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सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

चतुर्विंशः प्रकाशः
उपसंहार वर्णन्
कौतुक पञ्जिका विधानम्
उपक्रमः स्वेष्टतमस्य विष्णोः स्तवादिनादौ रचितश्रुतस्य
तत्पादनत्योपनतस्य पूर्ति मथोप संहार ममुष्य कुर्वे । १ ।
मैंने अपने इष्टतम देव श्री जगन्नाथ (विष्णु) का स्तवन कर इस ग्रन्थ का
आरम्भ किया था । अन्त में पुनःउनको प्रणाम कर इस ग्रन्थ का उपसंहार कर
रहा हूँ ।
तस्यादितः कौतुक पञ्जिकाख्यं वक्षामि किञ्चिद् गणितं मयायद् ।
कैशोर भाजां रचि पञ्जिकालिं दृष्ट्वैव पित्रा लिखितां प्रयत्नात् । २ ।
ग्रन्थ समाप्त करने से पहले कौतुक पञ्जिका नाम से कितनी गणित विधियां
मैं कहूंगा । मेरे पिता ने बहुत परिश्रम कर बहुत सी पाञ्जी बनायी थी । मैने
युवावस्था में इन्हें देखकर यह कौतुक पञ्जिका तैयार की थी ।
कौतुक पञ्जिका
पञ्चांगपाञ्जीं प्रविलोक्य चैकामन्वां ततः कल्पयितुंक्षमः स्यात्
जनो धनुर्ज्या पदकाद्यविज्ञो यथा तथायं क्रियते प्रकारः । ३ ।
चाप गणित (ज्या, कोटिज्या आदि) बिना जाने केवल पुरानी पाञ्जी (पञ्चाग)
देखकर जिस विधि से नयी पांजी बनायी जा सकती है, वह विधि कर रहा हूँ ।
कुवासरा नागशराग्नि (३५८) तुल्या नागेन्दु नाड्योरस भू (१६) विनाड्य
कृतांगरामै (३६४) स्तिथिभिः समाप्ताः स्युर्मन्द्र केन्द्रौजपदान्तगेऽर्के । ४ ।
अपने मन्दोच्च से सूर्य पूर्व या पीछे के पदान्त में रहने पर उस वर्ष के सावनदिनों
की संख्या ३५८।१८।१६ होगी । इतने दिनों में ३६४ तिथि या चन्द्र दिन समाप्त
होंगे ।
पलैस्त्रिभि (३) विश्व (१३) मितैश्च दण्डे
र्युक्तानिपूर्वोक्त महीदिनानि । ३५८।१३ । ३ ।
ऋक्षैश्चतुः पञ्चगुणैः (३५४) समाप्तं
यान्त्यत्र नेष्टं रवि मन्द केन्द्रम् । ५ ।
३५८।१३।३ सावन दिनों में ३५४ नाक्षत्र दिन होते हैं । अतः चन्द्र मन्द केन्द्र
की आवश्यकता नहीं है ।
कुवासरास्ते (३५८) सदलेन्द्र (१४।३०) नाड़ी
युक्ता खनागज्ज्वलनैः सहाद्देैः (३८०)

४२८ सिद्धान्त दर्पण
• योगैः समाप्तिं खलु यान्ति मन्द
केन्द्रौज पादान्त गते खरांशौ । ६ ।
३५८।१४।३० सावन दिन में ३८० १/२ योग होता है । यह सब मन्द केन्द्र से
विषम पादान्त में रवि रहन से होता है ।
तिथ्यर्द्धके यत्र यदिष्ट मेतत् संवत्सरान्ते करणं प्रमेयम्
नक्षत्र भोगांघ्रि विवेचनेन नवर्क्षपादान्त कराशयः स्युः । ७ ।
जिस तिथ्यर्द्ध में जो करण है, एक वर्ष बाद उसी तिथि के उसी अर्द्ध में
वही करण फिर होगा । नक्षत्र के चार पाद करने पर प्रत्येक राशि में ९ नक्षत्र पाद
होंगे ।
पूर्णेष्षतो द्वादशसु क्षपेष मासेषु यद्यन्ति विभाद्यमिष्टम्
तत्पूर्वं वर्षे हि तिथिः कृतो (४) ना ग्राह्या
गुणो (३) नं भमथापि योगः । ८ ।
१२ चान्द्र मास पूर्ण होने पर अर्थात् ३५८ सावन दिनों में ( एक सौराब्द के
अन्तः पात ३५८ सावन दिनों में) चान्द्र वर्ष की ४ तिथि अधिक होगी । पूर्ण
भगण का ३ नक्षत्र तथा पूर्ण योग में
सार्द्धद्वयो (२ १/२) नः परिगृह्यतां तद् ग्राह्यर्क्षतिथ्यन्त त एव देयाः
पुरोदितास्ता निजनाड़िकाद्या योगस्य मध्यादथ तत्तत्‌राढ्याः । ९ ।
. (तिथि नाड्यः (१८।१६ भनाड्यः १३।३ योगनाड्यः १४।३०)
२ १/२ योग अधिक होता है । पूर्व वर्ष में जो तिथि आदि ग्रहण करने से
वर्तमान वर्ष की इष्ट तिथि होती है । उसी को ही ग्राह्य तिथि आदि कहते हैं।
ग्राह्य नक्षत्र में १८।१६ नाड़ी, ग्राह्य तिथि में १३।३ दण्ड तथा ग्राह्य योग में १४।३०
दण्ड जोड़ेगे ।
तिथ्यादयः षष्टि घटीभ्य ऊना भवन्ति चेदिष्ट तमास्तदैकः
ग्राह्ये दिने वार इहैव देयो द्वौषष्टिदण्डाधिकता पिचेत्तौ । १० ।
यह सब योग करने पर फल यदि ६० दण्ड से कम हो तो ग्राह्य दिन में एक
एक वार जोड़ना होगा । फल ६० दण्ड से अधिक होने पर २ वार जोड़ा जायेगा ।
तद् ग्राह्यतिथ्यां तिथयश्चतस्रो योज्याश्चतस्रः किलतारकायाम्
योगे च सार्द्धद्वयमेवमिष्ट तिथ्यादयो ग्राह्यत उद् भवन्ति । ११ ।
फल की ग्राह्यतिथि में ४ तिथि, नक्षत्र में ४ तारा तथा योग में २-१/२ योग
जोड़ा जायेगा । इसके प्रकार ग्राह्य तिथि आदि से इष्ट तिथि आदि हो जायेगा ।
मासेऽत्रपक्षे ऽत्र तिथिर्मदिष्टा की दृश्य मुख्यां कथमृक्षयोगौ
इतिस्थिते प्रश्न विधौ तिथिः सा पञ्चांग मुख्या प्रतिभाति यस्मात् । १२.।

... wait:
ति थी (2) न्द्र (1) विश्वा (2) र्य (1) म (1) रु (1) द्र (1) का (1) ष्ठा (1) = 11 syllables!
Wait! The verse is divided into lines in the book to insert the numbers in brackets!
In the verse:
तिथीन्द्रविश्वार्यमरुद्रकाष्ठा-
गोदिङ्महेशोर्यमविश्वशक्रैः । १६ ।
The editor broke the verse lines to insert the numbers:
तिथी (१५) न्द्र (१४) विश्वा (१३)
र्यम (१२) रुद्र (११) काष्ठा (१०) गो (९)
दिङ् (१०) महेशो (११) र्यम (१२) विश्व ( १३) शक्रैः (१४) । १६ ।

That explains the exact layout!
Let's check line 23 again:
Is it "अथोद्धृतो" or "अथोद्धतो"?
Let's look at the third character:
It has द् and ध with an ृ (ri-matra): द्धृ.
So "अथोद्धृतो".

