सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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स्मृति में है- हर समय-सभी देशों में और सभी कामों में भगवान ही स्वामी
रूप में है । वह सभी के रूपों में और अनादि है । वे हरि मेरे कल्याण वृद्धि
करें ।
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञ क्रियादिषु
न्यूनं सम्पूर्णतां याति स द्यो वन्दे तमच्युतम् । ७ । इति ।
तपस्या, यज्ञ आदि सभी कार्यों की कमी यात्रुटि जिसके नाम स्मरण या गान
से उसी समय पूर्ण हो जाती है । उसी अच्युत की में वन्दना करता हूँ । (उद्धरण
समाप्त)
निर्गुणत्वात् परेशस्य तत्स्मृति र्घटते कथम् ।
इति चे दुच्यते तस्य वाशिष्ठोक्त्या शरीरिता । ८ ।
यदि परमेश निर्गुण हैं तो उनका स्मरण किस प्रकार हो सकता है । इस प्रश्न
के उत्तर में योग वाशिष्ट रामायण में भगवान के शरीर धारण करने के विषय में
जो कहा है वह उद्धृत किया जा रहा है ।
तथा हि वाशिष्ठ रामायणे-
नित्योजन्यश्च कालौ द्वौ तयोराद्य परेश्वरः
सोऽवाङ्मनस गम्योऽपिदेही भक्तानुकम्पया । ९ ।
वाशिष्ठ रामायण में इस प्रकार है-नित्य और जन्य- दो प्रकार का काल है ।
इनमें परमेश्वर ही प्रथम और नित्यकाल है । वाणी और मन द्वारा उनकी कल्पना
नहीं की जसकती, पर भक्तों पर कृपा करने के लिए वे शरीर धारण करते हैं ।
खड्ग पाशधरः श्रीमान् कुण्डली कवचान्वितः
ऋतु षटक् मयोदार वक्तर् षट्क समन्वितः । १० ।
भगवान् खड्ग और पाश धरने वाले, कवच तथा कुण्डल से सजित हैं ।
वह ६ ऋतुओं के रूप में ६ मुख धारण किये हुए हैं ।
मासो द्वादश कोद्दाम भुज द्वादश कोद् भटः
स्वाकार समया वहा वृतः किंकर सेनया । इति । ११ ।
उनकी १२ भुजाओं का पराक्रम १२ मास है । वह अपने ही आकार और रूप
वाले सेवकों से सदा सेवित है । (उद्धरणं समाप्त)
यद्यप्येतत्काल रूपं तथाप्यस्य रमापतेः
धृतनानातनोर्भक्त्यै कार्यास्वेष्टा कृति स्मृतिः । १२ ।
लक्ष्मीपति इस प्रकार काल रूप होने पर भी भक्तों के लिये अनेक प्रकार का
रूप धारण करते हैं । अतः भक्त अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी रूप में उनका
स्मरण करते हैं ।