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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

पृष्ठ 462, कुल 609 में से

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वासना शेष रहस्य वर्णन ३६५
बुद्धिमान भास्कराचार्य ने युग भगण गणना में त्रुटि होने के कारण कल्प में
पूर्ण अखण्ड भगण की कल्पना की ।
सृष्टि कालस्य च त्यागमकृत्वा कल्प वक्त्रतः ।
कालस्य गणनाञ्चक्रे लंका मंध्यार्य मोदयात् । ४१ ।
उन्होंने सृष्टि काल का त्याग कर कल्प आरम्भ से ही गणना आरम्भ की ।
कल्प आरम्भ उनके मत से लंका की अर्द्धरात्रि नहीं, मध्यम सूर्योदय से हुआ ।
कृताहर्गण संख्यया अल्पत्वा द्रविचन्द्रयोः
कलिवक्तात् स्वकालान्तं भागाद्याधिक्यपाततः । ४२ ।
कलियुग के प्रारम्भ से अपने समय तक के अहर्गण की कल्पना करने पर
उसकी संख्या अत्यन्त कम होने के कारण उससे रवि और चन्द्र निकालने पर
अंशादि का मान अधिक लगा (भास्कर को)
खाभ्र खाक्यैहृते त्वादि सिद्ध बीज कलोज्झनात्
सिद्धान्त मास्य वात्पीय समये कृतवां स्तयोः । ४३ ।
अतः उन्होंने सिद्धान्त शिरोमणि के ‘खाभ्रखाक्यैहताः कल्पयाताः समाः’
इत्यादि श्लोकों द्वारा सिद्ध बीच कला को घटाया । इससे उन्होंने अपने समय
के रवि और चन्द्र के लिए श्रेष्ठ सिद्धान्त कर दिया ।
इत्थमन्यग्रहाणाञ्च निर्माय भगणावलिम्
स्व स्वबीजैर्युतो नानां तेषां दृक् सिद्धि मैक्षतः । ४४ ।
इसी प्रकार उन्होंने अन्य ग्रहों का भी भगण आदि स्थिर कर अपने बीज को
जोड़कर या घटाकर सभी ग्रहों को दृक् सिद्ध किया ।
सिद्धान्त सिद्धि रर्केन्दोर्बीजेनापि यदिप्सिता
स्वपर्याया स्थिरत्वं हि सतेना विष्कृतं स्वयम् । ४५ ।
बीज संस्कार कर रवि और चन्द्र स्फुट किया । इससे लगा कि उनका रचित
भगण आदि निश्चित नहीं है । (नहीं तो संस्कार की आवश्यकता नहीं होती ।)
अधुनैतन्मध्यमयोः सिद्धान्त नीतयोर्यतः
दृक् सिद्धिर्भाति तस्योक्ता दृश्यते महदन्तरम् । ४६ ।
वर्तमान सिद्धान्त (सिद्धान्त दर्पण) द्वारा जिस प्रकार रवि और चन्द्र का साधन
किया जाता है, वह अच्छी प्रकार दृक् सिद्ध होता है । पर भास्कर की रीति से
करने पर बहुत अन्तर पड़ता है ।
यदि तत् पूर्व समये कश्चित्तत् सदृशः सुधीः
अकारिष्यत दृक् सिद्धिं कल्पितैः कल्प पर्ययैः । ४७ ।
यदि उनके पहले किसी ने भगण की कल्पना कर ग्रहों की दृक् सिद्धि की