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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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पृष्ठ 451

३५४ सिद्धान्त दर्पण
स्फुटतर परिमाण स्ववगतौ तु दण्ड
शर (५) करमित दैर्घ्यः कार्य्यतत् शिखायाम्
विकलयिषित साम्य प्रापिताक्ष्णा शलाका
नर इति लगनीया संस्कृतिः स्यात्तथैव । ९१ ।
यदि वृक्ष और पर्वत आदि का अति स्पष्ट परिमाण जानना हो तो यष्टि को
५ हाथ लम्बा कर देंगे । इस दण्ड के अग्रभाग की सीध में पर्वत की चोटी को
देखेंगे । इसके बाद आंख और पर्वत के बीच एक और शंकु रखेंगे जिसका अग्र
भाग भी पर्वत की चोटी की सीध में हो । तब पहले की विधि से इसका सभी
संस्कार करेंगे ।
ध्रुव समनग शृंगं वीक्ष्य तत् प्राक् प्रतीच्यो
क्वचिदुमविवरज्यां चोन्नतज्यां तथाद्रे
स्थिति युगविवरघ्नो सोन्नतज्या द्वयाप्ता
भवति शिखर मानं दूरता दृग् ज्याकान्तः । ९२ ।
ध्रुव देखने की विधि से (याम्योत्तर वृत्त में) पर्वत शृंग को देखेगे । उसी पर्वत
के पूर्व पश्चिम अन्तरज्या और उन्नतज्या निकालेंगे । उस उन्नत ज्या को पूर्वापर
अन्तरज्या से गुणा कर २ से भाग देने में फल पर्वत आदि की उच्चता होगी । दृग्
ज्या (नतज्या) से दूरता आयेगी अर्थात् नतज्या को उसी पूर्वा पर अन्तर से गुणा
कर २ से भाग देने पर पर्वत की दृगे ज्ञान होगी ।
चक्रवृत्तं तदलं चाप संज्ञं चापस्यार्द्धं यष्टि नामास्ति यन्त्रम् ।
चक्रेणा हो रात्रा कालस्तदर्द्धं चापेनां द्विज्ज्ञायते तस्य यष्ट्या । ९३ ।
चक्रयन्त्र वृत्ताकार है । उसका आधार या वृत्तार्द्धाकार चाप यन्त्र कहा जाता
है ।
पुनः चाप के आधा को यष्टि यन्त्र या तुरीय (चतुर्थांश) यन्त्र कहा जाता है ।
चक्र यन्त्र से दिन और रात का समय, चाप या वृत्ताद्धं यन्त्र से अहोरात्र का आधा,
पुन, यष्टि यन्त्र से (तुरीय यन्त्र से) दिन का अहोरात्र का चतुर्थांश (दिनार्द्ध)
निकाला जा सकता है ।
काच पात्रं युगलं परस्परं सम्मुखीन मणु मध्यरन्ध्रकम्
सं विधाय जल पूरितैकतानिः सरेदपर पात्र के जलम् । ९४ ।
ऊपर नीचे के दो कांच के बर्तनों के बीच में एक छोटा छेद होगा । जिससे
ऊपर के पात्र का जल नीचे के बर्तन में जा सके ।
यावताथ समये नतावता व्यस्त संस्थिति वशात् पुनस्ततः
ऊर्ध्वत स्थल गतेऽपि नःसरेदित्य मत्र सिकतापि निःसृतिः । ९५ ।
पहला पात्र ऊपर रहने पर उससे नीचे के पात्र में जल गिरने में जितना समय
लगता है, उसे उल्टा रखने पर ऊपर के दूसरे पात्र से उतने ही समय में पहले