श्रीयुत दासगुप्त महोदय ने इस प्रकार की एक
अभूतपूर्व कल्पना करने का साहस कैसे किया यही आश्चर्य है।
महर्षि गोतम न्यायशास्त्री के रूप में केवल भारत में ही नहीं अपितु अन्त-
र्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर चुके हैं। द्वितीय शताब्दी A. D. के पूर्वार्द्ध की यह
बात है जब कि न्यायशास्त्री के रूप में महर्षि गोतम का नाम भारत की सीमा
को भी पार कर परशिया तक विख्यात हो गया था। परशिया के सासानि-
[ २६ ]
यन-वंशीय बादशाह आर्दाशिर [ Ardashir A. D. 211-241 ] और शापिर
[ Shapir A. D. 242-272 ] के शासनकाल में संगृहीत की गई Khorda
Avest की एक yasth में [ 13 th yasth, Para 16 ] और early Religious
poetry of Persia, By. I. H. Moulton P. P. 141 ) में महर्षि गोतम का
उल्लेख हमें निम्नाङ्कित शब्दों में मिलता है—
'How the fravashis cause a man to be born who is a master in
assemblies and skilled in sacred lore, so that he come away from
debate as a victor over Gaotama'
यद्यपि डा० हॉग ने इस गोतम शब्द का सम्बन्ध गोतमबुद्ध से लगाया है,
परन्तु हमारे विचार से वाद और सभाचातुर्य के प्रसङ्ग में वह नाम फबता नहीं
है। वहाँ तो न्यायशास्त्री गोतम की ही आवश्यकता है। निःसन्देह न्यायशास्त्री
तार्किक शिरोमणि महर्षि गोतम की ओर ही ग्रन्थकार का संकेत है। ऐसी
अवस्था में जब द्वितीय शताब्दी के प्रारम्भ में तार्किक शिरोमणि के रूप में महर्षि
गोतम भारत के बाहर भी विख्यातः हो चुके थे और उत्तरवर्ती संस्कृत साहित्य भी
खुले और जोरदार शब्दों में उन्हें न्यायशास्त्र का प्रणेता ठहरा रहा है, तब इस सर्वथा
प्रामाणिक अर्थ का अपलाप करना सर्वथा अयौक्तिक और सारहीन जान पड़ता है !
'त्रिभुजात्मक समस्या' का हल—
अस्तु । अब हमारे सामने प्रश्न यह है कि मेधातिथि, गोतम और अक्षपाद इन
तीनों नामों के साथ न्यायशास्त्र का समन्वय कैसे किया जाय । इसी को यहाँ
'त्रिभुजात्मक समस्या' कहा गया है। इस प्रमुख प्रश्न का कुछ उत्तर हमें महाभारत
के शान्तिपर्व में मिलता है—
मेधातिथिर्महाप्राज्ञो गौतमस्तपसि स्थितः ।
विमृश्य तेन कालेन पत्न्याः संस्थाव्यतिक्रमम् ॥
( महाभा० शा० प० अ० २६५, ४५ वङ्गवासी एडीशन )
इस श्लोक से यह प्रतीत होता है कि 'गोतम मेधातिथि' दो नाम नहीं अपितु
एक ही व्यक्ति हैं। एक शब्द वंशबोधक और दूसरा नामबोधक है। महाभारत के
इस श्लोक ने हमारी समस्या को आधा हल कर दिया। वस्तुतः 'मेधातिथि गोतम'
एक ही व्यक्ति हैं, वही न्यायशास्त्र के आदि निर्माता हैं। भास ने मेधातिथि नाम
से और अन्य ग्रन्थकारों ने गौतम नाम से उन्हीं का उल्लेख किया है। यही इस
समस्या का सबसे सुन्दर और सबसे प्रामाणिक हल है इसके माने बिना अन्य
कोई गति नहीं है।'
१. सामवेद के गृह्य सूत्र से सम्बद्ध 'पितृमेध सूत्र' के रचयिता भी गौतम हैं और
उसके टीकाकार अनन्त यज्वन उनको तथा न्यायशास्त्र-प्रणेता को एक ही मानते
हैं, परन्तु कोई युक्ति नहीं दी है।
[ २७ ]
अब इस प्रश्न का अक्षपाद वाला एक पहलू और रह जाता है । जैसा कि ऊपर
कहा जा चुका है कि गौतम और अक्षपाद को एक मानने में कुछ बाधाएँ हैं इसलिए
'मेधातिथि गौतम' की भाँति 'अक्षपाद गौतम' को एक मान कर इस प्रश्न का हल
नहीं किया जा सकता । तब, ऐसा जान पड़ता है कि न्यायशास्त्र के क्रमिक विकास
