सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
पुरुषोत्तम स्तव वर्णन ४१९
का अन्धकार दूर हो जाता है । करोड़ो ब्रह्माण्ड उन्हीं के गुणों के प्रकाश है ।
उनकी पूजा उन्हीं के अवतार भी करते हैं । उनका शरीर नील कमल जैसा सुन्दर
है तथा लक्ष्मी के आनन्द का मूल हैं ।
अथ दशावतार स्तुति मीनावतार
मीनोऽलीनो नदीनोदर उषित ऋषि व्रात गोत्रातरीस्थं
त्रातुं सत्यव्रतं वातरदिह सुमहाहार्य सन्दोह देहः ।
वेदोद्धाराय योद्धा व्यधित वधमदश्चौर वृत्रालिशत्रो-
स्त्राणं तापत्रयान्न स्त्रिपुर हर पुरस्कार पात्रं तनोतु । ३१ ।
मीन अवतार धारी भगवान तीन तापों (दैहिक, दैविक और भौतिक) से हमारी
रक्षा करें । विशाल आकार के कारण वे मीन रूप में समुद्र में भी नहीं छिप
सके । उन्होंने नौका रूप पृथ्वी में स्थित ऋषियों तथा दुःखी सत्यव्रत के उद्धार
के लिये अवतार लिया था । उन्होंने वेदों के उद्धार के लिये शंखासुर का वध
किया जो वृत्रशत्रु इन्द्र का शत्रु और चोर था । उनकी त्रिपुरारि भी पूजा करते हैं ।
कूर्मावतार
कूर्म्मेऽशर्म्मोपनिर्मोचयतु रयभर भ्रान्त मन्थस्थिराष्टृ-
द् भूरिग्रावाग्र संघटन घटित महापृष्ठ कण्डूति सौख्यः
पच्छंकोचच्छलनो च्छलित चल हृदां मिलनं स्वाश्रितेभ्यो-
ऽनर्थभ्यः प्रोत्थितास्येन च पवन समुत्थान मर्थापयन्नः । ३२ ।
कूर्म रूपी श्री जगन्नाथ हमारा अमंगल दूर करें । समुद्र मन्थन के लिये उनकी
विशाल पीठ पर मन्दराचल पर्वत के तेज घूमने से उनकी पीठ की खुजली दूर
होने का सुख हुआ । पैर संकोच करने से जिस प्रकार मन्दराचल को आश्रय मिला
था (उनकी पीठ पर) उसी प्रकार भ्रमित बुद्धि वाले लोगों की बुद्धि भी स्थिर
होती है । मुहं खोलकर हवा निकालने से समुद्र मन्थन में देवो और असुरों को
शक्ति मिली, इसी प्रकार लोगों को उस रूप से काम करने की शक्ति मिले ।
वाराहावतार
कोलं-कोलं कुगोलं दधदधि जलधी वाध उद्धृत्यदन्त
प्रान्तेऽशान्ते दुरन्ते प्रथम दितिसुते वृद्धदुर्द्धर्ष युद्धैः ।
देयादाया सहीनोद्रुहिण हरिहया द्यादितेयार्हणीयः
श्रेयो दाम्नाय गेय क्रतुनिचयमया मेघकायः श्रियः नः । ३३ ।
वाराह ने प्रबल और दुर्भेद्य दिति के प्रथम पुत्र हिरण्याक्ष जैसे दुर्वृत्त को मार
कर बिना कंठिनाई के ही समुद्र में नाव के समान अपने दांतों पर पृथ्वी को नीचे
से उठा लिया था । उस समय ब्रह्मा इन्द्र आदि ने उनकी पूजा की थी । वेद
उनकी स्तुति करते हैं । वह यज्ञ मय और अनन्त हैं । वराह रूपी भगवान हमारा
४२० सिद्धान्त दर्पण
मंगल करे ।
नृसिंहावतार
अघं संघं नृसिंहो भवतु भवहरोऽह्यसंहर्तु महें
गर्हन्निर्हादवृन्दैः प्रलय जलधर ध्यान धारा समृद्धिम्
अक्षान्त स्वीय भक्ताक्षति रमरपराध्यक्ष वक्षः क पाट
क्षोप प्रक्ष्य॑माणक्षतय भृतनखो लक्ष्यलक्ष्मीकवक्षाः । ३४ ।
संसार के (जन्म मृत्यु के) नाशक नृसिंह भगवान शीघ्र पाप समूहों का नाश
करें । उनके वक्षस्थल पर लक्ष्मी है । अपने भक्तों की क्षति या कष्ट वे नहीं सह
पाते हैं । दैत्यराज हिरण्यकशिपु के कपाट रूपी वक्ष को चीरने से निकलाहुआ
रक्त उनके नखों में लग गया था । उस समय उनकी घोर गर्जना प्रलय कालीन
मेघ से भी अधिक भयंकर थी ।
वामनावतार
खर्विकुर्वित दविं कर भुवनक गीर्वाणवर्गालियार्वी
गर्वानिर्वाक् सुपर्वार्य वनिधवमहा सम्पदं लुम्पमानः
व्यापद् व्यापञ्जयं पत्रितय रयभरा दर्धना व्याजखर्वः
सर्वं शंकादि सेव्यः स्रवद मर धुनी नीर पन्नीरजोयः । ३५ ।
वामन् भगवान हमारे विपद समूह को नष्ट करें । उनकी शिव आदि देवता
सेवा करते हैं । उनके चरण कमलों में गंगा निकली है । मांग कर छल करने के
लिए उन्होंने वामन रूप लिया था । दैत्यराज (बलि) की सम्पूर्ण सम्पत्ति (दान
में) लेकर उन्होंने अपने तीन पगों से पाताल, देवालय (स्वर्ग) और पृथ्वी-सबका
गर्व चूर्ण कर दिया था ।
परशुरामावतार
षष्ठः क्ष्माप्रेष्ठ गोष्ठी कुठ गण लुठना कुण्ठतेजः कुठारः
श्रीवैकुण्ठावतारः कठिन रणधुरादृष्ट षष्ठीश पृष्टः
तिष्ठन् कण्ठिर वाभीऽर्जुन सुभटघटा घोर मातंग यूथे
श्रेष्ठः कष्टानि निष्ठे वयतु भृगु धुवां नील कण्ठांघ्रि निष्ठः । ३६ ।
भृगुवंश के श्रेष्ठ, भगवान के षष्ठ अवतार और विष्णु के अंशरूप परशुराम
स्वयं वैकुण्ठावतार के रूप में हमारा कष्ट दूर करें । वह नील कण्ठ महादेव के
भक्त और कार्त वीर्य अर्जुन के योद्धा रूपी हाथियों के लिये सिंह के समान
पराक्रमी थे । उन्होंने निष्ठुरता से कार्तवीर्य अर्जुन को मार डाला तथा पृथ्वी के
राजाओं को वृक्षों की तरह काट गिराने में कुठार कुण्ठित नहीं हुआ ।
पुरुषोत्तम स्तव वर्णन ४२१
रामावतार
रामः श्यामाब्जधामा शमयुत सममाशर्म घर्मांश वंशो
तंसः संसार हिंसा वह महिम महाम्भोधि रम्भोज नेत्रः
