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सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

गोलाधिकारे गोलादि वर्णनम् ३५१
एक कक्ष और बहुकक्ष - दो प्रकार के गोल यन्त्रों का वर्णन हुआ । अपनी
(या किसी अन्य वस्तु) की छाया भ्रम (छाया की दिशा और लम्बाई) या यन्त्र
घूमने से भी काल का ज्ञान आसानी से हो सकता है । तथापि अल्पज्ञ लोगों को
समय ज्ञान के लिए कालयन्त्र के बारे में कहता हूं ।
चक्रेण यष्ट्या धनुषा नरेण तूर्येण घट् या फलकादिना च
काचैः परोभिः सिकतादिभिश्च सूत्रैः स्वकालं कलयन्तितज्ज्ञाः ७७ ।
चक्र यन्त्र से (नाड़ी मण्डल का या दृङ् मण्डल में) यष्टि यन्त्र में, वृत्तार्द्ध
चाप यन्त्र से, शंकु से, वृत्त चतुर्थांश से, घड़ी यन्त्र से, भास्कर द्वारा वर्णित
फलकादियन्त्र से, काठी से, पानी से, बालू से, या सूत्र यन्त्र से भी समय का
ज्ञान हो सकता है । यन्त्र जानने वाले व्यक्ति प्रत्येक यन्त्र से काल ज्ञान कर सकते
हैं ।
गोलार्द्ध यन्त्रं समया वगत्त्यै कृत्वामृदाकुम्भ दलस्वरूपम्
दृक् सिद्ध मत्यामवनौ निघाय तदूर्ध्व वक्रं खलु भार्द्धबुद्धया । ७८ ।
मिट्टी के घड़ने के निचले आधे भाग के समान एक गोलार्द्ध यन्त्र बनायें ।
उसको जमीन पर ऊपरकी तरफ मुंह कर रख उसमें उस स्थान का पूर्व पश्चिम
आदि दिशा का साधन कर चिह्न देंगे । पृथ्वी के ऊपर उसका जो वक्र भाग है ।
उसको वृत्तार्द्ध मानें ।
उदग् ध्रुवं दक्षिण भित्तिमस्तकादधोऽक्ष भागे रुदरे निवेश्यच ।
ततो ध्रुवाक्रान्तर भाग तुल्य शलाकयोन्मुखया ध्रुवस्थया । ७९ ।
उसके उदर (भीतरी भाग) में पूर्वापर और याम्योत्तर वृत्त खींचेंगे । दक्षिण
उत्तर मस्तक से नीचे अक्षांश अन्तर से उत्तर ध्रुव देकर कलश के पेट में चिह्न
देंगे । तब ध्रुव और सूर्य की अन्तर रेखा व्यासार्द्ध से ध्रुव को केन्द्र मान एक वृत्त
खींचेंगे ।
विलिख्यतत् पश्चिमभित्तिमूर्ध्वतः पुरः स्थभित्यन्त विसर्पिरेखिकाम् ।
निघाय तद् व्यास दल प्रमाणकं नरञ्च साध्ये सरलं दिनादितः । ८० ।
यह वृत्त उस समय के लिए अहोरात्र वृत्त होगा । इस अहोरात्र वृत्त के
व्यासार्द्ध के बराबर ऊंचाई का एक सरल शंकु गोलार्द्ध के बीच में रखेंगे । जो
अहोरात्र वृत्त होगा । उसको भी
स्वघस्र नाड़ी पल लक्ष लक्षिते पुरोक्त रेखावलयार्द्ध केऽन्वितात्
नरप्रभाप्राप्तसमयं प्रतीयतां सितांश्रुतो निश्यपि सूक्ष्म बुद्धिना । ८१ ।
नाड़ी पल आदि से चिह्नित करेंगे । उस पर शंकु छाया की स्थिति से समय
का ज्ञान हो जायेगा । बुद्धिमान् लोग इसी यन्त्र द्वारा रात में भी चैन्द्र से समय
का ज्ञान कर सकते हैं ।

३५२ सिद्धान्त दर्पण
नभसि निरवलम्बे खेचराणामुडुनां
ग्रहलव घटिकादौ रन्तरं यन्त्र वेधैः
परिकलयितुमिष्टं मानयन्त्रं प्रवक्ष्ये
धर धरणीरुहादि स्याद् यतेऽपिप्रमेयम् । ८२ ।
निराधार आकाश में ग्रह तथा नक्षत्रों का अन्तर राशि, अंश, कला, आदि
निकालने के लिए अब मानयन्त्र के विषय में कहता हूँ । इस यन्त्र से पर्वत और
वृक्ष आदि का मान भी जाना जा सकता है ।
घनरस समभूमौ वृत्तमालिख्य भांशां (३६०)
गुल परिमिति मेतत्स्वां शकैरंकयित्वा
ऋजुलघुमिह दत्वा पट्टिकां पृष्ठलग्नां
परिधि लवलगद्भिः केन्द्र निर्यात सूत्रैः । ८३ ।
समतल भूमि को गाढ़े रससे लीपकर चिकना करते हैं । और उसमें ३६०
अंगुल का एक वृत्त बनाकर उसके प्रत्येक अंश (परिधि पर १ अंगुल की दूरी)
पर एक चिह्न देते हैं । ठीक इसी वृत्त के बराबर एक काठ पट्टा का वृत्त बनाते
हैं, जो इसे ढंक सके । काठ पट्टा में भी केन्द्र और अंशों को चिह्नित कर केन्द्र
से परिधि के ३६० अंश चिह्नों तक एक एक रेखा खींचते हैं । भूमि के वृत्त को
भी ३६० भाग में बांटते हैं ।
विरचयितु बहि स्थे पट्टिकान्तेलवाङ्का
स्तनुलवन समुत्थां स्तत्र सोपान कल्पान्
लगयतु पुनरस्या मध्य भागेऽपिदण्डम् ।
दृढ़मृजु मथ वृत्त व्यासतोऽर्द्ध प्रमाणम् । ८४ ।
पट्टी के प्रति अंश का विभाग कर कला आदि भी किया जा सकता है ।
इस पट्टे के केन्द्र में एक दृढ़ और सीधी छड़ी लगाते हैं, जिसका प्रमाण उस वृत्त
के व्यासार्द्ध के बराबर होगा ।
सदल गृह समावा पट्टिका राशि तुल्या
तिथिलव कलिता वा वाञ्छितां शैर्मिता स्यात्
पुनरिह लवनांकाद् व्यंशकाख्यं शका वा
कृतःशर लवका वा स्वेच्छया निर्मिताःस्युः । ८५ ।
इस पट्टे का परिमाण ४,५,३०,१५ वा इष्टांश भी हो सकता है ।
नयन तलगमूलं पाणिनादाय दण्डं
द्विवर विवर मग्रे पट्टिकांशैः प्रमातात्
ग्रह भव सति चिह्नात् प्रत्यगा गामि तत्त-
द्विवर लवकषट्कैस्त्रिज्यया (३४३८) ताड़ितैस्तु । ८६ ।

