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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 27, कुल 330 में से

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पृष्ठ 27

[ २६ ]
यन-वंशीय बादशाह आर्दाशिर [ Ardashir A. D. 211-241 ] और शापिर
[ Shapir A. D. 242-272 ] के शासनकाल में संगृहीत की गई Khorda
Avest की एक yasth में [ 13 th yasth, Para 16 ] और early Religious
poetry of Persia, By. I. H. Moulton P. P. 141 ) में महर्षि गोतम का
उल्लेख हमें निम्नाङ्कित शब्दों में मिलता है—
'How the fravashis cause a man to be born who is a master in
assemblies and skilled in sacred lore, so that he come away from
debate as a victor over Gaotama'
यद्यपि डा० हॉग ने इस गोतम शब्द का सम्बन्ध गोतमबुद्ध से लगाया है,
परन्तु हमारे विचार से वाद और सभाचातुर्य के प्रसङ्ग में वह नाम फबता नहीं
है। वहाँ तो न्यायशास्त्री गोतम की ही आवश्यकता है। निःसन्देह न्यायशास्त्री
तार्किक शिरोमणि महर्षि गोतम की ओर ही ग्रन्थकार का संकेत है। ऐसी
अवस्था में जब द्वितीय शताब्दी के प्रारम्भ में तार्किक शिरोमणि के रूप में महर्षि
गोतम भारत के बाहर भी विख्यातः हो चुके थे और उत्तरवर्ती संस्कृत साहित्य भी
खुले और जोरदार शब्दों में उन्हें न्यायशास्त्र का प्रणेता ठहरा रहा है, तब इस सर्वथा
प्रामाणिक अर्थ का अपलाप करना सर्वथा अयौक्तिक और सारहीन जान पड़ता है !
'त्रिभुजात्मक समस्या' का हल—
अस्तु । अब हमारे सामने प्रश्न यह है कि मेधातिथि, गोतम और अक्षपाद इन
तीनों नामों के साथ न्यायशास्त्र का समन्वय कैसे किया जाय । इसी को यहाँ
'त्रिभुजात्मक समस्या' कहा गया है। इस प्रमुख प्रश्न का कुछ उत्तर हमें महाभारत
के शान्तिपर्व में मिलता है—
मेधातिथिर्महाप्राज्ञो गौतमस्तपसि स्थितः ।
विमृश्य तेन कालेन पत्न्याः संस्थाव्यतिक्रमम् ॥
( महाभा० शा० प० अ० २६५, ४५ वङ्गवासी एडीशन )
इस श्लोक से यह प्रतीत होता है कि 'गोतम मेधातिथि' दो नाम नहीं अपितु
एक ही व्यक्ति हैं। एक शब्द वंशबोधक और दूसरा नामबोधक है। महाभारत के
इस श्लोक ने हमारी समस्या को आधा हल कर दिया। वस्तुतः 'मेधातिथि गोतम'
एक ही व्यक्ति हैं, वही न्यायशास्त्र के आदि निर्माता हैं। भास ने मेधातिथि नाम
से और अन्य ग्रन्थकारों ने गौतम नाम से उन्हीं का उल्लेख किया है। यही इस
समस्या का सबसे सुन्दर और सबसे प्रामाणिक हल है इसके माने बिना अन्य
कोई गति नहीं है।'
१. सामवेद के गृह्य सूत्र से सम्बद्ध 'पितृमेध सूत्र' के रचयिता भी गौतम हैं और
उसके टीकाकार अनन्त यज्वन उनको तथा न्यायशास्त्र-प्रणेता को एक ही मानते
हैं, परन्तु कोई युक्ति नहीं दी है।