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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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पृष्ठ 460

वासना शेष रहस्य वर्णन ३६३
ग्रहाणां योजन गतेः साम्यं स्वीक्रियते यदि
तदागति क्रमात् कक्षाविस्तारः कर्तु मिष्यते । २७ ।
यदि ग्रहों की योजन गति समान मानी जाय तो उनकी कला गति के अनुसार
कक्षा का विस्तार करना होगा (कला गति कम होने पर बड़ी कक्षा होगी ।)
तथा सति न दृक् तुल्याः शैघ्रं परिधयो हि यत्
भवन्ति त्युदिता सूर्याद् बुद्धाद्याः क्रम मन्दगाः । २८ ।
ऐसा मानने पर भी ग्रहों की शीघ्र परिधि दृक् सिद्ध नहीं होती है ।
अतः मेरा मत है कि सूर्य से बुध शुक्र आदि क्रमशः मन्द कला गति वाले
ग्रहों की योजन गति भी क्रमशः कम होती जाती है ।
हानि वृद्धयुक्तिः शैघ्र फलानां बिम्ब बाणयोः
सिद्धान्तेऽनुक्त मप्यक्तं ज्ञादीनामर्क वेष्टनम् । २९ ।
प्राचीन सिद्धान्तों में भी ग्रहों का बिम्ब, शर और शीघ्र फल का कम अधिक
होना लिखा है अतः सिद्ध होता है, कि वे भी ग्रहों की सूर्य केन्द्रित कक्षा स्वीकार
करते हैं । पर स्पष्ट रूप से कहा नहीं है । मैने सिर्फ स्पष्ट रूप से कह दिया है ।
भुवः परित इन्द्वर्को मध्यमार्कात् बुधादयः
मध्यार्क सावन दिने यावद् यान्ति पुरोदितम् । ३० ।
पृथ्वी के चारों तरफ सूर्य और चन्द्र भ्रमण करते हैं तथा बुध आदि अन्य ग्रह
मध्यम सूर्य की परिक्रमा करते हैं । मध्यम रवि सावन दिन में इनकी दैनिक गति
पूर्व दिशा में होती है ।
स्वाभाविकोगतिः सैषां मन्दोच्चा कर्षणत् तु सा
कलाद्यैर्भिद्यते नित्यं दूर सामीप्य या नतः । ३१ ।
यही इन ग्रहों की स्वाभाविक गति है । जो कि मन्दोच्च के आकर्षण के कारण
होती है । पृथ्वी से ग्रह दूर या निकट होने से उनकी कलादि गति भिन्न भिन्न
होती है ।
नानाचार्य निरुक्तानां भगणानांविभेदतः
कैश्चित्कल्पादि कालस्य गणना सम्मता न यत् । ३२ ।
आचार्यों के अनुसार ग्रह और उच्च का भगण भिन्न भिन्न होने के कारण कुछ
गणक कहते हैं कि कल्प आदि काल की गणना भी ठीक नहीं है ।
तत् पाषण्डमतं यस्मात् सिद्धान्तोदित पर्यतैः
तदुक्त कुदिनातीव मध्यमेन्दु विवस्वताः । ३३ ।
किन्तु यह शास्त्र विरुद्ध और पाखण्ड है ( आर्य भट्ट मत की आलोचना)