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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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४०० सिद्धान्त दर्पण
की वृद्धि और क्षय का माप करने वाला चान्द्र मास है । सूर्य की राशि गति का
समय मापने वाला सौर मास तथा दिन रात
त्रिंशतानि व्यतीतानि भचक्र भ्रमणानिच
मासः स उच्यते चान्द्रः सौरः सावन ऋक्षकः । २१ ।
३० तथा ३० नक्षत्र भ्रमण का माप करने वाला समय क्रमशः सावन और
नाक्षत्र मास कहलाता है ।
पक्षेते परि गृह्येते देवता पितृकार्ययोः
यौ तौ पक्षौ शुक्ल कृष्णौ चन्द्र वृद्धिक्षयाद् भवौ । २२ ।
चन्द्र की वृद्धि और क्षय के अनुसार शुक्ल और कृष्ण पक्ष होता है । उन दो
पक्षों का उपयोग देव और पितृकार्य में होता है ।
तनोति यो वर्द्धमानां क्षीयमाणां कलां विधोः
एकां काल विशेषोऽयं तिथि रित्युच्यते बुधैः । २३ ।
बढ़ने वाले या घटने वाले चन्द्र की एक एक कला का जिस समय द्वारा
हिसाब होता है उसे तिथि कहते हैं ।
इत्थं याम मुहूर्त्तादि कालांगाना मदेशकः
व्युत्पत्तिर्न मया प्रोक्ता ग्रन्थ विस्तार साध्वसात् । २४ ।
इसी प्रकार याम, मुहूर्त आदि समय के अनेक अंग है । ग्रन्थ का विस्तार
बढ़ने के भय से इन सबकी व्युत्पत्ति नहीं कही है ।
नवधा कालमानानि चान्द्र मार्क्ष्य च सावनम्
बार्हस्पत्यं ततः सौरं मानवं पैत्र मेव च । २५ ।
समय का विभाग ९ प्रकार का है- चान्द्र, नाक्षत्र, सावन, बार्हस्पत्य, सौर,
मानव, पैत्र, दैव और ब्राह्म ।
दैवं ब्राह्मय मिति प्रोक्तान्यत्र पञ्चभिरादिमैः
व्यवहारो मनुष्याणां मन्वादीनां स्वनामतः । २६ ।
इनमें प्रथम पांच समय मान ही मनुष्य के व्यवहार में आते हैं, बाकी मानव
आदि का व्यवहार अपने नाम के अनुसार होता है ।
भू गर्भ निः सृतात् सूत्रात् सूर्य मण्डल मध्यगात्
प्राचीं यद्याति शीतांशूश्चान्द्र मानं तदुच्यते । २७ ।
भू केन्द्र से सूर्य केन्द्र तक के सूत्र से पूर्व की तरफ, १२ अंश जितने समय
में चन्द्र जाता है, उसको चान्द्र मान (१ तिथि) कहते हैं ।
व्यर्केन्दु भगणो मास स्तदर्द्धं पक्ष ईष्यते ।
तिथि स्तत् शर रूपांश (१५) स्तदर्द्धं करणं मंतम् । २८ ।