तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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सप्तविंशतिमे प्राप्ते परिवर्ते क्रमागते ।
जातुकर्ण्यो यदा व्यासो भविष्यति तपोधनः ॥
तदाऽहं संभविष्यामि सोमशर्मा द्विजोत्तमः ।
प्रभासतीर्थमासाद्य योगात्मा लोकविश्रुतः ॥
तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति तपोधनाः ।
अक्षपादः कणादश्च उलूकी वत्स एव च ॥
A. S. B. द्वारा वायु पुराण नाम से प्रकाशित ब्रह्माण्डपुराण अध्याय २३.
यदि यह वर्णन ठीक है तो यह मानना ही पड़ेगा कि श्री अक्षपाद का स्थान
वर्तमान काठियावाड़ के प्रभासपत्तन् में कहीं रहा होगा ।
इधर महर्षि गोतम के स्थान का पता मिथिला के पास मिलता है । वर्तमान
दरभङ्गा से उत्तर पूर्व के कोने में २८ मील की दूरी पर 'गोतम स्थान' नाम-का
एक स्थान मिलता है जिसमें एक बहुत ऊँचा टीला है और कहा जाता है कि यहाँ
ही किसी समय महर्षि गोतम की कुटी रही होगी । उस टीले के पास ही गोतम
कुण्ड नाम का एक बहुत बड़ा तालाब है जिसका पानी अत्यधिक सफेद और दूध
की भाँति ही अत्यन्त स्वादिष्ट है। इस तालाब से एक छोटी सी नदी भी निकलती
है जो खीरोई [क्षीरोदधि] नाम से प्रसिद्ध है । 'गोतम स्थान' पर चैत्र की नवमी
को आज भी बहुत बड़ा मेला लगता है । इस प्रकार गोतम और अक्षपाद के
स्थान-भेद के इस प्रश्न ने उनके एकीकरण में एक और बाधा उपस्थित कर दी है
जिससे मूल समस्या की कठिनता और भी बढ़ गई है ।
मेधातिथि—
इसी प्रसङ्ग में तीसरा नाम 'मेधातिथि' का उपस्थित हो जाता है, वह भी एक
विचारणीय प्रश्न है । श्रीसुरेन्द्रनाथ दास गुप्त ने अपनी 'हिस्ट्री आफ इण्डियन
फिलासफी' नामक ग्रन्थ के द्वितीय भाग में इस प्रश्न पर जिस ढंग से विचार
किया है उससे भी इस प्रश्न का हल हो नहीं सकता है । इस सम्बन्ध में उनका
मत दुर्बल और सारहीन जान पड़ता है । आपने भास के प्रतिमा नाटक में आई
हुई 'मेधातिथेर्न्यायशास्त्रम्' इस पंक्ति की अर्थान्तर कल्पना कर समस्या को
सुलझाने का जो प्रयत्न किया वह बहुत अस्वाभाविक और असमर्थनीय बन गया
है। आपका भाव यह जान पड़ता है कि 'मेधातिथेः' को षष्ठी न मानकर पञ्चमी का
रूप मानना चाहिए तब उसका अर्थ 'मेधातिथि का न्यायशास्त्र' न होकर 'मेधा-
तिथि से न्यायशास्त्र पढ़ा' यह हो जायगा । और उस अवस्था में न्यायशास्त्र-प्रणेता
के रूप में मेधातिथि का नाम आने का कोई अवसर ही नहीं रहेगा । यह ठीक है,
यदि ऐसा अर्थ संभव होता तब तो यह प्रश्न उठता ही क्यों, पर उसका वैसा अर्थ
मानना सरल, स्वाभाविक और संभव नहीं है । 'मेधातिथेर्न्यायशास्त्रम्' यह वाक्यांश
यदि अलग स्वतन्त्ररूप से हमारे सामने आए तो हम उसके दोनों ही अर्थ कर