शोण्डश्रुण्डीश काण्डा सनवल दलने दण्डकारण्य चारी
हारी वारीश तारी सरपर विसर प्राणहारी बुधारी । ३७ ।
भगवान राम नील कमल के समान और सूर्य वंश के भूषण हैं । वह हमारा
अमंगल दूर करें । उनकी आंखें कमल के समान सुन्दर हैं । संसार के हिंसकों
के नाश के लिये (डुबाने के लिये) महासागर के समान हैं । उन्होंने शिव धनुष
को भी सहज में मोड़ कर तोड़ दिया था । दण्डकारण्य में विचरण करने वाले
हैं तथा महासागर को पाकर उन्होंने अजेय रावण का प्राण हर लिया था । वे
सदा बाणों के साथ रहते हैं ।
बलरामावतार
उर्जेन्दु ज्योतिरुर्जस्वल विमलहराहार्यरुग् जैत्र गात्रः
सद्यः प्रोद्यहिनेश भ्रमदमदभराघूर्णिना स्तीर्ण नेत्रः
प्रत्यग्राम्भोदवन्द प्रतिभट पटभृद् भूरि भास्वद् विभूषो
भूयाद् भूगोल भारो भव भयभिद् भानु भूमेदनो नः । ३८ ।
भगवान् बलराम हमारा संसार भय दूर करें । वह कार्तिक पूर्णिमा के चन्द्र
के समान प्रकाशमान है, अथवा रोहिणी (माता) के चन्द्र (पुत्र) रूप में विख्यात
हैं । उनके शरीर की धवल कान्ति कैलाश पर्वत से भी अधिक है । उनकी आंखें
मदमस्त तथा चञ्चल है, लाल और विशाल होने के कारण उदय कालीन सूर्य
के समान दीखती हैं । नीले मेघ समूह के समान नीले रंग का वस्त्र पहनते हैं
तथा बहुत से आभूषणों से सजित हैं । शेष के रूप में वह पूरे संसार का भार
बिना कष्ट के ही सहते हैं ।
बुद्धावतार
अध्यात्मध्यान बुद्धादर विधुत धृतिध्वस्त शुद्धाध्वराध्व
श्रद्धाः क्रोधादिरोधा विधि विहित वधा साधुता सिद्ध बोधः
दध्याद् बुद्धा भिधानो मगध धरणी हल्लब्ध जन्माभिदेवो
बाधाब्ध्योद्धार धूर्या धियमघन धनं धर्मधारां धरन्तः । ३९ ।
भगवान बुद्ध के रूप में हमारी बुद्धि को बढ़ायें । मगध देश के (लुम्बिनी
के राजवंश) में जन्म होने पर भी वे दरिद्रों के धन थे । विपद् समुद्र से उद्धार
के लिये उन्होंने उपयुक्त धर्म मार्ग बनाया । सदा आत्मा में लीन रहकर कभी धैर्य
नहीं छोड़ा । उन्होंने वैदिक यज्ञ कर्मों में पशुओं की हत्या की स्पष्ट रूप से निन्दा
की । यज्ञ में पशुओं की हत्या की तुलना में अपने ही भीतर काम क्रोध आदि
४२२ सिद्धान्त दर्पण
शत्रुओं का दमन श्रेष्ठ है यह प्रतिपादित किया ।
कल्कि अवतार
निर्धूली धूमाधारा धरनि कर नभो मध्य विद्योतमानं
द्योत् प्राग् भार भास्वद् भ्रमकर कर युङ् मण्डलाग्रं प्रचण्डः
स्वाधाराधीर घोरोद्धर तुरंग सुरक्षोदित क्षोणिरेणु
च्छन्नच्छायेन ईशोदिशतु दशको म्लेच्छविच्छेदकृच्छम् । ४० ।
भगवान् अपने कल्कि अवतार द्वारा हमारा मंगल करें । धूलि, धूम और मेघ
से शून्य स्वच्छ आकाश में दशम अवतार कल्कि का प्रकाश होगा । उनके शरीर
के ऊपरी भाग से तेज निकलेगा (मुख और आंखो से अग्नि) । तथा हाथों में
तीक्ष्ण खड्ग (करवाल) सूर्य की भ्रांति भ्रमण करेगा । उनके भंयकर रूप तथा
भयानक अश्व की गति से पृथ्व खाली हो जायेगी और म्लेच्छों का संहार होगा ।
उससे उत्पन्न धूलि से स्वयं सूर्य ढंक जायेगा ।
जगन्नाथ स्तुति
मत्स्याद्या कल्कि रूपं दशविधतनू भाक् सिद्ध (२४) संख्यात्ममूर्तिद्
), then स्कृतिः? Wait, let's look at स्कृतिः: Could it be हृतिः? Look at हृतिः: हwithऋmatra isहृ! तिःisतिः! Then what is before हृतिः? क्लेशौघहृतिः? क्लेशाम्हृतिः? क्लेशापहृतिः? क्लेशसंघहृतिः? Wait, look at the letter before हृतिः: It is लं? Wait, what if it is: क्लेशलंकृतिः? Let's spell: क् ले श लं कृ तिःCount syllables ofक्लेशलंकृतिः: क्लेश (2) + लं (1) + कृतिः (2) = 5 syllables! Now count with 5 syllables: 13: लु (U) 14: ष (_) 15: क्ले (_) 16: श (U) 17: लं (_) 18: कृ (U? But 18 needs to be _!) Wait, if it's अलंकृतिः: In Sanskrit, अलंकृतिःmeans decoration/ornament. Does Krishna decorate his hair with peacock feathers? "केकिपिच्छकृत..." ->केकिपिच्छावतंस...`
ात्मा"? स, न्धि, त्ता, त्मा.
L34:
"संवित्सवातधामा निगम गण शिर स्तुत्यसत्य प्रभावः"
Wait, look at "संवित्सवातधामा":
सं-वि-त्स-वा-त-धा-मा
Wait, is it "संवित्सवातधामा" or "संवित्सारधामा"? Look at 'वा': it is definitely 'वा'!
"निगम गण शिर स्तुत्यसत्य प्रभावः"
Wait, between "निगम" and "गण" is there a space? Yes.
Between "गण" and "शिर"? Yes.
"स्तुत्यसत्य प्रभावः" - wait, is it "स्तुत्यसत्य" or "स्तुत्य सत्य"? Connected: "स्तुत्यसत्य".
Then space, "प्रभावः".
Let's double-check all lines carefully to ensure precision:
L1: ४२४ सिद्धान्त दर्पण
L2: तीनों लोकों को समाप्त कर देते हैं । कवियों ने जिनकी अनेक कीर्तियों का वर्णन
Wait, is L2 "समाप्त" or "समास"?