में गौतम और अक्षपाद दोनों ही का महत्त्वपूर्ण भाग है । जैसा कि ऊपर कहा जा
चुका है कि प्राचीन न्याय के विकास में अध्यात्मप्रधान [ साध्यप्रधान ] और तर्क-
प्रधान [ साधनप्रधान ] दो युग स्पष्ट प्रतीत होते हैं । इनमें साध्यप्रधान अर्थात
प्रमेय प्रधान अथवा अध्यात्मप्रधान युग के निर्माता गौतम और प्रमाणप्रधान
[ साधनप्रधान ] युग के प्रवर्तक अक्षपाद हैं । यद्यपि वर्तमान न्याय सूत्रों में
प्रमेय का नहीं प्रमाण का ही प्राधान्य प्रतीत है । परन्तु वह अक्षपाद द्वारा किए
हुए प्रतिसंस्कार का ही फल है । इसके पूर्व गौतम का न्याय उपनिषदों के
समान प्रमेयप्रधान ही था । अध्यात्म विद्यारूप उपनिषदों से न्याय विद्या को
पृथक् करने के लिए ही अक्षपाद ने उसको प्रमाण प्रधान बनाया है । इस प्रकार
प्राचीन न्याय का निर्माण महर्षि गौतम और अक्षपाद इन दोनों महापुरुषों के
सम्मिलित प्रयत्न का फल है ।
इस प्रकार न्यायशास्त्र के साध्यप्रधान तथा साधनप्रधान दो संस्करणों की
कल्पना द्वारा इस 'त्रिभुजात्मक समस्या' का हल किया जा सकता है । यह
संस्करण पद्धति की कल्पना कोई अपूर्व कल्पना नहीं है । आयुर्वेद के प्रसिद्धतम
ग्रन्थ चरक में इस 'संस्कार पद्धति' का प्रयोग हुआ है । मूल ग्रंथ प्रणेता महर्षि
'अग्निवेश' हैं, परन्तु उसके प्रतिसंस्कर्ता 'चरक' माने जाते हैं । जैसा कि चरक
के टीकाकार 'दृढ़बल' के 'अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते' इस लेख में प्रतीत
होता है । इसी प्रकार न्याय दर्शन के 'मूल प्रणेता गौतम' और उसके 'प्रतिसंस्कर्ता
अक्षपाद' हैं ऐसा मानने में कोई आपत्ति नहीं उठाई जा सकती है ।
इस कल्पना से जहाँ इस 'त्रिभुज समस्या' का हल निकल आता है उसके
साथ दूसरा लाभ यह भी होता है कि न्याय दर्शन में अनेक सूत्रों में उत्तरवर्ती
बौद्ध सिद्धान्तों का जो उल्लेख पाया जाता है उसको प्रतिसंस्कर्ता अक्षपाद की
रचना मानकर उसकी सङ्गति भली प्रकार लगाई जा सकती है । अन्यथा न्याय
सूत्रों को केवल गौतम की रचना मानने पर उनमें उत्तरवर्ती बौद्ध सिद्धान्तों की
चर्चा का उपपादन नहीं किया जा सकता है । अतः इस 'प्रतिसंस्कार पद्धति'
का अवलम्बन करके ही न्याय के दर्शन निर्माण की 'त्रिभुज समस्या' का हल
करना उचित है ।
न्यायशास्त्र के अध्यात्मप्रधान युग के प्रवर्तक महर्षि गौतम हैं इस सम्बन्ध
में महाभारत और कठोपनिषद् में भी कुछ उल्लेख पाया जाता है । महाभारत के
शान्तिपर्व में निम्नलिखित श्लोक मिलते हैं ।
[ २८ ]
चतुर्थश्चौपनिषदो धर्मः साधारणः स्मृतः ।
वानप्रस्थाद् गृहस्थाच्च ततोऽन्यः संप्रवर्तते ॥
अस्मिन्नेव युगे तात विप्रः सर्वार्थदर्शिभिः ।
मेधातिथिर्बुधः····································॥
एनं धर्मं कृतवन्तः ।
( महाभा० शा० प०, अ० २४३ श्लो० १४-१७ )
इन श्लोकों से हमारी दोनों धारणाओं की पुष्टि होती है । पहिली यह कि
मेधातिथि गोतम एक ही व्यक्ति हैं और दूसरी यह कि उन्होंने न्यायशास्त्र के
प्रमेय, साध्य या अध्यात्मप्रधान युग का निर्माण किया । कठोपनिषद् के—
शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्याद् वीतमन्युर्गौतमो माभिमृत्योः ।
त्वत् प्रसृष्टं माभिवदेत् प्रतीत एतत् त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥
यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति ।
एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥
हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् ।
यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम ॥
( कठोपनि० १. १. १० । २. ४. १५ । २. ५. ६. )
इन उद्धरणों में जिन गौतम का उल्लेख पाया जाता है कदाचित् वे गौतम ही
न्यायशास्त्र के अध्यात्मप्रधान युग के निर्माता हैं । शुक्ल-यजुर्वेदीय-माध्यन्दिनीय
शाखा के शतपथ ब्राह्मण काण्ड १ अ० ४ में भी कदाचित् इन ही गौतम का वर्णन
है । इन्हीं के गोत्र में आगे चलकर गौतम बुद्ध उत्पन्न हुए हैं । श्री सतीशचन्द्र
विद्याभूषण का मत है कि शतपथ ब्राह्मण में गौतम के स्थान आदि का जो
विवरण पाया जाता है वह मिथिला के समीपवर्ती उपरिलिखित 'गौतम स्थान'
से बिल्कुल मिलता जुलता है । [ सन् १९१३ में श्री सतीश बाबू ने 'गौतम स्थान'
की यात्रा स्वयं की थी और उसके बाद ही यह सम्मति दी थी ] इस सम्बन्ध में
उनके शब्द इस प्रकार हैं—
‘His ( Nachikatas Gotam ) remote ancestor was perhaps the sage
Nodha Gotam descended from that Gotama who is described in the
Rigveda ( Mandal I sukt 62 verse 13, 1. 77. 5, 1. 85. 11 ) and Shata-
path Bramhana of the white yajurveda, as having settled in a Place
the description of which tallies with that of Gotama-sthana in Mithila’
( Indian logic, P. P. 19 )
फलतः बहुत प्राचीन काल में महर्षि गौतम ने आत्मविद्या के आचार्य के रूप
में न्यायशास्त्र को जन्म दिया था। उसके बाद कालान्तर में समय की आवश्यकता के
[ २६ ]
अनुरूप उस प्रमेय या आत्मप्रधान न्यायशास्त्र को प्रमाणप्रधान शास्त्र का स्वरूप
मिला। न्यायशास्त्र ने अपने इस नवीन रूप में भी अपना मुख्य ध्येय तो
आत्मज्ञान ही रखा, इसमें सन्देह नहीं, परन्तु ध्येय होते हुये न्यायशास्त्र प्रमाणों के
विस्तृत विवेचन में चला गया और उसके सामने आत्मा का विवेचन गौण पड़
गया है। न्यायशास्त्र के वर्तमान स्वरूप में प्रमाणों के विवेचन का ही प्राधान्य है।
इसका परिचय न केवल उत्तरवर्ती न्याय साहित्य से ही अपितु वात्स्यायन भाष्य
और मूलसूत्रों से भी भली-भाँति मिलता है। न्यायशास्त्र के प्रथम सूत्र—प्रमाण
प्रमेय-संशय-प्रयोजन-दृष्टान्त-सिद्धान्त-अवयव-तर्क-निर्णय-वाद-जल्प-वितण्डा-
हेत्वाभास-छल-जाति-निग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः' में जिन षोडश
पदार्थों के तत्त्वज्ञान को निःश्रेयस का साधन बताया है, उनमें भी सर्वप्रथम स्थान
प्रमाण का रखा है और आत्मा का साक्षात् स्थान भी नष्ट कर प्रमेयों के भीतर
उसकी गणना की है। इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि वर्तमान न्यायशास्त्र ने
प्रमाणादि को अत्यधिक प्रधानता दी है। और उसका समर्थन करते हुए वात्स्यायन
भाष्य में लिखा है—
‘तेषां पृथगभिधानमन्तरेण अध्यात्मविद्यामात्रमियं स्याद् यथोपनिषदः'
अस्तु । न्यायशास्त्र अपने ‘अध्यात्मप्रधान' स्वरूप को छोड़कर इस नवीन रूप
में कब से आया यह कह सकना और भी कठिन है। ‘गोल्डस्टकर'१ का विचार है कि
न्यायशास्त्र का परिज्ञान पाणिनि को था और उनके बाद चतुर्थ शताब्दी B. C. में
कात्यायन को भी इन न्यायसूत्रों का परिज्ञान था। अतएव इसके पूर्व न्यायशास्त्र को
यह नवीन रूप कदाचित् प्राप्त हो चुका था। और उसका नवीन रूप में संस्करण
