तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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उसके आविष्कार की कहानी का कुछ आभास पाया जा सकता है। किसी एक
विषय को लेकर विशुद्ध जिज्ञासा-भाव से अथवा जय-पराजय की आकांक्षा से
अनेक विद्वान् पुरुषों में परस्पर जो शास्त्रचर्चा होती है उसी का नाम क्रमशः 'वाद'
और 'जल्प' है। न्यायशास्त्र की सारी शक्ति 'वाद' और 'जल्प' अथवा शास्त्रचर्चा के
इस स्वरूप को परिमार्जित, परिष्कृत और नियमित करने में ही व्यय हुई है ऐसा
स्पष्ट प्रतीत होता है। वादी और प्रतिवादी को अपने.२ विषय का प्रतिपादन किस
शैली से करना चाहिए, कौन सी ऐसी त्रुटियाँ हैं जो उनके पक्ष को कमजोर बना
देती हैं; प्रतिपक्षी को कैसे अवसर पर निगृहीत कर लेना चाहिए, वाद-विवाद की
शैली और इन्हीं दाँव-पेंचों का विशद विवरण न्यायशास्त्र के बहुत बड़े भाग में
मिलता है। इसके अतिरिक्त न्यायशास्त्र का जो कुछ अंश बचता है वह देहादि से
व्यतिरिक्त नित्य आत्मा की सत्ता-साधन में व्यय हुआ है। बस यह दो और
केवल यही दो न्यायशास्त्र के प्रतिपाद्य विषय हैं। इन दोनों विषयों का ध्यान कर
उस परिस्थिति का जिसमें न्यायशास्त्र का निर्माण हुआ, अनुमान सहज ही में
लगाया जा सकता है।
यह कहने की आवश्यकता नहीं कि न्यायशास्त्र के इन दोनों विषयों में से एक
साध्य है और दूसरा साधन । देहादि से अतिरिक्त नित्य आत्मा की सत्ता सिद्ध
करना ही न्यायशास्त्र का प्रमुख और सैद्धान्तिक भाग है। यह दूसरी बात है कि
परिस्थितियों के वशीभूत होकर अपने विषयों का प्रतिपादन करते समय उसने
साध्य को गौण और साधन-भाग को प्रधान बना दिया है। न्यायशास्त्र के प्रधान
प्रतिपाद्य-विषय आत्मवाद को देखकर यह सहज ही समझा जा सकता है कि
आत्मवाद और नैरात्म्यवाद के सङ्घर्ष में ही न्यायशास्त्र का आदि सूत्रपात हुआ है।
और उनके पारस्परिक वाद-विवादों से ही न्यायशास्त्र का विकास हुआ है।
वस्तुतः देखा जाय तो न्याय-दर्शन मनुष्य के विचारों का परिशोधक और
संरक्षक है। वात्स्यायन ने 'प्रमाणैरर्थपरीक्षणं न्यायः' के शब्दों में न्याय का जो
स्वरूप निर्दिष्ट किया है, वह भी इसी बात का पोषक है। प्रमाण और तर्क
[युक्तियों] के द्वारा किसी सिद्धान्त [अर्थ] की परीक्षा करना न्याय का कार्य
है। इस दृष्टि से मनुष्य जब किसी विषय में कोई सिद्धान्त स्थिर करता है वहीं
न्याय की सहायता अपेक्षित होती है। इसलिए न्याय-दर्शन विचारशील मानव
समाज की मौलिक आवश्यकता और प्राथमिक उद्भावना है। उसके विना मनुष्य
न अपने विचारों एवं सिद्धान्तों को परिष्कृत तथा सुस्थिर ही कर सकता है और न
प्रतिपक्षी के सैद्धान्तिक आघातों से अपने सिद्धान्त की रक्षा ही कर सकता है।
अपने सिद्धान्तों के परिष्कार, रक्षा और प्रचार कार्य में मनुष्य का सबसे बड़ा
सहायक न्याय शास्त्र ही है। इसीलिए न्याय-दर्शन के 'जल्प' और 'वितण्डा' का
प्रयोजन बतलाते हुए भाष्यकार ने लिखा है—
'तत्त्वाध्यवसायसंरक्षणार्थं जल्पवितण्डे, कण्टकशाखावरणवत्'