गोलाधिकार गोलादि वर्णनम् ३५३
पट्टे के कोणों को दो ग्रहों या ग्रहनक्षत्र की सीध में रखकर यष्टि और कोण
को ग्रह की सीध में देखते हैं । पट्टी के कोण का जो अन्तर होता है, उसे ६ से
भाग देते हैं तथा त्रिज्या से गुणा करते हैं ।
निजनिजदिन जीवा भाजितै नाड़िकास्यु
र्गिरि मुख नर मूल स्वान्तरा हस्त संघात्
सकल लवक शंकु ज्या हता दृग् ज्ययाप्ता
भवति फलक राद्यं मानम द्विद्रुमादैः । ८७ ।
फल को उस दिन के अहोरात्र वृत्त के व्यासार्द्ध से भाग देने पर वह अन्तर
की नाड़ी होगी । पर्वत का अग्रभाग और शंकु मूल के बीच की दूरी को शंकुज्या
से गुणा कर दृग्ज्या से भाग देने पर पर्वत की उच्चता आयेगी । वृक्ष की उच्चता
भी इसी प्रकार निकाली जा सकती है ।
वहल सलिल वर्षं वीक्ष्यतस्योर्ध्व सीमो
न्नतनत लवकेभ्यः शंकुदृग्ज्ये विधाय
ख खशरकर (२५००) हस्ता दृग्ज्य काघ्ना नराप्ताः ।
स्व जलद तल भूम्योरन्तरं प्रायशः स्यात् । ८८ ।
खूब वर्षा करने वाले मेघ को भी देखकर मानयन्त्र से उसका उन्नतांश या
नतांश निकाला जा सकता है । उसकी दृग्ज्या को ( २५००) हाथ से गुणा करने
पर शंकु से भाग देने पर अपने और मेघ के केन्द्र तल के बीच की दूरी होगी ।
(नतज्या से भूमि की दूरी और उन्नतज्या से मेघ की जमीन से ऊंचाई ज्ञात होगी ।)
नर युगल सुसाध्यं मानमानेतु मस्मा-
दपि कलयितुशंकुस्थानयोः सन्निविष्टः
नगमुख समदृश्यं पट्टिकान्तः प्रदेशं
नरमिरितिरिति दण्ड भेदमेयान्ति कस्थम् । ८९ ।
दो शंकु द्वारा पर्वत और वृक्ष आदि की ऊंचाई निकालने की विधि में शंकु
के समान स्वयं बैठकर मान यन्त्र से पर्वत को देखा है । इस यन्त्र का डण्डा ही
शंकु है । मेघ पर्वत आदि के निकट स्थित शंकु को छाया माने)
अनिकट भुवि सिद्धे शंकु भे संस्कृते स्तः
प्रथमनर विनिघ्न्यौ दूरशंकु प्रभक्ते
कथितमपरकर्म क्ष्मा समात्रास्तु नो वा
भवति सम भगा दे रूर्ध्वं तिर्यक् प्रमाणम् । ९० ।
इस प्रकार दूर स्थान के शंकु और उसकी छाया को प्रथम शंकु से गुणा कर
२ य या दूरस्थ शंकु से भाग देने पर दो छाया आयेगी । इसके बाद की विधि
पहले कही जा चुकी है । इस विधि में पृथ्वी समतल या तिरछी हो तब भी पर्वत
की उच्चता और उसका विस्तार आयेगा ।

३५४ सिद्धान्त दर्पण
स्फुटतर परिमाण स्ववगतौ तु दण्ड
शर (५) करमित दैर्घ्यः कार्य्यतत् शिखायाम्
विकलयिषित साम्य प्रापिताक्ष्णा शलाका
नर इति लगनीया संस्कृतिः स्यात्तथैव । ९१ ।
यदि वृक्ष और पर्वत आदि का अति स्पष्ट परिमाण जानना हो तो यष्टि को
५ हाथ लम्बा कर देंगे । इस दण्ड के अग्रभाग की सीध में पर्वत की चोटी को
देखेंगे । इसके बाद आंख और पर्वत के बीच एक और शंकु रखेंगे जिसका अग्र
भाग भी पर्वत की चोटी की सीध में हो । तब पहले की विधि से इसका सभी
संस्कार करेंगे ।
ध्रुव समनग शृंगं वीक्ष्य तत् प्राक् प्रतीच्यो
क्वचिदुमविवरज्यां चोन्नतज्यां तथाद्रे
स्थिति युगविवरघ्नो सोन्नतज्या द्वयाप्ता
भवति शिखर मानं दूरता दृग् ज्याकान्तः । ९२ ।
ध्रुव देखने की विधि से (याम्योत्तर वृत्त में) पर्वत शृंग को देखेगे । उसी पर्वत
के पूर्व पश्चिम अन्तरज्या और उन्नतज्या निकालेंगे । उस उन्नत ज्या को पूर्वापर
अन्तरज्या से गुणा कर २ से भाग देने में फल पर्वत आदि की उच्चता होगी । दृग्
ज्या (नतज्या) से दूरता आयेगी अर्थात् नतज्या को उसी पूर्वा पर अन्तर से गुणा
कर २ से भाग देने पर पर्वत की दृगे ज्ञान होगी ।
चक्रवृत्तं तदलं चाप संज्ञं चापस्यार्द्धं यष्टि नामास्ति यन्त्रम् ।
चक्रेणा हो रात्रा कालस्तदर्द्धं चापेनां द्विज्ज्ञायते तस्य यष्ट्या । ९३ ।
चक्रयन्त्र वृत्ताकार है । उसका आधार या वृत्तार्द्धाकार चाप यन्त्र कहा जाता
है ।
पुनः चाप के आधा को यष्टि यन्त्र या तुरीय (चतुर्थांश) यन्त्र कहा जाता है ।
चक्र यन्त्र से दिन और रात का समय, चाप या वृत्ताद्धं यन्त्र से अहोरात्र का आधा,
पुन, यष्टि यन्त्र से (तुरीय यन्त्र से) दिन का अहोरात्र का चतुर्थांश (दिनार्द्ध)
निकाला जा सकता है ।
काच पात्रं युगलं परस्परं सम्मुखीन मणु मध्यरन्ध्रकम्
सं विधाय जल पूरितैकतानिः सरेदपर पात्र के जलम् । ९४ ।
ऊपर नीचे के दो कांच के बर्तनों के बीच में एक छोटा छेद होगा । जिससे
ऊपर के पात्र का जल नीचे के बर्तन में जा सके ।
यावताथ समये नतावता व्यस्त संस्थिति वशात् पुनस्ततः
ऊर्ध्वत स्थल गतेऽपि नःसरेदित्य मत्र सिकतापि निःसृतिः । ९५ ।
पहला पात्र ऊपर रहने पर उससे नीचे के पात्र में जल गिरने में जितना समय
लगता है, उसे उल्टा रखने पर ऊपर के दूसरे पात्र से उतने ही समय में पहले