Let's check line 24:
"कालः क्रमान्माः सुधनुर्मुखेषु"
Wait, "क्रमान्माः" or "क्रमान्मास्"?
Look at the characters:
क ् र म ा न ् म ा

४३० सिद्धान्त दर्पण
का चर कर्म कहा जा रहा है ।
सस्रोनिते ग्राह्य दिने दिनार्द्धं यत्स्या तदेवेष्ट दिनेऽब्दतः स्यात्
तदन्तरं यद्दिन सप्तकोत्थं तद् याम्य सौम्यायन योः क्रमेण । १८ ।
ग्राह्यदिन से ७ घटाने पर जो होगा उसी दिन का दिनार्द्ध इष्ट दिन के दिनार्ध
के बराबर होगा । अतः ७ दिन (३६५-३५८) सम्बन्धी दिनार्द्ध अन्तर को दक्षिण
उत्तरायण क्रम से तिथि, नक्षत्र और योग में जोड़ना या घटाना पड़ेगा ।
तिथ्यादिषु क्षेप्यमृणं विधेय मित्यं स्फुटं स्थूलमत प्रसिद्धम् ।
तिथ्यादिकं सूक्ष्ममितोऽपि कल्प्यं पूर्वोक्तरीत्यामृदुतुङ्ग बोधात् । १९ ।
इतना करने से प्राचीन सौर आदि मतों के अनुसार तिथि आदि स्फुट होगा ।
स्थूल मत से निकाले तिथि आदि से मन्दोच्च आदि के अनुसार पूर्वोक्त रीति से
सूक्ष्मतिति आदि की कल्पना करनी होगी ।
स्याद् ग्राह्य तिथ्यादि यदीह सूक्ष्मं स्थूली कृतिस्तस्य विधातु मिष्टा
व्यस्तेतु तुंगान्तर पाक्षिकाख्ये कार्ये, फले तत्र पुनः प्रयासात् । २० ।
यदि ग्राह्य तिथि आदि सूक्ष्म है तो इस विधि से उन्हें स्थूल करना चाहिये ।
तुंगान्तर और पाक्षिक फल निकाल कर विपरीत रीति से आदि में उसका संस्कार
करना होगा । यह कष्ट साध्य होने पर भी आवश्यक है ।
नागर्तवो (६८) नागदिवाकराश्च (१२५) गोर्थेन्दवः (१५९)
षट्कनृपाः (१६६) शरेन्द्रोः (१४५) भुजंगानन्दाश्च (९८)
कलम्बरामाः (३५) क्रमोत्क्रमादाद्य तिथैर्विनाड्यः । २१ ।
प्रतिपदा से सप्तमी की तिथियों में क्रमशः ६८, १२५, १५९, १६६, १४५, ९८
तथा ३५ कला (पल) जोड़ेगे तथा उल्टे क्रम से अष्टमी से चतुर्दशीतक की तिथियों
में घटायेंगे ।
कार्याधनर्णान्यथ बाहुलिप्ताः पूर्वोक्त तुंगान्तर केन्द्र जाताः
पक्षार्द्धजास्तत्त्वयमै (२२५) विभक्ता लब्धाः स्वखण्डास्तदनुक्रमोत्थाः । २२ ।
पक्षार्द्ध में पूर्वोक्त तुंगान्तर की भुजकला को २२५ से भाग देने पर फल तुंगान्तर
केन्द्र का भुज खण्ड होगा ।
वृहस्पते र्मन्दफलस्य लिप्ता यास्ताः शरघ्नात् विहताविनाड्यः
ज्ञेयाः पराः पक्षदले पुनस्ता हताः क्रमादादि तिथे स्त्र चन्द्रैः । २३ ।
इन खण्डों के अनुसार वृहस्पति का जितना मन्दफल कला होगी उसको ५
से गुणा कर २ से भाग देने पर पक्षार्द्ध की परा आदि होगी । इस परा आदि को
प्रतिपदा से सप्तमी तक क्रमशः १३,

उपसंहार वर्णन ४३१
तत्त्वै (२-२५) कलम्बाग्निभि (३-३५) रथवेदै (४-४५)
द्व्यर्थै (५-५२) र्नगार्थै (६-५७) खरसै (७-६६०) र्विलोमम्
तथाष्टमीतः (६०।५७।५२।४५।३५।२५।१३)
खरसै (६०) र्विभक्ता वामं खतुंगान्तर वद् युतोनाः । २४ ।
२५,३५,४५,५७,६० से गुणा करेंगे । अष्टमी से चतुर्दशी तक क्रमशः
६०,५७,५२,४५,३५,२५,१३ से गुणा करेंगे । सभी फलों में ६० से भाग देने पर जो
फल होगा उसे तुंगान्तर फल के समान विपरीत रीति से सूक्ष्म फल में संस्कार
करने से स्थूल तिथि हो जायेगी ।
ग्राह्य इतिस्युस्तिथयो भमेवं तिथ्यन्त पूर्ण तदृणस्वनाड्यः
विश्वां (१३) शहीनास्तिथि भान्तयोर्यत् कालान्तरं
यात मनागतं स्यात् । २५ ।
ठीक उसी प्रकार तिथि अन्त में जो नक्षत्र पूर्ण होगा उसी तिथि में जो घटाने
या जोड़ने वाला दण्ड आदि होगा उसका १/१३ भाग कम कर व्यवहार करेंगे ।
तिथि अन्त में नक्षत्र पूर्ण नहीं होने पर तिथि और नक्षत्र के बीच के समय को
तद् घ्नं तिथि द्वन्द्व धनर्ण कालान्तरेण षष्ठ्याप्त मितैष्य दृष्ट्या
न्यूनाधिकं कार्यमथर्क्षकेषु ग्राह्येषु शोध्यः क्रमतो विनाड्यः । २६ ।
नक्षत्र से संबन्धित दोनों तिथियों के धन या ऋण कालान्तर से गुणा कर ६०
से भाग देने पर गत नक्षत्र में योग या बाकी (गम्य) में घटायेंगे । ग्राह्य स्थूल
नक्षत्र होगा ।
षड् बाहवः (२६) षण् निगमा (४६) स्त्रिबाणा (५३)
रसाब्धयो (४६) ऽङ्गाक्षि (२६) मितामृगादेः
मासेषुकर्कादिषु योजनीया
यथास्थिताः कार्मुक युग्मयोस्तु । २७ ।
ग्राह्य नक्षत्र में मकर से आरम्भ कर ५ मासों में क्रमशः २६, ४६, ५३, ४६,
२६ पल (लिप्ता) घटाना पड़ेगा । कर्क आदि ५ मासों में इन्हें क्रमशः जोड़ना
पड़ेगा । धनु और मिथुन मास में योग या घटाव नहीं होता है ।
योगेऽत्र तिथ्युक्त फलान्य गांश (७)
हीनानि कुर्याद भ इवा नुपातम्
ग्राह्येभ्य इष्टानि पुरोक्त वत् स्युः
स्थूलानि सूक्ष्मी करणन्तु तेषाम् । २८ ।
विष्कुम्भ आदि योग निकालने के समय तिथि के लिये लिखे गये धन या
ऋण फल से उसका १/७ भाग कर व्यवहार करेंगे । नक्षत्र के गत या गम्य भाग
के समान गत या गम्य कालान्तर में अनुपात किया जायेगा । इस प्रकार ग्राह्यतिथि

