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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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३५८ सिद्धान्त दर्पण
सूर्य सिद्धान्ते- ग्रह नक्षत्र चरितं ज्ञात्वा गोलं च तत्वतः
ग्रहलोकमवाप्नोति पर्ययेणात्मवान्नरः । इति । ११० ।
ग्रह नक्षत्र तथा गोल का ज्ञान होने से व्यक्ति धनी होता है तथा मरने के
बाद ग्रह लोक में जाता है ।
सिद्धान्त शिरोमणै-दिव्य ज्ञान मतीन्द्रियं यदृषिभिर्ब्राह्म्यवशिष्ठादिभि
पारम्पर्य वशाद् रहस्य मवनीं नीतं प्रकाश्यं ततः
नैतद् वेषि कृतघ्न दुर्जन दुरा राराचिरा वासिनां
स्यादायुः सुकृतक्षयो मुनिकृतां सीमामिमामुज्झतः । इति । १११ ।
ग्रहज्ञान दिव्य और अतीन्द्रिय है । यह पहले ब्रह्मा ने कहा था उसके बाद
वशिष्ठ आदि ऋषियों के क्रम. से पृथ्वी पर इसका विस्तार हुआ । इस प्रकार
पवित्र ज्ञान को हिंसक, कृतघ्न, दुर्वृत्त तथा अधिक दिन ज्ञान न रख सकने वाले
व्यक्ति को नहीं देना चाहिये ।
ऋषि मुनियो का यह आदेश नहीं मानने से आयु तथा पुण्य का नाश होता
है ।
कृति प्रति निवृत्यौ मनु जवीययो यन्महा
प्रसाद परिपूरितोदर कराननाः पावनाः
पुनन्ति पतितान् पथि स्वतनु मारुतौ मद्द्दृशौ
दृशो र्वहतु मेऽन्वहं महमदो महान्तं महः । ११२ ।
जिसका महाप्रसाद हाथ में, मुंह या पेट में लेने से पुनः जन्म नहीं होता,
जिसके द्वारा मेरे जैसे पतित भी पावन हो जाते हैं, उस महाप्रभु का तेज सदा मेरी
दृष्टि में रह कर आनन्द दे ।
इत्युत्कलो ज्वल नृपाल कुल प्रसूत
श्री चन्द्रशेखर कृतौ गणितेऽक्षि सिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बाल बोधे
विंशोऽगमत्पाटित यन्त्रकथः प्रकाशः । ११३ ।
इस प्रकार उड़ीसा के विख्यात राजकुल में उत्पन्न श्रीचन्द्र शेखर द्वारा गणना
और दृष्टि में समानता तथा बालको की शिक्षा के लिए सिद्धान्त दर्पण का यन्त्र
वर्णन सम्बन्धी २० वां प्रकाश समाप्त हुआ ।