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सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

३९६ सिद्धान्त दर्पण
गुण्य और गुणक को गुणा उसको अन्त्य हार से भाग देंगे । फल को पुनः
अन्त्यहार से घटाने से वह अन्त्य स्फुट हार होगा । मूल अवशेष को ६० से गुणा
कर इस स्फुट हार से हरने पर यह लिप्ता होगा ।
पुरोदितं वर्गपदं मयात्र बहूपयोगोद्धन मूल मुक्तम्
दिग् दर्शिता साधन वासनाया गोलज्ञ गम्यानुदिता खिलायत । २४९ ।
वर्गमूल निकालने की विधि में पहले कह चुका हूँ। गणित में अति आवश्यक
होने के कारण घनमूल के बारे में भी मैने कहा । गणित साधन विधि सामान्य
प्रकार से कही गयी है । बाकी विधियां गोलज्ञ गणक स्वयं जान सकते हैं
सिद्धान्तशिरोमणौ-इषदोषदिह मध्य गमादौ ग्रन्थ गौरवभयेन मयोक्ता
वासनामति मतासक्त लोह्या गोल बोध इदमेद फलंहि । इति । २५० ।
सिद्धान्त शिरोमणि में लिखा है- ग्रन्थ बढ़ने के भय से मैं पहले थोड़ा थोड़ा
तर्क देकर आगे बढ़ जाता हूँ । बुद्धिमान् उसी से बाकीयुक्ति भी समझ लेंगे ।
गोल ज्ञान होने से ही यह फल होता है ।
हृत्प्राणेन्द्रिय रोध शोधित समक्रोध स्मरादिद्विषः
पञ्चक्लेश मुचोन यत्क्षणमपि द्रष्टुंक्षमा योगिनः
तद्यः स्वं परमं पदं स्वचरण प्रेमाध्व पान्थैर्जनैः
सु प्रापं विद धाति नः स भगवानव्याद् भव व्यापदः । २५१ ।
मन, प्राण और इन्द्रियों पर नियन्त्रण के लिये योगी गण मोह, क्रोध तथा
काम आदि शत्रुओं को जीतते हैं । इससे वे पांच क्लेशों विद्या, अस्मिता, अनुराग,
द्वेष और अभि निवेश से मुक्त हो जाते है । इसके बाद भी योगी गण उस परमपद
को एक क्षण के लिये भी नहीं देख पाते । (अधिक समय के लिए देखना दूर की
बात है ) उसी परम पद को जो अपने पाद सेवकों को सहज दिला देते हैं । वे
महाप्रभु श्री जगन्नाथ हमें विपद् से मुक्त करें ।
इत्युत्कलो ज्ज्वल नृपाल कुल प्रसूत
श्री चन्द्रशेखर कृतौ, गणितेऽक्षिसिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बालबोधे
सद् वासनोऽतिनख (२१) संख्यः इतः प्रकाशः । २५२ ।
इस प्रकार उड़ीसा के प्रसिद्ध राज परिवार में उत्पन्न श्री चन्द्र शेखर द्वारा
गणना और दृष्टि में समानता तथा बालकों की शिक्षा के लिये लिखे सिद्धान्त
दर्पण में सद् वासना (तर्क युक्त व्याख्या) सहित २१ वां प्रकाश समाप्त हुआ ।

द्वाविंश प्रकाशः
कालाधिकार
संवत्सरादि वर्णनम्
कलान्मानमकाल दण्ड निलयं कालाम्बु जन्म द्युतिं
कालो केलि कला जरार्च्चित पदं काला चलालं कृतिम्
क्रुध्यत् कालिय कालिकुब्जनकृतं काकोदरी काकुभिः
कृष्णं कृप्त कृपं करोभ्यभिवदन् कालाधिकार क्रमम् । १ ।
भगवान् कृष्ण काल के स्वरूप हैं और यम का काल दण्ड उनमें लीन (लुप्त )
हो जाता है । उनकी नील कमल जैसी शोभा है । उनके पदों की अर्चना पार्वती
की क्रीड़ा के चन्द्र रूप शिव के द्वारा की गयी है । वह नीलाचल पर जगन्नाथ
के रूप में स्थित है । वह नीलाचल पर जगन्नाथ के रूप में स्थित है । उन्होंने
क्रूर कालिय का दमन किया तथा नाग स्त्रियों का रोना सुनकर उन पर दया की ।
उन्हीं प्रभु को प्रणाम कर मै कालाधिकार लिखता हूँ ।
कालास्तु द्विविधो नित्यो जन्यश्चेति प्रकीर्तितः
नित्यः श्री परमेशोऽत्र काल कालापराह्वयः । २ ।
काल के दो प्रकार हैं-नित्य तथा जन्य । स्वयं परमेश्वर नित्य काल का रूप
हैं । वह काल की गणना करते हैं । अतः उनका अन्य नाम काल है ।
विशेषं कलनात् कालो जन्यः स तु तथेश्वरः
तत् स्मृति सर्वकार्येषु कर्तव्या मंगलार्थिभिः । ३ ।
जगत् का हिसाब करने के कारण वही पर परमेश्वर जन्य काल भी है ।
अतः कल्याण चाहने वाले लोग सभी कामों में परमेश्वर का स्मरण करते हैं ।
कौम्र्मे - अनादि के भगवान् कालोऽनन्तोऽक्षरः परः ।
सर्वाङ्गत्वात् स्वतन्त्रत्वात् सर्वात्मत्वात् महेश्वरः । ४ ।
कूर्म पुराण में कहा है- भगवान अनादि और अनन्त काल रूप हैं । उनका
क्षय नहीं होता । वह सभी के रोम रोम में तथा उसके बाहर भी हैं वह महेश्वर,
सर्वगत, स्वतन्त्र तथा सभी की आत्मा है ।
पर ब्रह्म च भूतानि वासुदेवोऽपि शंकरः
कालेनैव च सृज्यन्ते स एव ग्रसते पुनः । इति । ५ ।
काल ही स्वयं परम ब्रह्म, वासुदेव और शंकर है । काल द्वारा ही संसार
उत्पन्न तथा पीछे नष्ट हो जाता है । (उद्धरण समाप्त)
स्मृतिश्च-सर्वेषु कालेषु समस्त देशेषु तथेश्वरे श्वरश्च ।
सर्वैः स्वरूपै भगवान नादि र्ममास्तु मांग्ल्य वृद्धये हरिः । ६ ।

३९८ सिद्धान्त दर्पण
स्मृति में है- हर समय-सभी देशों में और सभी कामों में भगवान ही स्वामी
रूप में है । वह सभी के रूपों में और अनादि है । वे हरि मेरे कल्याण वृद्धि
करें ।
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञ क्रियादिषु
न्यूनं सम्पूर्णतां याति स द्यो वन्दे तमच्युतम् । ७ । इति ।
तपस्या, यज्ञ आदि सभी कार्यों की कमी यात्रुटि जिसके नाम स्मरण या गान
से उसी समय पूर्ण हो जाती है । उसी अच्युत की में वन्दना करता हूँ । (उद्धरण
समाप्त)
निर्गुणत्वात् परेशस्य तत्स्मृति र्घटते कथम् ।
इति चे दुच्यते तस्य वाशिष्ठोक्त्या शरीरिता । ८ ।
यदि परमेश निर्गुण हैं तो उनका स्मरण किस प्रकार हो सकता है । इस प्रश्न
के उत्तर में योग वाशिष्ट रामायण में भगवान के शरीर धारण करने के विषय में
जो कहा है वह उद्धृत किया जा रहा है ।
तथा हि वाशिष्ठ रामायणे-
नित्योजन्यश्च कालौ द्वौ तयोराद्य परेश्वरः
सोऽवाङ्मनस गम्योऽपिदेही भक्तानुकम्पया । ९ ।
वाशिष्ठ रामायण में इस प्रकार है-नित्य और जन्य- दो प्रकार का काल है ।
इनमें परमेश्वर ही प्रथम और नित्यकाल है । वाणी और मन द्वारा उनकी कल्पना
नहीं की जसकती, पर भक्तों पर कृपा करने के लिए वे शरीर धारण करते हैं ।
खड्ग पाशधरः श्रीमान् कुण्डली कवचान्वितः
ऋतु षटक् मयोदार वक्तर् षट्क समन्वितः । १० ।
भगवान् खड्ग और पाश धरने वाले, कवच तथा कुण्डल से सजित हैं ।
वह ६ ऋतुओं के रूप में ६ मुख धारण किये हुए हैं ।
मासो द्वादश कोद्दाम भुज द्वादश कोद् भटः
स्वाकार समया वहा वृतः किंकर सेनया । इति । ११ ।
उनकी १२ भुजाओं का पराक्रम १२ मास है । वह अपने ही आकार और रूप
वाले सेवकों से सदा सेवित है । (उद्धरणं समाप्त)
यद्यप्येतत्काल रूपं तथाप्यस्य रमापतेः
धृतनानातनोर्भक्त्यै कार्यास्वेष्टा कृति स्मृतिः । १२ ।
लक्ष्मीपति इस प्रकार काल रूप होने पर भी भक्तों के लिये अनेक प्रकार का
रूप धारण करते हैं । अतः भक्त अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी रूप में उनका
स्मरण करते हैं ।