४३२ सिद्धान्त दर्पण
आदि से पहले के समान स्थूल इष्ट तिथि आदि हो जायेगा ।
इहोक्त तुंगान्तर पाक्षिका भ्यं स्यादंगकानां धन हानि वाम्यात्
भानान्त कर्कादि मृगादि मासधनर्णता स्यादपि वैपरीत्यात् । २९ ।
इस स्थूल तिथि आदि को सूक्ष्म करने के लिए तुंगान्तर और पाक्षिक दोनों
फलों से तिथि आदि में उल्टे क्रम से संस्कार (जोड़ या घटाव) करेंगे । नक्षत्रों
का यह संस्कार कर्क और मकर से आरम्भ कर ५-५ मासों में क्रमशः जोड़कर
या घटाकर विपरीत क्रम से होगा ।
ग्राह्येऽप्यमध्येत्वधिमास पातश्चेद् ग्राह्यमेवोत्तर मासिसर्वम् ।
रूपाद्रि रामा (३७२) स्तिथयोऽर्कवर्षे यद्यन्त पूर्तिसह षोडशांशाः । ३० ।
ग्राह्य मास और इष्ट मास के बीच अधिमास पड़ने से अधिमास के अगले
मास में तिथि आदि सभी ग्रहण किया जायेगा । इसका कारण एक सौर वर्ष में
(३७२-१/१६) चान्द्र दिन या तिथि होती हैं । (३७२।३।४५)
[L1

उपसंहार वर्णन् ४३३
यद्राशि चार स्थिति (१५) दण्ड तोऽङ्गाद्
द्विरराम (३२) संख्यैः पलकै र्युतेभ्य
तन्मास्यभीष्ट दिन एक हीने
प्राग् वर्षजात् स्पष्ट इनः पुरेव । ३४ ।
किसी मास की संक्रान्ति पिछले वर्ष की संक्रान्ति से १५।३२ दण्ड के बाद
होगी । उस मास के अभीष्ट दिन में एक घटाकर पूर्व वर्ष के उसी समय के रवि
से पहले की तरह रवि को स्फुट किया जा सकता है ।
किन्तुत्रयाः प्रोज्झ्यतया निरुक्ता लिप्तादय
(१५।१८) स्ताः स्फुटसूर्यगत्याः
हताविभक्ताः खरसैः (६०) स्फुटाः स्युस्तदूनितः
सूक्ष्मइनोऽब्दतः स्यात् । ३५ ।
किन्तु यहां (१५।१८) कला घटाने को कहा गया है । उसको स्फुट सूर्य गति
से गुणा कर ६० से भाग देने पर स्फुट होगा । उसी स्फुट कला आदि को पूर्व
वर्ष के उसी दिन के सूर्य से घटाने पर इस वर्ष के इष्ट दिन का स्फुट सूर्य होगा ।
ग्राह्यादिरर्कोज्झित एष्यघस्र सूर्यः स्फुटा भुक्ति रतोऽवशेषः
अत्येति दर्शं रविसंक्रमश्चेत्त दाधिमासः सुविघावगम्यः । ३६ ।
अतः आगामी दिन के स्पष्ट सूर्य से ग्राह्य दिन का सूर्य घटाने पर शेष सूर्य
की स्फुट गति होगी । यदि रवि संक्रान्ति अमान्त के बाद हो वह मास अधिमास
होगा ।
भमुक्त नाड्योऽष्टशतो (८००) विनिघ्नाः साद्यन्त नक्षत्रघटी विभक्ताः
गतर्क्ष संख्याश्चततो गुणाढ्या भवन्ति विस्पष्ट सुधांशु लिप्ताः । ३७ ।
इष्ट नक्षत्र के गत दण्ड आदि को ८०० से गुणा कर उस नक्षत्र के भोग (आदि
से अन्त तक) दण्ड आदि से भाग देने पर उस नक्षत्र का भुक्त (बीता हुआ) कला
आदि होगा । ज्ञात नक्षत्र से पहले के नक्षत्र संख्या को ८०० से गुणा कर उससे
ज्ञात नक्षत्र के भुक्त अंशादि को मिलाने से चन्द्र का स्फुट कला आदि होगा ।
कला में ६० से भाग देने पर अंश और उसमें १२ से भाग देने पर राशि होगी ।
सहस्रनिघ्ना भगजाष्ट पक्षाः (२८,८०,०००) साद्यन्त नक्षत्र पलै र्विभक्तः
फलं विधोर्भुक्ति रनेक वर्ष यातैष्यतिथ्यादि वदन्ति विज्ञाः । ३८ ।
(२८,८०,०००) में नक्षत्र की आदि और अन्त लिप्ता (चन्द्र की ) से भाग देने
पर चन्द्र की स्फुट गति होगी । विज्ञ गणक इस प्रकार अनेक वर्ष की गति और
एष्य तिथि आदि जान सकते हैं ।
अथेन्दु सूर्य ग्रह सम्भवाया चन्द्रार्क मात्रावगतेर हानि
आनीय वारैः परिशोधितानि स्वाभीष्ट पर्वानुगतानि तेभ्यः । ३९ ।

४३४ सिद्धान्त दर्पण
चन्द्र और सूर्य ग्रहण की सम्भावना जानने के लिए चन्द्र और सूर्य का स्फुट
राशि आदि निकालना होगा । उसके लिए पूर्णिमा या अमावास्या (चन्द्र या सूर्य
ग्रहण में ) का अहर्गण निकाल कर उसे बार शुद्ध करेंगे ।
पातं स्वगत्या (३।१०।४८) परिकल्प्य पाता
तद् भार्द्धतो वाग्निकु (१३) भाग मध्ये
पक्षान्तजेऽर्क स्थित एव चन्द्र
ग्रहो भवेत्तत् क्रम भक्त पूर्वः । ४० ।
इस अहर्गण को दैनिक ३।१०।४८ कला गति से गुणा कर चन्द्र पात (राहु)
की राशि ज्ञात होगी । अमान्त में सूर्य और पात से ६ राशि बाद की दूरी तथा
पूर्णिमान्त में स्फुट चन्द्र और पात के बीच की पूरी १३ अंश से कम होने पर ग्रहण
की सम्भावना रहती है । चन्द्र ग्रहण के बारे में पहले कहा जा चुका है ।
दर्शान्त काले क्रमतस्तु पूर्व पश्चान्नति त्र्यश विहीन युक्ते
तात्कालिक ग्लौदिगिषोस्त्रिभोन तनू नतज्या खरसां (६०) शकस्य । ४१ ।
[L1