गोलाधिकारे गोलादि वर्णनम् ३५५
पात्र में जल जायेगा । इसमें जल के बदले बालू का भी व्यवहार किया जा सकता
है । इस समय के अनुसार दिन का समय भी जान सकते हैं ।
मयूर नर वानराः कुशल शिल्पिना कल्पिताः
ससूत्र नलको दराः सलिल गामि पात्र स्थिताैः
रसादिभ रनुद्भूतं निजमुखैश्च मण्यादिकं
गिलन्ति गुण गुम्फितं प्रतिमुहूर्त मिच्छा वशात् । ९६ ।
अच्छे शिल्पी द्वारा खोखला नर या वानर मूर्ति बनाकर उसके पेट में नली
लगाकर उसके भीतर एक लोहा का तार लगायेंगे । एक पानी से भरे बर्तन में
रखने पर पारद की तरह आकर्षण (Surface tension) के कारण उसमें बूंद बूंद
जल जाय इसकी व्यवस्था करेंगे । छेद की लम्बाई और मोटाई इस प्रकार स्थिर
करेंगे जिससे २ दण्ड (एक मुहूर्त) में एक बूंद (या कोई स्थिर चिह्न तक) पानी
जाय ।
गोलार्द्धाकृति घटितं सुताम्रपात्रम्
छिद्रेणाप्यति तनना तले समेतम्
कुण्डाम्भस्य बहलभित्ति पतितं सद्
घट्या मज्जति यदिदं कपालयन्त्रम् । ९७ ।
अर्द्ध गोलाकार ताम्बे का एक बर्तन तैयार करेंगे, जिसका तल थोड़ा चिपटा
हो (जिससे वह स्थिर रह सके) । उसके तल में एक छोटा छेद कर उसको पानी
के ऊपर रखने पर पात्र में धीरे धीरे पानी भरने लगेगा । छेद का आकार ऐसा
होगा जिससे एक घड़ी में पूरा पात्र भर जाय । इसे कपाल यन्त्र कहते हैं ।
भास्करेणोदितं यस्मात् फलकाक्षं सुविस्तरात्
यन्त्रं तदत्र न मया गदितं विदितं पुनः । ९८ ।
भास्कर ने फलक यन्त्र के बारे में विस्तार से कहा है अतः मैं पुनः नहीं कह
रहा हूँ ।
यन्त्रं स्वयं वह मिहाभिदधामि चक्रं
षष्टयं गुलावर्त्मल तुल्य नेमि
निर्माय यष्टि घटिकात्मक रेखिकाष्टयं
रेखान्तरे द्विषु (५) मिते वृत मंश चिहैः । ९९ ।
स्वयंवह यन्त्र के लिए ६० अंगुल परिधि का एक चक्र बनायेंगे । उसकी
परिधि पर प्रति अंगुल पर एक एक रेखा देंगे । नेमि की ६० रेखायें दिन-रात की
६० घटी के समान हैं । ५-५ अंश पर और एक चिह्न उस पर बनायेंगे ।
हस्तत्रयोन्नति मदुत्तर दक्षिणस्थ-
स्थूलाग्ररन्ध्र युग निश्चल सन्निवेशे

३५६ सिद्धान्त दर्पण
अक्षे सुवृत्त मसृणे विनियोज्यनाभिं
चक्रस्य तुल्य लघुता खिल वेष्टनस्य । १०० ।
चक्र के केन्द्र में एक छेद कर उसके भीतर एक गोल और चिकना आंख
(चिकनी नली) लगायेंगे, जिससे वह धुरी पर आसानी से घूम सके । उत्तर दक्षिण
दिशा में ३ हाथ ऊंचा दो खूंटा गाड़ कर उस पर एक धुरी पर यह चक्र लगायेंगे ।
चक्र का वजन समान होना चाहिये नहीं तो वह आसानी से नहीं घूमेगा ।
प्राक् पश्चिमाक्षि तिजयो रविचन्द्र चिह्ने
दत्वास्य वासर निशा परिवर्त हेतोः
प्रत्यग् भ्रमार्थ मपरक्षितिजाधर स्थं
ताम्रादि निर्मित मृजुनलकं निदध्यात् । १०१ ।
पूर्व और पश्चिम क्षितिज में सूर्य और चन्द्रचिह्न देकर यह दिन रात घुमाने के
लिए पश्चिम क्षितिज के नीचे ताम्बा आदि धातु की बनी एक सीधी नली स्थापित
करेंगे ।
षष्ट्यंगुल प्रमित तन्नलकोदरस्थ
तोयं यथा स्रवति षष्टि घटि भिरेवम्
[L1

गोलाधिकारे गोलादि वर्णनम् ३५७
धीरे धीरे चक्के को अहोरात्र में एक बार घुमायेगा ।
प्रातः पुरः स्थितिरवेः सविधे शलाकां
तिर्यग् ददत् क्षणघटी रूदिताः प्रमातुम्
अंकै र्घुरात्र्य वयवान् कलयेत्पुरेद्युः
प्राग् वन्नियो जयतु जीवन पूरणायैः । १०५ ।
सवेरे सूर्योदय के समय पूर्व क्षितिज में रवि चिह्न के निकट उसी चक्र से
तिरछे दक्षिणोत्तर दिशा में एक काठी रखेंगे । सूर्योदय से आरंभ कर चक्र के पूर्व
दिशा में घूमने से चक्र (नेमि) का जो चिह्न काठी से लगता है उससे अहोरात्र
का अवयव (घटी, पल आदि) जाना जा सकता है । अगले दिन भी उस चक्र
को उसी प्रकार स्थापित करेंगे ।
चक्रार्द्धतोऽवनितलावधि गोपनीयं
सर्वं भ्रमोपकरणं खलु दर्शकेभ्यः
तेषां भवेन्नहि चमत्कृतिरन्यथात्र
सच्छात्र नेत्रपतनार्ह मदो यदेव । १०६ ।
निचला चक्रार्द्ध जमीन के नीचे रखेंगे । जिससे यह दर्शकों को दिखायी
नहीं दे, नहीं तो दर्शकों की चमत्कार देखने की इच्छा नष्ट हो जायेगी । यह
गोपनीय विधि सिर्फ अच्छे छात्र को ही दिखानी चाहिये ।
अथ पुरोदित गोल परिभ्रमो भवति चक्र वदत्र मतान्तरम्
ब्रूत इह ध्रुव चक्र विलान्तगौ पृथुल दारु मयौ वलयौ क्रियात् । १०७ ।
पहले कहे गये गोल यन्त्र का भ्रमण भी इस स्वयंवह यन्त्र के समान होगा ।
इसके बारे में अन्य मत कहता हूँ । सायन मेषादि से ध्रुव (चक्र) मण्डल के भीतर
पतली लकड़ी का दो वृत्त बनायेंगे ।
विमलतैल मिलद् विल युग्मके समसुवृत्त शिखां ध्रुव यष्टिकाम्
अभिनिवेश्य पुनस्तन कीलकौ वलय पश्चिमगौनलकावधः । १०८ ।
ध्रुव चक्र के दोनों रन्ध्रो (काष्ठ के वृत्ताकार छेदो) में अच्छी तरह तेल देकर
समभाग से उसमें ध्रुव यष्टि को लगायेंगे) पुनः गोल के पश्चिम में दो छोटी कीलें
देकर कील के नीचे दो नली स्थापित करेंगे ।
तदनुसारि रसान्वित तुम्बिका युगलकृष्ट गुणौ रचयेत्तथा
इति कृते ऽखिल कर्मणि गोल को भ्रमति संस्थिति पूर्व निरक्षके । १०९ ।
नली से दो तुम्बी लटकायेंगे और उसमें पारद देंगे । तुम्बी द्वारा खींचने के
लिये गोल और तुम्बी के बीच सूत्र बान्धेंगे । इससे गोल यन्त्र विषुव वृत्त में
पूर्वापर वृत्त की तरह घूमेगा ।