संवत्सरादि वर्णनम् ३९९
नित्यात् जन्यस्य कालस्य समुत्पत्ति र्भूदिति
श्रुति प्रमाण्य मासाद्य प्राह स्वायम्भुवो मनुः । १३ ।
इसी नित्य कालरूप परमेश्वर से जन्य काल भी उत्पन्न हुआ है- यह वेद
में कहा है तथा स्वायम्भुव मनु ने भी कहा है ।
तथाहि-कालः काल विभक्तिश्च नक्षत्राणि ग्रहस्तथा
सृष्टिं ससर्ज चैवेमां स्रष्टुमिच्छांन्निमाः प्रजा । इति । १४ ।
ईश्वर रूपी काल ने प्रजा की सृष्टि के लिए काल के विभाग (दिन, मास
आदि), नक्षत्र ग्रह तथा इस विश्व की रचना की ।
कालात्मा दिनकृत् प्रोक्ता होरास्कन्धे यतस्ततः
सिद्धान्त गदिता सृष्टिर्न विरोध मिहार्हति । १५ ।
˙ होरा स्कन्ध (बृहज्जातक मे)सूर्य को कालात्मा कहा गया है । इस उक्ति का
सिद्धान्त की उक्ति विरोध करती है, ऐसा मानना ठीक नहीं है।
त्रुट् यदि प्रलंयान्तेषु जन्यकालेषु वत्सरः
प्रधान भूतोऽवयवो खाङ्गैर्युक्तोऽयनादिभिः । १६ ।
सूर्य को कालात्मा मानने से वह स्वयं सृष्टि का कारण है । त्रुटि से लेकर
प्रलय तक के जन्य काल में वर्ष प्रधान अवयव है । इसके अवयव हैं-अयन,
सम्यग् वसन्ति यत्रर्तु मास पक्षादिनादयः
प्राज्ञैःकाल विशेषोऽसौ संवत्सर इतीरितः । १७ ।
मास पक्ष और दिन आदि । वर्ष रुपी अवयव इन्हीं से बना है, इसका एक
नाम संवत्सर भी है ।
अयने येन पूषर्तु त्रयेणोदग् दिशं तथा ।
दक्षिणां शा तदेवोक्त मयनं सौर मानजम् । १८ ।
सूर्य जिन तीन ऋतुओं (६ मास) में उत्तर दिशा और अन्य तीन ऋतुओं में
दक्षिण दिशा में जाता है उसे ही अयन कहते हैं । यह सूर्य की क्रान्ति के अनुसार
होता है । (अय् धातु का अर्थ गति है)
इयर्त्य शोक पुष्यादि लिङ्ग साधारणैतरम्
यः सकाल विशेषोऽत्रवसन्तादि ऋतुरुच्यते । १९ ।
जिस समय (दो मास) अशोक वृक्ष पुष्प आदि असाधारण चिह्न धारण करता
है । उस को आदि ऋतु वसन्त कहा जाता है ।
मास्यते परिमीयते येन चन्द्रार्द्ध संख्ययौ
सूर्य राशि गतिर्यत्र मास्यतेऽह्नोञ्च यत्रहिं । २० ।
जिस समय को मापा जाय या हिसाब किया जाय उसे मास कहते हैं । चन्द्र

४०० सिद्धान्त दर्पण
की वृद्धि और क्षय का माप करने वाला चान्द्र मास है । सूर्य की राशि गति का
समय मापने वाला सौर मास तथा दिन रात
त्रिंशतानि व्यतीतानि भचक्र भ्रमणानिच
मासः स उच्यते चान्द्रः सौरः सावन ऋक्षकः । २१ ।
३० तथा ३० नक्षत्र भ्रमण का माप करने वाला समय क्रमशः सावन और
नाक्षत्र मास कहलाता है ।
पक्षेते परि गृह्येते देवता पितृकार्ययोः
यौ तौ पक्षौ शुक्ल कृष्णौ चन्द्र वृद्धिक्षयाद् भवौ । २२ ।
चन्द्र की वृद्धि और क्षय के अनुसार शुक्ल और कृष्ण पक्ष होता है । उन दो
पक्षों का उपयोग देव और पितृकार्य में होता है ।
तनोति यो वर्द्धमानां क्षीयमाणां कलां विधोः
एकां काल विशेषोऽयं तिथि रित्युच्यते बुधैः । २३ ।
बढ़ने वाले या घटने वाले चन्द्र की एक एक कला का जिस समय द्वारा
हिसाब होता है उसे तिथि कहते हैं ।
इत्थं याम मुहूर्त्तादि कालांगाना मदेशकः
व्युत्पत्तिर्न मया प्रोक्ता ग्रन्थ विस्तार साध्वसात् । २४ ।
इसी प्रकार याम, मुहूर्त आदि समय के अनेक अंग है । ग्रन्थ का विस्तार
बढ़ने के भय से इन सबकी व्युत्पत्ति नहीं कही है ।
नवधा कालमानानि चान्द्र मार्क्ष्य च सावनम्
बार्हस्पत्यं ततः सौरं मानवं पैत्र मेव च । २५ ।
समय का विभाग ९ प्रकार का है- चान्द्र, नाक्षत्र, सावन, बार्हस्पत्य, सौर,
मानव, पैत्र, दैव और ब्राह्म ।
दैवं ब्राह्मय मिति प्रोक्तान्यत्र पञ्चभिरादिमैः
व्यवहारो मनुष्याणां मन्वादीनां स्वनामतः । २६ ।
इनमें प्रथम पांच समय मान ही मनुष्य के व्यवहार में आते हैं, बाकी मानव
आदि का व्यवहार अपने नाम के अनुसार होता है ।
भू गर्भ निः सृतात् सूत्रात् सूर्य मण्डल मध्यगात्
प्राचीं यद्याति शीतांशूश्चान्द्र मानं तदुच्यते । २७ ।
भू केन्द्र से सूर्य केन्द्र तक के सूत्र से पूर्व की तरफ, १२ अंश जितने समय
में चन्द्र जाता है, उसको चान्द्र मान (१ तिथि) कहते हैं ।
व्यर्केन्दु भगणो मास स्तदर्द्धं पक्ष ईष्यते ।
तिथि स्तत् शर रूपांश (१५) स्तदर्द्धं करणं मंतम् । २८ ।

