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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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संवत्सरादि वर्णनम् ४०१
चन्द्र से सूर्य का अन्तर एक भगण होने से एक चान्द्र मास होता है । इसके
आधे को पक्ष कहते हैं । पक्ष के १/१५ भाग को तिथि तथा तिथि के आधे भाग
को करण कहते हैं ।
व्रतोपवास पर्वादि कृत्याकृत्य पितृक्रियाः ।
चान्द्र मानेन गृह्यन्ते मास वृद्धिक्षयादयः । २९ ।
मास की वृद्धि क्षय, व्रत, उपवास, पर्व आदि, कृत्यकाल और अकृत्य काल,
तथा पितृक्रिया-सभी चान्द्र मान (तिथि) के अनुसार ही किये जाते हैं ।
पर्वान्ते कृत्ति का दीनां योगद्ये कार्तिकादयः
मासाः प्राग् भिर्मता स्त द्यदृक्षस्थ बृहस्पते । ३० ।
पूर्णिमान्त में कृत्ति का आदि नक्षत्र के साथ चन्द्र के संयोग के कारण जिस
प्रकार कार्तिक आदि मासों का नाम दिया गया है । उसी प्रकार जिस नक्षत्र में
रहकर वृहस्पति अमान्त में -
उदयस्तद् भ नामा ब्दाः सूर्य सिद्धान्त सम्मत-
तल्लक्षणान्यति व्यासे नर्त्र प्रोक्तानि विस्तरात् । ३१ ।
उदय होता है, उसी नक्षत्र के अनुसार बार्हस्पत्य वर्ष का नाम होता है ऐसा
सूर्य सिद्धान्त का मत है । पर ग्रन्थ विस्तार के भय से इन सभी लक्षणों का वर्णन
नहीं किया जा रहा है ।
कृत्ति का शब्द वाच्यं यत् कृत्तिका रोहिणी द्वयम्
तत् पर्वान्ताद्वयन्मासो निरुक्त कार्तिको यदि । ३२ ।
कार्तिक और रोहिणी दोनों को कृत्तिका मानकर इसमें किसी के साथ पूर्णान्त
में चन्द्र का योग होने पर यदि उस मास को कार्तिक कहा जाता है,
तदूर्ज्ज मार्ग पर्वान्त भरणी रोहिणी यतौ
अब्दे त्विषोर्जतपत्ति र्भवेत् कार्तिक मार्गयोः । ३२ ।
तो कार्तिक और मार्गशिर पूर्णान्त में क्रमशः भरणी और रोहिणी के साथ
योग होने पर उस वर्ष इन मासों को क्रमशः आश्विन और कार्तिक क्यों नहीं कहा
जाता है ।
तथापि पूर्व चलित व्यवहार व शादिमे
कृत्तिका मार्ग-शीर्षादि नामभिः प्रायिका मताः । ३४ ।
यह असुविधा होने पर प्राचीन काल से प्रचलित व्यवहार के अनुसार कार्तिक
और मार्गशीर्ष आदि मासों की गणना होती है । यह नक्षत्र योग भी प्रायः घटता
है ।