सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
पृष्ठ 494, कुल 609 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वाविंश प्रकाशः
कालाधिकार
संवत्सरादि वर्णनम्
कलान्मानमकाल दण्ड निलयं कालाम्बु जन्म द्युतिं
कालो केलि कला जरार्च्चित पदं काला चलालं कृतिम्
क्रुध्यत् कालिय कालिकुब्जनकृतं काकोदरी काकुभिः
कृष्णं कृप्त कृपं करोभ्यभिवदन् कालाधिकार क्रमम् । १ ।
भगवान् कृष्ण काल के स्वरूप हैं और यम का काल दण्ड उनमें लीन (लुप्त )
हो जाता है । उनकी नील कमल जैसी शोभा है । उनके पदों की अर्चना पार्वती
की क्रीड़ा के चन्द्र रूप शिव के द्वारा की गयी है । वह नीलाचल पर जगन्नाथ
के रूप में स्थित है । वह नीलाचल पर जगन्नाथ के रूप में स्थित है । उन्होंने
क्रूर कालिय का दमन किया तथा नाग स्त्रियों का रोना सुनकर उन पर दया की ।
उन्हीं प्रभु को प्रणाम कर मै कालाधिकार लिखता हूँ ।
कालास्तु द्विविधो नित्यो जन्यश्चेति प्रकीर्तितः
नित्यः श्री परमेशोऽत्र काल कालापराह्वयः । २ ।
काल के दो प्रकार हैं-नित्य तथा जन्य । स्वयं परमेश्वर नित्य काल का रूप
हैं । वह काल की गणना करते हैं । अतः उनका अन्य नाम काल है ।
विशेषं कलनात् कालो जन्यः स तु तथेश्वरः
तत् स्मृति सर्वकार्येषु कर्तव्या मंगलार्थिभिः । ३ ।
जगत् का हिसाब करने के कारण वही पर परमेश्वर जन्य काल भी है ।
अतः कल्याण चाहने वाले लोग सभी कामों में परमेश्वर का स्मरण करते हैं ।
कौम्र्मे - अनादि के भगवान् कालोऽनन्तोऽक्षरः परः ।
सर्वाङ्गत्वात् स्वतन्त्रत्वात् सर्वात्मत्वात् महेश्वरः । ४ ।
कूर्म पुराण में कहा है- भगवान अनादि और अनन्त काल रूप हैं । उनका
क्षय नहीं होता । वह सभी के रोम रोम में तथा उसके बाहर भी हैं वह महेश्वर,
सर्वगत, स्वतन्त्र तथा सभी की आत्मा है ।
पर ब्रह्म च भूतानि वासुदेवोऽपि शंकरः
कालेनैव च सृज्यन्ते स एव ग्रसते पुनः । इति । ५ ।
काल ही स्वयं परम ब्रह्म, वासुदेव और शंकर है । काल द्वारा ही संसार
उत्पन्न तथा पीछे नष्ट हो जाता है । (उद्धरण समाप्त)
स्मृतिश्च-सर्वेषु कालेषु समस्त देशेषु तथेश्वरे श्वरश्च ।
सर्वैः स्वरूपै भगवान नादि र्ममास्तु मांग्ल्य वृद्धये हरिः । ६ ।