संवत्सरादि वर्णनम् ४०१
चन्द्र से सूर्य का अन्तर एक भगण होने से एक चान्द्र मास होता है । इसके
आधे को पक्ष कहते हैं । पक्ष के १/१५ भाग को तिथि तथा तिथि के आधे भाग
को करण कहते हैं ।
व्रतोपवास पर्वादि कृत्याकृत्य पितृक्रियाः ।
चान्द्र मानेन गृह्यन्ते मास वृद्धिक्षयादयः । २९ ।
मास की वृद्धि क्षय, व्रत, उपवास, पर्व आदि, कृत्यकाल और अकृत्य काल,
तथा पितृक्रिया-सभी चान्द्र मान (तिथि) के अनुसार ही किये जाते हैं ।
पर्वान्ते कृत्ति का दीनां योगद्ये कार्तिकादयः
मासाः प्राग् भिर्मता स्त द्यदृक्षस्थ बृहस्पते । ३० ।
पूर्णिमान्त में कृत्ति का आदि नक्षत्र के साथ चन्द्र के संयोग के कारण जिस
प्रकार कार्तिक आदि मासों का नाम दिया गया है । उसी प्रकार जिस नक्षत्र में
रहकर वृहस्पति अमान्त में -
उदयस्तद् भ नामा ब्दाः सूर्य सिद्धान्त सम्मत-
तल्लक्षणान्यति व्यासे नर्त्र प्रोक्तानि विस्तरात् । ३१ ।
उदय होता है, उसी नक्षत्र के अनुसार बार्हस्पत्य वर्ष का नाम होता है ऐसा
सूर्य सिद्धान्त का मत है । पर ग्रन्थ विस्तार के भय से इन सभी लक्षणों का वर्णन
नहीं किया जा रहा है ।
कृत्ति का शब्द वाच्यं यत् कृत्तिका रोहिणी द्वयम्
तत् पर्वान्ताद्वयन्मासो निरुक्त कार्तिको यदि । ३२ ।
कार्तिक और रोहिणी दोनों को कृत्तिका मानकर इसमें किसी के साथ पूर्णान्त
में चन्द्र का योग होने पर यदि उस मास को कार्तिक कहा जाता है,
तदूर्ज्ज मार्ग पर्वान्त भरणी रोहिणी यतौ
अब्दे त्विषोर्जतपत्ति र्भवेत् कार्तिक मार्गयोः । ३२ ।
तो कार्तिक और मार्गशिर पूर्णान्त में क्रमशः भरणी और रोहिणी के साथ
योग होने पर उस वर्ष इन मासों को क्रमशः आश्विन और कार्तिक क्यों नहीं कहा
जाता है ।
तथापि पूर्व चलित व्यवहार व शादिमे
कृत्तिका मार्ग-शीर्षादि नामभिः प्रायिका मताः । ३४ ।
यह असुविधा होने पर प्राचीन काल से प्रचलित व्यवहार के अनुसार कार्तिक
और मार्गशीर्ष आदि मासों की गणना होती है । यह नक्षत्र योग भी प्रायः घटता
है ।

४०२ सिद्धान्त दर्पण
एकः पश्चाद् भ्रमो भानां नाक्षत्रं दिन मुच्यते :
घटिकादिक मायुश्च तन्मानेनैव सिद्ध्यति । ३५ ।
नक्षत्रों के पश्चिम दिशा में एक चक्र पूरा करने में जितना समय लगता है,
उसे १ नक्षत्र दिन कहते हैं । घटी, पल आदि इसी मान के अनुसार होते हैं ।
ब्रह्मा की आयु भी इसी मान से होती है ।
नाक्षत्र मान संसिद्धं मायुः कल्पार्क वासरैः
गुणितं कल्प भदिन माप्तं सौराब्दादि स्फुटं । ३६ ।
नाक्षत्र मान की आयु को कल्प सौर दिन (१५,५२,००,००,०००,००) से गुणा
कर कल्प नक्षत्र दिन (१५,८२,२,३७,८,२,८,२८,००००) से भाग देने पर फल स्फुट
सौर वर्ष आदि होता है ।
यद्यपि स्याद् भग्रहाणां स्वस्वोदय युगान्तरम्
तत्तत् सावन घस्रारूय मुक्त पूर्वं तथापि हि । ३७ ।
पहले कहा जा चुका है, कि किसी ग्रह या नक्षत्र के एक उदय

संवत्सरादि वर्णनम् ४०३
इस प्रकार के ३० सौर दिनों का एक सौर मास होता है । इस प्रकार १२ सौर
मासों का एक सौर वर्ष होता है ।
सौर मानेन गृह्यन्ते संक्रमत्वर्यनादयः
देवासुर द्युरजनी युगमन्वन्तरक्षयाः । ४२ ।
सौर मान से संक्रान्ति, अयन और ऋतु आदि का पालन होता है । देवता
और असुरों का दिन और रात, युग, मन्वन्तर आदि की समाप्ति भी इसी सौर मान
से होती है ।
विवाह व्रत चूड़ादि वेश्मारम्भादयः क्रिया
मासाब्द नियमाः पर्वाण्यपि देशविशेषतः । ४३ ।
विवाह, व्रत, चूड़ा कर्म, गृहारम्भ आदि काम, मास, वर्ष, व्रतादि का पालन,
पर्व आदि का पालन किसी किसी देश में सौर मान से भी होता है । (सामान्यतः
चान्द्र मान से होता है ऐसा लिखा गया है)
सौर-तुलादिषडशी (८६) त्यंशैः षडशीति मुखं दिनम्
तञ्चतुष्टय मेवस्यात् द्विस्व भावेषु राशिषु । इति । ४४ ।
सूर्य सिद्धान्त में-तुला आरम्भ से ८६ अंश तक सूर्य रहने पर (अर्थात् ८६
सौर दिनों तक) षडशीति मुख नामक मास होता है । यह वर्ष में ४ बार होता है
और रवि द्विस्वभाव (द्वात्मक राशि ३,६,९,१२) में रहने पर ही होता है । (उद्धरण
समाप्त होता है ) ।
धनुषः सप्त विंशोऽश स्त्रयो विंशोऽण्डजस्य च
द्वन्दू से कोन विंशश्च स्त्रियाः पञ्चदशः स्मृतः । ४५ ।
धनु राशि का २७ अंश, मीन का २३ अंश, मिथुन का १९ अंश तथा कन्या
का १५ अंश में
तत्तन्मासेषु सूर्यस्य षडशीति मुखान्वयात् ।
षडशीत्याख्यया प्रोक्ता द्वात्मक क्षेत्र संक्रमाः । ४६ ।
उन मासों का सूर्य जाने से और ये स्थान ८६-८६ अंशों के बाद पड़ने से
इन (संक्रान्तियों) को षडशीति मुख कहते हैं । ये सभी द्वात्मक राशियों में ही
होती हैं ।
ओज पादादि चरयोः संक्रमौ विषवाभिधौ
युग्मादि चरये याम्य सौम्या यन तयोदितौ । ४७ ।
विषम पद में स्थित दो चर राशियों (मेष और तुला) में रवि की संक्रान्ति
को विषुव संक्रान्ति कहते हैं । सम पद में स्थित दो चर राशियों (कर्क और मकर)
संक्रान्ति को क्रमशः दक्षिण और उत्तर अयन संक्रान्ति कहा जाता है ।