उपसंहार वर्णन ४३५
अन्तर से फिर ग्रहण हो सकता है ।
ग्रहात् पुनः प्रग्रहणान्तरं स्यात्ततस्तताभिरिति क्रमेण
पातर्क शीतां श्वधिमासविद्भि र्ज्ञेया ग्रहाद्या दशवत्सरान्तम् । ४५ ।
उसके बाद पुनः १५,१६५ आदि तिथि में इस प्रकार दस वर्ष में पुनः ग्रहण
हो सकता है । यह राहु, चन्द्र, रवि तथा अधिमास के द्वारा समझा जा सकता
है ।
ताराग्रहाणां समतैक वर्षे न स्याद्यतस्तद् बहुपञ्जिकानाम् ।
कार्यों बुधैः संग्रह एवमन्य कार्याणि सिद्धन्त्यपि साधुताभ्यः । ४६ ।
एक वर्ष में तारा ग्रहों (मंगल आदि) की समता नहीं आने के कारण (एक
भगण पूर्ण नहीं होने के कारण) गणित पण्डितों को बहुत वर्षों की पञ्जिका रखनी
चाहिये । इन पंजिकाओं से अनेक उपयोगी काम किये जा सकते हैं ।
सौरेण मानेन रदा (३२) ब्दतः प्राग् यथा कुजः सोऽ पि तथैष्ट वर्षे
चक्रे खनागेन्दु (१८०) कला भराढ्य एकादिराश्यन्त रितस्तु सूर्यात् । ४७ ।
वर्तमान सूर्य वर्ष के जिस मास के जिस दिन का मंगल स्फुट राशि आदि
जितना है उस दिन के ठीक ३२ वर्ष पूर्व उस मास के उसी दिन मंगल का स्फुट
राशि आदि वही था । (३२ वर्ष बाद भी वही होगा) वह सूर्य से १२ राशि पर
रहनें पर १८० कला जोड़ना पड़ेगा ।
युतः कलादि र्दश ताड़िताभिः
कुबाहुभि (२१०) भै (२७०) रसवीतिहोत्रै (३६०) ।
गजाब्धिभिः (४८०) वह्नि रसैः (६३०) कुनागैः (८१०)
स्ताभिः पुनः कार्मुक पञ्चकस्थे । ४८ ।
सूर्य से १,२,३ आदि राशि के अन्तर पर मंगल रहने पर क्रमशः २१०, २७०,
३६०, ४८०, ६३० तथा ८१० कला मंगल में जोड़ना पड़ेगा । मंगल धनु से आरम्भ
कर पांच राशियों में रहने पर
तस्मिन् क्रमात्यञ्चदशा (१५) ष्ट (८) पंच (५)
मातंग (८) तिथ्यं (१५) श समन्विता भिः ।
युग्मादि पञ्चर्क्ष गते तदंश (१५।८।५।८।१५।)
हीनाभिरे वं स्फुटता मुपैति । ४९ ।
क्रमशः १५,८,५,८,१५ अंश मंगल से घटाना पड़ेगा । इससे ३२ वर्ष बाद
मंगल स्फुट हो जायेगा ।
विश्वा (१३) ब्दतः प्राक् शशिजो यथा भूतथेष्ट वर्षेऽ त्र कियान् विशेषः
गत्यन्तरेण स्फुट सौम्य मध्य भान्वोर्वसु (८) ध्नाग्नि (३) हृतेन चेषः । ५० ।
इष्टवर्ष के इष्ट सौर मास तथा इष्ट दिन का बुध का राशि आदि वही होगा

४३६ सिद्धान्त दर्पण
जो उससे ठीक १३ वर्ष पूर्व उसी मास के उसी दिन था । इस विषय में और
भी कई बाते हैं । स्फुट बुध और मध्यासूर्य के गति अन्तर को ८ से गुणा कर ३
से भाग दें ।
युतोनितः सूर्य गतेः ५९।८ स्वभुक्ति न्यूनाधिकत्वे सतु वक्रगश्चेत् तदात्मभास्वद्
गति योग नाग (८) घाताग्नि (३) भागेन युतः स्फुटः स्यात् । ५१ ।
बुध की गति, ५९।९ से कम या अधिक होने पर इस फल को बुध के राशि
आदि में जोड़ेगे या घटायेंगे । बुध वक्री होने पर स्फुट बुध और मध्यम सूर्य की
गति योग को इसी प्रकार ८ से गुणा कर ३ से भाग देकर फल को वक्र बुध में
जोड़ने से बुध स्फुट होगा ।
वृहस्पतिर्द्वादश वर्षतः प्राग्
यथा यथा स्वार्क कलान्तरस्य
खार्काशं (१२०) युग्भिः खकुदृक् (२१०)
कलाभि स्ताभिः पुनः कर्कट पञ्चकस्थे । ५२ ।
वृहस्पति १२ वर्ष पहले जो था वही होगा । गुरु और सूर्य की अन्तर कला
को १२० से भाग देकर फल को २१० कला में जोड़े । योग को वृहस्पति में जोड़े ।
पुनः वृहस्पति कर्क आदि ५ राशियों में होने पर
तस्मिन् सुधांशो (३३) घन (१७) रुद्र (११) मेघ (१७)
देवांश (३३) हीना भिरिहैव नक्रात्
भपञ्चकस्थे तुतदंश (३३।१७।११।१७।३३) युग्भिः
समन्वितः सन् स्फुटतां प्रयाति । ५३ ।
रवि और गुरु के अन्तर को क्रमशः ३३, १७,११,१७ और ३३ से भाग देकर
फल को उस अन्तर से घटाकर शेष को वृहस्पति में जोड़ेगे । वृहस्पति मकर
आदि ५ राशियों में रहने पर इस अन्तरफल को २१० कला में योग कर उसे पुनः
गुरु से जोड़ने से वृहस्पति स्फुट होगा ।
वर्षाष्टकात् प्राग् भृगुजो यथैव मिष्टाब्दके सौर दिने च तत्र
स्फुटस्व भुक्त्यर्थम मध्य भुक्त्यन्तरेण बाण (५) घ्न भुजो (२) हृतेन । ५४ ।
इष्ट और वर्ष मास और दिन में शुक्र की राशि जो होगी वही ठीक आठ
वर्ष पहले उसी मास और उसी दिन थी । शुक्र स्फुट गति और सूर्य की मध्यम
गति के अन्तर को ५ से गुणा कर २ से भाग देंगे ।
ऊनो युते भानुगतेः स्वभुक्तो न्यूनाधिकायां क्रमतोऽ नृजुश्चेत्
युत्याशर (५) घ्नाक्षि (२) हतस्वभास्वद्
गत्यास्तदोनः स्फुटतां संगच्छेत् । ५५ ।
सूर्य मध्यम गति ५९।८ से स्फुट शुक्र गति कम या अधिक होने पर इस

उपसंहार वर्णन् ४३७
लब्धि को स्फुट शुक्र में घटाने या जोड़ने से वह स्फुट शुक्र (इष्टवर्ष का) होगा
शुक्र वक्री होने पर सूर्य मध्यम गति और शुक्र स्फुट गति के योग को ५ से गुणा
कर २ से भाग देकर फल को शुक्र से घटाने पर स्फुट होगा ।
शनिः खरामा (३०) ब्द पुरोः यथासीत्
कि न्त्वात्स सूर्यान्तर लिप्तिकानाम्
खेनांश (१२०) युग्भिः शरवाजिराम (३७५)
लिप्ताभिराभिः पुनरत्र मेषात् । ५६ ।
शनि ३० वर्ष पूर्व जिस राशि अंश आदि में था इष्ट सौर वर्ष मास दिन
आदि में वही होगा । मध्यम सूर्य और स्फुट शनि की अन्तर कला को १२० से
भाग देकर फल को ३७५ कला में जोड़ेगे । योग को स्फुट शनि में जोड़ेगे ।
पञ्चर्क्ष संस्थे नख (२०) दिग (१०) श्व (७) दशा (१०)
नखां (२०) श संयोगवती भिरस्मिन्
तुलादि पञ्चर्क्ष गते तदंश (२०।१०।७।१०।२०

