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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 330 में से

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पृष्ठ 26

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सकते हैं, परन्तु जिस प्रकार से और पूर्वापर के जिन वाक्यांशों के बीच वह प्रयुक्त
हुआ उस स्थिति में उसका एक और केवल एक ही अर्थ हो सकता है, दूसरा अर्थ
करने की नाम-मात्र भी संभावना नहीं है। भास की पुस्तक से मूल वाक्य हम
ऊपर उद्धृत कर चुके हैं। 'मानवीयं धर्मशास्त्रम्-और-बार्हस्पत्यमर्थशास्त्रम्-के साथ-
मेधातिथेर्न्यायशास्त्रम्-का अर्थ स्पष्ट रूप से 'मेधातिथि का न्यायशास्त्र' ही हो सकता
है 'मेधातिथि से न्यायशास्त्र पढ़ा' यह अर्थ सर्वथा प्रक्रम-विरुद्ध है। श्रीदासगुप्त ने
ऐसा अर्थ करके भास, मेधातिथि और न्यायशास्त्र सबके साथ अन्याय किया है।
क्या गोतम न्यायशास्त्र के निर्माता नहीं है ?—
श्रीदासगुप्त ने इससे भी अधिक आश्चर्यजनक एक और नई कल्पना की है।
न्यायशास्त्र-प्रणेताओं की सूची में महर्षि गोतम का नाम रखना आपकी दृष्टि
में सर्वथा ही अप्रामाणिक है। न्यायशास्त्र के प्रणेता श्री अक्षपाद ही हैं; उस
सम्बन्ध में मेधातिथि या गोतम का नाम आ ही नहीं सकता ऐसा आपका मत
है। आप लिखते हैं—
Medhatithi Gotam is more or less a mythical person, and there is
no proof that he ever wrote anything'......
Vatsyayan himself refers to Akshpada as the person to whom
Nyaya [ the science of logic, ] revealed itself. Udyotakar also refers
to Akshpad as the utterer of the Nyaya shastra and so also does
Vachaspati. There is therefore absolutely no reason why the original
authorship of Nyaya should be attributed to a Gotam as against
Akshapad...
the Nyaya shastra therefore cannot be traced on the evidence of
the earliest Nyaya authorities to any earlier Gotam; for had this
been so, it would certainly have been mentioned by either Vatsyayan,
Udyotkar or Vachaspati.
( History of Indian philosophy, Vol. II, P. P. 393-94 )
न्यायशास्त्र के साथ महर्षि गोतम का नाम ऐसा जुड़ा है जिसके अलग करने
की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। शताब्दियों से वे न्यायशास्त्र के प्रणेता माने
जा रहे हैं। संस्कृत साहित्य के अनेकानेक प्राचीन ग्रन्थों के प्रमाण ऊपर उद्धृत
किए जा चुके हैं जो स्पष्टरूप से महर्षि गोतम को ही न्यायशास्त्र का प्रणेता
प्रतिपादन कर रहे हैं, फिर भी श्रीयुत दासगुप्त महोदय ने इस प्रकार की एक
अभूतपूर्व कल्पना करने का साहस कैसे किया यही आश्चर्य है।
महर्षि गोतम न्यायशास्त्री के रूप में केवल भारत में ही नहीं अपितु अन्त-
र्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर चुके हैं। द्वितीय शताब्दी A. D. के पूर्वार्द्ध की यह
बात है जब कि न्यायशास्त्री के रूप में महर्षि गोतम का नाम भारत की सीमा
को भी पार कर परशिया तक विख्यात हो गया था। परशिया के सासानि-