Let's zoom into L2:
"तीनों लोकों को समास कर देते हैं ।"
Look at the word: स (sa), म (ma), ा (aa), स (sa)!
There is NO 'प्त'! It is clearly "समास"!
Wait, "समास कर देते हैं" in Hindi means "cond
शेषा शेषांग सद्य सुरा तरुतल भात्कल्पित प्रेमरूपः
श्रीकृष्णः प्रेम भक्तिं वितरतु हृदि नः सच्चिदानन्द रूपः । ५० ।
श्री कृष्ण ह्लादिनी शक्ति श्री राधिका के सुख की सीमा हैं । उनकी शोभा
लाखों कामदेवों के समान है । वह योग शक्ति युक्त और योगेश्वर है । वेदों के
प्रधान अंग उपनिषद् उनकी स्तुति करते हैं । उनका सत्य प्रभाव (वास्तविक वही
है, बाकी अस्थायी ) है । अनन्त का पूरा अंग उनका निवास है । वह कल्प वृक्ष
के नीचे विश्राम करते हैं तथा प्रेम मूर्ति है । वही श्री जगन्नाथ सच्चिदानन्द हमारे
हृदय में प्रेम और भक्ति का वितरण करें ।
राधा साधारण श्रीकमन सुमनसं केकिपिच्छावतंसं
चन्द्रावल्यादिरागाच्छिदूर सुरनदी संग्राहागाध सिन्धुम् ।
वंशी संशीलितारुण्यं मणिमया कल्पना कल्पयन्तं
विद्युद् विद्योत् वस्त्रं नव जलद रुचिं श्री जगन्नाथ मीडे । ५१ ।
श्री कृष्ण राधा को लक्ष्मी के समान देखते थे और उनके लिए कामदेव के
समान थे । मोर पंख उनका अलंकार है । चन्द्रावली आदि गोप कन्याओं के गंगा
के प्रवाह के समान सतत प्रेमधारा के लिये वे अथाह सागर थे । वह सदा
वंशीवादन में रत थे । सोने के समान पीताम्बर और रत्न धारण किये रहते थे ।
वर्षा वाले मेघ के समान उनके श्याम शरीर पर पीताम्बर की शोभा बिजली के
समान है । उसी कृष्ण रूप जगन्नाथ की मैं पूजा करता हूँ ।
यस्य श्री विग्रहोद्यद् द्युति रिति परम ब्रह्म वेदान्त वेद्य
कोटी ब्रह्माण्ड भारी परमशिव भवः श्रीमहाविष्णुरंशः
यस्य भ्रूक्षेप मात्रात्सृजति हरिहर ब्रह्मशक्रादिदेवान्
माया पायाद पायादय मुदित दयः पुण्डरीकेश्वरोऽस्मान् । ५२ ।
जिसके सुन्दर शरीर का प्रज्वलित तेज है, वेदान्त (उपनिषद) द्वारा जिसके
परम ब्रह्म होने का ज्ञान होता है, जो करोड़ो ब्रह्माण्डों का भार उठाते हैं, जिनसे
परमशिव (या मंगल) उत्पन्न होते हैं, जो स्वंय महाविष्णु हैं, जिनके भौंह हिलाने
से ही माया या प्रकृति हरि, हर, ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवताओं की रचना होती है,
वही दयालु हृदय कमल के ईश्वर मरण से हमारी रक्षा करें ।
कृष्ण कृष्णाम्बुधिष्ण्याम्बुज चरण रण क्षीण गीर्वाणशत्रो
कृष्णाकृष्णादि तृष्णा हरण रणरण श्री तिरस्कार कारिन्
उष्णानुष्णांशु विस्मापन नयन युगाकार तारुण्य भारि
नस्मान् भीष्मादि कोष्मापह विहित महापातकान् पाहिपातात् । ५३ ।
हे कृष्ण ! तुमने क्षीर सागर को अपना घर बनाया है । तुम्हारे दोनों पैर कमल
के समान हैं । तुमने युद्ध में देवताओं के शत्रुओं को नष्ट कर दिया है । द्रौपदी
तथा अर्जुन का कष्ट तुम्हीं ने दूर किया था । तुम कामदेव की शोभा को भी
४२६ सिद्धान्त दर्पण
लज्जितु करते हो । तुम्हारी दो आंखें सूर्य और चन्द्र के समान चमकती हैं । तुम
सदा युवक रूप में हो । तुमने भीष्म और द्रोण आदि का गर्व (उष्मा) तोड़ा था ।
हम पापियों की पतन से रक्षा करो ।
श्री राधाकान्त कान्तानन नलिन हरे रामकृष्णावतारिन्
गोविन्दानन्द कन्दाद् भुत गुण वितते श्रीपते नीप मालिन्
कंसारेऽसार संसार सार हर हरनुता पारकारुण्य सिद्धो
दुःखान्धोरुद्धतिं मे तनु दनुज रिपोऽनुग्रहप्रग्रहेण । ५४ ।
हे राधाकान्त, तुम्हारा मुख कमल के समान सुन्दर है । हे हरि, हे गोविन्द,
तुमने राम और कृष्ण अवतार ग्रहण किया था । तुम आनन्द के आश्रय हो । तुममें
अद् भुत गुण हैं । तुम लक्ष्मी के स्वामी हो । तुम्हारे वक्षस्थल पर कदम्ब फूलों
की माला शोभित है । तुम कंस के शत्रु हो । इस असार संसार को ध्वंस करो ।
तुम असीम दया के सागर हो । तुम को शिव भी पूजते हैं । तुमने ही दैत्यों का
नाश किया था । तुम अपनी कृपा रूपी रस्सी से मुझे दुःख रूपी कुँएं से निकालो ।
पार्थानर्थ प्रमाथ प्रथित पृथुयशो मन्मथ प्रार्थ्यकान्ते
श्रीमन्नित्य स्थल स्थागम पथ पथिक प्रार्थतार्थामरेन्द्रो
शक्र प्रत्यर्थिपाथः पति मथन महामन्थ पृथ्वीधरान्तः
स्थानं नाथामि तीर्थाधिपतट वटयोः श्रीजगन्नाथ दुःस्थः । ५५ ।
हे जगन्नाथ, तुमने पाण्डवों का सभी कष्ट दूर किया । कामदेव रूप के लिए
तुम्हारी प्रार्थना करता है । सदा लक्ष्मी के साथ अपने नित्य स्थल पर विराजमान
हो । धर्म मार्ग में स्थित लोगों की कामना सूर्य करने के लिए तुम कल्पवृक्ष के
समान हो । देव और असुरों द्वारा समुद्र मन्थन करने के समय आपने मथानी को
कूर्म रूप से स्थिर किया था । मुझ दरिद्र को पुरी के कल्पवट की छाया में और
समुद्र तीर पर स्थान दो ।
दासी पाद रजां सिनिर्जर शिरोधार्याणि सूर्यात्मक
स्फूर्जदूर्ज सुदूत दर्पदमनी यत्रस्थितिः पापिनाम्
तत्रस्ता दसमोध्ूर्व वैभववति क्षेत्रोत्तमे जातुमे
नैव श्रीपुरुषोत्तमे शिवतमे स्थातुं विरोगादयः । ५६ ।
