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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 23, कुल 330 में से

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पृष्ठ 23

[ २२ ]
आदि ग्रन्थों में न्यायशास्त्र का रचयिता 'महर्षि गौतम' को ठहराया गया है।
इसके विपरीत न्यायभाष्य, न्यायवार्तिक, न्यायवार्तिक तात्पर्य टीका और
न्यायमंजरी आदि न्याय शास्त्र के अनेक ग्रन्थों में न्याय शास्त्र को 'अक्षपाद' की
कृति बतलाया गया है। इस सम्बन्ध में एक तीसरा मत महाकवि भास के
प्रतिमा नाटक में मिलता है जो इन दोनों से भिन्न है और जो न्याय शास्त्र का प्रणेता
श्री 'मेधातिथि को बतलाता है। इस प्रकार संस्कृत साहित्य में न्याय शास्त्र के
रचयिता के रूप में हमारे सामने तीन नाम आते हैं। इन तीनों में न्यायशास्त्र
वस्तुतः किसकी कृति है इसका निर्णय कर सकना कठिन कार्य है। प्राचीन पण्डितों
के अनुसार अक्षपाद और गौतम एक ही व्यक्ति है। महर्षि गौतम का दूसरा नाम
अक्षपाद क्यों पड़ा इस सम्बन्ध में दो आख्यायिकाएँ प्रसिद्ध हैं। पहली आख्या-
यिका का भाव यह है कि—
महर्षि गौतम किसी समय भ्रमण के लिए जा रहे थे। उस समय वे किसी
दार्शनिक प्रश्न के विचार में इतने निमग्न हो गये कि मार्ग का ध्यान उन्हें न
रहा और वह किसी कुएं में जा गिरे। कुएं से उनकी प्राणरक्षा तो यथा-कथञ्चित्
हो गई, पर आगे कभी इस प्रकार की दुर्घटना न घटे इस भाव से कृपालु भगवान्
ने उनके पैरों में दो आँखे बना दीं इसीलिए वह अक्षपाद [ पैरों में आँख वाले ]
कहे जाने लगे ।
इस कथा की निःसारता और मिथ्या-परिकल्पना इतनी स्पष्ट है कि उसके
लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। जिस मस्तिष्क से इस मिथ्या
कथानक की सृष्टि हुई उसने अक्षपाद शब्द को अन्वर्थ कर देने की बात तो
सोची, पर शेष उसकी यौक्तिकता आदि पर तनिक भी विचार नहीं किया
अन्यथा ऐसी तुच्छ परिकल्पना वह कभी न करता। मन अणु है, एक समय
में एक ही वस्तु का ज्ञान वह कर सकता है, 'युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम्'
यह न्यायशास्त्र का ही सूत्र है। महर्षि गौतम का मन उस समय किसी अन्य

१. योऽक्षपादमृषिं न्यायः प्रत्यभाद् वदतां वरम् ।
तस्य वात्स्यायन इदं, भाष्यजातमवर्तयत् ॥
[ न्याय भाष्य, विजयनगरम् संस्कृत सीरीज ]
२. यदक्षपादः प्रवरो मुनीनां शमाय शास्त्रं जगतो जगाद ।
कुतार्किकाज्ञाननिवृत्तिहेतोः करिष्यते तस्य मया निबन्धः ॥ [ न्यायवार्तिक ]
३. अथ भगवता अक्षपादेन निःश्रेयसहेतौ शास्त्रे प्रणीते । [ न्याय-वार्तिक तात्पर्य टीका ]
४. अक्षपादप्रणीतो हि विततो न्यायपादपः ।
सान्द्रामृतरसस्यन्दफलसन्दर्भनिर्भरः ॥ [ न्यायमञ्जरी, प्रथम परि० ]
५. भोः काश्यपगोत्रोऽस्मि । साङ्गोपाङ्गं वेदमधीये, मानवीयं धर्मशास्त्रं, माहेश्वरं योगशास्त्रं,
बार्हस्पत्यम्^र्थशास्त्रं, मेधातिथेर्न्यायशास्त्रं, प्राचेतसं श्राद्धकल्पं च ।
[ प्रतिमा नाटक अङ्क ५, पृ० ७९ ]