४०४ सिद्धान्त दर्पण

चर द्वात्मकयो र्मध्ये स्थिर राशि चतुष्टयम् ।
भानो र्विष्णुपदी संज्ञा स्तद् प्रवेशाः प्रकीर्त्तिताः । ४८ ।
चर और द्वात्मक राशियों के बीच में जो चार राशियां (वृश्चिक, कुम्भ, वृष
और सिंह) हैं उनमें रवि के प्रवेश से विष्णुपदी संक्रान्ति होती है ।
पूर्वोक्त क्रम संसिद्धा रवि संक्रान्ति सम्भवः
पुण्य नाड्यस्त्रय स्त्रिंशत् स्वमध्य स्थार्क संक्रमः । ४९ ।
एक राशि का अन्तिम बिन्दु ही दूसरी राशि का आदि बिन्दु है । उस बिन्दु
को रवि बिम्ब की परिधि स्पर्श करने से संक्रमण या संक्रान्ति का आरम्भ होता
है । रवि बिम्ब का दूसरी तरफ का अन्तिम बिन्दु उस बिन्दु से लगने पर पूरा
रवि संक्रमण बिन्दु पार कर जाता है । इसमें ३३ दण्ड (रवि बिम्ब व्यास ३३
कला पार करने का समय) लगता है । अतः यह ३३ दण्ड ही संक्रान्ति का पुण्य
काल है ।
ग्राह्या दशसु संक्रान्तिष्वयने दक्षिणेतु ताः
अन्तःस्थ संक्रमाः सौम्यायनेत्वादिस्य संक्रमाः । ५० ।
दस संक्रान्ति में संक्रान्ति के आरम्भ से ३३ दण्ड ही पुण्य काल हैं । दक्षिणायन
संक्रमण में अन्तिम १६/३० दण्ड तथा उत्तरायण संक्रमण में प्रथम आधा (१६/३०)
अति पुण्यतमाः प्रोक्ताः संक्रमासन्न नाड़िकाः
चलना सन्नता यत्र दिवास्नानादिकं तदा । ५१ ।
अत्यन्त पुण्य काल होता है । यह एक राशि से दूसरी राशि में संचार का
समय है । संक्रान्ति समय दिन में पड़ने से स्नान दान आदि किया जाता है ।
तन्निशार्धादधश्चोर्द्धं सञ्चारे प्राक् परं ततः
आसन्न द्यु दलं पुण्यं निशीथे चेत्तदा तिथैः । ५२ ।
रात्रि के पूर्वार्द्ध में संक्रान्ति होने से उसके पूर्व दिन के दूसरे अर्द्ध तथा रात्रि
के दूसरे अर्ध में संक्रान्ति होने पर अगले दिन के प्रथम अर्द्ध में पुण्यकाल होता
है ।
संक्रान्ति काल निष्ठाया यदिने महती स्थितिः
तत्र कार्याः क्रियाएष विचारोह्या यनादृते । ५३ ।
ठीक आधी रात को संक्रान्ति पड़ने से इसका अधिक भाग जिस दिन होता
है उसी दिन उतने समय पुण्य काल होता है । अतः उसी समय पुण्य क्रिया
करनी चाहिये । अयन संक्रान्ति में इस प्रकार का विचार नहीं होता है ।
नक्रौ याम्यायने पूर्वदिनस्यान्त्य दलं मतम् ।
सौम्या यने 'पर दिन स्यादिमं पुण्यदं दलम् । ५४ ।

संवत्सरादि वर्णनम् ४०५
याम्य अयन या कर्क संक्रान्ति रात में होने से पूर्व दिन का द्वितीयार्द्ध तथा
उत्तरायण (मकर) संक्रान्ति रात में होने से अगले दिन का पूर्वार्द्ध पुण्यकाल होता
है।
अहः संक्रमणे पुण्य महः कृत् संप्रकीर्तितम्
स्मार्त्तं स्तथापि संक्रान्ते रासत्ति र्बहुमन्यते । ५५ ।
दिन में संक्रान्ति होने से सारा दिन दिन पुण्य काल होता है । यह स्मार्त्त
मत होने पर भी संक्रमण का निकट वर्ती समय निश्चय बहुत फल दायक है ।
उक्तो विधेरयं कालो निषेधे त्वामिषादिनः
पूर्वास्त्रिंशत्परास्त्रिंशद् ग्राह्याः पर्वाक्ष नाड़िकाः । ५६ ।
संक्रान्ति पर्व दिन होने के कारण पूर्वोक्त स्नान, दान, आदि के अतिरिक्त
इसमें आमिष भोजन करना मना है । आमिष भोजन का निषेध संक्रान्ति से ३०
दण्ड पहले और उसके ३० दण्ड बाद तक, इस प्रकार कुल ६० दण्ड तक है ।
मासान्तरूय निरंशा रूयौ मासस्यान्त्यादिमौलवौ
यात्रोद् वाहादि कार्येषु त्याज्या कल्याण मिच्छभिः । ५७ ।
किसी राशि का.अन्तिम (३० वां) अंश मासान्त तथा प्रथम अंश निरंश कहा
जाता है । इन दो अंशों में रवि रहने से मासान्त तथा निरंश काल होता है ।
कल्याण चाहने वाले इन दो दिनों में यात्रा विवाह आदि शुभ कार्य नहीं करते
हैं।
बिम्बान्तर्वर्त्तिनः पुंसः संक्रान्ति समयोनृभिः
त्रुटेः सहस्र भागत्वादवगन्तुं न शक्यते । ५८ ।
सूर्य बिम्ब के केन्द्र बिन्दु (पुरुष) का संक्रमण काल एक त्रुटि का हजारवां
भाग होता है । इसको जानना मनुष्य के लिये सम्भव नहीं है ।
सौरे-भचक्र नाभौ विषुव द्वितयं समसूत्रगम्
आयन द्वितयं तैव गतस्र परमास्तताः । इति । ५९ ।
भचक्र की नाभि या केन्द्र स्थल में होने के कारण दो विषुव संक्रान्ति तथा
दो अयन संक्रानति ये चार अति श्रेष्ठ हैं । सायन मेषादि तथा तुलादि जिस प्रकार
मेरु से बराबर दूरी (९०° अंश) पर है उसी प्रकार सायन कर्क तथा मकर आदि
भी ध्रुव से बराबर दूरी पर हैं। अतः इनका माहात्म्य भी समान है । (सूर्य सिद्धान्त
के अनुसार)
सौम्यायनान्मास युगैः शिशिरादि ऋतवस्त्रयः
तथैव याम्यायनतः प्रावृडाद्यास्त्रयोमताः । ६० ।
उत्तर अयन से दो दो मास अर्थात् मकर संक्रान्ति (सायन) से दो-दो सौर
मास तक शीत आदि तीन ऋतुएं होंगी (६ मास तक) इसी प्रकार सायन कर्क

४०६सिद्धान्त दर्पण

*आरम्भ में २-२ मास की वर्षा आदि ३ ऋतुएं होगी ।
अथ पञ्चविधाब्दानां रवि मध्यम सावनैः
दिनैर्मानानि कथ्यन्ते मध्य भुक्त्यनुसारतः । ६१ ।
रवि की मध्यम गति के अनुसार पांच प्रकार के वर्ष में मध्यम सावन दिनों
की संख्या कही जा रही है ।
द्व्यक्षिनाड् यधिकाब्ध्यर्थ रामा (३५४।२२) श्चान्द्राब्द वासराः
सैकनाड्यंक बाणाग्नि संख्या (३५९।१) नक्षत्र वर्ष जाः । ६२ ।
चान्द्र वर्ष में (३५४।२२) तथा नाक्षत्र वर्ष में (३५९।१) सावन दिन होते हैं ।
सावनाब्दस्य ते षष्ठि समन्वित शतत्रयम् । (३६०)
स पञ्च दण्ड रूपाङ्गवह्वयो (३६१।५) जैववर्ष जाः । ६३ ।
सावन वर्ष में (३६०।०) तथा बार्हस्पत्य वर्ष में (३६१।५) सावन दिन होते
हैं ।
सौराब्द वासराः पञ्चषष्ट्युत्तर शत त्रयम् । (३६५)
तिथिभिः (१५) क्ष्माग्निभि (३१) श्वैतैः (३१)
सिद्धै (२४) दण्डादिभिर्यतम् । ६४ ।
सौर वर्ष में ३६५।१५।३१।३१।२४ सावन दिन होते हैं ।
ऋक्षेण भगणं केचिदार्द्धं मासं प्रचक्षते ।
अष्ट दण्डोन नागाक्षि गुणासद् वर्ष वासराः । (३२७।५२) । ६५ ।
कुछ लोग चन्द्र भगण काल को नाक्षत्र मास कहते हैं । इस मत से नाक्षत्र
वर्ष (१२ नक्षत्र मासों में ) सावन दिन संख्या ३२७।५२ है ।
मनूनां राज्य कालोऽत्र मानवं मान मुच्यते ।
न पृथग् दिन मासादि नियमस्तत्र सम्मतः । ६६ ।
स्वायम्भुव आदि मनु प्रत्येक जितने दिन राज्य करते हैं, उस काल को मनु
कहा जाता है । इसमें अलग दिन, मास आदि की गणना नहीं है ।
चान्द्रो मासः पितृदिनं यतैः खांगगुणैः (३६०) समा
सावनैस्तद् प्रमाणं तद्द्वा पाग्नि रस दिग् दिनैः (१०,६३१) । ६७ ।
एक चान्द्र मास को ही पितरों का अहोरात्र कहा जाता है। इस प्रकार के ३६०
दिनों का पितृवर्ष होता है । एक पितृवर्ष में (१०,६३१) सावन दिन होते हैं ।
देवमानं यदेवैतदासुरं परिकीर्तितम्
सौराब्दस्तदहोरात्रो दिनरात्रिविपर्ययात् । ६८ ।
देवताओं और असुरों का मान बराबर है, पर उनका दिन और रात विपरीत