३५८ सिद्धान्त दर्पण
सूर्य सिद्धान्ते- ग्रह नक्षत्र चरितं ज्ञात्वा गोलं च तत्वतः
ग्रहलोकमवाप्नोति पर्ययेणात्मवान्नरः । इति । ११० ।
ग्रह नक्षत्र तथा गोल का ज्ञान होने से व्यक्ति धनी होता है तथा मरने के
बाद ग्रह लोक में जाता है ।
सिद्धान्त शिरोमणै-दिव्य ज्ञान मतीन्द्रियं यदृषिभिर्ब्राह्म्यवशिष्ठादिभि
पारम्पर्य वशाद् रहस्य मवनीं नीतं प्रकाश्यं ततः
नैतद् वेषि कृतघ्न दुर्जन दुरा राराचिरा वासिनां
स्यादायुः सुकृतक्षयो मुनिकृतां सीमामिमामुज्झतः । इति । १११ ।
ग्रहज्ञान दिव्य और अतीन्द्रिय है । यह पहले ब्रह्मा ने कहा था उसके बाद
वशिष्ठ आदि ऋषियों के क्रम. से पृथ्वी पर इसका विस्तार हुआ । इस प्रकार
पवित्र ज्ञान को हिंसक, कृतघ्न, दुर्वृत्त तथा अधिक दिन ज्ञान न रख सकने वाले
व्यक्ति को नहीं देना चाहिये ।
ऋषि मुनियो का यह आदेश नहीं मानने से आयु तथा पुण्य का नाश होता
है ।
कृति प्रति निवृत्यौ मनु जवीययो यन्महा
प्रसाद परिपूरितोदर कराननाः पावनाः
पुनन्ति पतितान् पथि स्वतनु मारुतौ मद्द्दृशौ
दृशो र्वहतु मेऽन्वहं महमदो महान्तं महः । ११२ ।
जिसका महाप्रसाद हाथ में, मुंह या पेट में लेने से पुनः जन्म नहीं होता,
जिसके द्वारा मेरे जैसे पतित भी पावन हो जाते हैं, उस महाप्रभु का तेज सदा मेरी
दृष्टि में रह कर आनन्द दे ।
इत्युत्कलो ज्वल नृपाल कुल प्रसूत
श्री चन्द्रशेखर कृतौ गणितेऽक्षि सिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बाल बोधे
विंशोऽगमत्पाटित यन्त्रकथः प्रकाशः । ११३ ।
इस प्रकार उड़ीसा के विख्यात राजकुल में उत्पन्न श्रीचन्द्र शेखर द्वारा गणना
और दृष्टि में समानता तथा बालको की शिक्षा के लिए सिद्धान्त दर्पण का यन्त्र
वर्णन सम्बन्धी २० वां प्रकाश समाप्त हुआ ।

एक विंशः प्रकाशः
वासना शेष रहस्य वर्णन
कृत्वा ग्रहाणां गोलानां गणितक्रम वर्णनम्
प्रत्युक्ति शेषमिषतो वासनादिक् प्रदर्श्यते । १ ।
ग्रह और गोल का वर्णन पूरा करने के बाद प्रश्नोत्तर रूप में वासना (गणितं
विधियों का रहस्य या तर्क) दिखाया जा रहा है ।
व्यक्षे क्षितिज वृत्तम् यत्तदुन्मण्डलान्यतः
स्वदेशे क्षितिजे सूर्योदयोऽस्मात् स्वनिरक्षयोः । २ ।
निरक्ष देश (विषुव वृत्त स्थान) के क्षितिज वृत्त को अन्य स्थानों पर उन्मण्डल
कहा जाता है । अपने अपने स्थान के क्षितिज वृत्त में ही सूर्योदय होता है । अपने
स्थान के क्षितिज और निरक्ष के क्षितिज (जो अपने स्थान का उन्मण्डल है) के
बीच
द्युरात्र वृत्तानुसृतेश्वरं सूर्योदयान्तरम्
द्युरात्र मण्डले यस्मात् क्षितिजादुपरि स्थिते । ३ ।
अहोरात्र वृत्त का खण्ड ही चर है । यह दोनों स्थान के सूर्योदयों में समय
का अन्तर है । सूर्य अहोरात्र वृत्त में अपने क्षितिज के ऊपर रहने पर
दिनं भवेदधः संस्थे ततो भवति यामिनी
तस्मात् समत्वं सततं द्युनिशो व्यक्ष देशके । ४ ।
दिन होता है । तथा नीचे रहने पर रात होती है । निरक्षवृत्त ही सबसे बड़ा
अहोरात्र वृत्त है । इसको सभी देशों का क्षितिज दो समान भागों में बांदता है ।
अतः सूर्य निरक्ष वृत्त में घूमने पर दिन और रात हर स्थान पर समान होते हैं ।
निरक्ष देश में दिन रात...सदा समान होते हैं ।
निरक्षोदयतः पूर्वं सौम्य गोले स्वदेशजः
उदयोऽस्तमयः पश्चाद् याम्य गोले विपर्ययः । ५ ।
विषुव रेखा से उत्तर-सूर्य रहने पर उत्तर के स्थानों में विषुव क्षेत्र से पहले
सूर्योदय तथा पीछे सूर्यास्त होता है । दक्षिणीगोल में इसका विपरीत होता है ।
क्षितिजोर्ध्वाधरः स्थित्वा दृक्वृत्तस्य च गोलयोः
सौम्ये महद्दिनं रात्रिस्तनुर्याम्ये तु वाम्यतः । ६ ।
इसका कारण है कि उत्तर गोल में उन्मण्डल अपने क्षितिज से ऊपर रहता
है, उन्मण्डल तक पहंचने (निरक्ष सूर्योदय) से पहले ही सूर्य अपने क्षितिज पर
आ जाता है । और अपने स्थान का सूर्योदय होता है। दक्षिण गोल में उन्मण्डल
अपने क्षितिज से नीचे होता है।

३६० सिद्धांत दर्पण
सार्द्धषट् षष्टि (६६।३०) भागेभ्यो देशे यत्र पलांशकाः
भवन्त्य ध्यधिकास्तत्र विशेषोऽपर उच्यते । ७ ।
जिसका स्थान का अक्षांश ६६ १/२ अंश से अधिक है वहां विशेष घटना
होती है । जिसके बारे में यहां कहा जा रहा है ।
लम्बाधिकोत्तर क्रान्ति र्यावत्तावत् सदादिनम्
याम्य क्रान्ति स्तथा यावत् तावत्तत्र निशानिशम् । ८ ।
सूर्य की उत्तर क्रान्ति जितने दिनों तक रहती है । तब तक यहां दिन होता
है तथा जब तक दक्षिण क्रान्ति होती है तब तक रात्रि (अर्थात् ६ मास का दिन
तथा उतनी ही रात्रि) ।
देवासुराणां क्षितिजं विषुवद् वलयं यतः
सौम्य याम्य ध्रुवौ तेषां मस्तकोर्ध्व स्थितौ ततः । ९ ।
विषुव वृत्त देव और असुरों का क्षितिज है । अतः उत्तर ध्रुव देवताओं का
तथा दक्षिण असुरों का ख स्वस्तिक है ।
उर्ध्वे भ्रमन्तं क्षितिजादुदग् दक्षिण गोल योः
सव्यगं सूर्यमीक्ष्यन्ते देवा दैत्या स्त्व सव्यगम् । १० ।
सूर्य उत्तर गोल में रहने पर देवता लोग उसे दक्षिणी क्षितिज पर घूमता हुआ
देखते हैं । सूर्य दक्षिण क्रान्ति होने पर असुर उसे उत्तरी क्षितिज पर घूमता हुआ
देखते हैं ।
अस्मादुत्तर गोलस्थे भानौ दिविषदां दिनम् ।
रात्रि रन्यत्र दैत्यानां वैपरी त्यादहर्निशम् । ११ ।
क्रान्ति वृत्त का आधा भाग (सायन मेष से सायन तुला आदि तक) विषुव
के उत्तर है । अतः वर्ष के आधे भाग में जब सूर्य उत्तरायण होता है, देवताओं
का दिन और असुरों की रात होती है । सूर्य दक्षिणी गोल में रहने पर इसका
उल्टा होता है ।
सुराणां दिन यामिन्यौ सौम्य याम्या यने इति ।
स्मृति र्दिनोन्मुखे रात्र्यमुखेऽर्कं समतातयोः । १२ ।
अतः स्मृतियों में कहा गया है सूर्य के उत्तर या दक्षिण अयन में रहने से सुरों
का दिन या रात होता है । दिनार्द्ध के बाद सूर्य क्षितिज से नीचे की दिशा में
जाने लगता है । तथा रात्रि अर्द्ध के बात ऊपर उठता है, या दिन की दिशा में
जाता है ।
निशाहर्दलयो र्भानो र्यदारोहा वरोहयो
स्यादारम्भस्ततः कृत्यं देवानां स्याद् द्युरात्रजम् । १३ ।