करने का श्रेय कदाचित् श्री अक्षपाद को दिया जाना चाहिए।
क्या भारतीय न्याय पर यूनानी प्रभाव है ?—
इसी प्रसङ्ग में हम डा० सतीशचन्द्र विद्याभूषण की एक और अद्भुत कल्पना
का भी उल्लेख कर देना चाहते हैं। आपने अपने एक लेख में२ बड़े समारम्भ के
साथ यह सिद्ध करने का यत्न किया है कि भारतीय न्यायशास्त्र को वर्तमानरूप
देने में ग्रीक दर्शन का बहुत बड़ा हाथ है। विशेषतः अनुमान में ‘पञ्चावयव वाक्य’
की प्रक्रिया का विकास भारत में बहुत पीछे हुआ उसके बहुत पूर्व ग्रीक में
‘अरिस्टाटिल’ ने इस ‘पञ्चावयव वाक्य’ की प्रक्रिया को परिपूर्ण और सुव्यवस्थित
रूप में प्रस्तुत कर दियाथा। आपने अपने विषय का उपपादन इस प्रकार किया है—
But so far as the five limbed syllogism of Hindu Logic is concerned
the Hindu logician may have been indebted some way or other to the
Greeks. While the syllogism definitely formulated as a logical doctrine
१. Gold stucker's panini P. P. 157
२. जनरल आफ रायल एशियाटिक सोसाइटी आफ ग्रेट ब्रिटेन एण्ड आयलैण्ड ।
[ ३० ]
by Aristotle in its Rhetoric, Prior Analytics and Posteriar Analytics
in the 4th century B. C., the Hindu logician shows but a vague conception
of it, as late as the first century B. C. It is not inconceivable that the
Knowledge of Aristotle's logic found its way through Alexandria,
syria and other countries into Taxila. This is rightly Corroborated
by the Hindu tradition that Narada who visited Alexandria [ S'weta
dwbipa ] and became an expert in the handling of the five limbed
syllogism...
I am inclined, therefore, to think that the syllogism did not
actually evolve in Indian logic out of inference, and that the Hindu
logician owed the idea of syllogism to the influence of Aristotle'.
( Introduction to the Indian Logic P. P. XV )
श्रीसतीश बाबू की इस कल्पना में हमें कोई सार नहीं दिखाई देता । आप
कहते हैं कि पञ्चावयव अनुमान वाक्यपद्धति का पूर्ण विकास ग्रीक में तो अरिस्टा-
टिल के समय चतुर्थ शताब्दी B. C. में ही हो चुका था और भारत में प्रथम
शताब्दी B. C. तक भी वह परिमार्जितरूप में नहीं आ पाया था । जिस Syllogism
पञ्चावयववाक्य के विषय में प्रथम शताब्दी B. C. तक भारतीय दार्शनिकों के
अज्ञान की घोषणा करने का साहस आप करते हैं उसी Syllogism के विषय में
'गोल्डस्टकर' जैसे उच्च श्रेणी के पाश्चात्त्य विद्वानों का दृढ़ विश्वास है कि वह 'अरि-
स्टाटिल' से भी पूर्व पाणिनि के समय (500 B. C.) से भी पूर्व भारत में पूर्ण रूप
से विकसित हो चुका था । 'गोल्डस्टकर' महोदय ने अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक
Panini में लिखा है—
That Nyay was known to Panini in the sense of Syllogism or
logical reasoning or perhaps logical science, I Conclude from the sutra
III. 3. 122¹ where its affix conveys the sense of instrumentality i. e,
that by which analysis [lit. enlarging] is effected, for in the some form
Nyaya is made the subject of another rule III. 3. 37². Where Panini
gives as its meaning 'Propriety, good conduct' which would lead to its