संवत्सरादि वर्णनम् ४०७
क्रम से होते हैं, जिस समय एक का दिन (६ सौर मास का ) उस समय दूसरे
की रात्रि होती है ।
स षष्ठि त्रिशताहोभि (३६०) स्तदब्दः सतु सावनैः
सम्मितः साङ्कदण्डाग्नि गोशक्राग्नि कुभि (१३१४९३१९) दिनैः । ६९ ।
इस प्रकार के ३६० दैव (या आसुर) दिनों का दिव्य वर्ष होता है। जिसमें
(१,३१,४९३१९) सावन दिन होते हैं ।
सौराब्दे रर्बुद गुणैः कृतदिक् चन्द्र वह्निभिः (३११०४०,००,००,००,०००)
सम्मितं ब्रह्मणो वर्षं पुरोक्तास्त दिनादयः । ७० ।
ब्रह्मा का वर्ष (३१,१०,४०,००,००,००,०००) सौर वर्ष होते हैं । ब्रह्मा के दिन
के बारे में कहा जा चुका है ।
मनूनां यत् पृथङ्मानं हरिवंशेऽस्तितद्रवेः ।
गत्याप्यशक्यमाने तुं लिखाभ्यार्षोक्ति गौरवात् । ७१ ।
हरिवंश में मनु का जो अलग मान दिया गया है वह सूर्य की गति से नहीं
निकाला जा सकता है । ऋषि वचन के प्रति सम्मान के कारण में उसे यहां लिख
रहा हूँ ।
यथा हरिवंशे-दिव्यमब्दं दश गुणमहोरात्रं मनोः स्मृतम्
अहोरात्रं दश गुणं मानवः पक्ष उच्यते । ७२ ।
हरिवंश पुराण के अनुसार -१० दिव्य वर्षों का मनु का एक अहोरात्र होता
है । १० मनु अहोरात्र का मनु का १ पक्ष होता है ।
पक्षो दस गुणो मासो मासै द्वादशभिर्गुणैः
ऋतुर्मनूनां संप्रोक्तः प्राज्ञैस्तत्वार्थ दर्शिभिः । ७३ ।
मनु के १० पक्षों का मनु मास, १२ मनु मास का मनु की एक ऋतु होती
है-ऐसा तत्त्व दर्शी ज्ञानियों ने कहा है ।
कालव्याप्ति र्बहुविधा श्रौत स्मार्त्तेषु कर्मसु
तत् शुद्धिश्च विवाहादौ . न्युक्ता स्मृत्युक्ति भावतः । ७४ ।
वैदिक और स्मार्त्त कर्मों में अनेक प्रकार का काल विभाग हैं । स्मृति में इस
प्रकार की काल व्यवस्था का वर्णन होने के कारण विवाह आदि में काल शुद्धि
की व्यवस्था यहां नहीं कही जा रही है ।
चन्द्रगत्यनुसारेण जलोल्लासान्महाम्बुधेः
गंगाद्यवृद्धि नियमः क्वाचित्कत्वादलेखिना । ७५ ।
चन्द्र गति के अनुसार महासागर का पानी ऊपर उठता है । अतः गंगा आदि
नदियों का पानी भी बढ़ता होगा । परन्तु यह विचार ठीक नहीं होने के कारण

४०८ सिद्धांत दर्पण
इस विषय में नहीं लिखा जा रहा है ।
भास्वत्सम्मुख भाग् दले द्युति भृतोऽन्यत्रात्मनश्छायया
व्याप्तस्येन्दव गोलकस्य सतत क्ष्मा सम्मुखै कार्द्धतः
सूर्या शांत्यजतोऽयतो धवलतां वृद्धिक्षया वीक्षते
लोकस्तत् पितरः क्व सम्मुख दले मासार्क पश्चाद् भ्रमम् । ७६ ।
चन्द्र का जो गोलार्द्ध सूर्य के समाने होता है वह सूर्य किरण से प्रकाशित
होता है तथा विपरीत दिशा का आधा भाग छाया में रहता है । छाया अर्द्ध के
सामने पृथ्वी के लोग देखते हैं, कि चन्द्र सूर्य से दूर जाते समय उसकी कला
बढ़ती जाती है । दूसरी दिशा में (चन्द्र सूर्य के निकट) आने पर चन्द्र की कला
घटती है । क्या चन्द्र मण्डल पर रहने वाले पितर भी रवि की एक मास तक
पश्चिम दिशा की गति देख पाते हैं ?
नव्याभ्र भ्रमर प्रभाकर सुता पाथः प्रफुल्लोत्पलः
प्रालेयांशुकलंक कजलमहानीलाश्म नीलोज्वलः
शम्पा चम्पक नीप कुंकुमतमी चामीकरा भाम्बरः
कृष्णः संसृति शर्करा ध्वजनितं मुष्णातु, तृष्णां मम । ७७ ।
नया काला मेष, भ्रमर, यमुना जल, प्रफुल्ल नील कमल, चन्द्र का काला
कंलक, कजल और नीलमणि के समान उज्ज्वल, बिजली, चम्पाफूल, कुकुम,
हल्दी और सोने के समान पीताम्बर धारण करने वाले कृष्ण जगन्नाथ संसार रूपी
लोभ द्वारा जन्मी मेरी तृष्णा को नष्ट करे ।
इत्युत्कलोज्वल नृपाल कुल प्रसूत
श्री चन्द्रशेखर कृतौ गणितेऽक्षिसिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बाल बोधे
द्वाविंशकः प्रथित काल इतः प्रकाशः । ७८ ।
इस प्रकार उड़ीसा के प्रसिद्ध राज परिवार में उत्पन्न श्रीचन्द्रशेखर द्वारा गणना
और दृष्टि में समानता तथा बालकों के ज्ञान के लिये लिखे सिद्धान्त दर्पण में
काल वर्णन सम्बन्धी २२ वां प्रकाश समाप्त हुआ ।

