सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवासना शेष रहस्य वर्णन ३६१
इस प्रकार अर्द्ध रात्रि से ही दिन का आरम्भ हो जाता है । अतः उत्तरायण
आरम्भ होने पर देवताओं के दिन का आरम्भ माना जाता है । और उस समय
देवताओं के दिनारम्भ कृत्य मनुष्य करने पर देवता गण प्रसन्न होते हैं ।
ब्रह्मयाति दूरगं भूमेः पश्येदा प्रलयं रविम्
दिनान्तेऽस्तमिते शेते तत्रेत्युक्तिः पुराविदाम् । १४ ।
भूमि से ब्रह्मा बहुत दूर रहने के कारण वह प्रलय होने तक सदा रवि को
देखते हैं । और उनका दिन रहता है । प्रलय होने पर सूर्य अस्त (वा नष्ट) होता
है तब ब्रह्मा की रात्रि होती है और वह शयन करते हैं ऐसा पुराणों में कहा है ।
अन्यस्य तदहः कर्तुमनेन सति भास्वतः
भ्रान्तिर्युग सहस्राभ्या मेका तस्यापि मन्यताम् । १५ ।
अन्यों का (देव, दानव और मनुष्यों का) दिन-रात एक ही सूर्य से होता है ।
ब्रह्मा की रात्रि समाप्त होने पर एक अन्य सूर्य का उदय होता है । (क्यों कि पिछला
सूर्य प्रलय में नष्ट हो जाता है )
दिनं स्याद्दर्शने भानोर्यतो रात्रि रदर्शने
पितॄणां तद्दिनं मासाशशि पृष्ठ निवासिनाम् । १६ ।
सूर्य का दर्शन होने से दिन तथा अदर्शन (छिप जाने) से रात्रि होती है ।
अतः पितृ लोक चन्द्र की सतह पर रहने के कारण एक चान्द्र मास उनका दिन
-रात होता है ।
मध्यन्दिनंस्याद्धशान्ति पूर्णिमान्ते निशादिनम्
सितेऽसिते पक्ष दले सायं प्रात रितः क्रमात् । १७ ।
अमान्त में पितरों का दिनार्द्ध तथा पूर्णान्त में उन लोगों का निशार्द्ध होता
है। शुक्ल पक्ष की अष्टमी में उन लोगों की सन्ध्या तथा कृष्ण पक्ष की अष्टमी :
(आधा में) उनका सूर्योदय होता है ।
यत्रापमण्डलं प्राच्यां लगति क्षितिजे लवे
लग्नस्तद्राशि भागाद्यमस्त लग्नः परे कजे । १८ ।
पूर्व क्षितिज में क्रान्ति वृत्त का जो अंश लगता है वही उस समय का (उस
स्थान का) लग्न है । पश्चिम क्षितिज में क्रान्ति वृत्त का जो भाग लगता है वह
उस समय का अन्त लग्न है ।
क्षितिजद्वय मध्यस्थौ प्रदेशा दधरोर्द्धव गौ
पाताल मध्य लग्ना रूयौज्ञेयौ त्रिप्रश्न दर्शनात् । १९ ।
पूर्व और पश्चिम क्षितिज के बीच में नीचे और ऊपर की दिशा में क्रान्ति वृत्त
का जो अंश लगता है उसे क्रमशः चतुर्थ और दशम् लग्न कहते हैं । इसका ज्ञान
त्रिप्रश्नाधिकार से होता है ।