वासना शेष रहस्य वर्णन ३६१
इस प्रकार अर्द्ध रात्रि से ही दिन का आरम्भ हो जाता है । अतः उत्तरायण
आरम्भ होने पर देवताओं के दिन का आरम्भ माना जाता है । और उस समय
देवताओं के दिनारम्भ कृत्य मनुष्य करने पर देवता गण प्रसन्न होते हैं ।
ब्रह्मयाति दूरगं भूमेः पश्येदा प्रलयं रविम्
दिनान्तेऽस्तमिते शेते तत्रेत्युक्तिः पुराविदाम् । १४ ।
भूमि से ब्रह्मा बहुत दूर रहने के कारण वह प्रलय होने तक सदा रवि को
देखते हैं । और उनका दिन रहता है । प्रलय होने पर सूर्य अस्त (वा नष्ट) होता
है तब ब्रह्मा की रात्रि होती है और वह शयन करते हैं ऐसा पुराणों में कहा है ।
अन्यस्य तदहः कर्तुमनेन सति भास्वतः
भ्रान्तिर्युग सहस्राभ्या मेका तस्यापि मन्यताम् । १५ ।
अन्यों का (देव, दानव और मनुष्यों का) दिन-रात एक ही सूर्य से होता है ।
ब्रह्मा की रात्रि समाप्त होने पर एक अन्य सूर्य का उदय होता है । (क्यों कि पिछला
सूर्य प्रलय में नष्ट हो जाता है )
दिनं स्याद्दर्शने भानोर्यतो रात्रि रदर्शने
पितॄणां तद्दिनं मासाशशि पृष्ठ निवासिनाम् । १६ ।
सूर्य का दर्शन होने से दिन तथा अदर्शन (छिप जाने) से रात्रि होती है ।
अतः पितृ लोक चन्द्र की सतह पर रहने के कारण एक चान्द्र मास उनका दिन
-रात होता है ।
मध्यन्दिनंस्याद्धशान्ति पूर्णिमान्ते निशादिनम्
सितेऽसिते पक्ष दले सायं प्रात रितः क्रमात् । १७ ।
अमान्त में पितरों का दिनार्द्ध तथा पूर्णान्त में उन लोगों का निशार्द्ध होता
है। शुक्ल पक्ष की अष्टमी में उन लोगों की सन्ध्या तथा कृष्ण पक्ष की अष्टमी :
(आधा में) उनका सूर्योदय होता है ।
यत्रापमण्डलं प्राच्यां लगति क्षितिजे लवे
लग्नस्तद्राशि भागाद्यमस्त लग्नः परे कजे । १८ ।
पूर्व क्षितिज में क्रान्ति वृत्त का जो अंश लगता है वही उस समय का (उस
स्थान का) लग्न है । पश्चिम क्षितिज में क्रान्ति वृत्त का जो भाग लगता है वह
उस समय का अन्त लग्न है ।
क्षितिजद्वय मध्यस्थौ प्रदेशा दधरोर्द्धव गौ
पाताल मध्य लग्ना रूयौज्ञेयौ त्रिप्रश्न दर्शनात् । १९ ।
पूर्व और पश्चिम क्षितिज के बीच में नीचे और ऊपर की दिशा में क्रान्ति वृत्त
का जो अंश लगता है उसे क्रमशः चतुर्थ और दशम् लग्न कहते हैं । इसका ज्ञान
त्रिप्रश्नाधिकार से होता है ।

यात्यल्प कालेन ऋजु र्बहुना समयेन यत् । २० ।
Wait, line 3:
"यात्यल्प कालेन ऋजु र्बहुना समयेन यत् । २० ।"
Notice the space: "ऋजु" then "र्बहुना" (र् on बहुना with space). Exactly as printed!

Line 4-5:
क्रान्ति वृत्त का तिरछा स्थान जल्दी उदय और अस्त होता है किन्तु सरल
भाग (लम्बा होने के कारण) उदय और अस्त होने में अधिक समय लगता है ।

Line 6-7:
ततोन तुल्या उदया व्यक्षे चक्रांश्रयः पृथक्
Wait, "ततोन": is it "ततोन" or "ततो न"?
Looking at line 6: "ततोन" is joined! "ततोन तुल्या उदया व्यक्षे चक्रांश्रयः पृथक्"
Line 7:
"उद्यन्ति तिथिनाड़ी भिभाद्र्द्धे सर्वत्रखाग्निभिः (३०) । २१ ।"
Wait, look at "भिभाद्र्द्धे":
भ + ि = भि
भ + ा = भा
द + ् + र् + द् + ध + े = द्र्द्धे?
Look at it: "भिभाद्र्द्धे" -> 'भि' then 'भा' then 'द्र्द्धे' (द with halanta/

वासना शेष रहस्य वर्णन ३६३
ग्रहाणां योजन गतेः साम्यं स्वीक्रियते यदि
तदागति क्रमात् कक्षाविस्तारः कर्तु मिष्यते । २७ ।
यदि ग्रहों की योजन गति समान मानी जाय तो उनकी कला गति के अनुसार
कक्षा का विस्तार करना होगा (कला गति कम होने पर बड़ी कक्षा होगी ।)
तथा सति न दृक् तुल्याः शैघ्रं परिधयो हि यत्
भवन्ति त्युदिता सूर्याद् बुद्धाद्याः क्रम मन्दगाः । २८ ।
ऐसा मानने पर भी ग्रहों की शीघ्र परिधि दृक् सिद्ध नहीं होती है ।
अतः मेरा मत है कि सूर्य से बुध शुक्र आदि क्रमशः मन्द कला गति वाले
ग्रहों की योजन गति भी क्रमशः कम होती जाती है ।
हानि वृद्धयुक्तिः शैघ्र फलानां बिम्ब बाणयोः
सिद्धान्तेऽनुक्त मप्यक्तं ज्ञादीनामर्क वेष्टनम् । २९ ।
प्राचीन सिद्धान्तों में भी ग्रहों का बिम्ब, शर और शीघ्र फल का कम अधिक
होना लिखा है अतः सिद्ध होता है, कि वे भी ग्रहों की सूर्य केन्द्रित कक्षा स्वीकार
करते हैं । पर स्पष्ट रूप से कहा नहीं है । मैने सिर्फ स्पष्ट रूप से कह दिया है ।
भुवः परित इन्द्वर्को मध्यमार्कात् बुधादयः
मध्यार्क सावन दिने यावद् यान्ति पुरोदितम् । ३० ।
पृथ्वी के चारों तरफ सूर्य और चन्द्र भ्रमण करते हैं तथा बुध आदि अन्य ग्रह
मध्यम सूर्य की परिक्रमा करते हैं । मध्यम रवि सावन दिन में इनकी दैनिक गति
पूर्व दिशा में होती है ।
स्वाभाविकोगतिः सैषां मन्दोच्चा कर्षणत् तु सा
कलाद्यैर्भिद्यते नित्यं दूर सामीप्य या नतः । ३१ ।
यही इन ग्रहों की स्वाभाविक गति है । जो कि मन्दोच्च के आकर्षण के कारण
होती है । पृथ्वी से ग्रह दूर या निकट होने से उनकी कलादि गति भिन्न भिन्न
होती है ।
नानाचार्य निरुक्तानां भगणानांविभेदतः
कैश्चित्कल्पादि कालस्य गणना सम्मता न यत् । ३२ ।
आचार्यों के अनुसार ग्रह और उच्च का भगण भिन्न भिन्न होने के कारण कुछ
गणक कहते हैं कि कल्प आदि काल की गणना भी ठीक नहीं है ।
तत् पाषण्डमतं यस्मात् सिद्धान्तोदित पर्यतैः
तदुक्त कुदिनातीव मध्यमेन्दु विवस्वताः । ३३ ।
किन्तु यह शास्त्र विरुद्ध और पाखण्ड है ( आर्य भट्ट मत की आलोचना)