त्रयोविंश प्रकाश
पुरुषोत्तम स्तव वर्णन
या वाग् वाग् ब्रह्म शर्वेडित गुणविततेः श्रीपते वर्णनाढ्या
सास्याद् विश्वाशुभघ्नी सततमपियुता यद्यवद् गव्यपद्यैः
या तद्रक्ता सुपृक्ता पि च सुभग पदै स्त्यज्यते सद्भिरेशा
तस्मात् कृष्णा चले शामल गुण जलधो वर्णनीयोऽत्रविन्दुः । १ ।
सरस्वती, ब्रह्मा और शिव द्वारा पूजित गुणों के समुद्र लक्ष्मीपति की गद्य पद्य
पूर्ण वाक्यों में विस्तृत वर्णन है । वह सारे संसार का क्लेश दूर कर सकते हैं,
इसमें सन्देह नहीं है ।
दूसरे अर्थ से जो वाक्य अत्यन्त सुन्दर पद विन्यास और लय से युक्त हैं ।
पर उसमें भगवान् का गुण कीर्तन नहीं है उसको सज्जन ग्रहण नहीं करते हैं ।
अतः विशुद्ध गुण के सागर नीलाचल नाथ श्री जगन्नाथ का बहुत थोड़ा
वर्णन यहां किया गया है । गुण के सागर होने के कारण सभी गुणों का वर्णन
नहीं हो सकता ।
उत्कल
यत्रक्षेत्रं पवित्रं विलसत सितरुङ् मित्रनेत्रस्य गात्रं
गोत्रा यत्रातिमात्रा स्तदवयव सृती दीपवत्यो विचित्राः
स्वस्थानस्थाः पदस्थापित निजजनता देवताः सन्ति नित्याः
मर्त्याःस्मार्ताः स्मरार्ता हरिचरण रता श्रोत्कलः स्तात्कलिघ्नः । २ ।
जिस देश में कमल नेत्र श्रीकृष्ण का शरीर तथा पवित्र क्षेत्र है, जिसके
अंशरूप में अनेक पर्वत हैं जहां देवताओं के मन्दिरों में सदा दीपक जलते हैं,
जहां देवी देवता अपने अपने मन्दिरों में स्थित होकर भी भक्तों को उच्च पद पर
स्थापित करते हैं, जहां के लोग स्मार्त काम कर नाम स्मरण और प्रभु चरण सेवा
में तत्पर हैं । वह उत्कल देश कलि के दोषों का नाश करे ।
स्तव्याभव्या अभव्या अपि वचन चयैर्नव्य नवैश्च दिव्यै
र्वास्तव्ययत् पृथिव्या मवनत वदनै व्योम्नि निर्वर्ण्यमाना
बाहू व्यूहाग्र विभ्राजित वन जगदा कम्बुचक्रा इवेङ्गे
रौडूः प्रौढः प्रभावो जयति परिवढः सर्वदेशस्य सोऽयम् । २ ।
जहां के निवासी अयोग्य होने पर भी हाथों में चक्र गदा और पद्म धारण
करने वाले विष्णु की तरह दीखते हैं । देवगण आकाश में झुक कर उनकी विचित्र
और बड़े शब्दों में प्रशंसा करते उनको योग्य कहते हैं, वह औड्र देश बहुत प्राचीन
काल से विख्यात है और अन्य देशों से उच्च स्थान पर है ।

४१० · सिद्धान्त दर्पण
पुरुषोत्तम और नीलाद्रि
नानोद्यानोद्यतानो कह वहल दलच्छाय शान्तात पार्त्ति
र्नित्यप्रत्यग्र सौदावलिद लित कला नाथभृत् शैल कान्तिः
अश्रान्त भ्रान्त वात प्रमथित पथिक श्रान्ति रक्षैम शान्ति
कुर्यात् पर्यन्त गर्ज जलधि रधिरुचिः कम्बुभाः कापितुर्नः । ४ ।
जहां असंख्य उद्यानों और उनमें घने वृक्षों के पत्रों की छाया से सूर्य के ताप
का कष्ट नहीं होता । जहां के नये प्रासादों की शोभा कैलाश पर्वत से अधिक है,
जहां हमेशा बहता पवन पथिकों की थकावट दूर करता है ।
जिसके एक तरफ शब्द करता हुआ समुद्र है, तथा जो शंख के समान शोभित
पुरुषोत्तम क्षेत्र हैं वहां हम लोगों का निर्वाण और शान्ति हो ।
यत्रामर्त्याः परित्राकृत सुकत जनत्रासिनोऽ प्येत्यमर्त्यान्
वित्रस्ता वेत्रहस्ता ननुविवृति कृतः प्रेक्ष्य संरुयेच्छवःस्युः
देवा देवाधि देवानन नलिन दृशः सन्ति नानात्मभाजः
कुर्यात् पर्याप्त वीर्या समविषम सिता हास्य धुर्या पुरी नः । ५ ।
वहां पूर्व जन्म में अकर्म करने के भय से हाथ में बेत लेकर स्तुति करते हुये
मनुष्यों से देवता गण मित्रता चाहते हैं, जहां पर अनेक रूपों में स्थिति देवगण
कमलनयन प्रभु को देखते रहते हैं, उस पुरी में अत्यन्त बली और नीलगिरि का
भार उठाने में समर्थ प्रभु जगन्नाथ हमारा मंगल करें ।
अन्तर्वेदी त्रिवेदी निगदितमहिमाधित्यका नित्यकान्ता
स्तुङ्गाः शृंगाणि यस्यामर निकरगृहः पावनी यद् वनीश्रीः
प्राकारो यत्प्रपातः प्रमथ पतुनुतो पत्यका पूर्यदीया
स श्री शम्भोदमारी वितरतु जगतां मेचकं मेचकाद्रिः । ६ ।
जिस अन्तर्यामी की महिमा तीनों वेदों में उच्चप्रशंसित है, जिसकी उन्नत
अधित्यका (पर्वत की उच्च भूमि) सदा रमणीय है, जिसकी चोटियों पर देवतागण
रहते हैं, जिसकी भीड़ से लोग पवित्र हो जाते हैं, जिसकी प्राचीर पर्वत समान
ऊंची है, जिसकी तट भूमि की शिव सदा प्रशंसा करते हैं, तथा जिसकी पुरी
कृष्ण रूपी मेघ के भार से आक्रान्त है उसी नीलगिरि के नाथ हमारा मंगल करें ।
पताका
तुंग प्रासाद श्रृंग प्रतिलव पवनान्दोलिता वैजयन्ती
वांच्छाकल्पद्रुम तीर्थेश्वर शिरसि चरत् पल्लवं श्री जयन्ती
याम्य स्वाम्याति ताम्यञ्जन वृजिन चमूमूर्जितां तर्जयन्ती
पायान्माया भवाब्ध श्रममिव शमिनां विजनैमार्जयन्ती । ७ ।
श्री जगन्नाथ के ऊंचे मन्दिर की चोटी पर प्रतिक्षण वैजयन्ती पताका हवा
से फर-फर होती है । तीर्थेश्वर इच्छा कल्पवृक्ष के सिर पर हिलते हुए वट के

पुरुषोत्तम स्तव वर्णन ४११
पत्तों की शोभा को भी इस पताका की शोभा पराजित करती है । जो पापी लोगों
को अत्यन्त पीड़ित करने वाली यमराज की सेना को भय देते हैं वे संसार पथ
पर थके अपने भक्तों की थकावट दूर कर शान्ति प्रदान करें ।
पताका दण्ड
शौण्डानां दण्डपाणेरपि चरणयुषां दण्डदः केतुदण्डः
श्रुण्डाल स्योर्द्धर्व गत्या अपि किमु विदलन्न्रण्ड मार्तण्ड बिम्बः
चञ्चच्चञ्चत्पताकाश्रय विधुति मिषाद् बाहुराहूत्य लोकः
प्रासादस्यैव दूरादपनयतुभयं पंकतः किंकराणाम् । ८ ।
जो यम के पद सेवक यम दूतों को दण्ड देता है, पताका की ऊर्ध्व गति से
जो प्रखर सूर्य बिम्ब का उत्ताप कम करता है, जो अति स्मणीय भाव से हिलकर
मानों दूर के लोंगो को हाथ हिलाकर बुला रहा है, और मन्दिर की भुजा के समान
है, वह पताकादण्ड हम अकिञ्चन सेवकों के पाप के भय को दूर करे ।
चक्र
चक्रं तन्नक्र शक्र क्रकच कटुतनु क्रान्त्य विक्रान्ति दन्ती
क्रान्ति प्रान्ताति शान्ता जित महित महीः संहरेदं हसां नः
संघसंगात पाता दवितु मविकलं हन्त पातत्य भाजो
भ्राजन् प्रासाद राजोपरि पतितदृशः श्रीशतुर्यां शरूपम् । ९ ।
जिस चक्र ने गज को मुक्त करने के लिए ग्राह के शरीर में आरी तरह घुस
कर काट डाला तथा उसके बाद भी अविकृत शान्त और अपराजित रहा, जो
लक्ष्मीपति भगवान के चतुर्भुज रूप में विद्यमान है तथा मन्दिर के ऊपर चमक
रहा है वह अपने दर्शन करने वाले पापियों के प्रसार और संकट को पूरी तरह
नष्ट करे ।
कलश
पर्यन्तोत्कीर्णनानाभरण चणतनुश्चातनुंः शीतदायी
सोऽन्तः सन्ताप शान्त्यै विलसतु कलशः सत्सुधाधारधामा
यः पद्माकान्त सद्मा भवविवुध शिरोगर्भ काकार चक्रा
क्रान्तश्रूडेव निः श्रेयस पथ पथिकानर्थहद् हृद्र कुम्भः । १० ।
चक्र के नीचे स्थित स्वर्ण कुम्भ ही मन्दिर का कलश है, जो विशाल अमृत
से भरा हुआ है तथा उस पर अनेक प्रकार के चित्र बने हुए हैं, वह सुखदायी
तथा मोक्षमार्ग पर चले वालों का अनर्थ दूर करता है । जगन्नाथ मन्दिर के मस्तक
के केन्द्र में गोल ढक्कन के समान रहने के कारण वह मन्दिर की चूड़ी के समान
दीखता है । वह हमारे हृदय के दुख समूह का नाश करने के लिए सदा विराजमान
रहे ।