जिस श्रीक्षेत्र के सेव कीं चरणधूलि को देव अपने सिर से लगाते हैं, जहां
रहने से पापी भी यमदूतों के गर्व को खण्डित करते हैं उसी मंगलमय वैभवशाली
पुरुषोत्तम क्षेत्र में रहने पर मेरा मन सदा प्रसन्न रहे ।
इत्युत्कलोज्ज्वल नृपाल कुल प्रसूतः श्रीचन्द्रशेखर कृतौ गणिते ऽक्षिसिद्धे
सिद्धान्तदर्पण उपाहित बाल बोधे कृष्णस्तुतिस्त्रधिक विंशितः प्रकाशः
इस प्रकार उड़ीसा के प्रसिद्ध राजकुल में उत्पन्न श्रीचन्द्रशेखर द्वारा गणना
और दृष्टि में समानता तथा छात्रों की शिक्षा के लिये लिखे सिद्धान्त दर्पण में
कृष्ण स्तुति सम्बन्धी २३ वां प्रकाश समाप्त हुआ ।
चतुर्विंशः प्रकाशः
उपसंहार वर्णन्
कौतुक पञ्जिका विधानम्
उपक्रमः स्वेष्टतमस्य विष्णोः स्तवादिनादौ रचितश्रुतस्य
तत्पादनत्योपनतस्य पूर्ति मथोप संहार ममुष्य कुर्वे । १ ।
मैंने अपने इष्टतम देव श्री जगन्नाथ (विष्णु) का स्तवन कर इस ग्रन्थ का
आरम्भ किया था । अन्त में पुनःउनको प्रणाम कर इस ग्रन्थ का उपसंहार कर
रहा हूँ ।
तस्यादितः कौतुक पञ्जिकाख्यं वक्षामि किञ्चिद् गणितं मयायद् ।
कैशोर भाजां रचि पञ्जिकालिं दृष्ट्वैव पित्रा लिखितां प्रयत्नात् । २ ।
ग्रन्थ समाप्त करने से पहले कौतुक पञ्जिका नाम से कितनी गणित विधियां
मैं कहूंगा । मेरे पिता ने बहुत परिश्रम कर बहुत सी पाञ्जी बनायी थी । मैने
युवावस्था में इन्हें देखकर यह कौतुक पञ्जिका तैयार की थी ।
कौतुक पञ्जिका
पञ्चांगपाञ्जीं प्रविलोक्य चैकामन्वां ततः कल्पयितुंक्षमः स्यात्
जनो धनुर्ज्या पदकाद्यविज्ञो यथा तथायं क्रियते प्रकारः । ३ ।
चाप गणित (ज्या, कोटिज्या आदि) बिना जाने केवल पुरानी पाञ्जी (पञ्चाग)
देखकर जिस विधि से नयी पांजी बनायी जा सकती है, वह विधि कर रहा हूँ ।
कुवासरा नागशराग्नि (३५८) तुल्या नागेन्दु नाड्योरस भू (१६) विनाड्य
कृतांगरामै (३६४) स्तिथिभिः समाप्ताः स्युर्मन्द्र केन्द्रौजपदान्तगेऽर्के । ४ ।
अपने मन्दोच्च से सूर्य पूर्व या पीछे के पदान्त में रहने पर उस वर्ष के सावनदिनों
की संख्या ३५८।१८।१६ होगी । इतने दिनों में ३६४ तिथि या चन्द्र दिन समाप्त
होंगे ।
पलैस्त्रिभि (३) विश्व (१३) मितैश्च दण्डे
र्युक्तानिपूर्वोक्त महीदिनानि । ३५८।१३ । ३ ।
ऋक्षैश्चतुः पञ्चगुणैः (३५४) समाप्तं
यान्त्यत्र नेष्टं रवि मन्द केन्द्रम् । ५ ।
३५८।१३।३ सावन दिनों में ३५४ नाक्षत्र दिन होते हैं । अतः चन्द्र मन्द केन्द्र
की आवश्यकता नहीं है ।
कुवासरास्ते (३५८) सदलेन्द्र (१४।३०) नाड़ी
युक्ता खनागज्ज्वलनैः सहाद्देैः (३८०)
४२८ सिद्धान्त दर्पण
• योगैः समाप्तिं खलु यान्ति मन्द
केन्द्रौज पादान्त गते खरांशौ । ६ ।
३५८।१४।३० सावन दिन में ३८० १/२ योग होता है । यह सब मन्द केन्द्र से
विषम पादान्त में रवि रहन से होता है ।
तिथ्यर्द्धके यत्र यदिष्ट मेतत् संवत्सरान्ते करणं प्रमेयम्
नक्षत्र भोगांघ्रि विवेचनेन नवर्क्षपादान्त कराशयः स्युः । ७ ।
जिस तिथ्यर्द्ध में जो करण है, एक वर्ष बाद उसी तिथि के उसी अर्द्ध में
वही करण फिर होगा । नक्षत्र के चार पाद करने पर प्रत्येक राशि में ९ नक्षत्र पाद
होंगे ।
पूर्णेष्षतो द्वादशसु क्षपेष मासेषु यद्यन्ति विभाद्यमिष्टम्
तत्पूर्वं वर्षे हि तिथिः कृतो (४) ना ग्राह्या
गुणो (३) नं भमथापि योगः । ८ ।
१२ चान्द्र मास पूर्ण होने पर अर्थात् ३५८ सावन दिनों में ( एक सौराब्द के
अन्तः पात ३५८ सावन दिनों में) चान्द्र वर्ष की ४ तिथि अधिक होगी । पूर्ण
भगण का ३ नक्षत्र तथा पूर्ण योग में
सार्द्धद्वयो (२ १/२) नः परिगृह्यतां तद् ग्राह्यर्क्षतिथ्यन्त त एव देयाः
पुरोदितास्ता निजनाड़िकाद्या योगस्य मध्यादथ तत्तत्राढ्याः । ९ ।
. (तिथि नाड्यः (१८।१६ भनाड्यः १३।३ योगनाड्यः १४।३०)
२ १/२ योग अधिक होता है । पूर्व वर्ष में जो तिथि आदि ग्रहण करने से
वर्तमान वर्ष की इष्ट तिथि होती है । उसी को ही ग्राह्य तिथि आदि कहते हैं।
ग्राह्य नक्षत्र में १८।१६ नाड़ी, ग्राह्य तिथि में १३।३ दण्ड तथा ग्राह्य योग में १४।३०
दण्ड जोड़ेगे ।
तिथ्यादयः षष्टि घटीभ्य ऊना भवन्ति चेदिष्ट तमास्तदैकः
ग्राह्ये दिने वार इहैव देयो द्वौषष्टिदण्डाधिकता पिचेत्तौ । १० ।
यह सब योग करने पर फल यदि ६० दण्ड से कम हो तो ग्राह्य दिन में एक
एक वार जोड़ना होगा । फल ६० दण्ड से अधिक होने पर २ वार जोड़ा जायेगा ।
तद् ग्राह्यतिथ्यां तिथयश्चतस्रो योज्याश्चतस्रः किलतारकायाम्
योगे च सार्द्धद्वयमेवमिष्ट तिथ्यादयो ग्राह्यत उद् भवन्ति । ११ ।
फल की ग्राह्यतिथि में ४ तिथि, नक्षत्र में ४ तारा तथा योग में २-१/२ योग
जोड़ा जायेगा । इसके प्रकार ग्राह्य तिथि आदि से इष्ट तिथि आदि हो जायेगा ।
मासेऽत्रपक्षे ऽत्र तिथिर्मदिष्टा की दृश्य मुख्यां कथमृक्षयोगौ
इतिस्थिते प्रश्न विधौ तिथिः सा पञ्चांग मुख्या प्रतिभाति यस्मात् । १२.।
... wait:
ति थी (2) न्द्र (1) विश्वा (2) र्य (1) म (1) रु (1) द्र (1) का (1) ष्ठा (1) = 11 syllables!