३६४ सिद्धान्त दर्पण
किन्तु प्राचीन सिद्धान्तों से उक्त मध्यम सूर्य और चन्द्र भगण से कल्प सावन दिन
के अनुसार-
अद्यावध्यर्य्य भटस्य कालात् शक्रशताब्दतः (१४००)
कलाभेदोऽपि नोलब्धस्तत् कथं प्राक् कृति र्मृषा । ३४ ।
आर्यभट्ट से १४०० वर्ष बीत जाने पर भी वर्तमान मध्यम सूर्य और चन्द्र में
कला भेद भी नहीं दीखता है । अतः प्राचीन आचार्यों का शास्त्र भ्रान्त कैसे कहा
जा सकता है ।
स्थिरत्वात् मन्द तुंगस्य भानोर्मध्य गति र्जनैः
भूच्छायादि समालोकात् पञ्चषाब्दैः प्रतीय ताम् । ३५ ।
रवि मन्दोच्च की स्थिरता (बहुत कम गति होने के कारण) तथा रवि मध्यम
गति को भू छाया आदि देखकर ५-६ वर्षों में ही जाना जा सकता है ।
चन्द्र तत्तुं गयो र्नित्यं चलनाद् भगणास्तयोः
न शक्यन्ते नृभिर्ज्ञातुं बिना सिद्धान्त दर्शनात् । ३६ ।
किन्तु चन्द्र का मन्दोच्च तेज चलने के कारण उसके उच्च की गति या मध्यम
चन्द्र गति को बिना सिद्धान्त के नहीं जाना जा सकता है ।
ज्ञायतां तत् विशेषोऽपि बहु प्रमण दर्शिभिः
मध्योच्चाभ्यं शनेर्भेदं शताब्दैज्ञायते कथम् । ३७ ।
बार बार चन्द्र का वेध करने पर ही उसका गति भेद जाना जा सकता है ।
शनि की गति अत्यन्त कम होने के कारण १०० वर्ष के भीतर उसकी मध्य और
मन्दोच्च गति में अन्तर नहीं किया जा सकता है ।
तस्माद्रवीन्दु भगणा वर्ष मास दिनानि च
लंकाद्धं रात्रः सर्वांदिरिति सिद्धान्त वाग् ध्रुवा । ३८ ।
इन कारणों से रवि और चन्द्र का भगणं, वर्ष, मास और दिन आदि की
गणना कल्प से करना असत्य नहीं, उचित है । अतः सिद्धान्त वचन भी सत्य
है ।
चन्द्रोच्च पात भौमादौ विसंवादो यदीक्ष्यते
तत्सर्वं स्थूल दृष्ट्योक्तं युग पर्ययवादतः । ३९ ।
चन्द्र के उच्च और पात की भगण तथा मंगल आदि के भगण में जो अन्तर
दीखता है वह युग आदि के कारण दीखता है । युग भगण आदि स्थूल गणना
के लिये है । सूक्ष्म गणना कल्प भगण से ही हो सकती है ।
मतिमान् भास्कराचार्यः प्रमेदं युगपर्ययैः
ग्रहाणां वीक्ष्यतत् संख्या कल्पे पूर्णामकल्पयत् । ४० ।

वासना शेष रहस्य वर्णन ३६५
बुद्धिमान भास्कराचार्य ने युग भगण गणना में त्रुटि होने के कारण कल्प में
पूर्ण अखण्ड भगण की कल्पना की ।
सृष्टि कालस्य च त्यागमकृत्वा कल्प वक्त्रतः ।
कालस्य गणनाञ्चक्रे लंका मंध्यार्य मोदयात् । ४१ ।
उन्होंने सृष्टि काल का त्याग कर कल्प आरम्भ से ही गणना आरम्भ की ।
कल्प आरम्भ उनके मत से लंका की अर्द्धरात्रि नहीं, मध्यम सूर्योदय से हुआ ।
कृताहर्गण संख्यया अल्पत्वा द्रविचन्द्रयोः
कलिवक्तात् स्वकालान्तं भागाद्याधिक्यपाततः । ४२ ।
कलियुग के प्रारम्भ से अपने समय तक के अहर्गण की कल्पना करने पर
उसकी संख्या अत्यन्त कम होने के कारण उससे रवि और चन्द्र निकालने पर
अंशादि का मान अधिक लगा (भास्कर को)
खाभ्र खाक्यैहृते त्वादि सिद्ध बीज कलोज्झनात्
सिद्धान्त मास्य वात्पीय समये कृतवां स्तयोः । ४३ ।
अतः उन्होंने सिद्धान्त शिरोमणि के ‘खाभ्रखाक्यैहताः कल्पयाताः समाः’
इत्यादि श्लोकों द्वारा सिद्ध बीच कला को घटाया । इससे उन्होंने अपने समय
के रवि और चन्द्र के लिए श्रेष्ठ सिद्धान्त कर दिया ।
इत्थमन्यग्रहाणाञ्च निर्माय भगणावलिम्
स्व स्वबीजैर्युतो नानां तेषां दृक् सिद्धि मैक्षतः । ४४ ।
इसी प्रकार उन्होंने अन्य ग्रहों का भी भगण आदि स्थिर कर अपने बीज को
जोड़कर या घटाकर सभी ग्रहों को दृक् सिद्ध किया ।
सिद्धान्त सिद्धि रर्केन्दोर्बीजेनापि यदिप्सिता
स्वपर्याया स्थिरत्वं हि सतेना विष्कृतं स्वयम् । ४५ ।
बीज संस्कार कर रवि और चन्द्र स्फुट किया । इससे लगा कि उनका रचित
भगण आदि निश्चित नहीं है । (नहीं तो संस्कार की आवश्यकता नहीं होती ।)
अधुनैतन्मध्यमयोः सिद्धान्त नीतयोर्यतः
दृक् सिद्धिर्भाति तस्योक्ता दृश्यते महदन्तरम् । ४६ ।
वर्तमान सिद्धान्त (सिद्धान्त दर्पण) द्वारा जिस प्रकार रवि और चन्द्र का साधन
किया जाता है, वह अच्छी प्रकार दृक् सिद्ध होता है । पर भास्कर की रीति से
करने पर बहुत अन्तर पड़ता है ।
यदि तत् पूर्व समये कश्चित्तत् सदृशः सुधीः
अकारिष्यत दृक् सिद्धिं कल्पितैः कल्प पर्ययैः । ४७ ।
यदि उनके पहले किसी ने भगण की कल्पना कर ग्रहों की दृक् सिद्धि की

३६६ सिद्धान्त दर्पण
होती
तदैवदृग् विसंवादो भासकरोक्तेर्नसंभवेत्
स्वपूर्व काल संवादा ध्यतः स्यादन्तर ग्रहः । ४८ ।
तो भास्कर की उक्ति (भगण मान) और दर्शन (वास्तविक स्थिति) में इतना
अन्तर नहीं होता । उनसे (५१६) पूर्व ब्रह्म गुप्तं के कल्प भगण के आधार पर गणना
में भेद आते देख कर
आचार्यः कल्पभगणान् यदाहेष महान् गुणः
प्रवृत्ति दिन मासादि संख्या भेदस्तु दूषणम् । ४९ ।
अपना अलग कल्प भगण कहा यह उनका महान् गुण है। लेकिन उन्होंने
कल्पादि के लंका के सूर्योदय से ग्रहविचार आरम्भ किया तथा सावन, चान्द्र
दिन, मास आदि की अलग संख्या दी वह उनका दोष है ।
तथाप्येष निजेकाले लिखित्वा दृक् समान् ग्रहान्
महोपकार मकरोत् मादृशा मल्प संविदाम् । ५० ।
तथापि उन्होंने अपने समय का दृक् सिद्ध ग्रह गणित लिखकर मेरे समान
कम ज्ञान वाले लोगों का बहुत उपकार किया है ।
आर्यभट्ट शतानन्द भास्कराणां स्वकालजैः
तत्तन्मतमानीतैः कामभट्टादि सम्मतैः । ५१ ।
आर्यभट्ट, शतानन्द और भास्कर आदि ने जो अपने समय का ग्रह (स्थिति)
निकाला तथा काम भट्ट आदि के द्वारा गणित समान किया गया
ग्रहैः स्वानीत खेटानां कृत्वा संवादमात्मनः
कालेनाहं दृष्टि सिद्धान् सृष्टवान् भगणानसून । ५२ ।
इन सभी को मैने अपने समय में अपनी रीति में निकाले गये ग्रहों से तुलना
की है और उनके अनुसार दृक् सिद्ध भगण लिखे हैं ।
तिथि भादौ घटी भेदो भाग भेदो कुजादिषु
भविष्यत्ययुताब्दान्तं नैतेभ्य इति मे मतः । ५३ ।
अतः मेरी धारणा है कि आज से अयुत (१०,०००) वर्ष बाद भी मेरी गणना
आज ही के समान दृक् सिद्ध होगी । तिथि नक्षत्र आदि में, या मंगल आदि ग्रहों
के स्पष्ट राशि अंश में कोई भेद नहीं होगा ।
त्रिकाल ज्ञान हीनत्वात् ना दृशां चिरकालतः
अंशादिभिः प्रमेदश्चेत् साक्षात्कार्यः प्रमातृभिः । ५४ ।
मैं त्रिकालज्ञ नहीं हूँ अतः चिरकाल तक मेरा सिद्धान्त स्थिर नहीं रह सकता
है । अतः एक अयुत वर्ष से अधिक समय के बाद स्पष्ट ग्रह के अंशों में भेद आने

वासना शेष रहस्य वर्णन ३६७
पर उसका संशोधन करना पड़ेगा ।
तदा मयोक्त पूर्वेषु भगणेष्वपि विपर्ययात् ।
देया हेया वाथमाणा हानि वृद्धयनुसारतः । ५५ ।
मेरे कहे गये भगण के अनुसार यदि ग्रह स्थिति वास्तव से कम या अधिक
आती है तो उसमें कुछ जोड़ना या घटाना पड़ेगा ।
वेद तत्वानि (२५४) पञ्चेषु सिन्धवो (४५५) नव खाद्रयः । (७०९ )
रामत्वं का (१६३) समुद्रांगं रुद्राः (११६४) समेन्दु भास्कराः (१२१७) । ५६ ।
संशोधन के लिये मंगल के भगण में (२५४) जोड़ना या (४५५) घटाना
पड़ेगा । (कल्प भगण में) बुध भगण में (७०९) जोड़ना या (१६३) घटाना पड़ेगा ।
गुरु भगण में (११६४) जोड़ना या (१२१७) घटाना पड़ेगा
द्विशैल रस मेदिन्य (१६७२) श्चन्द्राष्ट गुण बाहवः । २३८१)
शराग्नि रस ने त्राणि (२६३५) खनन्द गगनाऽग्नयः (३०९०) । ५७ ।
शुक्र भगण में (१६७२) जोड़ना या (२३८१) घटाना पड़ेगा । शनि भगण में
(२६३५) जोड़ना या (३०९०) घटाना पड़ेगा ।
एवं दशविधा भेदा धनर्णत्वेन सम्मताः
भौमादेः कल्पिताः कल्प भगणानां विशुद्धये । ५८ ।
इस प्रकार भौम आदि के कल्प भगणों में संशोधन के लिये (यदि १०,०००
वर्ष बाद राशि अंश कम या अधिक हों) लिखित कल्प भागणों में इन दस राशियों
को जोड़ना या घटाना पड़ेगा ।
अत्रतु प्रथमो भेदो द्विगुणःक्वचिदिष्यते
ततो द्वि त्रिवेदघ्न स्तुर्यः पञ्चगुणावधि । ५९ ।
यहां दिया हुआ प्रथम भेद २ गुणा भी हो सकता है । तृतीय भेद, २, ३ या
४ गुणा भी हो सकता है । चतुर्थ भेद ५ गुणा तक हो सकता है ।
तथैवाष्टमपक्षः स्यात् सप्तमो दिग् गुणावधिः
अन्यो द्वित्रिगुणो ग्राह्य स्त्रयस्त्रिंशद् भिदा इति । ६० ।
इसी प्रकार ८ वां भेद २, ३, ४ या ५ गुणा हो सकता है । अन्या का २ या
३ गुणा तक होगा । इस प्रकार इन भेदों की संख्या ३३ हुयी ।
एषामन्योन्य योगाच्च ये स्तुस्ते भास्कर स्यमे
संवादात्काल योग्राह्या स्त्रिंश लिप्तान्तरा दपि । ६१ ।
भास्कर के समय और मेरे समान के बीच दृकसिद्धि में यदि ३० कला का
भी अन्तर पड़े तो यह योग वियोग करना पड़ेगा ।

३६८ सिद्धान्त दर्पण
तिथ्यादौ ग्रहमादौ च चन्द्र मन्दोच्च पातयोः
सर्वोपादेयता हेतो स्तद् विशेषं ब्रुवे पुनः । ६२ ।
तिथि नक्षत्र आदि निकालने में तथा ग्रहण आदि में चन्द्र मन्दोच्च और पात
की सर्वोपयोगिता के कारण उसके संशोधन के बारे में कह रहा हूं ।
ख चतुर्नव सप्तैश वसु नाग कृता इति (४८,८१,१७,९४०)
उक्त पूर्वान्मया चन्द्रमन्दोच्च भगण ब्रजात् । ६३ ।
पहले चन्द्र मन्दोच्च का कल्प भगण (४८,८१,१७,९४०) कहा गया गया है ।
कालान्तरे सुसाध्यस्य तुंगस्येक्षण सिद्धितः
अधिकं न्यूनता वापि भवता तेत्तदाप्यमो । ६४ ।
बहुत काल के बाद उसमें अच्छी तरह उच्च साधन करने पर यदि उससे
वास्तविक मान अधिक या कम दिखायी दे तो दिये गये मान में
ग्राह्या दृक् सिद्धये भेदा द्विसप्त रस भूमयः (१६७२)
चन्द्राद्रिगुणपक्षा (२३८१) वा किं वाग्नीषु ख सागराः । ४०५३) । ६५ ।
१६७२, २३८१ या ४०५३ जोड़ेगे या घटायेंगे (जिस मान से गणना और दृष्टि
में समानता है ।)
तत्पात भगणानान्तु शंकानास्ति विपर्यये
तथाप्यब्दा युतेऽतीते भेदो भागाधिका यदि । ६६ ।
चन्द्रपात भगणं में एक अयुत (१०,०००) वर्ष के बाद परिवर्तन अवश्य होगा ।
गणना और दृष्टि में एक अंश का अन्तर हो
भावीतद् व्यद्रिष्ट चन्द्रा (१६७२) स्तेषु दृश्यनुसारतः
क्रान्ति पातस्य भगणेष्व भ्रगो गगनाग्नयः । (३०९०) । ६७ ।
तो भगण में १६७२ जोड़ेंगे या घटायेंगे । क्रान्ति पात का भगण में (३०९०)
खाद्रिद् व्यर्थाः (५२७०) खधृत्यंगा (६१८०) न्यभ्रषड् गुणदन्तिनः । (८३६०)
एतेद्विघ्ना स्त्रिनिघ्नाश्च दिग्गजांक निशाकराः । (१९,८१०) । ६८ ।
(५,१७०) (६१८०), (८,३६०) इसका दो गुणा (१६,७२०) ३ गुणा (२५, ०८०)
(१९८१०) या (२८,१७०) जोड़ेगे या घटायेंगे । (कल्प में क्रान्ति पात भगण
६,४०,१७० है)
खाद्रिचन्द्राष्ट पक्षाश्च (२८,१७०) यो ज्यात्याज्या तथापि चेत्
दृक् सिद्धिर्न तदा भानो व्यत्यया भावनिश्चयात् । ६९ ।
यदि इसके बाद भी क्रान्ति पात स्पष्ट नहीं होते तो सूर्य की छाया द्वारा क्रान्ति
साधन करेंगे ।