later meaning 'Policy'. Unless we draw this distinction betwean the
two sutras named, the first sutra become superfluous, Nor is it probable
that a civilization like that which is traceable in Panini's rules could
have done without a word for Syllogistic thought. ( Panini P. P. 116 )
१. अध्यायन्यायोद्यावसंहाराश्च । अष्टाध्यायी ३. ३. १२२ ।
२. परिन्योर्नीणोर्ध्यू ताभ्रेषेभ्योः । अष्टा० ३. ३. ३७ । यथाप्राप्तकरणमभ्रेषः ।
[ ३१ ]
अष्टाध्यायी के जिन दो सूत्रों का उल्लेख 'गोल्डस्टकर' महोदय ने किया है
उसके अतिरिक्त अन्य स्थलों पर भी न्याय का उल्लेख पाणिनि की अष्टाध्यायी में
मिलता है। यही नहीं अपितु चतुर्थ अध्याय के द्वितीय पाद के 'क्रतूक्थादिसूत्रा-
न्ताट्ठक्' ४, २, ६० के सूत्रान्तर्गत उक्थादि गण के 'गणपाठ' में 'न्याय' शब्द का
पाठ कर पाणिनि ने 'नैयायिक' शब्द की सिद्धि की है। ठक् प्रत्यय का विधान
करने वाला यह सूत्र 'तदधीते तद्वेद' इस अर्थ में ठक् का विधान करता है, जिससे
'नैयायिक' शब्द का अर्थ 'न्यायमधीते नैयायिकः' होता है। इस प्रकार पाणिनि
की अष्टाध्यायी और गोल्डस्टकर महोदय का ऐतिहासिक विवेचन सतीश बाबू की
कल्पना की निस्सारता सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है।
प्राचीन न्याय का साहित्य
जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है न्यायशास्त्र का प्रारम्भ कब से हुआ यह निश्चित
रूप से कह सकना कठिन है। परन्तु फिर भी गोल्डस्टकर और उसके आधारभूत
पाणिनि-सूत्रों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि न्यायशास्त्र बहुत पुरानी
और सम्भवतः नहीं, निश्चित रूप में पाणिनि से पूर्व की चीज़ है। न्यायशास्त्र का सबसे
पुराना ग्रन्थ जो इस समय मिलता है वह न्यायसूत्र है। परन्तु यह नहीं कहा जा
सकता कि यह न्यायसूत्र ठीक इसी रूप में पाणिनि के पूर्व की चीज है। इस बात
के अनेक प्रमाण हैं कि न्यायसूत्रों के अनेक सूत्र अत्यन्त आधुनिककाल के हैं। जिन
सूत्रों में बौद्ध सिद्धान्तों का खण्डन हुआ है उनकी रचना बौद्धकाल के बाद की है
बौद्ध मत की आलोचना के प्रकरण में लिखे गए अनेक सूत्रों के शब्द-विन्यास से
यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि वह सूत्र बौद्ध ग्रन्थों के आधार पर लिखे गए हैं। दोनों
की, विषय के साथ आनुपूर्वी और शब्दविन्यास में भी कुछ समानता है।
उदाहरण के लिए हम ऐसे कुछ सूत्र नीचे उद्धृत करते हैं—
| माध्यमिक सूत्र | न्याय सूत्र |
| नसंभवः स्वभावस्य युक्तः प्रत्ययहेतुभिः। | न स्वभावसिद्धिरापेक्षिकत्वाद् । |
| स्वभावः कृतको नामभविष्यति पुनः कथम् | व्याहतत्वादयुक्तम् । |
| ( माध्यमिक सूत्र. अ. १५. पृ. ९३ ) | ( न्या. सू. अ. ४. १ ३९-४० ) |
| ( B. T. S. Edition, Calcutta ) | स्वप्नविषयाभिमानवदयं प्रमाणप्रमेया- |
| यथा माया यथा स्वप्नो गन्धर्वनगरं यथा । | भिमानः । ( ४. २. ३१ ) |
| तथोत्पादस्तथा स्थानंतथा भङ्ग उदाहृतम्॥ | माया-गन्धर्वनगर-मृगतृष्णिकावद्वा । |
| ( मा. सू. अ. ७. ) | ( ४. २. ३२. ) |
१. उक्थ, लोकायत, न्यास, न्याय, पुनरुक्त, निरुक्त, निमित्त, द्विपदा, ज्योतिष, अनुपद्,
अनुकल्प, यज्ञ, धर्म, चर्चा, क्रमेतर, श्लक्षण, संहिता, पदक्रम, संघट, वृत्ति, परिषद्,
संग्रह, गण [गुण], आयुर्वेद । इत्युक्थादिः ॥ ४,२,६० ॥ (गणपाठ, ४. २. ६०. पा.)
