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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 19, कुल 330 में से

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पृष्ठ 19

[ १८ ]
यौवनकाल का 'बौद्ध न्याय' तथा जैन-न्याय 'मध्य कालीन न्याय' है और बौद्ध-
धर्म के पतन एवं ब्राह्मण धर्म के पुनरुत्थान काल का न्याय 'नव्य न्याय' के नाम
से विख्यात है।
भारत के धार्मिक जगत् में बौद्ध धर्म एक भीषण क्रान्ति के रूप में उत्पन्न
हुआ और वि० पू० पञ्चम शताब्दी से लेकर दश शताब्दी वै० तक १५०० वर्ष
उसने देश के धार्मिक एवं राजनीतिक क्षेत्र को व्यापक रूप में प्रभावित किया।
परन्तु उसके बाद वह भारत से एकदम लुप्त हो गया। भारत के सीमावर्ती तिब्बत
चीन, ब्रह्मा, लङ्का आदि देशों में बौद्धधर्म का प्रचार हो जाने के बाद भारत में
उसका प्रभाव बहुत काल तक स्थिर नहीं रह सका। वह आँधी की तरह आया,
राज्याश्रय ने उसे उत्तेजना दी, लगभग पन्द्रह सौ वर्ष बाद फिर जैसे सब कुछ
साफ हो गया केवल साहित्य में जहाँ-तहाँ उसके कुछ चिह्न अवशिष्ट रह गए।
बौद्धधर्म के उन्हीं साहित्यिक भग्नावशेषों में मध्यकालीन 'बौद्ध-न्याय' है। 'बौद्ध
न्याय' के समकालीन तथा समान तन्त्र 'जैनन्याय' की भी लगभग वही स्थिति
है। परन्तु न विदेशों में उसका उतना प्रचार हुआ और न भारत से उसका
विलोप ही हुआ।
वह बौद्धन्याय [ तथा जैन न्याय ] एक आँधी या क्रान्ति की स्मृति या
भग्नावशेष भले ही हो परन्तु उसका अपना स्वतन्त्र व्यक्तित्व है और वह व्यक्तित्व
इतना ज़बरदस्त है कि उसने दार्शनिक साहित्य और विशेषतः ब्राह्मणों के न्याय
साहित्य को अलग दो टुकड़ों में बाँट दिया है। बौद्धधर्म से पूर्व का प्राचीन न्याय
अलग है और बौद्धधर्म के ह्रास के बाद का नव्य न्याय अलग है। उन दोनों
की रचना शैली इतनी भिन्न हो गई है कि उनको मिलाने का यत्न करने पर भी
वे मिल नहीं सकते। उन दोनों के बीच अविचल खड़ा हुआ 'मध्य न्याय' या बौद्ध
न्याय जैसे आज भी उनके सारे बल-पौरुष-प्रयत्न को विफल कर रहा है।
प्राचीन और नवीन न्याय के बीच 'बौद्ध न्याय' जो अपना एक अलग अस्तित्व
रखता है उसका कारण उसकी धार्मिक विशेषता है। बौद्धधर्म अनात्मवादी धर्म है
और उसके पूर्वोत्तरवर्ती धर्म आत्मवादी धर्म हैं। इसलिए जहाँ प्राचीन और
नवीन न्याय आत्मास्तित्व-पोषक तत्त्व जुटाने का प्रयत्न करते हैं वहाँ बौद्धन्याय
अनात्मवाद-पोषक तत्त्वों का संग्रह करने में व्यस्त है। इसलिए उसका व्यक्तित्व
उन दोनों से अलग स्पष्ट ही दीख रहा है।
न्यायशास्त्र के दो युग—
न्याय साहित्य के जो यह तीन प्रमुख विभाग हमने किए हैं, इनकी भी सूक्ष्म
विवेचना करने से उनमें से प्रत्येक में अनेक स्तर [ तह ] दिखाई देते हैं जो उसके
विभिन्न-कालिक प्रभावों को परिलक्षित करते हैं। उदाहरण के लिए प्राचीन न्याय
को लीजिए। रचना की दृष्टि से इसके दो भाग अत्यन्त स्पष्ट हैं। एक में मूल सूत्र
और दूसरे में भाष्य, वार्त्तिक, तात्पर्य टीका आदि का समावेश होता है। इनमें से न