वासना शेष रहस्य वर्णन ३६९
गणितागत सूक्ष्मार्क छायाक्रान्तिर सम्मिताः
अयनांशादयो ग्राह्या विशेषोऽत्रेति कीर्त्तितः । ७० ।
सूक्ष्म गणित द्वारा सूर्य तथा छाया द्वारा सूर्य निकाल कर (त्रिप्रश्नाधिकार
विधि से) दोनों का अन्तर निकालेंगे । जो कि वास्तविक अयनांश होगा ।
यदा प्रजापतिः खेटान् सृष्टा जादौन्यवीविशन्
ततो द्विद्यु (२२) ब्दतः कुम्भराश्यादौ निदधे गुरुम् । ७१ ।
(वाराह मिहिर की वृहत्संहिता के अनुसार) जब सृष्टि का आरम्भ हुआ उस
समय वृहस्पति मेष राशि के आरम्भ में था । अतः वह २२ वर्ष बाद कुम्भ राशि
में निश्चय रहा होगा । (मध्यम मान से १ वर्ष में एक राशि)
तदादि प्रभवस्तस्मात् प्रवृत्तोऽब्दागुरौ पुनः
मेषादि निष्ठे शुक्लाद्या इति सांहितिकोवितः । ७२ ।
उससे प्रभव नामक गुरुवर्ग आरम्भ हुआ । पुनः वृहस्पति मेषादि में रहने से
उस वर्ष का नाम शुक्ल आदि हो सकता है ।
राशि द्वय युतिः प्रोक्ता मया मध्य वृहस्पतौ
तत्पर्यय विपर्यास सम्भविष्यति पण्डितैः । ७३ ।
अतः प्रभव से आरम्भ होने वाला गुरु वर्ष निकालने के लिए मध्यम वृहस्पति
में २ राशि जोड़ा जाता है । भविष्य में वृहस्पति साधन में यदि भगण परिवर्तन
के कारण अन्तर हो तो पण्डितों द्वारा
भगणां पञ्चनिःशेषाः कल्प्यास्तत् खरदावलिं
सृष्टेर्विश्वावसु (३९) मुखा कपिलाख्या (५१) दिरेववा । ७४ ।
गुरु भगण में ५ से भाग दिया जायेगा । क्योंकि गुरु वर्ष ६० होते हैं और ५
वर्ष में एक-एक सम्वत्सर होने के कारण ५ से भाग देने पर १२ सम्वत्सर होंगे ।
सृष्टि आरम्भ से विश्वावसु (३९), कपिल (पिंगल) (५१)
शुक्ला (३) दिर्वा वृषा (१५) दिर्वा विजया (२७) दिरथापि वा
लेख्याः स्वकाल सिद्धिना मब्दानामविरोधतः । ७५ ।
शुक्ल (३) वृष (१५) या विजय (२७) आदि संवत्सर ही होगा । क्योंकि ६०
को ५ से भाग देने पर प्रत्येक १२ संवत्सर के आरम्भ में इन्हीं में से कोई वर्ष होगा ।
अपने देश में प्रचलित अब्द का नाम लिखना चाहिये ।
किन्तु खाब्ध्यष्ट सप्तार्थ द्वयब्धिषड् गुण पर्ययाः (३६,४२,५७,८४०)
शुक्लाद्य ब्द गणाः सर्व पक्षतः साधवो मताः । ७६ ।
वृहस्पति की भगण संख्या (३६,४२,५७,८४०) मानने वाले लोगों के लिए
शुक्ल से ही सम्वत्सर आरम्भ करना चाहिये ।

३७० सिद्धान्त दर्पण

  • एतद् भगण जेष्बिन्दु (१५) लिसोनेजस्य संम्प्रति
    दृक् साम्यात्पदकं लेखं ध्रुव गत्यादि संगतम् । ७७ ।
    इस भगण से जो मध्यम वृहस्पति आयेगा उससे १५ कला घटाने पर वह
    आकाश में प्रत्यक्ष होगा । इसमें ध्रुव गति आदि जोड़कर पदक आदि लिखना
    होगा ।
    भाविद् व्यब्दीश (११४२) वर्षान्ते मतद्वयज गीष्पतेः
    समत्वं भविता तत्र कार्ये दृक् सिद्धि रुत्तमैः । ७८ ।
    (११४२) वर्ष बाद उल्लिखित मत और पारम्परिक मत के अनुसार गुरु साधन
    कर देखेंगे कि दोनों मत से एक ही मान आता है, कि नहीं । उस समय सूक्ष्म
    बुद्धि वाले दृक् सिद्धि करेंगे ।
    शास्त्रस्यास्य विसंवादे धर्मगोप्ताच्युतेन चेत्
    सम्भव्यो ग्रन्थकृत्कश्चिद्रहस्य तत्कृतेह्लादः । ७९ ।
    ज्योतिष शास्त्र की गणना में त्रुटि होने पर धर्मरक्षक भगवान इस शास्त्र का
    संस्कारक उत्पन्न करते हैं । उसी को यह गोपनीय शास्त्र ज्ञात होता है । अन्य
    लोग यह रहस्य नहीं समझ सकते ।
    कलाद्या दशधा भुक्तिर्ग्रहाणां या पुरोदिता
    क्रमाद्दश गुणैकादिदिन संख्या हताथसा । ८० ।
    ‘ग्रहों की गति कला आदि १० भागों में पहले दी गयी है, इस दैनिक गति
    को क्रमशः १०,१० से गुणा कर दिन संख्या से गुणा करेगें ।
    अन्ततः क्रमषष्ठांशै र्विवरान्त समन्विता
    ततो द्व्र्यादि नन्दान्त गुणिता खरखादिभिः । ८१ ।
    फल को अंतिम स्थान (सबसे छोटे विभाग ) से ६० से भाग देकर शेष को
    वहीं रखेंगे, और भागफल को अगले विभाग की राशि में जोड़ेगे । यही क्रिया
    उस राशि और क्रमशः अगली राशियों में करेंगे । गुणनफल को पुनः २,३,---९
    संख्याओं से गुणा कर ६० से भाग देकर
    विपरादि गृहान्तानां स्वहारै र्विहृता क्रमात्
    फलयुक् शेष संस्थानैः सिद्धं यद् भादि पंचकम् । ८२ ।
    विपरा आदि स्थान में फलों को जोड़ेंगे । यह राशि आदि ५ स्थानों की
    संख्या होगी ।
    तत्कोष्ठकेषु संलेख्यं स संख्या पद काक्षया
    कर्मेद भगणैः खेटा नयनात्सुकरं मतम् । ८३ ।
    इसको कोष्ठक (Column) में लिखकर रखेंगे । इन्हीं संख्याओं को पदक