तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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अब इस प्रश्न का अक्षपाद वाला एक पहलू और रह जाता है । जैसा कि ऊपर
कहा जा चुका है कि गौतम और अक्षपाद को एक मानने में कुछ बाधाएँ हैं इसलिए
'मेधातिथि गौतम' की भाँति 'अक्षपाद गौतम' को एक मान कर इस प्रश्न का हल
नहीं किया जा सकता । तब, ऐसा जान पड़ता है कि न्यायशास्त्र के क्रमिक विकास
में गौतम और अक्षपाद दोनों ही का महत्त्वपूर्ण भाग है । जैसा कि ऊपर कहा जा
चुका है कि प्राचीन न्याय के विकास में अध्यात्मप्रधान [ साध्यप्रधान ] और तर्क-
प्रधान [ साधनप्रधान ] दो युग स्पष्ट प्रतीत होते हैं । इनमें साध्यप्रधान अर्थात
प्रमेय प्रधान अथवा अध्यात्मप्रधान युग के निर्माता गौतम और प्रमाणप्रधान
[ साधनप्रधान ] युग के प्रवर्तक अक्षपाद हैं । यद्यपि वर्तमान न्याय सूत्रों में
प्रमेय का नहीं प्रमाण का ही प्राधान्य प्रतीत है । परन्तु वह अक्षपाद द्वारा किए
हुए प्रतिसंस्कार का ही फल है । इसके पूर्व गौतम का न्याय उपनिषदों के
समान प्रमेयप्रधान ही था । अध्यात्म विद्यारूप उपनिषदों से न्याय विद्या को
पृथक् करने के लिए ही अक्षपाद ने उसको प्रमाण प्रधान बनाया है । इस प्रकार
प्राचीन न्याय का निर्माण महर्षि गौतम और अक्षपाद इन दोनों महापुरुषों के
सम्मिलित प्रयत्न का फल है ।
इस प्रकार न्यायशास्त्र के साध्यप्रधान तथा साधनप्रधान दो संस्करणों की
कल्पना द्वारा इस 'त्रिभुजात्मक समस्या' का हल किया जा सकता है । यह
संस्करण पद्धति की कल्पना कोई अपूर्व कल्पना नहीं है । आयुर्वेद के प्रसिद्धतम
ग्रन्थ चरक में इस 'संस्कार पद्धति' का प्रयोग हुआ है । मूल ग्रंथ प्रणेता महर्षि
'अग्निवेश' हैं, परन्तु उसके प्रतिसंस्कर्ता 'चरक' माने जाते हैं । जैसा कि चरक
के टीकाकार 'दृढ़बल' के 'अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते' इस लेख में प्रतीत
होता है । इसी प्रकार न्याय दर्शन के 'मूल प्रणेता गौतम' और उसके 'प्रतिसंस्कर्ता
अक्षपाद' हैं ऐसा मानने में कोई आपत्ति नहीं उठाई जा सकती है ।
इस कल्पना से जहाँ इस 'त्रिभुज समस्या' का हल निकल आता है उसके
साथ दूसरा लाभ यह भी होता है कि न्याय दर्शन में अनेक सूत्रों में उत्तरवर्ती
बौद्ध सिद्धान्तों का जो उल्लेख पाया जाता है उसको प्रतिसंस्कर्ता अक्षपाद की
रचना मानकर उसकी सङ्गति भली प्रकार लगाई जा सकती है । अन्यथा न्याय
सूत्रों को केवल गौतम की रचना मानने पर उनमें उत्तरवर्ती बौद्ध सिद्धान्तों की
चर्चा का उपपादन नहीं किया जा सकता है । अतः इस 'प्रतिसंस्कार पद्धति'
का अवलम्बन करके ही न्याय के दर्शन निर्माण की 'त्रिभुज समस्या' का हल
करना उचित है ।
न्यायशास्त्र के अध्यात्मप्रधान युग के प्रवर्तक महर्षि गौतम हैं इस सम्बन्ध
में महाभारत और कठोपनिषद् में भी कुछ उल्लेख पाया जाता है । महाभारत के
शान्तिपर्व में निम्नलिखित श्लोक मिलते हैं ।