सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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होती
तदैवदृग् विसंवादो भासकरोक्तेर्नसंभवेत्
स्वपूर्व काल संवादा ध्यतः स्यादन्तर ग्रहः । ४८ ।
तो भास्कर की उक्ति (भगण मान) और दर्शन (वास्तविक स्थिति) में इतना
अन्तर नहीं होता । उनसे (५१६) पूर्व ब्रह्म गुप्तं के कल्प भगण के आधार पर गणना
में भेद आते देख कर
आचार्यः कल्पभगणान् यदाहेष महान् गुणः
प्रवृत्ति दिन मासादि संख्या भेदस्तु दूषणम् । ४९ ।
अपना अलग कल्प भगण कहा यह उनका महान् गुण है। लेकिन उन्होंने
कल्पादि के लंका के सूर्योदय से ग्रहविचार आरम्भ किया तथा सावन, चान्द्र
दिन, मास आदि की अलग संख्या दी वह उनका दोष है ।
तथाप्येष निजेकाले लिखित्वा दृक् समान् ग्रहान्
महोपकार मकरोत् मादृशा मल्प संविदाम् । ५० ।
तथापि उन्होंने अपने समय का दृक् सिद्ध ग्रह गणित लिखकर मेरे समान
कम ज्ञान वाले लोगों का बहुत उपकार किया है ।
आर्यभट्ट शतानन्द भास्कराणां स्वकालजैः
तत्तन्मतमानीतैः कामभट्टादि सम्मतैः । ५१ ।
आर्यभट्ट, शतानन्द और भास्कर आदि ने जो अपने समय का ग्रह (स्थिति)
निकाला तथा काम भट्ट आदि के द्वारा गणित समान किया गया
ग्रहैः स्वानीत खेटानां कृत्वा संवादमात्मनः
कालेनाहं दृष्टि सिद्धान् सृष्टवान् भगणानसून । ५२ ।
इन सभी को मैने अपने समय में अपनी रीति में निकाले गये ग्रहों से तुलना
की है और उनके अनुसार दृक् सिद्ध भगण लिखे हैं ।
तिथि भादौ घटी भेदो भाग भेदो कुजादिषु
भविष्यत्ययुताब्दान्तं नैतेभ्य इति मे मतः । ५३ ।
अतः मेरी धारणा है कि आज से अयुत (१०,०००) वर्ष बाद भी मेरी गणना
आज ही के समान दृक् सिद्ध होगी । तिथि नक्षत्र आदि में, या मंगल आदि ग्रहों
के स्पष्ट राशि अंश में कोई भेद नहीं होगा ।
त्रिकाल ज्ञान हीनत्वात् ना दृशां चिरकालतः
अंशादिभिः प्रमेदश्चेत् साक्षात्कार्यः प्रमातृभिः । ५४ ।
मैं त्रिकालज्ञ नहीं हूँ अतः चिरकाल तक मेरा सिद्धान्त स्थिर नहीं रह सकता
है । अतः एक अयुत वर्ष से अधिक समय के बाद स्पष्ट ग्रह के अंशों में भेद आने