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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 18, कुल 330 में से

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पृष्ठ 18

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जिस प्रकार किसी छोटे पौधे की रक्षा करने के लिए उसके चारों ओर काँटों
की बाड़ लगा दी जाती है इसी प्रकार सिद्धान्त या तत्त्व की रक्षा के लिए
जल्प-वितण्डा आदि न्यायाङ्ग, काँटेदार बाड़े के समान हैं।
इस सिद्धान्त को समझ लेने से हमें न्याय शास्त्र के विविध स्वरूपों को या उन
परिवर्तनों को जो कि समय २ पर उसमें होते रहे हैं समझने में सहायता मिलेगी।
'अर्थपरीक्षा' और 'तत्त्वाध्यवसाय-संरक्षण' यही न्याय शास्त्र के प्रधान कार्य हैं इस
लिए उसका स्वरूप बहुत कुछ मानव-विचारों के ऊपर अवलम्बित है। जिस प्रकार
पृथ्वी में सभी प्रकार के पोषक तत्त्व हैं, हम अपने चर्म-चक्षुओं से उन्हें भले ही न
देख सकें पर नीम और नीबू, अंगूर और आम, केला और कटहल सभी अपने २
पोषक तत्त्व उसी पृथ्वी में से खींच लेते हैं और अपने फलों द्वारा उन विरोधी तत्त्वों
के अस्तित्व को मूर्त्तरूप में हमारे सामने प्रस्तुत कर देते हैं, इसी प्रकार विचार क्षेत्र
और प्रमाण क्षेत्र में भी हर प्रकार के तत्त्व विद्यमान हैं। हर विचार के और हर
सिद्धान्त के पोषक तत्त्व उसमें मिल सकते हैं। विचार क्षेत्र से उन तत्त्वों को खींच
कर अपने सिद्धान्त को परिपुष्ट करना और उन तत्त्वों को मूर्त्तरूप दे देना यही
न्यायशास्त्र का कार्य है। इसलिए बहुधा दो विरोधी सिद्धान्तों के समर्थन एवं
संरक्षण का भार न्यायशास्त्र पर ही आता है, और न्यायशास्त्र उन दोनों ही
सिद्धान्तों की पुष्टि के लिए आवश्यक उपकरण उसी सामान्य क्षेत्र से निकाल कर
जुटाता है। 'आत्मा है' की पुष्टि भी न्यायशास्त्र ही करता है और 'आत्मा नहीं है'
इसकी पुष्टि का उत्तरदायित्व भी न्यायशास्त्र पर ही आता है। हम उसे 'बौद्धन्याय'
नाम से अलग करने का यत्न भले ही करें पर है तो वह न्यायशास्त्र ही। ऐसी
अवस्था में मूलतः एक ही तत्त्व होने पर भी उसके बाह्यस्वरूप में परिवर्तन हो
जाता है और एक ही न्यायशास्त्र प्राचीन न्याय, नव्यन्याय; बौद्धन्याय, जैन न्याय,
पौरस्त्यन्याय, पाश्चात्त्यन्याय आदि के विविधस्वरूपों में हमारे सामने आता है।
न्यायशास्त्र के विकास पर धार्मिक प्रभाव—
भारतीय साहित्य में न्याय शास्त्र का पथनिर्देश प्रायः धार्मिक भावना ने किया
है। समाज में जिस प्रकार की धार्मिक क्रान्तियां समय २ पर होती गईं न्यायशास्त्र
के स्वरूप पर उसका प्रभाव स्पष्ट रूप से अङ्कित होता गया। वह प्रभाव इतना
व्यापक और इतना स्थायी है कि विभिन्न काल में निर्मित न्याय साहित्य पर
उसकी छाप स्पष्ट दिखाई देती है। इस प्रभाव की परख को ध्यान में रखते हुए
यदि हम सम्पूर्ण न्याय साहित्य का विश्लेषण करें तो हमें उसके तीन भाग
बिल्कुल अलग २ दिखाई देंगे, जिन्हें हम प्राचीन न्याय, मध्य न्याय और नव्य
न्याय के नाम से निर्दिष्ट कर सकते हैं। न्याय दर्शन का प्रादुर्भाव बुद्ध भगवान् के
जन्म के पूर्व हो चुका था। न्याय शास्त्र के प्रवर्तक गौतम ऋषि के गोत्रज होने से
ही कदाचित् वह गौतम बुद्ध कहे जाते हैं। इसलिए बौद्धधर्म के प्रादुर्भाव और
प्रतिष्ठा से पूर्व का न्याय 'प्राचीन न्याय' कहलाता है; बौद्ध और जैन धर्म के
२ त० भ०