४३८ सिद्धान्त दर्पण
किं वा नवाश्वै (७९) र्दिननाथ वर्षे
भौमश्रुतुः षष्टि (६४) कलाधिकः स्यात्
बुधोऽगवेदै (४६) विधुदिक् (१०१) कलोनो
गुरुस्त्रिनागै (८३) कृत सप्त (७४) हीनः । ६१ ।
मध्यम मंगल ७९ सौरवर्ष में ६४ कला अधिक होता है । बुध ६४ सौर वर्ष
में (१०१) कला कम होता है । गुरु ८३ सौर वर्ष में ७४ कला कम होता है ।
शुक्रस्त्रिसिद्धै (२४३) स्त्रिचतु (४३) ष्कलाढ्यः
शनिर्नवार्थै (५९) र्नगसायकाढ्यः (५७)
राहुस्त्रिनन्दै (९३) र्नख (२०) लिप्तिकोनः
शीघ्रो ज्ञ शुक्रा वितरेऽत्र मध्या । ६२ ।
मध्यम शुक्र (२४३) सौर वर्षों में (४३) कला बढ़ता है । शनि (५९) सौर
वर्षों में (५७) कला बढ़ता है। राहु (९३) सौर वर्षों में (२०) कला कम होता है।
बुध और शुक्र का शीघ्रोच्च तथा अन्य ग्रहों के मध्यम मान ठीक आते हैं ।
तिथ्यादिभूक्ताः प्रति सौर मास्य यायाहतिः स्वर्णविनाड़िकाप्ताः
ग्राह्येऽष्टषत्सार्क युगान्तरार्द्धयुक्तेष्टषट्‌सार्थम मासतस्स्युः ६३ ।
सौर मास के तिथि नक्षत्र आदि के लिये जो भाग विधि या दण्ड जोड़ने
घटाने के विषय में कहा गया है, उसे रखें । ग्राह्य तथा इष्ट दिन सम्बन्धी स्पष्ट
सूर्य के अन्तर के आधे को जोड़ने पर इष्ट दिन का सूर्य जिस राशि में जायेगा
उसी मास से उन तिथियों की गिनती होगी तथा अन्य संस्कार होंगे ।
तारामहेष्वंशभिरेन्दु भान्वोः कला प्रभेद स्तिथि योग भेषु
फल प्रभेदोऽत्र बुधैर्नगण्यः कृतिर्मदीया यद सावपूर्वा । ६४ ।
कौतुक पंजिका में मंगल आदि तारा ग्रहों में अंश की त्रुटि हो सकती है ।
चन्द्र, सूर्य में कला का अन्तर तथा तिथि योग और नक्षत्र में लिप्ता का अन्तर
विज्ञ गणक नगण्य मानेंगे ।
स्नानादि योगां श्चिरकालतोऽस्या भविष्यतो ज्ञातुमलं नरः स्यात्
मृषाप्यतः कौतुक पंजिकेयं महोपकाराय सतांसदास्ताम् । ६५ ।
पहले किसी ने इस प्रकार की कौतुक पंजिका नहीं बतायी थी । लोग इससे
आगामी तीर्थ स्नान आदि योग बहुत पहले जान पायेंगे । अतः यह कौतुक पंजिका
स्थूल होने पर भी इससे सज्जनों का बहुत उपकार हो यह मेरी इच्छा है ।
सलक्षणोदाहरणं वितत्य सिद्धान्त मध्येऽत्रकुतूहलाय
उद्देश्यतो भूय उदीर्यतेऽसौयतोऽतिवेशाद् विषय ग्रहः स्यात् । ६६ ।
इस सिद्धान्त दर्पण में उदाहरण के साथ अनेक लक्षण विस्तार से दिये गये
हैं । तथापि इसके विषय वस्तु को शीघ्र जानने के लिए उद्देश्य से संक्षेप में सभी

उपसंहार वर्णन ४३९
बातें पुनः कही जा रही हैं ।
प्रोक्तं प्रकाशे प्रथमे प्रमाणं त्रुट् यदि कालस्य लयान्तिमस्य
सिद्धान्त सल्लक्षण सृष्टि काल सहांग चक्राणि च सप्रशंसम् । ६७ ।
प्रथम प्रकाश में ये विषय है- त्रुटि आदि से आरम्भ कर प्रलय के अन्त तक
का काल मान, सिद्धान्त का लक्षण, सृष्टिकाल, वेद उसका अंग विभाग, उसकी
प्रशंसा ।
संख्या द्वितीये भगणोत्करस्य कल्पाब्दमास द्युमिति र्निरुक्ता
नभश्चराणां दिन भुक्ति लिप्तास्तत्साधनं पर्ययघस्रकृप्तिः । ६८ ।
द्वितीय प्रकाश में ये विषय हैं । ग्रह उच्च, और पात आदि की भगण संख्या,
कल्प में वर्ष, मास और दिन की संख्या, ग्रह उच्च और पात आदि की दैनिक
मध्यमगति कला और उसे निकालने की विधि, भगण का दिन परिमाण ।
उक्त स्तुतीये कुदिनौघ इष्टे दिनाब्द मासाधिप मध्य खेटा
जैवास्तथाब्दा द्विविधा ग्रहादि ध्रुवा द्युषत्पात मृदूच्चहाराः । ६९ ।
तृतीय प्रकाश के विषय हैं-इष्ट अहर्गण निकालने की विधि, दिन, मास,
वर्ष आदि के अधिपति निकालने की विधि, मध्यम ग्रह, बार्हस्पत्य वर्ष, ग्रह उच्च
और पात का ध्रुव तथा उच्च पात का हार ।
तुर्ये महीवेष्टन देश नाड़ी वार प्रवृत्तीष्ट धनर्ण लिप्ताः
भुजान्तराख्या वदयान्तरारूया श्ररोद् भवा सत्पदकं ध्रुवादौ । ७० ।
चतुर्थ प्रकाश में भू परिधि, देशान्तर दण्ड, वार प्रवृत्ति और योग वियोग
कला, भुजान्तर कला, उदयान्तर कला, चर कला और द्वापरान्त ध्रुवपदक हैं ।
इत्थं चतुर्भिर्गदित प्रकाशैर्मध्याधिकारः सुरवर्त्मगानाम्
अथ प्रकाश द्वितीयेन तेषा मुद्दिष्यते विस्फुटताधिकारः । ७१ ।
इस प्रकार प्रथम चार प्रकाशों में आकाश चारी ग्रहों का मध्यमाधिकार पूरा
हुआ । इसके बाद २ प्रकाशों में ग्रह स्फुट करने के बारे में जो कहा गया है
उसके बारे में संक्षेप में कहूँगा ।
पश्चात् पुरः खेट गतिः प्रमाणं तदुच्च पातोत्थ पृथग्गति त्वम्
ज्या पञ्चमे दोः फल भुक्ति खण्डाः परिध्युपात्तास्तिथि भादि सर्वः । ७२ ।
पंचम प्रकाश में ग्रहों की पूर्व और पश्चिम गति का मान, उच्च और पात के
कारण ग्रहों का गति भेद, क्रम और उत्क्रम ज्या साधन, भुजफल निकालने के
लिये गति खण्ड, परिधि और उसकी मन्द और शीघ्र परिधि, तिथि और नक्षत्र
आदि पंचांग कहा गया है ।

