तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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विषय के चिन्तन में व्यासक्त था, इसलिए आँखों के सामने कुएँ के आते हुए
भी वह कुएँ को नहीं देख सके। यही उनके कुएँ में गिरने का कारण था, न
कि उनकी नेत्र-विहीनता। पैरों में दो आँखें और हो जाने से क्या इस परि-
स्थिति में कोई परिवर्तन हो गया? पैरों में क्या उनके सारे शरीर में आँखों के सिवा
और कुछ भी न रहता तो भी मन के विषयान्तरासक्त होने की हालत में असली
दो आँखों के समान वे सहस्रों आँखें व्यर्थ ही रहतीं और वे उस घटना की पुनरा-
वृत्ति को रोक नहीं सकती थीं। महर्षि गोतम के सम्बन्ध में ऐसी मिथ्या कल्पना
करते समय भी यदि उसे उनके इस सिद्धान्त का स्मरण हो आता तो आशा थी
कि उसे इस प्रकार की मिथ्या और व्यर्थ कल्पना करने का साहस न होता। हाँ
पैरों के दोष से कुएँ में गिर पड़ने की भी दुर्घटना ने उनकी 'आँखें खोल दीं' ताकि
आगे वह सावधान होकर चले और इस प्रकार की दुर्घटना की पुनरावृत्ति न हो।
यह भावार्थ यदि 'अक्षपाद' शब्द से निकाला जाय तो उसकी अपेक्षा अधिक
सङ्गत होगा।
दूसरी कथा का निर्देश न्यायकोशकार ने अपनी टिप्पणी में किया है जिसका
भाव यह है कि-महर्षि गोतम, न्याय-सिद्धान्तों का खण्डन करने वाले महर्षि
व्यास से अप्रसन्न हो गये और उन्होंने ऐसी प्रतिज्ञा कर ली कि कभी इसका मुख
नहीं देखूँगा। पीछे व्यास की प्रार्थना आदि से प्रसन्न होने पर उन्होंने पैरों में
आँखें बनाकर उन पैर की आँखों से उन्हें देखा। पूर्वकथा की भाँति ही यह कथा
भी सर्वथा मिथ्या, अविश्वसनीय और किसी दूषित मस्तिष्क की परिकल्पना है।
उसका प्रयोजन न्याय का खण्डन करने वाले वेदान्त शास्त्र के प्रवर्तक महर्षि व्यास
की तुच्छता दिखाकर महर्षि गोतम और उसके द्वारा न्यायशास्त्र की गौरव वृद्धि
करना है। अस्तु, इस प्रकार की मिथ्या कल्पनाओं से इस समस्या का हल नहीं
हो सकता।
गोतम तथा अक्षपाद का भेद पक्ष—
पुराण आदि प्राचीन संस्कृत साहित्य में पाए जाने वाले इस सम्बन्ध के ऐति-
हासिक विवरणों पर यदि विचार करें तो वह शायद गोतम और अक्षपाद की
एकता के बजाय विभिन्नता की पुष्टि में अधिक सहायक होंगे। इसका कारण यह
है कि पुराणों के अनुसार महर्षि गोतम का स्थान 'मिथिला' के पास और अक्षपाद
का स्थान 'काठियावाड़' के पास 'प्रभासपत्तन' में निश्चित होता है। ब्रह्माण्ड
पुराण के अनुसार अक्षपाद शिवजी के अंशभूत सोमशर्मा ब्राह्मण के पुत्र हैं, और
प्रभासपत्तन के रहने वाले और जातुकर्णी व्यास के समकालीन हैं। उनके सम्बन्ध
में ब्रह्माण्ड पुराण का वर्णन इस प्रकार है—
१. गोतमो हि स्वमतदूषकस्य व्यासस्य दर्शनं चक्षुषा न कर्तव्यमिति प्रतिज्ञाय, पश्चाद्
व्यासेन प्रसादितः पादे नेत्रं प्रकाश्य तं दृष्टवान्, इति पौराणिकी कथा।