Wait! The verse is divided into lines in the book to insert the numbers in brackets!
In the verse:
तिथीन्द्रविश्वार्यमरुद्रकाष्ठा-
गोदिङ्महेशोर्यमविश्वशक्रैः । १६ ।
The editor broke the verse lines to insert the numbers:
तिथी (१५) न्द्र (१४) विश्वा (१३)
र्यम (१२) रुद्र (११) काष्ठा (१०) गो (९)
दिङ् (१०) महेशो (११) र्यम (१२) विश्व ( १३) शक्रैः (१४) । १६ ।
That explains the exact layout!
Let's check line 23 again:
Is it "अथोद्धृतो" or "अथोद्धतो"?
Let's look at the third character:
It has द् and ध with an ृ (ri-matra): द्धृ.
So "अथोद्धृतो".
Let's check line 24:
"कालः क्रमान्माः सुधनुर्मुखेषु"
Wait, "क्रमान्माः" or "क्रमान्मास्"?
Look at the characters:
क ् र म ा न ् म ा
४३० सिद्धान्त दर्पण
का चर कर्म कहा जा रहा है ।
सस्रोनिते ग्राह्य दिने दिनार्द्धं यत्स्या तदेवेष्ट दिनेऽब्दतः स्यात्
तदन्तरं यद्दिन सप्तकोत्थं तद् याम्य सौम्यायन योः क्रमेण । १८ ।
ग्राह्यदिन से ७ घटाने पर जो होगा उसी दिन का दिनार्द्ध इष्ट दिन के दिनार्ध
के बराबर होगा । अतः ७ दिन (३६५-३५८) सम्बन्धी दिनार्द्ध अन्तर को दक्षिण
उत्तरायण क्रम से तिथि, नक्षत्र और योग में जोड़ना या घटाना पड़ेगा ।
तिथ्यादिषु क्षेप्यमृणं विधेय मित्यं स्फुटं स्थूलमत प्रसिद्धम् ।
तिथ्यादिकं सूक्ष्ममितोऽपि कल्प्यं पूर्वोक्तरीत्यामृदुतुङ्ग बोधात् । १९ ।
इतना करने से प्राचीन सौर आदि मतों के अनुसार तिथि आदि स्फुट होगा ।
स्थूल मत से निकाले तिथि आदि से मन्दोच्च आदि के अनुसार पूर्वोक्त रीति से
सूक्ष्मतिति आदि की कल्पना करनी होगी ।
स्याद् ग्राह्य तिथ्यादि यदीह सूक्ष्मं स्थूली कृतिस्तस्य विधातु मिष्टा
व्यस्तेतु तुंगान्तर पाक्षिकाख्ये कार्ये, फले तत्र पुनः प्रयासात् । २० ।
यदि ग्राह्य तिथि आदि सूक्ष्म है तो इस विधि से उन्हें स्थूल करना चाहिये ।
तुंगान्तर और पाक्षिक फल निकाल कर विपरीत रीति से आदि में उसका संस्कार
करना होगा । यह कष्ट साध्य होने पर भी आवश्यक है ।
नागर्तवो (६८) नागदिवाकराश्च (१२५) गोर्थेन्दवः (१५९)
षट्कनृपाः (१६६) शरेन्द्रोः (१४५) भुजंगानन्दाश्च (९८)
कलम्बरामाः (३५) क्रमोत्क्रमादाद्य तिथैर्विनाड्यः । २१ ।
प्रतिपदा से सप्तमी की तिथियों में क्रमशः ६८, १२५, १५९, १६६, १४५, ९८
तथा ३५ कला (पल) जोड़ेगे तथा उल्टे क्रम से अष्टमी से चतुर्दशीतक की तिथियों
में घटायेंगे ।
कार्याधनर्णान्यथ बाहुलिप्ताः पूर्वोक्त तुंगान्तर केन्द्र जाताः
पक्षार्द्धजास्तत्त्वयमै (२२५) विभक्ता लब्धाः स्वखण्डास्तदनुक्रमोत्थाः । २२ ।
पक्षार्द्ध में पूर्वोक्त तुंगान्तर की भुजकला को २२५ से भाग देने पर फल तुंगान्तर
केन्द्र का भुज खण्ड होगा ।
वृहस्पते र्मन्दफलस्य लिप्ता यास्ताः शरघ्नात् विहताविनाड्यः
ज्ञेयाः पराः पक्षदले पुनस्ता हताः क्रमादादि तिथे स्त्र चन्द्रैः । २३ ।
इन खण्डों के अनुसार वृहस्पति का जितना मन्दफल कला होगी उसको ५
से गुणा कर २ से भाग देने पर पक्षार्द्ध की परा आदि होगी । इस परा आदि को
प्रतिपदा से सप्तमी तक क्रमशः १३,
उपसंहार वर्णन ४३१
तत्त्वै (२-२५) कलम्बाग्निभि (३-३५) रथवेदै (४-४५)
द्व्यर्थै (५-५२) र्नगार्थै (६-५७) खरसै (७-६६०) र्विलोमम्
तथाष्टमीतः (६०।५७।५२।४५।३५।२५।१३)
खरसै (६०) र्विभक्ता वामं खतुंगान्तर वद् युतोनाः । २४ ।
२५,३५,४५,५७,६० से गुणा करेंगे । अष्टमी से चतुर्दशी तक क्रमशः
६०,५७,५२,४५,३५,२५,१३ से गुणा करेंगे । सभी फलों में ६० से भाग देने पर जो
फल होगा उसे तुंगान्तर फल के समान विपरीत रीति से सूक्ष्म फल में संस्कार
करने से स्थूल तिथि हो जायेगी ।
ग्राह्य इतिस्युस्तिथयो भमेवं तिथ्यन्त पूर्ण तदृणस्वनाड्यः
विश्वां (१३) शहीनास्तिथि भान्तयोर्यत् कालान्तरं
यात मनागतं स्यात् । २५ ।
ठीक उसी प्रकार तिथि अन्त में जो नक्षत्र पूर्ण होगा उसी तिथि में जो घटाने
या जोड़ने वाला दण्ड आदि होगा उसका १/१३ भाग कम कर व्यवहार करेंगे ।
तिथि अन्त में नक्षत्र पूर्ण नहीं होने पर तिथि और नक्षत्र के बीच के समय को
तद् घ्नं तिथि द्वन्द्व धनर्ण कालान्तरेण षष्ठ्याप्त मितैष्य दृष्ट्या
न्यूनाधिकं कार्यमथर्क्षकेषु ग्राह्येषु शोध्यः क्रमतो विनाड्यः । २६ ।