४४० सिद्धान्त दर्पण
षष्ठेऽर्क चन्द्रर्क्षज सूक्ष्मपंजी तिथ्यादिसन्धिः प्रतिमण्डलाद्या
चलांशकाः क्रान्तिमही द्युजीवाश्चराणि लग्ना विविधाश्चदेशैः । ७३ ।
षष्ठ प्रकाश में रवि, चन्द्र और नक्षत्र की सूक्ष्म पञ्जिका, तिथि, नक्षत्र और
राशि की सन्धि, वृत्त और प्रतिवृत्त, अयनांश, शीघ्र फल, क्रान्ति ज्या, द्युज्या और
भूज्या, चर और स्थान विशेष का लग्न कहा गया है ।
दिग्भूमि शुद्धिर्भुजकोटिकर्ण लम्बाक्ष काग्राः सममण्डलाद्याः
दिग् देश काल स्फुट सूर्य बोधो ना सप्तमे कोण भवः करण्याः । ७४ ।
७ म प्रकाश में दिग् और भूमि शुद्धि, भुज कोटि और कर्ण, लम्बज्या, अक्षज्या
और अग्रा, सममण्डल आदि वृत्त, दिग् और देश समय और स्फुट रवि निकालना,
करणी, कोण शंकु आदि कहा गया है ।
अथाष्टमे सूर्य विधूक्ष माभा मानश्रुतीषूस्थिति मर्दकाले
चन्द्रग्रहोक्ति र्वलने सयुक्तो चान्द्रंदिनं ग्रास ज्ञ वर्णभेदाः । ७५ ।
अष्टम प्रकाश में, सूर्य, चन्द्र, भूछाया बिम्ब परिमाण, रविचन्द्र मन्दकर्ण, शर
स्थिति, मर्दकाल और इन सबके द्वारा चन्द्रग्रहण, युक्ति सहित आयन औरर आक्ष
वलन चान्द्र दिन तथा विभिन ग्रास के बारे में कहा गया है ।
युक्ति र्नते वित्रिभ लग्न शंकोर्द्विधोदितं लम्बन मिन्दु भान्वोः
नतिस्तमो मानभिदा नरोत्थाग्रहः स्वराशोर्नवमेकिलेति । ७६ ।
नवम प्रकाश में नति, वित्रिभ लग्न का शंकु, रवि और चन्द्र का दो प्रकार
का लम्बन, शंकु के अनुसार छाया मान में भेद तथा सूर्य ग्रहण के बारे में कहा
गया है ।
कालोन्नतेर्मानि भिदाथ वृत्त त्रयं सरण्या सवशात् समक्षः
लेखस्थलेच्छेदक नामधेया ग्रहस्य सिद्धो दशम प्रकाशे । ७७ ।
दशम प्रकाश में उदय आदि, उन्नत काल भेद से दृश्य बिम्ब मान में भेद,
शर के अनुसार तीन वृत्तों के विषय में तथा ग्रहण का परिलेख दिया गया है ।
एकादशेखेचर तुल्यतादौ दृक् कर्मयुग्म स्फुट दिक् कलम्बैः
द्युष द्युति र्बिम्बमितेर्भिदोक्ता युद्धप्रभेदानलकादि सिद्धिः । ७८ ।
एकादश प्रकाश में स्फुट ग्रहों की समानता, ग्रह स्फुट करना और उससे
आयन और आक्ष दृक् कर्म निकालना, ग्रह युति (योग), ग्रह बिम्ब के भेद, ग्रह
युद्ध के भेद, ग्रहयुद्ध देखने के लिये नलिका के व्यवहार के बारे में कहा गया
है ।
भानां युति द्वादश के खगेन्द्रे र्ध्रुवाः शराश्चाकृतयो भ संख्याः
तद् बिम्बमानानि च योग ताराः सप्तर्ष्यगस्त्य प्रमुखाः प्रदिष्टाः । ७९ ।

उपसंहार वर्णन् ४४१
बारहवें प्रकाश में नक्षत्र और ग्रह योग, ग्रह नक्षत्र का ध्रुव, दक्षिण और उत्तर
शर, ग्रह नक्षत्र का आकार, तारा संख्या, नक्षत्र बिम्ब परिमाण, योगतारा, सप्तर्षि,
अगस्त्य, लुब्धक आदि तारों के बारे में विशेष रूप से कहा गया है।
त्रयोदशे प्राक् परदिग् गृहार्क्ष समुद् गमा स्तं गमने निरुक्ते ।
क्षेत्रांश कालांशक चक्र भागे भास्वनिश्शेषा स्फुजितां प्रकाशाः । ८० ।
१३ वें प्रकाश में पूर्व और पश्चिम में ग्रह नक्षत्र का उदय और अस्त, क्षेत्रांश
कालांश और मानांश तथा सूर्य चन्द्र और शुक्र के प्रकाश के बारे में विशेष वर्णन
है ।
चतुर्दशे सूक्ष्म रवीन्दु मध्य कालां शतश्चन्द्रसमुद् गभास्तौ
चन्द्रक्षयो द्वौः परिलेख इन्दोः शृंगोन्नतिः साबुध शुक्रयोश्च । ८१ ।
१४ वें प्रकाश में स्पष्ट सूर्य और चन्द्र का कालांश से चन्द्र का उदय और
अस्त, चन्द्र की क्षय और वृद्धि का परिलेख, चन्द्र शृंगोन्नति और बुध तथा शुक्र
की शृंगोन्नति भी कहा गया है ।
पातो महान् पञ्चदशे निरुक्तो द्विरूप इत्थं नवभिः प्रकाशैः
त्रिप्रश्नमाधिकृतिभिः समाप्ता पूर्वं नभः सद् गणिताख्य मर्द्धम् । ८२ ।
पन्द्रहवें प्रकाश में वैधृति तथा व्यतीपात इन महापातों की कथा है । इस
प्रकार ९ प्रकाशों में त्रिप्रश्नाधिकार समाप्त हुआ है । यहां ग्रन्थ का पूर्वार्द्ध समाप्त
हुआ ।
अथोदिताः षोड़ शकेऽनुयोगाः स्थिराचला का क्षितिरित्यनेकैः
मतैः स्वसन्देह मुदस्तुकम्य कार्याण्यवैतुं सह वासिनाभिः । ८३ ।
सोलहवें प्रकाश में बहुत मतों का उल्लेख कर पृथ्वी की गति शीलता, सृष्टि
रचना आदि के सम्बन्ध में अनेक प्रश्न किये गये हैं ।
प्रत्युक्तयः सप्तदशे निरुक्ता बौद्धादि नानामत खण्डनोत्थाः
भ्रान्तिर्विभोः स ग्रह भास्वतश्च खान्तर्भुवः स्थानमवादि युक्त्या । ८४ ।
सत्रहवें प्रकाश में उक्त प्रश्नों के उत्तर, बौद्ध मत आदि का खण्डन, चन्द्र
और अन्य ग्रहों के साथ सूर्य का भ्रमण तथा आकाश शून्य में पृथ्वी की स्थिति
के बारे में कहा गया है ।
अष्टादशे सृष्टि रथस्वरूपाण्यकादिकानां गिरितुंगतोक्तिः
संस्थान मानानि भुवः सहाब्धेः सयुक्तिकक्षेत्र फल व्रजोक्तिः । ८५ ।
अठारहवें प्रकाश में सृष्टि चर्चा सूर्य आदि ग्रहों का स्वरूप, पर्वत आदि की
उच्चता, समुद्र सहित पृथ्वी का परिणाम और स्थिति, युक्ति के साथ वृत्त क्षेत्र
तथा पृथ्वी पृष्ठ आदि का फल निकालने का वर्णन हुआ है ।

