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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 330 में से

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पृष्ठ 20

[ १६ ]
मूल सूत्रों का निर्माण एक दिन में हुआ है और न भाष्यवार्तिक आदि का, दोनों के
निर्माण में शताब्दियाँ लगी हैं। भाष्य, वार्तिक, तात्पर्य टीका आदि अलग २ ग्रन्थ
हैं इसलिए उनके ऊपर इन शताब्दियों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। परन्तु
मूल सूत्र अलग २ पुस्तकें नहीं हैं। वह एक पुस्तक के रूप में उपलब्ध होते हैं
इसलिए उनके भीतर शताब्दियों का प्रभाव सहज में नहीं देखा जा सकता फिर
भी जिन संघर्षों में होकर न्याय-सूत्रों को अन्तिम स्वरूप मिल सका है उनका
प्रभाव छिप नहीं सकता है।
यों तो न्याय शास्त्र का सारा जीवन ही संघर्ष का जीवन रहा है। आत्मा
और अनात्मा के इस संघर्ष से उसका जन्म हुआ, इसीसे उसका विकास हुआ,
इसीसे वह जी रहा है और जिस दिन मरेगा-उस दिन इसी संघर्ष में वीरगति लाभ
करेगा। परन्तु इस संघर्षमय जीवन में उसके शत्रुगण विविध रूपों में उसके
प्रतिपक्ष में खड़े हुये हैं। जिस आदि अनात्मवाद के संघर्ष से न्याय शास्त्र को
जन्मलाभ हुआ वह अनात्मवाद कुछ दूसरी ही चीज थी परन्तु कुछ समय बाद
न्यायशास्त्र के यौवनकाल में उसी अनात्मवाद ने बौद्ध दर्शन के नैरात्म्यवाद के
नवीन रूप में आकर उससे लोहा लिया है।
१ साध्यप्रधानयुग—
उपनिषदों में अनेक स्थलों पर अनात्मवादी अथवा देहात्मवादी मतों का उल्लेख
मिलता है। कठोपनिषत् १, ९ 'येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति
चैके' और छान्दोग्य नवमाध्याय के इन्द्र-विरोचन के उपाख्यान में जिस अनात्म-
वाद और देहात्मवाद का उल्लेख हुआ है वह विचार उस काल से भी बहुत पूर्व
की सम्पत्ति हैं। ऐसे विचारों का परिशोधन कर नित्य आत्मा के अस्तित्व को
प्रतिष्ठित करना ही उपनिषदों का ध्येय है। उसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये लगभग
उसी समय के आस पास न्यायशास्त्र का भी सूत्रपात हुआ। यह न्यायशास्त्र का
'साध्यप्रधान' अथवा 'अध्यात्मप्रधान' युग था। उसमें विशुद्ध जिज्ञासा भाव से
शङ्का-समाधान होता था। परन्तु जय या पराजय की भावना उसमें नहीं थी।
ऐसे अनेक प्रसङ्गों की चर्चा उपनिषदों में आई है। उन प्रसङ्गोंमें दोनों पक्ष अपनी-
अपनी बात को समझाने के लिये युक्ति और प्रमाणों का आश्रय लेते थे। उनको
भी सिद्धान्तों के परिशोधन एवं संरक्षण के लिये न्यायशास्त्र की सहायता की आव-
श्यकता होती थी। परन्तु वह जो कुछ थी, जिज्ञासा-भाव से, मूलतत्त्व को समझने
के लिये। श्रद्धापूर्वक, समित्पाणि होकर, जिज्ञासाभाव से लोग उपस्थित होते थे
आत्मदर्शी ऋषियों के आश्रम में। वैसे ही प्रेम भाव से अपने सम्पूर्ण अनुभव को
जिज्ञासु के हृदय में उड़ेल देने की आकुलता के साथ ऋषियों के उत्तर होते थे।
और यदि एक बार में समझ में नहीं आते तो दूसरे दिन दूसरे प्रकार से और
तीसरे दिन तीसरे प्रकार से उसी बात को समझाया जाता था। उद्देश्य था आत्म-
तत्त्व का ज्ञान प्राप्त करना, वह जिस प्रक्रिया से भी हो सके वही ठीक है—