नक्षत्र से संबन्धित दोनों तिथियों के धन या ऋण कालान्तर से गुणा कर ६०
से भाग देने पर गत नक्षत्र में योग या बाकी (गम्य) में घटायेंगे । ग्राह्य स्थूल
नक्षत्र होगा ।
षड् बाहवः (२६) षण् निगमा (४६) स्त्रिबाणा (५३)
रसाब्धयो (४६) ऽङ्गाक्षि (२६) मितामृगादेः
मासेषुकर्कादिषु योजनीया
यथास्थिताः कार्मुक युग्मयोस्तु । २७ ।
ग्राह्य नक्षत्र में मकर से आरम्भ कर ५ मासों में क्रमशः २६, ४६, ५३, ४६,
२६ पल (लिप्ता) घटाना पड़ेगा । कर्क आदि ५ मासों में इन्हें क्रमशः जोड़ना
पड़ेगा । धनु और मिथुन मास में योग या घटाव नहीं होता है ।
योगेऽत्र तिथ्युक्त फलान्य गांश (७)
हीनानि कुर्याद भ इवा नुपातम्
ग्राह्येभ्य इष्टानि पुरोक्त वत् स्युः
स्थूलानि सूक्ष्मी करणन्तु तेषाम् । २८ ।
विष्कुम्भ आदि योग निकालने के समय तिथि के लिये लिखे गये धन या
ऋण फल से उसका १/७ भाग कर व्यवहार करेंगे । नक्षत्र के गत या गम्य भाग
के समान गत या गम्य कालान्तर में अनुपात किया जायेगा । इस प्रकार ग्राह्यतिथि
४३२ सिद्धान्त दर्पण
आदि से पहले के समान स्थूल इष्ट तिथि आदि हो जायेगा ।
इहोक्त तुंगान्तर पाक्षिका भ्यं स्यादंगकानां धन हानि वाम्यात्
भानान्त कर्कादि मृगादि मासधनर्णता स्यादपि वैपरीत्यात् । २९ ।
इस स्थूल तिथि आदि को सूक्ष्म करने के लिए तुंगान्तर और पाक्षिक दोनों
फलों से तिथि आदि में उल्टे क्रम से संस्कार (जोड़ या घटाव) करेंगे । नक्षत्रों
का यह संस्कार कर्क और मकर से आरम्भ कर ५-५ मासों में क्रमशः जोड़कर
या घटाकर विपरीत क्रम से होगा ।
ग्राह्येऽप्यमध्येत्वधिमास पातश्चेद् ग्राह्यमेवोत्तर मासिसर्वम् ।
रूपाद्रि रामा (३७२) स्तिथयोऽर्कवर्षे यद्यन्त पूर्तिसह षोडशांशाः । ३० ।
ग्राह्य मास और इष्ट मास के बीच अधिमास पड़ने से अधिमास के अगले
मास में तिथि आदि सभी ग्रहण किया जायेगा । इसका कारण एक सौर वर्ष में
(३७२-१/१६) चान्द्र दिन या तिथि होती हैं । (३७२।३।४५)
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उपसंहार वर्णन् ४३३
यद्राशि चार स्थिति (१५) दण्ड तोऽङ्गाद्
द्विरराम (३२) संख्यैः पलकै र्युतेभ्य
तन्मास्यभीष्ट दिन एक हीने
प्राग् वर्षजात् स्पष्ट इनः पुरेव । ३४ ।
किसी मास की संक्रान्ति पिछले वर्ष की संक्रान्ति से १५।३२ दण्ड के बाद
होगी । उस मास के अभीष्ट दिन में एक घटाकर पूर्व वर्ष के उसी समय के रवि
से पहले की तरह रवि को स्फुट किया जा सकता है ।
किन्तुत्रयाः प्रोज्झ्यतया निरुक्ता लिप्तादय
(१५।१८) स्ताः स्फुटसूर्यगत्याः
हताविभक्ताः खरसैः (६०) स्फुटाः स्युस्तदूनितः
सूक्ष्मइनोऽब्दतः स्यात् । ३५ ।
किन्तु यहां (१५।१८) कला घटाने को कहा गया है । उसको स्फुट सूर्य गति
से गुणा कर ६० से भाग देने पर स्फुट होगा । उसी स्फुट कला आदि को पूर्व
वर्ष के उसी दिन के सूर्य से घटाने पर इस वर्ष के इष्ट दिन का स्फुट सूर्य होगा ।
ग्राह्यादिरर्कोज्झित एष्यघस्र सूर्यः स्फुटा भुक्ति रतोऽवशेषः
अत्येति दर्शं रविसंक्रमश्चेत्त दाधिमासः सुविघावगम्यः । ३६ ।
अतः आगामी दिन के स्पष्ट सूर्य से ग्राह्य दिन का सूर्य घटाने पर शेष सूर्य
की स्फुट गति होगी । यदि रवि संक्रान्ति अमान्त के बाद हो वह मास अधिमास
होगा ।
भमुक्त नाड्योऽष्टशतो (८००) विनिघ्नाः साद्यन्त नक्षत्रघटी विभक्ताः
गतर्क्ष संख्याश्चततो गुणाढ्या भवन्ति विस्पष्ट सुधांशु लिप्ताः । ३७ ।
इष्ट नक्षत्र के गत दण्ड आदि को ८०० से गुणा कर उस नक्षत्र के भोग (आदि
से अन्त तक) दण्ड आदि से भाग देने पर उस नक्षत्र का भुक्त (बीता हुआ) कला
आदि होगा । ज्ञात नक्षत्र से पहले के नक्षत्र संख्या को ८०० से गुणा कर उससे
ज्ञात नक्षत्र के भुक्त अंशादि को मिलाने से चन्द्र का स्फुट कला आदि होगा ।
कला में ६० से भाग देने पर अंश और उसमें १२ से भाग देने पर राशि होगी ।
सहस्रनिघ्ना भगजाष्ट पक्षाः (२८,८०,०००) साद्यन्त नक्षत्र पलै र्विभक्तः
फलं विधोर्भुक्ति रनेक वर्ष यातैष्यतिथ्यादि वदन्ति विज्ञाः । ३८ ।
(२८,८०,०००) में नक्षत्र की आदि और अन्त लिप्ता (चन्द्र की ) से भाग देने
पर चन्द्र की स्फुट गति होगी । विज्ञ गणक इस प्रकार अनेक वर्ष की गति और
एष्य तिथि आदि जान सकते हैं ।
अथेन्दु सूर्य ग्रह सम्भवाया चन्द्रार्क मात्रावगतेर हानि
आनीय वारैः परिशोधितानि स्वाभीष्ट पर्वानुगतानि तेभ्यः । ३९ ।
