तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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'यया यया भवेत्पुंसां व्युत्पत्तिः प्रत्यगात्मनि ।
सा सैव प्रक्रिया साध्वी विपरीता ततोऽन्यथा ॥'
यह प्राचीन न्याय का एक युग था। उसे हमने 'साध्यप्रधान युग' के नाम से
निर्दिष्ट किया है।
२ साधनप्रधानयुग—
उसके बाद आत्मा और अनात्मा का यह विवाद जब स्पष्ट रूप से पक्ष-प्रतिपक्ष
के रूप में सामने आया और उसके साथ वादी या प्रतिवादी की जय अथवा
पराजय की भावना का पुट लगा तो उसने एक नवीन रूप धारण किया। जय-
पराजय की इस भावना के साथ ही विषय-प्रतिपादक पञ्चावयवयुक्त अनुमान-
वाक्य की शैली का आविष्कार हुआ। प्रतिज्ञा, हेतु और उदाहरणादि का पृथक् २
निर्देश कर परार्थानुमान की प्रणाली का जन्म और उसके बाद हेत्वाभास, जाति
और अन्त में निग्रह स्थानों का परिष्कृत रूप में प्रचार इन सबका आविष्कृत
और प्रचलित होना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य था और वही हुआ भी। थोड़े
समय में वाद-विवाद की कला ने एक स्वतन्त्र शास्त्र का रूप धारण कर लिया
और उनके लिये स्वतन्त्र परिभाषाओं और स्वतन्त्र नियमों का निर्माण हुआ।
न्यायशास्त्र के इस परिवर्तन काल में नियम-निर्माण आदि के इस अभिनव
आयोजन का कुछ ऐसा प्रभाव पड़ा कि तात्कालिक नैयायिकों की दृष्टि में आत्म-
तत्त्व विवेचन रूप उनका प्रधान प्रतिपाद्य विषय तो पीछे पड़ गया, और साध्य
के बजाय साधन के निर्माण में ही उनकी सारी शक्ति लग गई। इस नवीन युग-
भावना के बीच सुसंस्कृत होकर न्यायशास्त्र जिस रूप में हमारे पास पहुँचा वही
आज का उपलब्ध न्यायदर्शन है, जिसमें साध्य की अपेक्षा साधन पर और प्रमेय
की अपेक्षा प्रमाण पर अधिक बल दिया गया है। इसे हम न्यायशास्त्र में 'साधन-
प्रधान-युग' कह सकते हैं।
न्यायशास्त्र के इन दो विभिन्न रूपों का परिचय न केवल उसके विकास क्रम
के सूक्ष्म परिशीलन में ही पाया जाता है, अपितु दो विभिन्न कालों में उसके लिये
प्रयुक्त होने वाले दो विभिन्न नामों में भी उनकी ध्वनि स्फुट रूप में प्रतीत होती
है। प्राचीन न्यायशास्त्र के लिये 'आन्वीक्षिकी' शब्द का प्रयोग संस्कृत साहित्य में
बहुतायत से हुआ है। और वह शब्द न्यायशास्त्र के 'साध्यप्रधान युग' की भावना
को ही स्फुटतया व्यक्त करता है। 'आन्वीक्षिकी' शब्द का अर्थ स्वयं भाष्यकार
'वात्स्यायन' ने इस प्रकार किया है—
'प्रत्यक्षागमाभ्यामीक्षितस्य अन्वीक्षणमन्वीक्षा।
तया प्रवर्तत इत्यान्वीक्षिकी न्यायविद्या न्यायशास्त्रम् ॥'
अर्थात् प्रत्यक्ष [योगि प्रत्यक्ष] और आगम [आप्त वचन] द्वारा परिज्ञात
अर्थ [आत्मतत्त्व] का [युक्तियों द्वारा लौकिक पुरुषों के] परिज्ञान प्राप्त करने