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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 330 में से

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पृष्ठ 22

[ २१ ]
का नाम 'अन्वीक्षा' है और अन्वीक्षण के आधार पर प्रवृत्त हुई विद्या का नाम
आन्वीक्षिकी अथवा न्यायशास्त्र है ।
आन्वीक्षिकी शब्द के इस सूक्ष्म विश्लेषण से यह परिणाम सरलता से ही
निकाला जा सकता है कि इस शब्द के भीतर आत्मान्वीक्षण की झलक स्पष्ट है
और वह न्यायशास्त्र के इतिहास के 'साध्यप्रधान युग' की भावना को ही व्यक्त
करता है ।
आन्वीक्षिकी के अतिरिक्त न्यायशास्त्र के वादविद्या, तर्कविद्या आदि जो अन्य
नाम मनुस्मृति, स्कन्दपुराण, महाभारत, गौतम-धर्मशास्त्र आदि ग्रन्थों में मिलते
हैं, वे सभी उसके 'साधनप्रधान-युग' के द्योतक हैं । स्वयं न्याय शब्द की ध्वनि
भी 'साधनप्रधान-युग' के साथ ही है । 'वात्स्यायन' ने न्याय शब्द का अर्थ—
'प्रमाणैरर्थपरीक्षणं न्यायः' ।
किया है, उसकी ध्वनि 'साध्यप्रधान-युग' के नहीं अपि तु 'साधनप्रधान-युग'
के साथ ही है। इस प्रकार हम देखते हैं कि प्राचीन न्यायशास्त्र का जो रूप मूल
न्याय दर्शन के नाम से आज उपलब्ध होता है वह दो विभिन्न कालों की दो
विभिन्न भावनाओं के बीच निमग्नोन्मग्न होता हुआ परिमार्जित और परिष्कृत
होकर हम तक पहुँचा है । और सूक्ष्म आलोचक-दृष्टि उसके भीतर से प्राचीन
न्याय शास्त्र के क्रमिक विकास के इतिहास को सफलतापूर्वक परिलक्षित कर
सकती है ।
न्याय शास्त्र के निर्माता
इस न्याय-शास्त्र के निर्माण का वास्तविक श्रेय किसको प्राप्त है । इस प्रश्न
का भी कोई सहज निपटारा दिखाई नहीं देता । इसका कारण यह है कि संस्कृत
साहित्य के विविध ग्रन्थों में न्यायशास्त्र के रचयिता का उल्लेख विविध नामों से
मिलता है । पद्मपुराणे१, स्कन्दपुराणे२, गान्धर्व तन्त्रे३, नैषधचरिते४ और विश्वनाथ वृत्ति५
१. कणादेन तु सम्प्रोक्तं शास्त्रं वैशेषिकं महत् ।
गौतमेन तथा न्यायं, सांख्यन्तु कपिलेन वै ॥ [ पद्म, उत्तर खं. अ. २६३ ]
२. गौतमः स्वेन तर्केण खण्डयंस्तत्र तत्र हि । [ स्कन्द. कालिका खं. अ. १७ ]
३. गौतमप्रोक्तशास्त्रार्थनिरताः सर्व एव हि ।
शृगालीं योनिमापन्नाः सन्दिग्धाः सर्वकर्मसु ॥
[ गान्धर्व तन्त्र-प्राणतोषिणी तन्त्र में उद्धृत ]
४. मुक्तये यः शिलात्वाय शास्त्रमूचे सचेतसाम् ।
गौतमं तमवेत्तैव यथा वित्थ तथैव सः ॥ [ नैषध सर्ग १७ ]
५. एषा मुनिप्रवरगौतमसूत्रवृत्तिः,
श्रीविश्वनाथकृतिना सुगमाल्पवर्णा ।
श्रीकृष्णचन्द्रचरणाम्बुजचञ्चरीक-
श्रीमच्छिरोमणिभवःप्रचयैरकारि ॥