४३४ सिद्धान्त दर्पण
चन्द्र और सूर्य ग्रहण की सम्भावना जानने के लिए चन्द्र और सूर्य का स्फुट
राशि आदि निकालना होगा । उसके लिए पूर्णिमा या अमावास्या (चन्द्र या सूर्य
ग्रहण में ) का अहर्गण निकाल कर उसे बार शुद्ध करेंगे ।
पातं स्वगत्या (३।१०।४८) परिकल्प्य पाता
तद् भार्द्धतो वाग्निकु (१३) भाग मध्ये
पक्षान्तजेऽर्क स्थित एव चन्द्र
ग्रहो भवेत्तत् क्रम भक्त पूर्वः । ४० ।
इस अहर्गण को दैनिक ३।१०।४८ कला गति से गुणा कर चन्द्र पात (राहु)
की राशि ज्ञात होगी । अमान्त में सूर्य और पात से ६ राशि बाद की दूरी तथा
पूर्णिमान्त में स्फुट चन्द्र और पात के बीच की पूरी १३ अंश से कम होने पर ग्रहण
की सम्भावना रहती है । चन्द्र ग्रहण के बारे में पहले कहा जा चुका है ।
दर्शान्त काले क्रमतस्तु पूर्व पश्चान्नति त्र्यश विहीन युक्ते
तात्कालिक ग्लौदिगिषोस्त्रिभोन तनू नतज्या खरसां (६०) शकस्य । ४१ ।
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उपसंहार वर्णन ४३५
अन्तर से फिर ग्रहण हो सकता है ।
ग्रहात् पुनः प्रग्रहणान्तरं स्यात्ततस्तताभिरिति क्रमेण
पातर्क शीतां श्वधिमासविद्भि र्ज्ञेया ग्रहाद्या दशवत्सरान्तम् । ४५ ।
उसके बाद पुनः १५,१६५ आदि तिथि में इस प्रकार दस वर्ष में पुनः ग्रहण
हो सकता है । यह राहु, चन्द्र, रवि तथा अधिमास के द्वारा समझा जा सकता
है ।
ताराग्रहाणां समतैक वर्षे न स्याद्यतस्तद् बहुपञ्जिकानाम् ।
कार्यों बुधैः संग्रह एवमन्य कार्याणि सिद्धन्त्यपि साधुताभ्यः । ४६ ।
एक वर्ष में तारा ग्रहों (मंगल आदि) की समता नहीं आने के कारण (एक
भगण पूर्ण नहीं होने के कारण) गणित पण्डितों को बहुत वर्षों की पञ्जिका रखनी
चाहिये । इन पंजिकाओं से अनेक उपयोगी काम किये जा सकते हैं ।
सौरेण मानेन रदा (३२) ब्दतः प्राग् यथा कुजः सोऽ पि तथैष्ट वर्षे
चक्रे खनागेन्दु (१८०) कला भराढ्य एकादिराश्यन्त रितस्तु सूर्यात् । ४७ ।
वर्तमान सूर्य वर्ष के जिस मास के जिस दिन का मंगल स्फुट राशि आदि
जितना है उस दिन के ठीक ३२ वर्ष पूर्व उस मास के उसी दिन मंगल का स्फुट
राशि आदि वही था । (३२ वर्ष बाद भी वही होगा) वह सूर्य से १२ राशि पर
रहनें पर १८० कला जोड़ना पड़ेगा ।
युतः कलादि र्दश ताड़िताभिः
कुबाहुभि (२१०) भै (२७०) रसवीतिहोत्रै (३६०) ।
गजाब्धिभिः (४८०) वह्नि रसैः (६३०) कुनागैः (८१०)
स्ताभिः पुनः कार्मुक पञ्चकस्थे । ४८ ।
सूर्य से १,२,३ आदि राशि के अन्तर पर मंगल रहने पर क्रमशः २१०, २७०,
३६०, ४८०, ६३० तथा ८१० कला मंगल में जोड़ना पड़ेगा । मंगल धनु से आरम्भ
कर पांच राशियों में रहने पर
तस्मिन् क्रमात्यञ्चदशा (१५) ष्ट (८) पंच (५)
मातंग (८) तिथ्यं (१५) श समन्विता भिः ।
युग्मादि पञ्चर्क्ष गते तदंश (१५।८।५।८।१५।)
हीनाभिरे वं स्फुटता मुपैति । ४९ ।
क्रमशः १५,८,५,८,१५ अंश मंगल से घटाना पड़ेगा । इससे ३२ वर्ष बाद
मंगल स्फुट हो जायेगा ।
विश्वा (१३) ब्दतः प्राक् शशिजो यथा भूतथेष्ट वर्षेऽ त्र कियान् विशेषः
गत्यन्तरेण स्फुट सौम्य मध्य भान्वोर्वसु (८) ध्नाग्नि (३) हृतेन चेषः । ५० ।
इष्टवर्ष के इष्ट सौर मास तथा इष्ट दिन का बुध का राशि आदि वही होगा
४३६ सिद्धान्त दर्पण
जो उससे ठीक १३ वर्ष पूर्व उसी मास के उसी दिन था । इस विषय में और
भी कई बाते हैं । स्फुट बुध और मध्यासूर्य के गति अन्तर को ८ से गुणा कर ३
से भाग दें ।
युतोनितः सूर्य गतेः ५९।८ स्वभुक्ति न्यूनाधिकत्वे सतु वक्रगश्चेत् तदात्मभास्वद्
गति योग नाग (८) घाताग्नि (३) भागेन युतः स्फुटः स्यात् । ५१ ।
बुध की गति, ५९।९ से कम या अधिक होने पर इस फल को बुध के राशि
आदि में जोड़ेगे या घटायेंगे । बुध वक्री होने पर स्फुट बुध और मध्यम सूर्य की
गति योग को इसी प्रकार ८ से गुणा कर ३ से भाग देकर फल को वक्र बुध में
जोड़ने से बुध स्फुट होगा ।
वृहस्पतिर्द्वादश वर्षतः प्राग्
यथा यथा स्वार्क कलान्तरस्य
खार्काशं (१२०) युग्भिः खकुदृक् (२१०)
कलाभि स्ताभिः पुनः कर्कट पञ्चकस्थे । ५२ ।
वृहस्पति १२ वर्ष पहले जो था वही होगा । गुरु और सूर्य की अन्तर कला
को १२० से भाग देकर फल को २१० कला में जोड़े । योग को वृहस्पति में जोड़े ।
पुनः वृहस्पति कर्क आदि ५ राशियों में होने पर
तस्मिन् सुधांशो (३३) घन (१७) रुद्र (११) मेघ (१७)