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उपर्युक्त सारी स्थिति से यही परिणाम निकलता है कि न्याय-सूत्रों की रचना
भी एक काल में नहीं हुई। सबसे पूर्व गोतम के अध्यात्मप्रधान न्यायसूत्र
की रचना हुई। उसके बाद अध्यात्मप्रधान उपनिषद्विद्या से अक्षपाद ने आन्वीक्षिकी
न्याय विद्या को पृथक् करने के लिए उसके प्रमेयप्रधान स्वरूप के स्थान पर
प्रमाणप्रधान स्वरूप देकर अक्षपाद ने उसका नवीन संस्करण किया¹ और बौद्ध
युग में उसमें कुछ प्रक्षेप और परिवर्धन होकर ही न्याय-शास्त्र को वर्तमान
स्वरूप प्राप्त हो सका है।
'न्याय-सूत्रों' के बाद न्याय-शास्त्र का दूसरा पुराना ग्रन्थ 'वात्स्यायन भाष्य'
है जिसका रचनाकाल ४०० वि० (जैकोबी के अनुसार ३००, अन्यों के अनुसार
४०० वि०) के लगभग निर्धारित किया गया है। ४०० वि० से लेकर १००० वि०
तक के ६०० वर्षों में न्याय-शास्त्र के जिस प्रचुर साहित्य का निर्माण हुआ उस
सारे न्याय साहित्य का आधार ग्रन्थ 'न्यायसूत्र' और 'वात्स्यायन भाष्य' हैं। अन्य
जो कुछ भी साहित्य तैयार हुआ वह सभी इन्हीं के समर्थन में और उन्हीं के
टीका-प्रटीका के रूप लिखा गया है। इसी लिए उस सबको 'प्राचीन न्याय' साहित्य
के नाम से कहा जाता है।
यद्यपि न्याय सूत्रों के बाद 'प्राचीन न्याय' के विषय में कोई मौलिक ग्रन्थ नहीं
लिखा गया फिर भी १७ वीं शताब्दी तक प्राचीन न्याय के साहित्य का निर्माण
होता रहा, जो न्याय-सूत्रों की टीका-प्रटीका के रूप में ही था। इसमें से भी ४००
से लेकर १००० वि० तक जिस साहित्य का निर्माण हुआ वह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
१—भाष्यकार वात्स्यायन [ ३०० वि० ]—
न्याय दर्शन के भाष्यकार वात्स्यायन कौन हैं यह भी एक विवादग्रस्त प्रश्न
है। 'अभिधानचिन्तामणि' नामक ग्रन्थ में हेमचन्द्र [जैन] ने 'वात्स्यायन' के
अनेक नामों का निर्देश किया है, जो इस प्रकार है—
'वात्स्यायनो मल्लनागः कौटिल्यश्चणकात्मजः ।
द्रामिलः पक्षिलस्वामी, विष्णुगुप्तोऽङ्गुलश्च सः ॥'
इसके अनुसार वात्स्यायन, पक्षिलस्वामी, कौटिल्य और चाणक्य सब एक ही
व्यक्ति के नाम हैं और वह द्रविड़ देश का रहनेवाला प्रतीत होता है जिसकी
राजधानी काञ्चीपुर वर्तमान काञ्चीवरम् थी। इसीलिए उसके नामों में 'द्रामिल'
भी एक नाम है और 'पक्षिलस्वामी' नाम भी उसी देशवासी का नाम जान पड़ता
है। इसके अतिरिक्त न्यायदर्शन अध्याय २, अ० १ सूत्र ४० में वात्स्यायन ने उदा-
१. आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थ चरक की रचना भी इसी प्रकार हुई, प्रथम अग्निवेश ने
फिर चरक ने उसका नवीन संस्करण किया जो आजकल उपलब्ध होता है। जैसा
कि 'दृढबल' ने लिखा, अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते।