सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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नभसि निरवलम्बे खेचराणामुडुनां
ग्रहलव घटिकादौ रन्तरं यन्त्र वेधैः
परिकलयितुमिष्टं मानयन्त्रं प्रवक्ष्ये
धर धरणीरुहादि स्याद् यतेऽपिप्रमेयम् । ८२ ।
निराधार आकाश में ग्रह तथा नक्षत्रों का अन्तर राशि, अंश, कला, आदि
निकालने के लिए अब मानयन्त्र के विषय में कहता हूँ । इस यन्त्र से पर्वत और
वृक्ष आदि का मान भी जाना जा सकता है ।
घनरस समभूमौ वृत्तमालिख्य भांशां (३६०)
गुल परिमिति मेतत्स्वां शकैरंकयित्वा
ऋजुलघुमिह दत्वा पट्टिकां पृष्ठलग्नां
परिधि लवलगद्भिः केन्द्र निर्यात सूत्रैः । ८३ ।
समतल भूमि को गाढ़े रससे लीपकर चिकना करते हैं । और उसमें ३६०
अंगुल का एक वृत्त बनाकर उसके प्रत्येक अंश (परिधि पर १ अंगुल की दूरी)
पर एक चिह्न देते हैं । ठीक इसी वृत्त के बराबर एक काठ पट्टा का वृत्त बनाते
हैं, जो इसे ढंक सके । काठ पट्टा में भी केन्द्र और अंशों को चिह्नित कर केन्द्र
से परिधि के ३६० अंश चिह्नों तक एक एक रेखा खींचते हैं । भूमि के वृत्त को
भी ३६० भाग में बांटते हैं ।
विरचयितु बहि स्थे पट्टिकान्तेलवाङ्का
स्तनुलवन समुत्थां स्तत्र सोपान कल्पान्
लगयतु पुनरस्या मध्य भागेऽपिदण्डम् ।
दृढ़मृजु मथ वृत्त व्यासतोऽर्द्ध प्रमाणम् । ८४ ।
पट्टी के प्रति अंश का विभाग कर कला आदि भी किया जा सकता है ।
इस पट्टे के केन्द्र में एक दृढ़ और सीधी छड़ी लगाते हैं, जिसका प्रमाण उस वृत्त
के व्यासार्द्ध के बराबर होगा ।
सदल गृह समावा पट्टिका राशि तुल्या
तिथिलव कलिता वा वाञ्छितां शैर्मिता स्यात्
पुनरिह लवनांकाद् व्यंशकाख्यं शका वा
कृतःशर लवका वा स्वेच्छया निर्मिताःस्युः । ८५ ।
इस पट्टे का परिमाण ४,५,३०,१५ वा इष्टांश भी हो सकता है ।
नयन तलगमूलं पाणिनादाय दण्डं
द्विवर विवर मग्रे पट्टिकांशैः प्रमातात्
ग्रह भव सति चिह्नात् प्रत्यगा गामि तत्त-
द्विवर लवकषट्कैस्त्रिज्यया (३४३८) ताड़ितैस्तु । ८६ ।