४४२ \qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad सिद्धान्त दर्पण
एकोन विंशे ग्रह भास्वकक्षा युक्तिः प्रमाणं श्रुति मण्डलानाम्
वर्षेश मासेशदिनेश होराधिपक्रमो दृष्टि कर प्रसाराः । ८६ ।
उन्नीसवें प्रकाश में ग्रह नक्षत्र और आकाश कक्षा का प्रमाण और उसकी
युक्ति, ग्रह नक्षत्रों का कर्ण परिमाण, वर्ष, मास, दिन और होरा के अधिपतियों
का क्रम, शंकु की दृष्टि सीमा और सूर्य किरण की प्रसार सीमा कही गयी है ।
विंशे द्विधा गोलक यन्त्र कॢप्ति गोलार्द्ध चक्र प्रभृति प्रभेदैः
कालस्य राश्यादि मितेश्च सिद्धिः स्वयं वहत्यौ पयिक प्रकारः । ८७ ।
बीसवें प्रकाश में दो प्रकार के गोल यन्त्रों की कल्पना, गोलार्द्ध, चक्र आदि
यन्त्रों द्वारा समय और ग्रह राशि आदि निकालना तथा स्वयं वह यन्त्र बनाने की
विधि कही गयी है ।
गोलेऽनुमुक्तिर्गदितेक विंशे देवादिमानस्यतनोः स्फुटादेः ।
विकल्प चक्राण्युततोऽक्षि सिद्धाः स्ववासना घर्धन मूलकर्म । ८८ ।
इक्कीसवें प्रकाश में युक्ति के साथ गोल में देव और दानवों की अहोरात्रिका
मान, मेष आदि लग्नों की स्फुटता और उसकी अनुभूति, विकल्प ग्रह भगण,
प्रत्यक्ष होते वसन्त आदि ऋतु और घन मूल निकालने की विधि कही गयी है ।
षड् भिः प्रकाशै रिति संगृहीतो गोलाधिकार स्त्रिभिरुच्यतेऽथ
कालः संहार्थः किल वत्सराद्या द्वाविंश के मानभिदार्क चाराः । ८९ ।
इस प्रकार ६ प्रकाशों में गोलाधिकार समाप्त हुआ । अब अन्तिम तीन प्रकाशों
के बारे में कहा जाता है । बाइस वें प्रकाश में अर्थ के साथ संवत्सर, मास,
तिथि, सौर सावन और चान्द्र, नाक्षत्र वर्ष आदि का परिमाण भेद तथा सौर
संक्रान्ति आदि के बारे में कहा गया है ।
प्रोक्ता त्रयोविंशतमेस्तवालिः कालात्मनः कालनगेन्द्र भर्तुः
सवेश्मनः सावरणस्य पारावारादि साम्येन च दोष हत्यैः । ९० ।
२३ वें प्रकाश में पाप नष्ट करने के लिए काल रूपी नीलाद्रि नाथ मन्दिर
सहित आवरण (आकाश) और समुद्र आदि सहित उनकी समानता दिखा कर
स्तोत्र वर्णन किया गया है । इसमें पुरी श्री जगन्नाथ मन्दिर का विशेष वर्णन है ।
अन्त्ये चतुर्विंश इह स्फुटीभूदनुक्रमः कौतुक पञ्जिकादिः
कालाधिकारोऽयमगात् परार्द्धं गोलादिशब्दं गणितं यदाहुः । ९१ ।
अन्तिम २४ वें प्रकाश में कौतुक पञ्चिका और ग्रन्थ के विषयों का संक्षेप
में वर्णन है । इस प्रकार तीन प्रकाशों में कालाधिकार समाप्त हुआ । इस प्रकार
गोल अर्थात् गोलार्द्ध समाप्त हुआ । गणित और गोल इन दो प्रधान खण्डों का
यह ग्रन्थ समाप्त हुआ ।

उपसंहार वर्णन् ४४३
केचित्पठिष्यन्त्युप संहृतिं तदुद्देशतो भूरिपदार्थ जातम्
मयोदितं राजकुमार कादेर्वेदांगपाठोत्थ फलाय सौख्यात् । ९२ ।
कोई कोई पूरा ग्रन्थ न पढ़कर केवल उपसंहार ही पढ़ते हैं । सुकुमार मति
राजकुमार आदि धनाढ्य लोग सहज से ही वेद की आंख रुपी ज्योतिष तथा
उसका फल जान पायें इसके लिये उपसंहार में सभी विषय संक्षेप में कहा गया
है ।
दिग् देश कालावगतिः प्रकाशात् स्यात् सप्तमादेव तथापि धीरा
न लोक सिद्ध स्थल बोध हीना ग्रहादि संदर्शयितुं यदीशाः । ९३ ।
सप्तम प्रकाश में दिग्, स्थान और काल आदि के विषयों में विस्तार से कहा
गया है । तथापि संसार में प्रसिद्ध सभी स्थानों को पण्डित लोग भी नहीं जान
पाते हैं । अतः कहां पर कब ग्रहण आदि होगा यह बताने में वे असमर्थ हो जाते
हैं ।
प्रधान नगरेश्वतो धरणि मध्य रेखा पुरः
परान्त रवि नाड़िकाः पल कलाश्च वच्मि क्रमात्
यतो

४४४ सिद्धान्त दर्पण
तथा (५) जलालाबाद का उत्तर अक्षकला क्रमशः (१-१२९४), (२-१३७१),
(३-१४२८), (४-१६४३), तथा (५-२०६७) है ।
आकेन्द्रमेतत् समसूत्र निष्ठ भूमौ न देशान्तर संस्कृति स्यात्
प्राग् भूविभागे खलु गुर्जराष्ट्रे (६) देशान्तरं बाण मिता विनाड्यः । ९७ ।
ये ५ स्थान पृथ्वी के केन्द्र से एक ही उत्तर दक्षिण वृत्त या देशान्तर रेखा पर
स्थित है । अतः इन स्थानों का देशान्तर संस्कार नहीं किया जाता है । यहां पर
उज्जैन के बदले जूनागढ आदि से गुजरती देशान्तर रेखा से दूरी कही गयी है) ।
इस रेखा के पूर्व भाग में गुजरात (६) का देशान्तर ५ कला है ।
तत्राक्षलिप्ता शरदन्त चन्द्राः (१३२५)
ऊनापुरे (७) ऽश्वाः (७) शरबाण सूर्याः (१२५५)
श्रीनर्मदा तोयधि संगमे (८) ऽक्षि
पक्षाः (२२) खशून्यज्वलनौषधीशाः (१३००) । ९८ ।
(६) गुजरात की अक्षकला उत्तर (१३२५) है । (७) उनापुर का देशान्तर (७)
पूर्व तथा अक्षकला (१२५५) उत्तर है । (८) नर्मदा सागर संगम का देशान्तर (२२
कला पूर्व) तथा अक्षकला (१३०० उत्तर ) है ।
बोम्बायिपुर्यां (९) त्रिभुजा (२३) नगाग्नी
शा (११३७) श्रोदया रूयानपुरे (१०) खरामाः (३०)
खाद्रयब्धि चन्द्रा (१४७०) अथ षट्क् रामा (३६)
लाहोर के (११) पूर्ण खनन्द चन्द्राः (१९००) । ९९ ।
(९) बम्बई का (२३ कलापूर्व) तथा ११३७ कला उत्तर है । (१०) उदयपुर
का ३० कलापूर्व तथा १४७० कला उत्तर है (११) लाहौर का (३६ कला पूर्व) तथा
१९०० कला उत्तर है ।
काश्मीरज श्रीनगर (१२) त्रिवेदा (४३)
रामाशुगव्योम विलोचनानि (२०५३)
जम्बां (१३) त्रिवेदो (४३) द्विशरांकचन्द्रा (१९५२)
वस्वब्धयः (४८) खाक्षिनृपा (१६२०) जयादौ । १०० ।
(१२) कश्मीर के श्रीनगर का ४३ कला पूर्व तथा २०५३ कला उत्तर है ।
(१३) जम्मू का ४३ कला पूर्व तथा १९५२ कला उत्तर है । (१४) जयपुर का ४८
कला पूर्व तथा १६२० कला उत्तर है ।
पुर्यु (१४) ज्ञयिन्यां (१५) खशरा (५०) खनन्द
विश्वे (१३९०) ऽथ विन्ध्याचल मध्य देशे (१६)
द्युर्थाः (५२) खबाणाग्नि भुवः (१३५०) कुरुणां
क्षेत्रे (१७) रसार्था (५६) खनवाद्रि चन्द्राः (१७९०) । १०१ ।