देवांश (३३) हीना भिरिहैव नक्रात्
भपञ्चकस्थे तुतदंश (३३।१७।११।१७।३३) युग्भिः
समन्वितः सन् स्फुटतां प्रयाति । ५३ ।
रवि और गुरु के अन्तर को क्रमशः ३३, १७,११,१७ और ३३ से भाग देकर
फल को उस अन्तर से घटाकर शेष को वृहस्पति में जोड़ेगे । वृहस्पति मकर
आदि ५ राशियों में रहने पर इस अन्तरफल को २१० कला में योग कर उसे पुनः
गुरु से जोड़ने से वृहस्पति स्फुट होगा ।
वर्षाष्टकात् प्राग् भृगुजो यथैव मिष्टाब्दके सौर दिने च तत्र
स्फुटस्व भुक्त्यर्थम मध्य भुक्त्यन्तरेण बाण (५) घ्न भुजो (२) हृतेन । ५४ ।
इष्ट और वर्ष मास और दिन में शुक्र की राशि जो होगी वही ठीक आठ
वर्ष पहले उसी मास और उसी दिन थी । शुक्र स्फुट गति और सूर्य की मध्यम
गति के अन्तर को ५ से गुणा कर २ से भाग देंगे ।
ऊनो युते भानुगतेः स्वभुक्तो न्यूनाधिकायां क्रमतोऽ नृजुश्चेत्
युत्याशर (५) घ्नाक्षि (२) हतस्वभास्वद्
गत्यास्तदोनः स्फुटतां संगच्छेत् । ५५ ।
सूर्य मध्यम गति ५९।८ से स्फुट शुक्र गति कम या अधिक होने पर इस
उपसंहार वर्णन् ४३७
लब्धि को स्फुट शुक्र में घटाने या जोड़ने से वह स्फुट शुक्र (इष्टवर्ष का) होगा
शुक्र वक्री होने पर सूर्य मध्यम गति और शुक्र स्फुट गति के योग को ५ से गुणा
कर २ से भाग देकर फल को शुक्र से घटाने पर स्फुट होगा ।
शनिः खरामा (३०) ब्द पुरोः यथासीत्
कि न्त्वात्स सूर्यान्तर लिप्तिकानाम्
खेनांश (१२०) युग्भिः शरवाजिराम (३७५)
लिप्ताभिराभिः पुनरत्र मेषात् । ५६ ।
शनि ३० वर्ष पूर्व जिस राशि अंश आदि में था इष्ट सौर वर्ष मास दिन
आदि में वही होगा । मध्यम सूर्य और स्फुट शनि की अन्तर कला को १२० से
भाग देकर फल को ३७५ कला में जोड़ेगे । योग को स्फुट शनि में जोड़ेगे ।
पञ्चर्क्ष संस्थे नख (२०) दिग (१०) श्व (७) दशा (१०)
नखां (२०) श संयोगवती भिरस्मिन्
तुलादि पञ्चर्क्ष गते तदंश (२०।१०।७।१०।२०
४३८ सिद्धान्त दर्पण
किं वा नवाश्वै (७९) र्दिननाथ वर्षे
भौमश्रुतुः षष्टि (६४) कलाधिकः स्यात्
बुधोऽगवेदै (४६) विधुदिक् (१०१) कलोनो
गुरुस्त्रिनागै (८३) कृत सप्त (७४) हीनः । ६१ ।
मध्यम मंगल ७९ सौरवर्ष में ६४ कला अधिक होता है । बुध ६४ सौर वर्ष
में (१०१) कला कम होता है । गुरु ८३ सौर वर्ष में ७४ कला कम होता है ।
शुक्रस्त्रिसिद्धै (२४३) स्त्रिचतु (४३) ष्कलाढ्यः
शनिर्नवार्थै (५९) र्नगसायकाढ्यः (५७)
राहुस्त्रिनन्दै (९३) र्नख (२०) लिप्तिकोनः
शीघ्रो ज्ञ शुक्रा वितरेऽत्र मध्या । ६२ ।
मध्यम शुक्र (२४३) सौर वर्षों में (४३) कला बढ़ता है । शनि (५९) सौर
वर्षों में (५७) कला बढ़ता है। राहु (९३) सौर वर्षों में (२०) कला कम होता है।
बुध और शुक्र का शीघ्रोच्च तथा अन्य ग्रहों के मध्यम मान ठीक आते हैं ।
तिथ्यादिभूक्ताः प्रति सौर मास्य यायाहतिः स्वर्णविनाड़िकाप्ताः
ग्राह्येऽष्टषत्सार्क युगान्तरार्द्धयुक्तेष्टषट्सार्थम मासतस्स्युः ६३ ।
सौर मास के तिथि नक्षत्र आदि के लिये जो भाग विधि या दण्ड जोड़ने
घटाने के विषय में कहा गया है, उसे रखें । ग्राह्य तथा इष्ट दिन सम्बन्धी स्पष्ट
सूर्य के अन्तर के आधे को जोड़ने पर इष्ट दिन का सूर्य जिस राशि में जायेगा
उसी मास से उन तिथियों की गिनती होगी तथा अन्य संस्कार होंगे ।
तारामहेष्वंशभिरेन्दु भान्वोः कला प्रभेद स्तिथि योग भेषु
फल प्रभेदोऽत्र बुधैर्नगण्यः कृतिर्मदीया यद सावपूर्वा । ६४ ।
कौतुक पंजिका में मंगल आदि तारा ग्रहों में अंश की त्रुटि हो सकती है ।
चन्द्र, सूर्य में कला का अन्तर तथा तिथि योग और नक्षत्र में लिप्ता का अन्तर
विज्ञ गणक नगण्य मानेंगे ।
स्नानादि योगां श्चिरकालतोऽस्या भविष्यतो ज्ञातुमलं नरः स्यात्
मृषाप्यतः कौतुक पंजिकेयं महोपकाराय सतांसदास्ताम् । ६५ ।
पहले किसी ने इस प्रकार की कौतुक पंजिका नहीं बतायी थी । लोग इससे
आगामी तीर्थ स्नान आदि योग बहुत पहले जान पायेंगे । अतः यह कौतुक पंजिका
स्थूल होने पर भी इससे सज्जनों का बहुत उपकार हो यह मेरी इच्छा है ।
सलक्षणोदाहरणं वितत्य सिद्धान्त मध्येऽत्रकुतूहलाय
उद्देश्यतो भूय उदीर्यतेऽसौयतोऽतिवेशाद् विषय ग्रहः स्यात् । ६६ ।
इस सिद्धान्त दर्पण में उदाहरण के साथ अनेक लक्षण विस्तार से दिये गये
हैं । तथापि इसके विषय वस्तु को शीघ्र जानने के लिए उद्देश्य से संक्षेप में सभी