४१२ सिद्धान्त दर्पण
आवला बेड़ा
सद वण्टा कर्परात्या मलकत तरति द्योतिता द्योतयन्ती
प्रासादस्थूल मूर्त्तेर्भवतु भगवतः सर्वतोवक्त्र भावम्
याष्टाशोत्यंग जुष्टाष्ट परिगुण चतुः षष्टिमुष्ट्यन्त निष्ठैः
दृष्ट्या भ्रष्टं शिरो वेष्टनमपि तनुते सोम मानिष्ट नष्ट्यै । ११ ।
मन्दिर कलश के नीचे आँवला बेड़ा बड़े घण्टे के खोल के समान तथा
मन्दिर रूपी शरीर का कपाल है । इसके ८८ अंग (आंवला) हैं तथा ६४x८ =
५१२ मुट्ठी दूर से देखने वाले लोगों के सिर से पगड़ी गिर जाती है । यह हमारा
अनिष्ट दूर करे ।
देउल कण्ठ
स्पष्टा स्पष्टा सुकाष्ठा स्वनुघटित पतच्छ्रेष्ठ कण्ठीरवेन्द्रैः
पश्याद्दिश्या घनागप्रभव परिवभोल्लुण्ठना कुण्ठवीर्यैः
दृष्टि प्रेष्ठकृष्ट प्रतिकृति खलुः सुष्ठु नोऽ धिष्ठिताङ्गि
वैकुण्ठागार कण्ठो विघट यतु हठात् कष्टदादृष्ट सृष्टिम् । १२ ।
जगन्नाथ मन्दिर का कण्ठ शीघ्र हमारे कष्टप्रद प्रारब्ध कर्म को अच्छी प्रकार
नष्ट कर दे । इस कण्ठ के आठ दिशाओं में पाप रूपी दिग्गजों को नष्ट करने के
लिए श्रेष्ठ सिंह इनके ऊपर अंकित दीखते हैं । मन्दिर से ये गज और सिंह लगे
रहने से इनका आकार अत्यन्त सुन्दर अतुलनीय दीखता है ।
मन्दिर
जम्बूद्वीपा स्वभूपाखिल भुवन जयस्तम्भ सम्भार भारी
गर्भस्थानन्त विश्वम्भर शरणतया वाञ्चयातीत मानः ।
सांगो पांगोऽति तुंगोऽनुगुणपृथुलतः प्रेक्षकानन्दकन्दः
प्रासादेशोऽनिशं नःस्पृशतु विश दृशः स्वाशयं श्रीश मूर्तिः । १३ ।
समस्त जम्बूद्वीप के सभी राजाओं पर जीत के स्तम्भ के रूप में उनके भार
से आक्रान्त होकर यह प्रासाद अपने गर्भ में जगन्नाथ कोरख उनकी शरण पाने
से अत्यन्त सम्मानित हुआ है । यह प्रासाद अत्यन्त ऊंचा है तथा इसका कोई भी
अंग पतला या शक्ति हीन नहीं है । यह जगन्नाथ की मूर्ति के समान अतुलनीय
और दर्शकों को आनन्द देने वाला है ।
प्राकार द्वन्द्वमध्य प्रतत समदृशत् कुट्टि माट्टापकृष्ट
प्रासाद वेष्टिनोऽधस्तृत मसृणलसन्नुद्गत् पाषाण पट्टः
नाना कारावतारैः हरिण नरवरैः कुञ्जरै रञ्जितोऽङ्गः
पुञ्जं कुञ्जाधिराजालय उपचयिनं व्यञ्जयेच्छर्मणा नः । १४ ।

पुरुषोत्तम स्तव वर्णन ४१३
इसके दो प्राचीरों के बीच की भूमि समान कटे पत्थरों से ढंकी है । उसके
ऊपर छोटे-छोटे देव प्रसाद हैं । ठीक नीचे चिकना संगमर्मर पत्थर है । मन्दिर
की दीवारों पर मत्स्य, कच्छप आदि अनेक अवतार, सिंह और हाथी मूर्त्ति रखी
हुई है । नगेन्द्र श्रीकृष्ण के घर इस मन्दिर से हम लोगों का सुख बढ़ता रहे ।
प्रग्रीवं सोर्ध्व भागं शिखर मृजुतरं मञ्जरी मञ्जुलाभां
भित्ति ध्वस्ताघभीतिं त्रितनुतनुगृहान् वक्त्रशालां विशालाम्
पीठं शिष्टाभिजुष्टं गृहमति विततं श्री जगन्मोहनारूयं
भोगार्थं मण्डपञ्चाद् भूत मवनी धवस्याश्रये प्रश्रयेण । १५ ।
पृथ्वी पति जगन्नाथ की सभी चीजों का मैं भक्ति और उत्कण्ठा के साथ
आश्रय लेता हूँ । मन्दिर के कण्ठ के नीचे (छाती के ऊपरी भाग-प्रग्रीव) लगे
हुए सीधे शिखरों के समूह अत्यन्त सुन्दर दीखते हैं । मन्दिर के गोलाकार दीवाल
को देख कर सभी पाप नष्ट होते हैं । पाताल में स्थित तीन छोटे घर (मन्दिर के
पास जिसमें गणेश, वामन और वाराह हैं) उसके बाद विशाल मुख शाला ।
इसके बाद जगन्मोहन पीठ है जहां के विशाल घर में शिष्ट लोग बैठते हैं । अन्त
में भोग मण्डप है ।
प्रेक्षन शंखस्य नाभौ सतत गति वशाद् बाहु दण्डैः प्रचण्डैः
शाखाभिश्चण्डरोति स्तनुजनिज जनान् वासयन् किं विदूरात्
कल्पान्तेऽप्यन्तहीनः सकल कलुषहत् सिन्धु राजोऽधिराधो
न्यग्रोधः क्रोध कामाद्यरी परिभव कृद् भूत वर्गस्य भूयात् । १६ ।
मन्दिर का कल्पवट प्रलयकाल में भी नष्ट नहीं होता है और सभी प्रकार के
पापों का नाश करता है । यह महासागर के तीर पर अवस्थित है । यह प्राणियों
के शत्रु काम, क्रोध आदि को परास्त करे । शंख क्षेत्र की नाभि में रह कर यह
कल्प वृक्ष पवन से अपनी भुज दण्ड रूपी शाखाओं से सूर्यपुत्र यम के दूतों को
दूर से ही भगा देता है ।
भद्राभूमाधव श्रीमुषल भृदरिभिः शोभितः श्रीवपुष्मा
नष्मानुष्णां शुजोषाम गम शमनघनः पातु देवाधिदेवः
जन्तुर्मन्तुनिहन्तुं प्रभवति शतशोऽह्नाय यन्नाम गृहन्
पश्यन् श्रश्यत्य वश्यं विषयजल निधौ नेवयं दैव भृत्यः । १७ ।
दैव के अधीन प्राणी भी जिस जगन्नाथ का नाम सौ बार लेने से उसी समय
पाप से मुक्त हो जाता है, जिसे देखने से संसार (विषय) समुद्र में प्राणी नहीं
पड़ता है, जो देवताओं के प्रभु और ताप शान्त करने के लिये वर्षा वाले मेघ हैं
तथा जो सुभद्रा, भूदेवी, माधव, बलभद्र और सुभद्रा के साथ शोभा पाते हैं वे
हमारी रक्षा करे ।