उपसंहार वर्णन् ४४५
(१५) उज्जियिनी का ५० कलापूर्व तथा १३९० कला उत्तर है । (१६ ) मध्यदेश
में विन्ध्याचल का ५२ कला पूर्व तथा १३५० कला उत्तर है । (१७) कुरुक्षेत्र का
५६ कला पूर्व तथा १७९० कला उत्तर है ।
श्रीरंग के (१८) द्व्यंगमिता (६२) द्विवेदा
द्वयो (७४२)ऽर्थषट्का (६५) नगरामशैलाः (७३७)
कर्णाटके (१९) ऽथो गजसाह्वये (२०) ऽङ्ग
षट्का (६६) नगक्ष्माद्रि भुवः (१७१७) प्रदिष्टाः । १०२ ।
(१८) श्रीरंग (पट्टन) का ६२ कला पूर्व तथा ७४२ कला उत्तर है । (१९)
कर्नाटक का ६५ कलापूर्व तथा ७३७ कला उत्तर है । (२०) गाजियाबाद का ६६
कला पूर्व तथा १७१७ कला उत्तर है । ( दिल्ली के पास उत्तर प्रदेश में)
कुमारिका नामनि चान्तरीपे (२१)
गजर्तवो (६८) नाग भुजाब्धि (४२८) संख्याः
भूपालके (२२) नन्दशराः (६९) खखेन्द्राः (१४००)
ब्रजे (२३) खशैलाः (७०) खरसांग चन्द्राः (१६६०) । १०३ ।
(२१) कन्याकुमारी अन्तरीप का ६८ कला पूर्व तथा ४२८ कला उत्तर है ।
(२२) भोपाल का ६९ कला पूर्व तथा १४०० कला उत्तर है । (२३) ब्रज का ७०
कला पूर्व तथा १६६० कला उत्तर है ।
आग्रापुरे (२४) वेदनगः (७४) कुराम
भूपाश्च (१६३१) काञ्च्या (२५) त्रिगजाः (८३) खषट् षट् (६६०)
श्री वेंकटे (२६) खाष्ट (८०) नभोऽष्टशैला (७८०)
रामेश्वरे (२७)ऽगोष्ट (८७) रसार्थ बाणाः (५५६) । १०४ ।
(२४) आगरा का ७४ कला पूर्व तथा १६३१ कला उत्तर है । (२५) काञ्ची
पुरी का ८३ कला पूर्व तथा ६६० कला उत्तर है । (२६) श्रीवेंकट (तिरुपति) का
८० कला पूर्व तथा ७८० कला उत्तर है । (२७) रामेश्वरम् का ८७ कला पूर्व
तथा ५५६ कला उत्तर है ।
तद्द्वाविड़े (२८)ऽद्व्यष्ट (८७) खषट्क षट्काः (६६०)
बुन्देल के (२९)ऽगोष्ठ (८७) खखार्थ चन्द्राः (१५००)
श्रीनर्मदा सौम्यतटे जबल्लपुरे (३०) तथा भारतवर्ष मध्ये । १०५ ।
(२८) द्राविड़ मध्य का ८७ कला पूर्व तथा ६६० कला उत्तर है । (२९)
बुन्देलखण्ड का ८७ कला पूर्व तथा १५०० कला उत्तर है । (३०) भारत वर्ष के
मध्य में तथा श्रीनर्मदा के उत्तरी तट पर स्थित जबलपुर का
त्र्यंका (९३) शरांगाग्नि भुवो (१३९५)ऽथ चेन्न
(३१) पुर्यां नगांकाः (९७) कृतनागशैलाः (७८४)

४४६ सिद्धान्त दर्पण
कृष्णाब्धि संगे (३२) द्विदिशः (१०२) खबाण
॰नन्दा (९५०) अथो राय पुरे नवाशाः (१०९) । १०६ ।
(३०) जबलपुर का ९३ कला पूर्व तथा १३९५ कला उत्तर है । (३१) चेन्नपुर
या चन्द्र पुर का ९७ कला पूर्व और ७८४ कला उत्तर है । (३२) कृष्णा सागर
संगम का १०२ कला पूर्व तथा ९५० कला उत्तर है । (३३) रायपुर का १०९ कला
पूर्व तथा
गोऽगारुणा (१२६९) राजमहेन्द्र पूर्या (३४)
रुद्रेन्दवो (१११) द्विद्विदिशः (१०२२) प्रयागे (३५)
चन्द्रेश्वराः (१११) खाक्षिशरेन्दव (१५२०) श्चा
योध्यापुरे (३६) रत्नपुरे (३७) ऽर्थ रुद्राः (११५) । १०७ ।
१२६९ कला उत्तर है । (३४) राजमहेन्द्री का १११ कला पूर्व तथा १०२२ कला
उत्तर है । (३५) प्रयाग १११ कला पूर्व तथा १५२० कला उत्तर है । (३६) अयोध्या
का ११५ कलापूर्व तथा (३७) रत्नपुर का भी ११५ कला पूर्व -
शराग्नभूपा (१६०५) क्षकलाः षडंग
विश्वे (१३६६) ऽथ गोदावरी सिन्धुसंगे (३८)
घनेन्दवो (११७) ऽङ्गाभ्र दिशो (१००६) ऽथ काश्यां (३९ )
सिद्धेन्दवो (१२४) ऽद्रीन्दुशरेन्दु (१५१७) संख्याः । १०८ ।
(३६) अयोध्या का अक्षकला १६०५ उत्तर तथा (३७) रत्नपुर का १३६६ कला
उत्तर है । (३८) गोदावरी सागर संगम का ११७ कला पूर्व तथा १००६ कला उत्तर
है । (३९) काशी का १२४ कला पूर्व तथा १५१७ कला उत्तर है ।
अथोदिता रायगढे (४०) ऽद्रिसूर्या (१२७)
नागाग्निविश्वे (१३०८) ऽथविशाख पुर्याम् । (४१)
नागारुणा (१२७) द्व्यंगदिशः (१०६२) समल्ल-
पुरे (४२) खविश्वे (१३०) त्रिगजाक्षि चन्द्राः (१२८३) । १०९ ।
(४०) रायगढ़ का १२७ कला पूर्व तथा १३०८ कला उत्तर है । (४१ )
विशाखापत्तन का १२७ कला पूर्व तथा १०६२ कला उत्तर है । ( ४२) सम्वलपुर
का १३० कला पूर्व तथा १२८३ कला उत्तर है ।
श्रीकाकुले (४३) रामगुणौ षधीशाः (१३३)
समुद्रनन्दाम्बर शीतभासः (१०९४)
नेपालमध्ये (४४) कृतरामरूपा (१३४)
स्यष्टाष्टभूपा (१६८८) श्व महेन्द्रशैले (४५) । ११० ।
(४३) श्रीकाकुलम का १३३ कला पूर्व तथा १०९४ कला उत्तर (४४) नेपाल
मध्य का १३४ कलापूर्व तथा १६८८ कला उत्तर है । (४५) महेन्द्र गिरिका