सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगोलाधिकार गोलादि वर्णनम् ३५३
पट्टे के कोणों को दो ग्रहों या ग्रहनक्षत्र की सीध में रखकर यष्टि और कोण
को ग्रह की सीध में देखते हैं । पट्टी के कोण का जो अन्तर होता है, उसे ६ से
भाग देते हैं तथा त्रिज्या से गुणा करते हैं ।
निजनिजदिन जीवा भाजितै नाड़िकास्यु
र्गिरि मुख नर मूल स्वान्तरा हस्त संघात्
सकल लवक शंकु ज्या हता दृग् ज्ययाप्ता
भवति फलक राद्यं मानम द्विद्रुमादैः । ८७ ।
फल को उस दिन के अहोरात्र वृत्त के व्यासार्द्ध से भाग देने पर वह अन्तर
की नाड़ी होगी । पर्वत का अग्रभाग और शंकु मूल के बीच की दूरी को शंकुज्या
से गुणा कर दृग्ज्या से भाग देने पर पर्वत की उच्चता आयेगी । वृक्ष की उच्चता
भी इसी प्रकार निकाली जा सकती है ।
वहल सलिल वर्षं वीक्ष्यतस्योर्ध्व सीमो
न्नतनत लवकेभ्यः शंकुदृग्ज्ये विधाय
ख खशरकर (२५००) हस्ता दृग्ज्य काघ्ना नराप्ताः ।
स्व जलद तल भूम्योरन्तरं प्रायशः स्यात् । ८८ ।
खूब वर्षा करने वाले मेघ को भी देखकर मानयन्त्र से उसका उन्नतांश या
नतांश निकाला जा सकता है । उसकी दृग्ज्या को ( २५००) हाथ से गुणा करने
पर शंकु से भाग देने पर अपने और मेघ के केन्द्र तल के बीच की दूरी होगी ।
(नतज्या से भूमि की दूरी और उन्नतज्या से मेघ की जमीन से ऊंचाई ज्ञात होगी ।)
नर युगल सुसाध्यं मानमानेतु मस्मा-
दपि कलयितुशंकुस्थानयोः सन्निविष्टः
नगमुख समदृश्यं पट्टिकान्तः प्रदेशं
नरमिरितिरिति दण्ड भेदमेयान्ति कस्थम् । ८९ ।
दो शंकु द्वारा पर्वत और वृक्ष आदि की ऊंचाई निकालने की विधि में शंकु
के समान स्वयं बैठकर मान यन्त्र से पर्वत को देखा है । इस यन्त्र का डण्डा ही
शंकु है । मेघ पर्वत आदि के निकट स्थित शंकु को छाया माने)
अनिकट भुवि सिद्धे शंकु भे संस्कृते स्तः
प्रथमनर विनिघ्न्यौ दूरशंकु प्रभक्ते
कथितमपरकर्म क्ष्मा समात्रास्तु नो वा
भवति सम भगा दे रूर्ध्वं तिर्यक् प्रमाणम् । ९० ।
इस प्रकार दूर स्थान के शंकु और उसकी छाया को प्रथम शंकु से गुणा कर
२ य या दूरस्थ शंकु से भाग देने पर दो छाया आयेगी । इसके बाद की विधि
पहले कही जा चुकी है । इस विधि में पृथ्वी समतल या तिरछी हो तब भी पर्वत
की उच्चता और उसका विस्तार आयेगा ।