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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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वासना शेष रहस्य वर्णन ३६७
पर उसका संशोधन करना पड़ेगा ।
तदा मयोक्त पूर्वेषु भगणेष्वपि विपर्ययात् ।
देया हेया वाथमाणा हानि वृद्धयनुसारतः । ५५ ।
मेरे कहे गये भगण के अनुसार यदि ग्रह स्थिति वास्तव से कम या अधिक
आती है तो उसमें कुछ जोड़ना या घटाना पड़ेगा ।
वेद तत्वानि (२५४) पञ्चेषु सिन्धवो (४५५) नव खाद्रयः । (७०९ )
रामत्वं का (१६३) समुद्रांगं रुद्राः (११६४) समेन्दु भास्कराः (१२१७) । ५६ ।
संशोधन के लिये मंगल के भगण में (२५४) जोड़ना या (४५५) घटाना
पड़ेगा । (कल्प भगण में) बुध भगण में (७०९) जोड़ना या (१६३) घटाना पड़ेगा ।
गुरु भगण में (११६४) जोड़ना या (१२१७) घटाना पड़ेगा
द्विशैल रस मेदिन्य (१६७२) श्चन्द्राष्ट गुण बाहवः । २३८१)
शराग्नि रस ने त्राणि (२६३५) खनन्द गगनाऽग्नयः (३०९०) । ५७ ।
शुक्र भगण में (१६७२) जोड़ना या (२३८१) घटाना पड़ेगा । शनि भगण में
(२६३५) जोड़ना या (३०९०) घटाना पड़ेगा ।
एवं दशविधा भेदा धनर्णत्वेन सम्मताः
भौमादेः कल्पिताः कल्प भगणानां विशुद्धये । ५८ ।
इस प्रकार भौम आदि के कल्प भगणों में संशोधन के लिये (यदि १०,०००
वर्ष बाद राशि अंश कम या अधिक हों) लिखित कल्प भागणों में इन दस राशियों
को जोड़ना या घटाना पड़ेगा ।
अत्रतु प्रथमो भेदो द्विगुणःक्वचिदिष्यते
ततो द्वि त्रिवेदघ्न स्तुर्यः पञ्चगुणावधि । ५९ ।
यहां दिया हुआ प्रथम भेद २ गुणा भी हो सकता है । तृतीय भेद, २, ३ या
४ गुणा भी हो सकता है । चतुर्थ भेद ५ गुणा तक हो सकता है ।
तथैवाष्टमपक्षः स्यात् सप्तमो दिग् गुणावधिः
अन्यो द्वित्रिगुणो ग्राह्य स्त्रयस्त्रिंशद् भिदा इति । ६० ।
इसी प्रकार ८ वां भेद २, ३, ४ या ५ गुणा हो सकता है । अन्या का २ या
३ गुणा तक होगा । इस प्रकार इन भेदों की संख्या ३३ हुयी ।
एषामन्योन्य योगाच्च ये स्तुस्ते भास्कर स्यमे
संवादात्काल योग्राह्या स्त्रिंश लिप्तान्तरा दपि । ६१ ।
भास्कर के समय और मेरे समान के बीच दृकसिद्धि में यदि ३० कला का
भी अन्तर पड़े तो यह योग वियोग करना पड़ेगा ।