७८० सिद्धान्त दर्पण
साङ्गं येनेन्दु पद्मा द्यखिल मुपमिति द्रव्य मासीत् कृतार्थं

  • विद्बद् भिर्वर्णमानं यदनुमितिकृतः कृत्रिमं विश्वमाहुः
    शब्द ब्रह्म प्रमाणं यदवयव जने यौंऽसकृन्नारदाद्यैः
    साक्षाल्लक्षोऽपि साक्षी भवति नवनवः श्रीधवः सोऽ वतान्नः । १८ ।
    जिसके अंगों से उपमा के कारण चन्द्र और पद्म आदि धन्य हो गये हैं,
    जिसकी कल्पना करने से तार्किकों को यह सचरा चर विश्व ही कृत्रिम (ईश्वर
    की तुलना में) लगता है । जिसके अवयव रूप जगत् की उत्पत्ति में शब्द ब्रह्म
    (ॐ) ही प्रमाण है, जिसे नारद आदि महर्षि प्रत्यक्ष देख पाते थे और जो स्वयं
    सभी के द्रष्टा होकर स्थित है, वे लक्ष्मीपति भगवान नित्य नये रूपों में हमारी
    रक्षा करें ।
    द्रव्यैर्जातुपमानं न भवति कृतिनां प्राकृतैर्जात दोषं
    सर्वान्तर्यामि भवाद्युति मति कृतिभिः यस्य लोकोत्तरस्य
    व्यक्ताव्यक्तेषुसत्वे स्वपरिमित निज व्याप्ति मुद् व्यक्त कामः
    स्तस्मादो दिव्यसिंहोऽभवदिह च महादारु देहः सनो ऽ व्यात् । १९ ।
    भगवान् लोकोत्तर होने के कारण किसी भी प्राकृतिक वस्तु से तुलना (उपमा)
    कर उनका रूप, बुद्धि या प्रयत्न का वर्णन करने में कवियों का दोष होता है ।
    वह सभी के भीतर स्थित हैं । उन्होंने सभी व्यक्त तथा अव्यक्त द्रव्यों में अपने
    असंख्य रूपों को दिखाने के लिये दिव्य सिंह (नृसिंह) का रूप धारण किया
    था । वही दारुब्रह्म रूप में हमारी रक्षा करें ।
    पारावार प्रतीरप्रथित वर महापादपोः स्पर्शनाशा
    प्रोद्यत् प्रासाद पीठार्पित विपुल वपुः पाण्डु पद्मोपमाक्षः
    पूर्ण प्रेम प्रदान प्रवण उपनिषद् प्रार्थ्य मानानुगम्रः
    पापौघाम्नां पुनीयात्पतित पतिमयं पूतना प्राण पायी । २० ।
    समुद्र किनारे कल्पवृक्ष की दिशा में उसे स्पर्श करते हुए सुन्दर मन्दिर में
    पीठ (रत्न सिंहासन) पर विराजमान महाकाय जगन्नाथ की आंखें धवल कमल
    के समान हैं । उन्होंने पूतना राक्षसी के प्राण पी लिया था । उपनिषद् उनकी
    स्तुति करते हैं । वह भक्तों को सदा स्नेह देते हैं । अतः मेरे जैसे पापराशि का भी
    उद्धार करे ।
    अथ श्री जगन्नाथस्य द्वाभ्यां समुद्र साम्यम् -
    लक्ष्मीभृ नांगसद् मामृत खनिरशनि त्रासितक्ष्मा भृदीश-
    स्थानं स्वर्गापगायाः प्रभुरखिलनृणां पापसन्ताप हन्ता
    श्याम श्रीमान् कूर्माद्यमित तनुधरः शंखचक्राब्जवाहः
    कल्पान्त प्रस्त लोकः कलयतु कमलं तीर्थराट् क्रान्ति शन्त्यै । २१ ।
    जगन्नाथ लक्ष्मी पति हैं तथा समुद्र भी लक्ष्मी का पिता है । भगवान नाग

पुरुषोत्तम स्तव वर्णन ४१५
(शेष) को घर बनाये हैं । नाग का घर समुद्र है । दोनों अमृत के भण्डार हैं ।
भगवान ने मत्स्य कच्छप आदि प्रत्येक रूप धारण किया था, ये सबी रूप वाले
प्राणी समुद्र ने भी धारण किये हैं । इन्द्र वज्र से रक्षा के लिए पर्वत (गोवर्द्धन)
का आश्रय कृष्ण ने लिया था-समुद्र ने भी वज्र से रक्षा के लिए पर्वत (मैनाक)
को आश्रय दिया था । विष्णु से गंगा की उत्पत्ति (नख से हुयी), समुद्र में गंगा
मिलती है, अतः दोनों गंगा के स्वामी हैं । भगवान के हाथो में शंख, पद्म आदि
है जो समुद्र में भी है । सृष्टि के अन्त में वे दोनों भुवनों को जनप्लावित करते
हैं । वे सभी तीर्थों के राजा हैं । वे दोनों दुःख शान्ति के लिए सुख (जल) का
विवरण करें ।
यत्रास्ते सानुबिम्बादित सित किरण प्रोज्ज्वलं नेत्रयुग्मं
नासाबाहूदरांह्रिं स्फुरति च विविध द्वीप शोभानुकारि
वारीतं श्यामल श्रीमर्कर सुरुचिरे कुण्डले वाड़वाग्नि-
ज्वाले वाद्यत् किरीटं तरणिव दधरः सोऽस्तु शान्त्यै कृपाब्धिः । २२ ।
जिसके दोनों नेत्र उदय होते हुए सूर्य और चन्द्र बिम्बों के समान है । (कृष्ण
नेत्र गोल तेजस्वी हैं) । समुद्र में भी दोनों उदय होते सम उसके नेत्र समान दीखते
हैं । जिसके नाक, भुजा, पेट और पैर आदि प्रत्येक द्वीपों के समान है (कृष्ण के
भुजा, पैर आदि द्विप अर्थात् हाथी के समान विशाल हैं) समुद्र के द्वीप उसके
अंगों के समान बाहर निकले हैं । जिनकी श्यामल शोभा है (कृष्ण और समुद्र
दोनों नीले हैं) जो मकर कुण्डल धारण किये हैं (कृष्ण के कुण्डल का आकार
मकर जैसा है । समुद्र के भीतर मकरों का समूह है), जिसका किरीट् बड़वानल
के समान तेजस्वी है (कृष्ण की मणि किरीट का तेज अग्नि के समान है, समुद्र
का बड़वानल उसकी मणि के समान है), जिसका नौका के समान अधर है ।
कृष्ण के ओठ नौका के समान सामान्य वक्र हैं, समुद्र का प्रवेश द्वार नौका है-
मुख के प्रवेश की तरह)- वे दया सागर (कृष्ण और समुद्र) हमारी शान्ति के
लिये विराजमान रहें ।
ब्रह्माण्ड साम्यम्
विभ्रद् वस्त्र क्षपे शौ नयन युग मिषादगभ शोभामदभ्रां
शुभ्र श्री वक्त्र दम्भादधर पुर रुचि व्याजतः सान्ध्यवेलाम्
तिर्यग् विस्तीर्ण वृत्तातुल भुजबल यच्छद् मनश्चक्र वालं
शैलं मध्यच्छला काञ्छल मुपरि नुतात् विश्वभर्त्ता शुभंनः । २३ ।
ब्रह्माण्ड के सूर्य चन्द्र की तरह कृष्ण के दो नेत्र हैं । ब्रह्माण्ड के मेघ की
तरह कृष्ण भी श्यामल है । ब्रह्माण्ड (आकाश) के समान कृष्ण का स्वच्छ तेज
है । ब्रह्माण्ड की सन्ध्या के समान लाल रंग कृष्ण के अधरों का है । भगवान
की दोनों भुजायें ब्रह्माण्ड के दिगवलय की तरह तिर्यक् फैली हुयी, गोल और