सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
पृष्ठ 466, कुल 609 में से
संदर्भ में पढ़ेंवासना शेष रहस्य वर्णन ३६९
गणितागत सूक्ष्मार्क छायाक्रान्तिर सम्मिताः
अयनांशादयो ग्राह्या विशेषोऽत्रेति कीर्त्तितः । ७० ।
सूक्ष्म गणित द्वारा सूर्य तथा छाया द्वारा सूर्य निकाल कर (त्रिप्रश्नाधिकार
विधि से) दोनों का अन्तर निकालेंगे । जो कि वास्तविक अयनांश होगा ।
यदा प्रजापतिः खेटान् सृष्टा जादौन्यवीविशन्
ततो द्विद्यु (२२) ब्दतः कुम्भराश्यादौ निदधे गुरुम् । ७१ ।
(वाराह मिहिर की वृहत्संहिता के अनुसार) जब सृष्टि का आरम्भ हुआ उस
समय वृहस्पति मेष राशि के आरम्भ में था । अतः वह २२ वर्ष बाद कुम्भ राशि
में निश्चय रहा होगा । (मध्यम मान से १ वर्ष में एक राशि)
तदादि प्रभवस्तस्मात् प्रवृत्तोऽब्दागुरौ पुनः
मेषादि निष्ठे शुक्लाद्या इति सांहितिकोवितः । ७२ ।
उससे प्रभव नामक गुरुवर्ग आरम्भ हुआ । पुनः वृहस्पति मेषादि में रहने से
उस वर्ष का नाम शुक्ल आदि हो सकता है ।
राशि द्वय युतिः प्रोक्ता मया मध्य वृहस्पतौ
तत्पर्यय विपर्यास सम्भविष्यति पण्डितैः । ७३ ।
अतः प्रभव से आरम्भ होने वाला गुरु वर्ष निकालने के लिए मध्यम वृहस्पति
में २ राशि जोड़ा जाता है । भविष्य में वृहस्पति साधन में यदि भगण परिवर्तन
के कारण अन्तर हो तो पण्डितों द्वारा
भगणां पञ्चनिःशेषाः कल्प्यास्तत् खरदावलिं
सृष्टेर्विश्वावसु (३९) मुखा कपिलाख्या (५१) दिरेववा । ७४ ।
गुरु भगण में ५ से भाग दिया जायेगा । क्योंकि गुरु वर्ष ६० होते हैं और ५
वर्ष में एक-एक सम्वत्सर होने के कारण ५ से भाग देने पर १२ सम्वत्सर होंगे ।
सृष्टि आरम्भ से विश्वावसु (३९), कपिल (पिंगल) (५१)
शुक्ला (३) दिर्वा वृषा (१५) दिर्वा विजया (२७) दिरथापि वा
लेख्याः स्वकाल सिद्धिना मब्दानामविरोधतः । ७५ ।
शुक्ल (३) वृष (१५) या विजय (२७) आदि संवत्सर ही होगा । क्योंकि ६०
को ५ से भाग देने पर प्रत्येक १२ संवत्सर के आरम्भ में इन्हीं में से कोई वर्ष होगा ।
अपने देश में प्रचलित अब्द का नाम लिखना चाहिये ।
किन्तु खाब्ध्यष्ट सप्तार्थ द्वयब्धिषड् गुण पर्ययाः (३६,४२,५७,८४०)
शुक्लाद्य ब्द गणाः सर्व पक्षतः साधवो मताः । ७६ ।
वृहस्पति की भगण संख्या (३६,४२,५७,८४०) मानने वाले लोगों के लिए
शुक्ल से ही सम्वत्सर आरम्भ करना चाहिये ।